बुधवार, 2 जून 2010

सरकारी बाबू समझो इशारे...

चन्दन राय
सरकारी बाबुओं और नेताओं में एक बात पर स्पष्ट मतैक्य है॥ आजादी के बाद वाले दौर से ही दोनों में इस बात की होड लगी है कि कौन भ्रष्टाचार में एक-दूसरे को पछाडता है। सरकारी बाबुओं को इस बात का अफसोस है कि आमतौर पर नेता उनसे बाजी मार ले जाते हैं। जैसे नेताओं में कई वर्ग होते हैं-छुटभैये नेता, प्रदेश और जिला स्तर के नेता या राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नेता, उसी तरह सरकारी बाबुओ में भी चपरासी से लेकर आईएएस लॉबी तक के कई लोग होते हैं। लोगों के हैसियत के हिसाब से रेट तय होता है। आम लोग भी इस बात को समझते हैं कि चपरासी है तो कुछेक हजार में काम निकल सकता है, ऊपर का अधिकारी हो तो फिर बात लाखों, करोडों तक भी जा सकती है। शायद ही कोई ऐसा हो, जिनका साबका सरकारी बाबुओं की इस बिरादरी से न पडा हो। एक बार जो इनके चंगुल में फंसा, जिंदगी भर के लिए इनसे तौबा कर लेता है। इनकी फितरत ही कुछ ऐसी होती है। चाहे राशन कार्ड बनवाना हो, ड्राइविंग लाइसेंस का रिन्यूवल करवाना हो, पासपोर्ट बनवाना हो या फिर कुछ और लालफीताशाही के फीतों में उलझकर बडों-बडों की सांसें दम तोड देती हैं। कहते हैं ऊपर से लेकर नीचे तक के बाबुओं का रेट बंधा होता है। बडा बाबू तक जाने के लिए छोटे बाबू को चढावा दिया जाता है। हालांकि सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार से देश के नेता तो नहीं उकताए, लेकिन न्यायपालिका जरूर सख्त हो गई। अभी मुंबई हाईकोर्ट ने सरकारी बाबुओं को भ्रष्टाचार के आरोप में पकडे ज़ाने पर आजीवन कारावास की सजा तजवीज की है। अपना घर साफ करते-करते न्यायपालिका को ऐसा लगा कि आस-पास के कूडों की भी सफाई होनी लाजिमी है। नहीं तो यह संक्रामक रोग फिर न्याय के मंदिर को भीतर से खोखला कर देगा। खैर यहां की व्यवस्था से हमारे मुख्य न्यायाधीश निपटें, हमारी चिंता तो लोकतंत्र के रहनुमाओं के स्थायी अधिकारियों से है। अभी मध्यप्रदेश के आईएएस लॉबी के यहां छापे के दौरान सीबीआई इस गुत्थी को सुलझाने में लगी रही कि यह पैसा तिरूपति के मंदिरों के चढावे से कितना गुना ज्यादा है। केतन देसाई के घर सीबीआई छापे के दौरान तो ऐसा लगता था मानो इनकी दिलचस्पी डॉक्टरी से ज्यादा सोना जमा करने में रही हो। एक बात तो तय है कि अगर यह सोना चंद्रशेखर सरकार के समय में होता, तो हमें अपने देश की इज्जत विदेशी बैंकों में गिरवी नहीं रखनी होती। ऐसे अफसरों के यहां कुछेक करोड पाया जाना तो आम बात है। फिर चल-अचल संपत्ति, बैंक लॉकर में जमा की गई रकम, मॉरिशस के रास्ते देश में भेजा गया टैक्स रहित पैसा, विदेशों में आलीशान कोठियां, अनगिनत हवाई यात्राएं, रिश्तेदारों के नाम संपत्ति, स्विस बैंक में काला धन और न जाने क्या-क्या? फिर ये वर्ग आम जनता को कैटल क्लास समझता भी है तो इसपर सदन में इतना हल्ला-हंगामा क्यों? सचमुच वे कीडों की तरह ही तो जी रहे हैं, विश्वास न हो तो धूल खा रही अर्जुन सेनगुप्ता की रिपोर्ट पर ही नजर दौडा लें। जब तक जीने लायक रहे जीया, नहीं तो मरने के लिए किसानों के पास कीटनाशक तो होता ही है।
मुंबई हाईकोर्ट के सब्र का बांध तभी टूटा, जब आत्महत्या करने के कगार पर खडे क़िसानों की जमाराशि को भी ये सरकारी बाबू ले उडे। ऌन प्रदेशों में तो ऐसा लग रहा है मानो आत्महत्या करने के लिए देश भर के गरीब किसान आंध्रप्रदेश, विदर्भ, बुंदेलखंड में इकट्ठे हो रहे हों। हो सकता है सरकार को इसमें विपक्षी साजिश की भी बू आती हो। हुआ यूं कि विदर्भ के गरीब किसानों का 1.30 करोड क़ा फंड एक को-ऑपरेटिव बैंक में कमिश्नर ने यह जानते हुए जमा करवाया कि एक महीने के बाद यह बैंक बंद हो जाएगा। सरकारी अफसरों की सांठ-गांठ से इन गरीबों के पैसे का हेर-फेर किया गया। इसी मामले में संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने सरकारी बाबुओं को भ्रष्टाचार के मामले में उम्रकैद दिए जाने की सलाह दी। वर्तमान नियम के तहत सिर्फ सात साल की सजा का प्रावधान है, जो कि इसे रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। उम्मीद है कि उम्रकैद का डर सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार को कुछ हद तक नियंत्रित करेगा। हालांकि कानून बनने से पहले ही सरकारी बाबू उसकी काट निकाल लेने में माहिर होते हैं। आजादी के बाद सूचना का अधिकार पहला ऐसा कानून था, जिसने इन बाबुओं की नींद हराम कर दी थी। सरकारी बाबुओं को यह बात हजम नहीं हुई कि जो तबका काम करवाने के लिए उनके आगे हाथ-पैर जोडक़र खडा रहता था, एकाएक साधिकार, गर्दन ऊंची करके उनसे बात कर रहा है। अभी भी आम आदमी के इस अधिकार पर बाबुओं की टेढी नजर है कि कैसे इस कानून को पटखनी दी जाए? अब तो सरकारी बाबुओं का मामला भी हाईटेक हो गया है। वो जमाना कल की बात हो चुकी जब सारा लेन-देन टेबल के नीचे होता था। मीडिया के स्टिंग ने सरकारी बाबुओं को काफी दंश दिया है।
अब राशन, पासपोर्ट दफ्तरों के बाहर ही सरकारी बाबुओं ने दलालों का जाल फैला रखा है। जो मोटी रकम लेने के बाद आपके काम हो जाने की गारंटी देता है, उसका एक अंश ऊपर से नीचे तक के बाबुओं में बंटता है। यही कारण है कि कमाऊ थानों के लिए थानेदार एक मोटी रकम चुकाते हैं, जिससे भ्रष्टाचार रूपी गंगा सतत प्रवाहित होती रहे। सरकार जब अपने मातहतों के बारे में यह जानने की जहमत नहीं उठाती कि मामूली तनख्वाह की बदौलत कैसे कोई नेता कुछ दिनों में ही करोडपति, अरबपति और न जाने कितने पति बन जाते हैं, तो भला सरकारी बाबुओं की लगाम कौन थामे? लूट के मामले में लोकतंत्र के हर कोने में मौन सहमति है। लूट नीति मंथन करी-लोकतंत्र में इस मंत्र का पाठ करके ही आप इस व्यवस्था का हिस्सा बन सकते हैं। बिहार में बाढ आने पर गंदे पानी में पलनेवाले जाेंक भी हर साल आ जाते हैं। बाढ में अपना घर-बार गंवा चुके लोगों को इस जोंक की भी ज्यादा चिंता नहीं होती। ये तो उस सरकारी जोंक से परेशान होते हैं, जिनके लिए बाढ, सुखाड या महामारी इनके खून चूसने का बेहतर मौसम होता है।
भारत में कई ऐसे देश हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था ही भारत जैसे भ्रष्ट देशों से आए काले पैसों पर चलती है। स्विटजरलैंड हो या मॉरीशस-ये देश अपने यहां के बैंकों में काले या सफेद पैसों को नहीं देखते। इन पैसों पर ही तो इनकी अर्थव्यवस्था का मजबूत ढांचा खडा होता है। मॉरीशस जैसे देशों में कंपनियां रजिस्टर्ड करवाने के बाद भारत में निवेश किया जाता है ताकि टैक्स से राहत मिल सके। क्या सरकार को इस बात की जानकारी नहीं-सोचना हमारी नादानी होगी। फिर सरकार के हाथ किन लोगों ने कार्रवाई करने से रोक रखे हैं-यह जानना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। यहीं से लोकतंत्र के ढोंग का पोल खुलेगा, जब अफसरशाह और राजनेता सभी इस खेल में नंगे, बेपर्दा होकर आम जनता के सामने लाए जाएंगे। आज भारत की तस्वीर ही दूसरी होती, यदि आजादी के बाद नेहरू ने आम जनता से किया अपना वादा निभाया होता। भ्रष्टाचारी बाबुओं और नेताओं को नजदीक के बिजली के पोल पर लटकाने की नेहरू की धमकी जीप घोटाले में फंसे अपने साथियों को देखकर मौन रह गई। यह देश के साथ पहला ऐसा धोखा था, जिसने भ्रष्टाचार के राक्षस को आज तक खाद-पानी देकर जीवित रखा है। आम लोगों में यह जुमला काफी प्रचलित है कि ऊंट किस करवट बैठेगा, जानना उतना ही मुश्किल है, जितना यह जानना कि सरकारी बाबू चढावे की रकम कितनी बोलेगा? हालांकि ऊंटों का नेचर काफी हद तक उन अफसरों से मिलता है जो सरकारी निर्णयों की फाइल किसी भी करवट दबाकर लेट जाते हैं और हुकूमत इस खुशफहमी में होती है कि उन योजनाओं का लाभ नीचे के लोगों तक पहुंच रहा होगा। कितने भी रोजगार गारंटी लागू कर लो, बिना व्यवस्था के बदले गरीबों के घर में मानसून नहीं आने वाला। तभी तो एक बार भटकता हुआ भ्रष्टाचार का राक्षस व्यंग्यकार शैल चतुर्वेदी के घर आकर अपना परिचय देता है- ''मैं आज का वक्त हूं, कलयुग की धमनियों में बहता हुआ रक्त हूं, मेरे ही इशारे पर रात में हुस्न नाचता है और दिन में पंडित रामायण बांचता है। '' इन हालातों में सरकारी बाबूओं की क्या बिसात जो उम्रकैद के डर से भ्रष्टाचार से तौबा कर लें?

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