मंगलवार, 1 जून 2010

फैसले से बंधे सूबों के हाथ

चन्दन राय
सीबीआई जांच में कोई अभियुक्त अगर निचली अदालत से ही बरी हो जाता है और सीबीआई उच्च न्यायालय में अपील नहीं करती, तो राज्य सरकार अपराधी को सजा दिलाने के लिए कुछ भी नहीं कर सकती। यह केंद्र पर निर्भर करता है कि वह इस मामले में अपील दायर करेगी या नहीं। या हो सकता है इसका इस्तेमाल राजनैतिक विरोधियों को अपने पाले में रखने के लिए करे। सत्ता में कोई किसी का सगा नहीं होता और हमेशा के लिए कोई दुश्मन नहीं होता-ये मुहावरा आज सत्ता के चाल-चरित्र का बखूबी वर्णन करते हैं। ऐसे में जैसे ही कोई राजनैतिक अभियुक्त केंद्र से दूरी बनाने का प्रयास करता है, उसके पुराने मामलों को लेकर सीबीआई न्यायालय पहुंच जाती है। यही एकमात्र डर विरोधी दल के नेताओं को सांसत में रखने के लिए काफी है।
हालांकि इससे पहले पटना हाईकोर्ट ने लालू दंपत्ति को बरी करने के फैसले के खिलाफ दाखिल राज्य सरकार की याचिका को स्वीकार कर लिया था। इसके बाद लालू ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अब भाजपा इस मामले को लेकर प्रधानमंत्री पर दवाब डालने का प्रयास कर रही है कि वह सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने का निर्देश दें। एक बात तो तय है कि इस फैसले के बाद अब सीबीआई से संबंधित मामले केंद्र सरकार के इशारों पर ही चलेंगे, जबकि राज्यों के अधिकार सीमित हो जाएंगे। सीबीआई का मामला केंद्र बनाम राज्य के बीच उलझकर रह गया है। राजनीतिक जानकार इस फैसले को राज्याें की शक्ति को कमजोर करने वाला बता रहे हैं। हालांकि राज्य सरकारें मामला आपराधिक हो या भ्रष्टाचार का, अब सीबीआई जांच की मांग उठाने से पहले सौ बार सोचेंगे।
इन दिनों देश की राजनीति कहां से तय होती है? अगर आप व्यवस्था से अनभिज्ञ हैं, तो आपका जवाब होगा, यह भी कोई पूछने की बात है, अधिकांश फैसले तो सेवन रेसकोर्स से ही लिए जाते हैं। अगर आप राजनीति के चतुर पंडित हुए तो आपका इशारा दस जनपथ की तरफ होगा। लेकिन आप सोच भी नहीं सकते कि दिल्ली के संभ्रांत इलाके लोधी रोड में भी एक ऐसा आवास है, जहां से सत्ता की धुरी को नियंत्रित किया जाता है, खासकर राजनैतिक विरोधियों को मजा चखाने के लिए। तो हम आपको बताते चलें- ये है देश की सबसे प्रतिष्ठित जांच एजेंसी सीबीआई का मुख्यालय यानी सीजीओ कॉम्पलैक्स। ये हम नहीं कह रहे, बल्कि तमाम राजनैतिक पार्टियां सीबीआई की वैधानिकता पर सवाल खडे क़रते रही हैं। आज राजनीति के गलियारों में वैधानिकता के साथ-साथ इसकी विश्वसनीयता पर भी ऊंगलियां उठने लगी हैं। यूपीए सरकार के मंत्रियों ने भी पिछले साल सदन में प्रश्न काल के दौरान इस तरह के सवाल खडे क़िए थे। ऐसा नहीं होता, तो क्या कारण है कि लालू जब केंद्र के साथ होते हैं, सीबीआई की जांच-प्रक्रिया धीमी हो जाती है। और उनके केंद्र-विरोधी तेवर अख्तियार करते ही उनके खिलाफ मामलों में तेजी आ जाती है। जहां आम जनता इस बात पर जोर दे रही थी कि सीबीआई पर केंद्र सरकार के नियंत्रण को कमजोर किया जाए, वहीं सुप्रीम कोर्ट के एक ताजा फैसले ने इसे और मजबूत ही किया है। आय से अधिक संपत्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लालू दंपत्ति को राहत देते हुए कहा कि सीबीआई जांच से बरी किए जाने पर या तो केंद्र सरकार अपील कर सकती है या खुद सीबीआई, राज्य सरकार को ऐसे मामलों में अपील दायर करने का अधिकार नहीं। एक बार फिर राज्यों के अधिकार छीनकर सीबीआई पर केंद्र की जकडन को मजबूत किया गया है।
अपने इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को पटना हाईकोर्ट में अपील दायर करने के अधिकार को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट का कहना है कि लालू दंपत्ति के खिलाफ सीबीआई ने ही अभियोग चलाया था। हालांकि इससे पहले पटना हाईकोर्ट ने लालू दंपत्ति को बरी करने के फैसले के खिलाफ दाखिल राज्य सरकार की याचिका को स्वीकार कर लिया था। इसके बाद लालू ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अब भाजपा इस मामले को लेकर प्रधानमंत्री पर दवाब डालने का प्रयास कर रही है कि वह सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने का निर्देश दें। एक बात तो तय है कि इस फैसले के बाद अब सीबीआई से संबंधित मामले केंद्र सरकार के इशारों पर ही चलेंगे, जबकि राज्यों के अधिकार सीमित हो जाएंगे।
सीबीआई का मामला केंद्र बनाम राज्य के बीच उलझकर रह गया है। राजनीतिक जानकार इस फैसले को राज्याें की शक्ति को कमजोर करने वाला बता रहे हैं। हालांकि राज्य सरकारें मामला आपराधिक हो या भ्रष्टाचार का, अब सीबीआई जांच की मांग उठाने से पहले सौ बार सोचेंगे। उसकी वजह यह है कि सीबीआई जांच में कोई अभियुक्त अगर निचली अदालत से ही बरी हो जाता है और सीबीआई उच्च न्यायालय में अपील नहीं करती, तो राज्य सरकार अपराधी को सजा दिलाने के लिए कुछ भी नहीं कर सकती। यह केंद्र पर निर्भर करता है कि वह इस मामले में अपील दायर करेगी या नहीं। या हो सकता है इसका इस्तेमाल राजनैतिक विरोधियों को अपने पाले में रखने के लिए करे। सत्ता में कोई किसी का सगा नहीं होता और हमेशा के लिए कोई दुश्मन नहीं होता-ये मुहावरा आज सत्ता के चाल-चरित्र का बखूबी वर्णन करते हैं। ऐसे में जैसे ही कोई राजनैतिक अभियुक्त केंद्र से दूरी बनाने का प्रयास करता है, उसके पुराने मामलों को लेकर सीबीआई न्यायालय पहुंच जाती है। यही एकमात्र डर विरोधी दल के नेताओं को सांसत में रखने के लिए काफी है। लोकतंत्र में संख्या-बल मायने रखता है ऐसे में एक भी सांसद के इधर-उधर होने से केंद्र की सत्ता डगमगाने लगती है। पहले तो कांग्रेस सरकार में शामिल करने के लिए मायावती पर डोरे डालने में लगी रही, मामला नहीं बनता देखकर केंद्र ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना ही जरुरी समझा। राजनैतिक विश्लेषकों की मानें तो कांग्रेस यूपी में अपना जनाधार बढाने के लिए दलित कार्ड खेलने की तैयारी में है, जिसके मार्ग में मायावती एकमात्र बाधा हैं। यही कारण है कि आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआई यूपी की मुख्यमंत्री मायावती पर नकेल कसने की कोशिश करती रही है। केंद्र के निर्देश पर ही मायावती के मामले में सीबीआई कभी नरमी, तो कभी गरमी का रूख अख्तियार करती रही है।
अभी तक अपराध की सीबीआई जांच की सिफारिश करने की मांग राज्य सरकारें ही करती रही हैं। लेकिन अब अपील करने का अधिकार केंद्र के पाले में होगा, ऐसे में राज्य सरकारें अपने हाथ बांधना नहीं चाहेंगी। अब राज्य सरकार को अगर लगता है कि किसी व्यक्ति ने राज्य की संपत्ति की हानि पहुंचाई है, तब भी चुप रहने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं। उसे पता है आखिर में मामला सीबीआई के पाले में ही जाना है। हालांकि इसके पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के मामले को लेकर राज्य के अधिकारों पर चोट की है। अगर किसी मामले की सीबीआई जांच कराने का फैसला उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट करती है, तो ऐसे में संबंधित राज्यों से सहमति लेने की जरुरत नहीं।
फिर बात करते हैं लालू यादव की राजनीति पर। दरअसल लालू बिहार में सुशासन का नारा देने वाले नीतीश कुमार के खिलाफ प्रदेश में कांग्रेस का साथ चाह रहे थे। पिछले चुनाव में टिकटों के बंटवारे में कांग्रेस को दरकिनार किए जाने के कारण कांग्रेस प्रमुख नाराज चल रही थीं। यूपीए सरकार से संबंध सुधारने के संकेत लालू लंबे समय से दे रहे थे। हालांकि महिला आरक्षण विधेयक को लेकर संसद में उनके तेवर गरम दिखे। केंद्र को भी इस विधेयक को पारित कराने के लिए लालू के समर्थन की जरुरत थी। इसके साथ ही अभी बिहार में राज्य सभा का चुनाव भी होना है। रामविलास पासवान को राज्य सभा में भेजने के लिए लालू कांग्रेस की मदद करने का संकेत दे चुके थे। यही कारण है कि राजनैतिक जोड-तोड क़ा फायदा लालू को सीबीआई मामलों में बरी कर दिया गया, राजनैतिक विश्लेषकों का ऐसा मानना है। हालांकि चारा घोटाले में भ्रष्टाचार के कई मामले अभी भी लालू यादव का सुख-चैन छीन सकते हैं। लेकिन कांग्रेस के सहारे ही वे उम्मीद लगाए हैं कि उनकी डगमग नैया इस बाधा को पार कर लेगी।
अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष बूटा सिंह भी इससे पूर्व सीबीआई पर राजनैतिक षडयंत्र का आरोप लगाते हुए यह कहते रहे हैं कि सीबीआई जांच एजेंसी की भूमिका का निर्वाह सही तरीके से नहीं कर रही। यह आरोप उन्होंने बेटे स्वीटी सिंह पर एक करोड रुपए घूस लेने के आरोप में चल रहे सीबीआई जांच को लेकर लगाए थे। राजनैतिक संरक्षण में भ्रष्टाचार के पनपने के पीछे यह भी एक कारण रहा है। जहां सत्ताधारी दल के नेताओं को सीबीआई जांच के मामलों में एक तरह से अघोषित छूट का होना शामिल है। हालांकि कई ऐसे मामले हैं, जिनमें सीबीआई को ढीला-ढाला रवैया अपनाने के कारण सुप्रीम कोर्ट की फटकार भी सुननी पडी है।
कुछ ऐसे राजनैतिक मामले जिनमें सीबीआई की भूमिका संदिग्ध रही है उनमें हैं-झारखंड के मुख्यमंत्री शिबु सोरेन को उच्च न्यायालय द्वारा बरी किए जाने के मामले में सीबीआई का अपील दायर नहीं करना। दूसरा मामला कांग्रेस सरकार के ही अजित जोगी के बेटे अमित जोगी का है जिसमें रामअवतार जग्ग्गी हत्या मामले में कोर्ट द्वारा बरी किए जाने के मामले में भी सीबीआई मौन रही। तो देश के बहुचर्चित मामले बोफोर्स में भी हिंदूजा बंधुओं को हाईकोर्ट द्वारा आरोपमुक्त किए जाने पर सीबीआई ने आरोप पत्र दाखिल करना जरुरी नहीं समझा।
भारत एक संघीय प्रदेश है। आज विकेंद्रीकरण का युग है जिसमें सत्ता का बंटवारा केंद्र से पंचायतों की ओर होना है। ऐसे में राज्यों के अधिकारों में कमी किए जाने को लोकतंत्रवादी संदेह की नजरों से देख रहे हैं। सीबीआई की स्थापना विशेष पुलिस स्थापना अध्यादेश के जरिए की गई है, जो ब्रिटिश शासन में जारी किया गया था। अगर सीबीआई को अपनी साख बचानी है, तो उसे क्षुद्र राजनीति से दूर ही रखना होगा। इसके लिए जरुरी है इस जांच एजेंसी को गृह मंत्रालय के चंगुल से मुक्त कर एक स्वतंत्र इकाई के रूप में स्थापित किया जाए। हालांकि इस मामले में केंद्र सरकार से यह उम्मीद करना नाकाफी होगा कि वह इस मामले में पहल कर अपने पर कतरने को तैयार होगी।
अन्य मामले जिसमें नहीं हुई अपील
बोफोर्स मामला- इसमें उच्च न्यायालय का हिंदूजा बंधुओं को आरोप मुक्त करने का फैसला जिसका पूरे देश में कडा विरोध हुआ।
शशिनाथ झा हत्याकांड- इसमें उच्च न्यायालय द्वारा झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को बरी किए जाने के बाद सीबीआई के कार्यप्रणाली पर तीखी बहस।
रामअवतार जग्गी हत्याकांड- इस हत्याकांड में कांग्रेस नेता अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को बरी करने का निर्णय लिया गया था।

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