शुक्रवार, 28 मई 2010

कबाड नहीं, मौत का बाजार

चंदन राय
इराक-ईरान युद्ध के समय तो न जाने कई मिसाइल, बारूद, रॉकेट लांचर एवं जिंदा बमों की कई खेप कबाड बाजार में चली आई थी। यही नहीं अमरीका, यूरोपीय देशों, सिंगापुर एवं अरब देशों से बड़े पैमाने पर आयात करके कबाड़ यहां लाया जाता है। ताजुब की बात तो यह है कि जिंदा बम मिलने की घटना के बाद भी विदेशों से आने वाले कबाड़ की सख्ती से जांच नहीं की जाती। जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि कबाड़ की किसी भी वस्तु की तोड़-फोड़ करने से पहले मशीनों से जांच कर इन्हें अलग निकाल लेना चाहिए। लेकिन हालात तो ये हैं कि आज एमसीडी से लेकर पुलिस अधिकारी भी ऐसे कबाड क़ो लेकर अपने आंख-कान मूंदे रहते हैं
आ पके घर को खूबसूरत बनाने के लिए एक ऐसी जगह होती है, जहां बेकार पडी चीजों को फेंका जा सके। यानी कह सकते हैं कि कबाडख़ाने की बदसूरती पर ही आपके घर की सुंदरता है। ठीक यही हाल अमरीका, यूरोप जैसे देशों का भी है, जो अपने यहां की फालतू चीजों को भारत जैसे देशों में खपा देते हैं। हम बडे चाव से उन चीजों को मेड इन यूएसए की शेखी बघारते हुए यार-दोस्तों पर रौब जमाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन अब सावधान हो जाएं। ऐसी शेखी दिखाना आपके सेहत पर भारी पड सकता है क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बडा कबाडख़ाना बनने जा रहा है। बारूद के ढेर पर बैठा हमारा देश कई भूषण स्टील जैसे विस्फोटों को अपने गर्भ में छिपाए है। जो समय-समय पर लोगोें को अपना विकराल रूप दिखाकर आने वाले खतरे से आगाह करता रहा है।
ई-कचरा हमारे अस्तित्व के लिए ही चुनौती बनता जा रहा है। भारत एक बार फिर सुर्खियों में रहा-एशिया की सबसे बडी क़बाड मंडी मायापुरी में एक रहस्यमयी विकिरण के कारण, जो दिल्ली में पांच लोगों पर कहर बनकर आई। उनका पूरा शरीर काला पड ग़या और बाल एवं नाखून झडने लगे। जब तक बीमारी का कारण समझ में आता, मायापुरी का पूरा इलाका दहशत में रहा। तो जनाब, इस समस्या के जड में था-रेडियोधर्मी तत्व कोबाल्ट-60 जिससे हुए विकिरण ने लोगों की नींद उडा दी। मायापुरी एक ऐसी जगह बन गई है, जहां न सिर्फ पूरे देश से कबाड़ आता है, बल्कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों के कबाड़ को खपाने के लिए भी यह काफी महफूज जगह मानी जाती है।
कोबाल्ट एक ऐसा रेडियोएक्टिव तत्व है जो यूरेनियम से भी ज्यादा खतरनाक है। इसके एक्टिव होने के बाद इससे निकलने वाली गामा किरणें शरीर को झुलसा देती हैं, जो जानलेवा हो सकती हैं। इसका इस्तेमाल अमूमन आभूषणों के रंग-रोगन, कैंसर रोगियों के इलाज एवं स्टील वेल्ंडिग में धडल्ले से किया जाता है। संभव है कि यह तत्व अस्पतालों की असावधानी की वजह से यहां पहुंचा हो। लेकिन इससे पहले कचरों के ढेर में हुए विस्फोटों के लिए हमारे पास क्या बहाना हो सकता है? इसके लिए हमारे सुरक्षा अधिकारी भी कम जिम्मेदार नहीं, जो करोडाें टन आयातित ई-कचरे को बिना जांच किए पास करने देते हैं। इसके साथ ही वे औद्योगिक संस्थान भी जिम्मेदार हैं, जो खतरनाक तत्वों को निष्क्रिय किए बिना ही मासूम कबाडियों को मौत की सौगात के रूप में कबाड भेज देते हैं।
कुछ लोगों का कहना है कि यह कबाड भी विदेशों से ही आयात किया गया था। बंदरगाहों पर बिना जांच के ही विस्फोटक, रेडियोएक्टिव एवं जहरीले कबाडाें का पास किया जाना हमारे सुरक्षा उपायों की पूरी तरह पोल खोल देता है।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक केवल भारत में 2020 तक खराब कंप्यूटरों का कबाड 500 ग़ुना तक बढ़ सकता है। सेलफोन से कबाड ऌसी अवधि के दौरान बढक़र 18 गुना तक हो जाएगा। हर साल विश्व भर से 4 करोड़ टन ई-वेस्ट पैदा होता है। इसमें अकेले 30 लाख टन केवल अमरीका पैदा करता है। इसमें कंप्यूटर के अलावा टेलीविजन, फ्रिज, प्रिंटर, टेलीफोन, मोबाइल और कई बिजली के उपकरण भी शामिल हैं, जो ई-वेस्ट पैदा करते हैं। इन खतरनाक कचरों के लिए उपभोगवादी अमरीकी सोच जिम्मेदार है। अंधाधुंध उपभोगवाद के कारण हमारी जरूरतें रोज बदलती जा रही हैं। ब्लैक एंड व्हाईट टीवी से कलर और फ्लैट्रॉन से आगे की यात्रा न जाने कहां खत्म होगी? नई चीजें आती हैं, तो हर पुरानी चीज कबाडख़ाने यानी की भारत जैसे देशों में भेज दी जाती है।
हाल ही में अमरीका से चला कबाडाें से भरा जहाज इंडोनेशिया भेजा गया था। इस जहाज में टेलीविजन, कंप्यूटर के स्क्रीन एवं सेलफोन के पुराने उपकरण भरे पडे थे। वहां की सरकार ने ई-वेस्ट की तस्करी से अपने देश को बचाने की गुहार लगाते हुए अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को इसके खतरों से आगाह किया था। वहीं भारत जैसे देश तो ऐसा लगता है मानो मौत का सामान इकट्ठे करने के लिए लालायित हैं।
विदशियों की साजिश का एक नमूना गुजरात के अलंग में देखने को मिलता है। यहां जहरीले जहाजों को तोडने का काम किया जाता है। अमरीका के पास करीब 300 ऐसे जहाज हैं, जिन्हें वह ठिकाने लगाना चाहता है। दरअसल, जहाज 40-45 साल बाद बर्बाद हो जाते हैं। उन्हें जहर मुक्त करने में 35 से 50 मिलियन यूरो का खर्च आता है। इसे बचाने के लिए जहाज को भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे विकासशील देशों में डंप करने का जुगाड़ भिड़ाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय संधि के मुताबिक, जब तक जहाज को पूरी तरह क्लीन घोषित न कर दिया जाए, तब तक उसे किसी देश में टूटने के लिए नहीं भेजा जा सकता। लेकिन पर्यावरण एवं सुरक्षा मानकाें की अनदेखी करते हुए इन जहाजों को यहां तोडा जा रहा है।
अमरीकी सरकार बिक्री बढाने के लिए पुरानी कार की जगह नई कार लेने पर छूट की घोषणा करती है। इस योजना को पश्चिमी देश कैश फॉर क्लंकर्स कहते हैं। हालांकि छूट तो भारत सरकार भी देती है, लेकिन उसका कारण पुरानी कारों से होने वाले हानिकारक कार्बन गैसों का उत्सर्जन कम करना होता है। अगर तकनीकी उपकरणों की बात करें तो इनके मॉडल जितनी तेजी से बदलते हैं, उनका सेकेंड हैंड बाजार उतनी तेजी से नहीं बढता। ऐसी चीजें महानगरों में कबाड क़े रूप में भेज दी जाती हैं। मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु आज देश में ई-वेस्ट के मामले में सबसे ऊपर हैं। किसी कवि की एक छोटी-सी कविता में हमारा यह पूरा मानव-व्यापार छिपा है :
उन्होंने बहुत-सी चीजें बनाईंऔर उनका उपयोग सिखायाउन्होंने बहुत सी और चीजें बनाईं दिलफरेबऔर उनका उपभोग सिखायाइस कारोबार ने दुनिया को फाड़ा भीतर से फांक-फांकबाहर से सिल दिया गेंद की तरह ठसाठस कबाड़ भरा विस्फोटक हैअंतरिक्ष में लटका हुआ पृथ्वी का नीला संतरा। धीरे-धीरे कबाड क़ा पहाड ऌकट्ठा होता चला गया और उसे खपाने के लिए हमारे जैसे गरीब
देश आगे आए।
दरअसल भारत में गरीबी का ये आलम है कि वहां के ठुकराए माल बेचकर कबाडी भी माला-माल हो जाते हैं। विदेशों से आया कपडा शहरों के सप्ताह में लगनेवाले मेलों में देखा जा सकता है, जिसे खरीदने के लिए लोगों का हुजूम निकल पडता है। यही हाल मोबाइल, टेलीविजन और कंप्यूटर को लेकर भी है, जिसका कारोबार नेहरू प्लेस से लेकर गफ्फार मार्केट तक फैला है। खतरनाक कचरों के निपटारे पर इतना खर्च आता है, जितना कि उनके निर्माण पर भी नहीं होता। इससे पर्यावरण को तो नुकसान पहुंचता ही है, साथ ही मानव स्वास्थ्य के लिए यह जानलेवा भी साबित होता है। इनसे खतरा और बढ ज़ाता है जब इन खराब उपकरणों को जलाकर सोना और चांदी जैसी कीमती धातुएं को जमा किया जाता है। कंप्यूटर, टेलीविजन और मोबाइल जैसे उपकरणों को रिसाइकिल करने के लिए जब जलाया जाता है, तो इनसे जहरीली गैस निकलती है, जो कैंसर जैसी बीमारियों को जन्म देती है। अगर आप धूम्रपान करते हैं, तो घबडाने की जरूरत नहीं। इससे ज्यादा घातक बीमारियां तो हमें मोबाइल के इस्तेमाल से ही हो सकती हैं। वैज्ञानिकों की मानें तो मोबाइल से होने वाले इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडिएशन (ईएमआर) से ब्रेन डैमेज व हृदय संबंधी बीमारी, कैंसर, त्वचा रोग, ऑस्टियोपोरोसिस, ब्लड प्रेशर, थकान, स्मृति-लोप आदि समस्याएं हो सकती हैं। तो है न यह धूम्रपान से भी ज्यादा हानिकारक।
मोबाइल टॉवर से निकलने वाला रेडिएशन तो इतना तेज होता है कि इस पर चिड़िया भी नहीं बैठ पाती। यही कारण है कि हमारे घर-आंगन में चहकनेवाली गौरेया अब घरों के आस-पास भी नहीं दिखती।
इराक-ईरान युद्ध के समय तो न जाने कई मिसाइल, बारूद, रॉकेट लांचर एवं जिंदा बमों की कई खेप कबाड बाजार में चली आई थी। यही नहीं अमरीका, यूरोपीय देशों, सिंगापुर एवं अरब देशों से बड़े पैमाने पर आयात करके कबाड़ यहां लाया जाता है। ताजुब की बात तो यह है कि जिंदा बम मिलने की घटना के बाद भी विदेशों से आने वाले कबाड़ की सख्ती से जांच नहीं की जाती। जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि कबाड़ की किसी भी वस्तु की तोड़-फोड़ करने से पहले मशीनों से जांच कर इन्हें अलग निकाल लेना चाहिए। लेकिन हालात तो ये हैं कि आज एमसीडी से लेकर पुलिस अधिकारी भी ऐसे कबाड क़ो लेकर अपने आंख-कान मूंदे रहते हैं। जब इन कबाड क़े ढेर में विस्फोट होता है और कई निर्दोष लोग इसकी भेंट चढ ज़ाते हैं, तब सरकार थोडी देर के लिए नींद से जागती है, फिर एक लंबी नींद सो जाने के लिए। ऐसे में कहा जा सकता है कि भारत का कबाड बाजार बारूद के ढेर पर बैठा है।

कैसे जिएं निगहबां?

चंदन राय
जवानों को एक साथ दो मोर्चों पर लडना पड रहा है। माओवादी तो समस्या हैं ही, कब कहां से आएं और दन-दनाकर फायरिंग शुरू कर दें। लेकिन एक और हमलावर है जो उनसे ज्यादा फुर्तीला और खतरनाक है, गुरिल्ला वार में तो वह दुनिया की तेज-तर्रार फौज के भी छक्के छुडा सकता है। ये हैं मलेरिया के मच्छर, जो सुनसान जंगलों में जानलेवा साबित होते हैं, जहां इलाज के लिए दूर-दूर तक कोई अस्पताल नहीं। साथ में कोई डॉक्टर नहीं, जो वक्त-बेवक्त इलाज के लिए आगे आए। बिल्कुल असहाय, उपलब्ध जडी-बूटियों से अनभिज्ञ, धीमे-धीमे बीमार और कमजोर होने के अलावा कोई चारा नहीं और जंगल का कानून है कि वह कमजोर लोगों का साथ नहीं देता।
जंगलों में रहने-खाने-जीने के अभ्यस्त माओवादी, कहते हैं जंगल में मलेरिया के मच्छर और सांप-बिच्छू से लेकर खूंखार जानवर तक इनके पास नहीं फटकते। आसपास कोई अस्पताल नहीं, तो भी कोई समस्या नहीं, इनके भाई-बंधु आदिवासी जडी-बूटियों से ही अपना इलाज करते हैं। पीने का पानी नहीं, चलो जंगल में प्रकृति का दिया तालाब तो है। कमांडो ट्रेनिंग ने इनकी मारक क्षमता को कई गुना बढा दिया है। जंगल ही देवता है, वही पालनहार और वही तारणहार, सरकार के गुड गवर्र्नेंस का नारा अभी इन जंगलियों तक नहीं पहुंचा है। आखिर शहरों की सभ्यता को चीरकर गुंजती मीडिया की चीख-पुकार भी जंगल की सरहदों को पार नहीं कर पाती। इन्हीं के बीच है एक ऐसी आदिम सभ्यता, जो सरकारी हस्तक्षेप के कारण विलुप्त होने के कगार पर है। अगर इनके पास शैंपू या ब्रेड जैसी कोई चीज हो, तो पुलिस एक झटके में इन्हें नक्सली मान लेती है। जरुर शहर में आना-जाना होगा और जो शहर के संपर्क में है, वह माओवादी तो होगा ही। ऐसे खतरनाक लोगों को मारने के लिए सीआरपीएफ के जवानों को जंगल की सरहदों में छोड दिया गया है। बिना जंगल के नियम-कानूनों को समझे, बिना विशेष प्रशिक्षण के, बिना उचित दवाओं और मच्छरदानियों के, माओवादियों से भी ज्यादा खूंखार जंगली जानवरों के बीच।
सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट, जिसके खिलाफ माओवादी समाज से लड रहे हैं, ही जंगल का कानून है। एक झटके में ही 76 सीआरपीएफ के जवान शहीद हो जाते हैं। ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाने वाली सरकार को क्या इस बात का अंदाजा नहीं कि जंगल की लडाई के क्या कायदे-कानून होते हैं? आखिर क्यों सरहद की रक्षा करने वाले जवानों को देश की सीमा के अंदर युध्द जैसी स्थिति पैदा कर मरने के लिए छोड दिया जाता है। 9 फीसदी की विकास दर पर मचलने वाले देश के पास क्या इतना भी पैसा नहीं कि अपने सैनिकों के लिए एक मच्छरदानी भी खरीद सके।
वीर जवानों की शहादत ने कई ऐसे अहम सवाल छोड दिए हैं, जो हमें शर्मसार करते हैं। अब जानकारी मिल रही है कि माओवादियों के पास लाईट मशीन गन भी था, स्वचालित हथियारों से लैस करीब 1000 माओवादियों ने हमले की योजना महज वारदात के कुछ घंटे पूर्व ही बनाई थी। गुरिल्ला वार में माहिर माओवादियों को इस बात की जानकारी थी कि ये जवान आने-जाने के लिए इन्हीं रास्तों का उपयोग करते हैं। त्वरित कार्रवाई करते हुए उन्होंने जवानों पर हमला बोला था। हमारे जवान भी गोला, बारूद खत्म होने तक हमले का जवाब देते रहे। एक लंबी लडाई के लिए जरुरी है कि हमारे जवानों के हौसले बुलंद हों। उन्हें यह महसूस हो कि उनकी शहादत के पीछे देश की इज्जत, प्रतिष्ठा के साथ ही लोकशाही का समर्थन भी है। अगर जंगल में हमलों के दौरान उनका ध्यान जंगली जानवरों, मच्छरों, पीने के पानी की तरफ रहा, तो युध्द में हार निश्चित है। हमारे जवानों का मनोबल ऊंचा रखने के लिए जरुरी है कि उनकी छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा किया जाए। उन्हें इलाके की पुख्ता जानकारी हो, माओवादियों की गतिविधियों पर पैनी नजर हो, साथ ही राज्य पुलिस भी खुलकर मदद करे। भूखे-प्यासे और आधे-अधूरे मनोबल से युध्द नहीं लडे ज़ाते।
जवानों को एक साथ दो मोर्चों पर लडना पड रहा है। माओवादी तो समस्या हैं ही, कब कहां से आएं और दन-दनाकर फायरिंग शुरु कर दें। लेकिन एक और हमलावर है जो उनसे ज्यादा फुर्तीला और खतरनाक है, गुरिल्ला वार में तो वह दुनिया की तेज-तर्रार फौज के भी छक्के छुडा सकता है। ये हैं मलेरिया के मच्छर, जो सुनसान जंगलों में जानलेवा साबित होते है, जहां इलाज के लिए दूर-दूर तक कोई अस्पताल नहीं। साथ में कोई डॉक्टर नहीं, जो वक्त-बेवक्त इलाज के लिए आगे आए। बिल्कुल असहाय, उपलब्ध जडी-बूटियों से अनभिज्ञ, धीमे-धीमे बीमार और कमजोर होने के अलावा कोई चारा नहीं। और जंगल का कानून है कि वह कमजोर लोगों का साथ नहीं देता। थके-हारे जवान माओवादियों से लडें या कमजोर साथियों को सहारा दें। कमोबेश जंगल में स्थित सभी कैंप कुछ ऐसे ही हालत से गुजर रहे हैं। तो ये है जंगल का सच, जो दुश्मन देशों के दांत खट्टे करने वाले सैनिकों के मनोबल को भी चकनाचूर कर देता है।
एक ऐसे युध्द में जहां जीत की कोई गुंजाइश नहीं, भूखे-प्यासे जवानों को भेजना कहां तक उचित है? सेना के लिए एक अलग से रसद-सामग्री ले जाने के लिए सैनिकों की टुकडी होती है। दिन में दुश्मनों से लडते समय भी उन्हें पता है कि चलो रात तो भूखे पेट नहीं सोना होगा। ड्राई फ्रूटस के अलावा कई तरह के पौष्टिक आहार सैनिकाें को दिए जाते हैं। लेकिन इस युध्द में क्या हमने उम्मीद लगाई थी कि सीआरपीएफ के जवान भूखे पेट लडक़र भी इन्हें चुटकियों में मसल देंगे। युध्द लडना ही है तो हमें जवानों को मूलभूत सुविधाएं देनी होंगी। जंगल में जवानों का तो ये हाल है कि प्यास लगने पर इन्हें मीलों दूर जाना पडता है। कैंप में पानी के लिए पंप तो लगे हैं, लेकिन बिजली रहे तब तो पानी मिले। जवानों को इस बात का अंदाजा भी नहीं होता कि पानी की तलाश में निकलने पर आगे कोई तालाब भी होगा। एक खतरा ये भी होता है कि माओवादी पानी की तलाश में निकले जवानों पर घात लगा सकते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि जंगल की भीषण गर्मी जवानों को पानी के ठिकानों की ओर जरुर खींच लाएगी। अगर कभी जलाशय मिलते भी हैं, तो जानवर उसे इतना प्रदूषित कर चुके होते हैं कि ऐसे पानी पीना खुलेआम मौत को आमंत्रण देना होता है।
गुरिल्ला वार से अनभिज्ञ जवान जिन गाड़ियां में थे, वे बारूदी सुरंग निरोधी नहीं थीं बल्कि महज बुलेट प्रुफ थीं। क्या सरकार को इस बात की जानकारी थी कि माओवादियों ने जगह-जगह पर बारूदी सुरंगें बिछा रखी हैं। फिर ऐसे वाहन में उन्हें भेजना, तो सीधे मौत के मुंह में भेजना ही कहा जा सकता है। जांच के दौरान पता चला है कि उस दिन माओवादियों ने जवानों को चारों तरफ से घेर लिया। माओवादी पहाड़ी पर थे और उन्होंने गांव को जोड़ने वाले रास्ते को भी बंद कर रखा था। ऊंचाई पर होने का फायदा उन्हें इस लडाई में मिला। अभी सरकार ने इस बात की घोषणा की है कि जवानों को जंगल में विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। इन्हें भारी हथियार लेकर पेड पर चढने की भी टे्रनिंग दी जाएगी। एकाएक हमला करने एवं हमले के बाद छुप जाने की ट्रेनिंग भी इसका एक हिस्सा होगा। लेकिन जंगल के चप्पे-चप्पे से वाकिफ माओवादियों से लड पाना जवानों के लिए फिर भी एक चुनौती होगी।
यों भी 76 जानें कोई मामूली नहीं, वीर जवानों की थीं, जिनके प्रशिक्षण पर देश के करोडाें रुपए लगे होते हैं। अगर एक व्यक्ति पर पांच लोग भी निर्भर थे तो इससे 380 लोगों के जीवन में अंधकार और दुख का साया मंडराने लगा है। सरकार को इस बात की तलाश करनी होगी कि आखिर इन इलाकों में माओवादी क्यों एकाएक बढ़े। ये वही इलाके हैं जहां लोग प्यास से मर रहे हैं। ये वही इलाके हैं जहां लोग बीमारी से मर रहे हैं। ये वही लोग हैं, जिन्हें विदेशी कंपनियों के लिए अपने घरों से उजाडा जा रहा है। ये वही लोग हैं, जिनकी याचना को सरकार हमेशा अनसुनी करती आई है। सरकार को ये बात समझनी होगी कि खून चाहे इधर बहे या उधर बहे, अपना ही है। इनसे लडने वाले कई जवानों की भी शायद वही पारिवारिक पृष्ठभूमि हो। जवानों को भी जानकारी है कि वे ऐसी लडाई में अपनी जान गंवा रहे हैं, जिसका कोई सैनिक हल नहीं। भूखों को बुलेट नहीं, रोटी चाहिए। ऐसे में देश के दुश्मनों से लडने वाला मनोबल उनके सामने नहीं होता। और जब मनोबल में दुश्मनों को मारने वाला जज्बा न हो, तब हथियार तो कुंद हो ही जाएंगे।
दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बैठकर युध्द के नियम बनाने तो आसान हैं, लेकिन जमीन पर लडने वाले जवानों की असली समस्याओं को समझ पाना मुश्किल। जवानों की शहादत पर घडियाली आंसू बहाने वाले राजनेताओं को इनके प्रति मानवीय रुख अपनाना होगा। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने युध्द लडने वाले सैनिकों के साथ भिखारियों की तरह व्यवहार करने के लिए केंद्र सरकार को फटकार लगाई। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजधानी के किसी हिस्से में भीख मांगकर गुजारा करने वाला व्यक्ति भी हर रोज एक हजार रुपए कमा लेता है, और हम दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर जंग लडने वाले सिपाहियों को एक हजार रुपए महीने भत्ता दे रहे हैं, जिसने इस जंग में अपने हाथ तक गंवा दिए हों। क्या बहादुर सैनिकों के साथ व्यवहार करने का सरकार का यही तरीका है? क्या कोर्ट की इस फटकार के बाद सरकार से अपने जवानों के प्रति संवेदनशील होने की उम्मीद की जा सकती है? अगर हालात यही रहे और देश पर जान देने वालों का जज्बा कम हो गया, तो यकीन मानिए, यह देश के अब तक के हुए बडे हादसों से सौ गुना अधिक होगा।

कोख में तलवार

चन्दन राय
जैसे ही औजार गर्भाशय की दीवार को छूता है, बच्ची डर से कांपने लगती है और अपने आप में सिकुडने लगती है। औजार छूते ही उसे पता चल जाता है कि अब हमला होने वाला है। वह बचाव के लिए जोर से चिल्लाती है। लेकिन बचाने वाली मां तो बेसुध ऑपरेशन-थियेटर में पडी होती है। औजार का पहला हमला कमर व पैर के ऊपर होता है। कन्या-भ्रूण दर्द से तडपने लगती है। फिर जब उसके सिर को चकनाचूर किया जाता है, तो एक मूक चीख के साथ तडपकर वह असहाय मां के गर्भाशय की दीवारों पर चोट मारती है। एक अंतिम आस कि शायद मां जग जाए और उसे बचा ले। लेकिन आज मां उसे बचाने के लिए सामने नहीं आती। आज वो नहीं जगेगी, क्योंकि उसी ने तो बच्ची से गर्भ में ही छूटकारा पा लेने का फैसला लिया है।

यह आधी आबादी की दुनिया में शोषण के लिए लडी ज़ाने वाली सबसे बडी और लंबी लडाई है।
मां चाहे मुझे प्यार न देना, चाहे दुलार न देना। कर सको तो इतना करना, जन्म से पहले मार न देनाएक अजन्मे बच्चे की करुण पुकार सभ्य समाज के चेहरे को परत दर परत उघाडक़र रख देती है। एक कूडेदान में 16 अजन्मे बच्चे अपने मां-बाप से यही तो पुकार कर रहे होंगे, जब कुत्ते इन्हें नोंचते हुए इधर-उघर घसीट रहे होंगे। मनचाहा संतान पाने की इच्छा ने हमें कितना क्रूर बना दिया है, अपने ही बच्चों के प्रति। गांवों में अभी भी माताओं को बच्ची जनने के कारण परिवार की उलाहनाएं सुननी पडती है। कई बार ऐसा देखा गया है कि बच्ची के जन्म लेने पर माताएं रोने लगती हैं। बिना इस बात को सोचे-जाने कि अगर उनके मां-बाप ने भी शायद ये फैसला लिया होता, तो वे इस धरती पर नहीं होती। हरियाणा में कई ऐसे गांव हैं, जहां लोगों की शादियां नहीं होतीं। कारण ये नहीं कि वे गरीब हैं या पढे-लिखे नहीं, एकमात्र कारण है हरियाणा में बच्चियों का कम होना। सामाजिक ताना-बाना टूटने के कारण या तो उन्हें पडाेसी राज्यों से लडक़ियां मंगानी होती है या फिर दूसरी बिरादरी में शादी करनी पडती है। यानी बच्चियां वधू के रूप में तो स्वीकार है, लेकिन बेटी नहीं।
भारत में आम तौर पर नर्सिंगहोम के आगे एक बडी सी पट्टिका लगी होती हैयहां लिंग परीक्षण नहीं किया जाता। यह कानूनन जुर्म है। शायद यह चेतावनी सरकारी अधिकारियों के लिए ही होती है। लेकिन अंदर जाने पर पता चलेगा कि इस चहारदीवारी के अंदर ऐसे सभी कर्म किए जाते हैं, जो मानवता को शर्मसार करते हाें। सिगरेट पर छपे चेतावनी की तरह ही अल्ट्रासाउंड क्लीनीक चलाने वाले इस कानून का माखौल उडाते हैं। यही कारण है कि भारत में कई अच्छे कानून सरकारी अधिकारियों की सुस्ती के कारण असमय ही दम तोड दिए। अगर इस कानून का पालन हो रहा होता, तो कूडे क़े ढेरों में बच्चे कैसे मिलते? भ्रूण-परीक्षण कराने के पीछे हमारा लक्ष्य था शिशु में किसी प्रकार के विकृति का पता लगाना, ताकि समय से पहले उपचार किया जा सके। लेकिन समय के साथ हमारा उद्देश्य बदलता चला गया और डॉक्टरों का ईमान।
आंकडों की बात करें तो देश के सबसे समृध्द राज्यों में प्रति हजार बालिकाओं की संख्या पंजाब में 798, हरियाणा में 819 और गुजरात में 883 है। अगर राष्ट्रीय आंकडो की बात करें तो यह 1981 में एक हजार बालकों के पीछे 962 बालिकाएं थी, जो 2001 में घटकर 927 ही रह गईं। नवरात्र के समय गली-मोहल्लों में खोज-खोज कर बालिकाओं को जिमाने एवं पूजने वाला समाज कैसे इनके प्रति इतना निर्मम हो जाता है? इससे पहले भी अगस्त 2006 में पंजाब राय के पटियाला शहर में एक नर्सिंगहोम के पास एक गङ्ढे से 35 कन्या भ्रूण मिले थे। इसका पता लोगों को तब चला था जब वहां की एक दाई ने ही इस बात का भंडाफोड क़िया। एक बात तो तय है कि देश की समृध्दि, शिक्षा एवं रहन-सहन का इस समस्या पर कोई प्रभाव नहीं पडता। उदारीकरण के दानव ने जैसे-जैसे अपने पांव पसारने शुरू किए, मानव के अंदर का दानव भी जागता गया। बच्चियों के प्रति निर्मम रहे समाज का भयंकर चेहरा लोगों के सामने आया। कोढ में खाज की तरह भ्रूण-परीक्षण ने लोगों को बच्चियों से छुटकारा दिलाने का रास्ता दिखाया। तो ऐसे अजन्मे बच्चे गटर में नजर आने लगे।
डॉ. निथसन ने अमरीका में एक अल्ट्रासाउंड फिल्म दिखलाकर कन्या-भ्रूण की मौन चीख सभ्य समाज के सामने लाने का प्रयास किया था। भ्रूण को इस बात का एहसास होता है कि कोई चीज जो उसकी ओर आ रही है, वह किस सोच से उसकी ओर बढ रही है। जैसे ही औजार गर्भाशय की दीवार को छूता है, बच्ची डर से कांपने लगती है और अपने आप में सिकुडने लगती है। औजार छूते ही उसे पता चल जाता है कि अब हमला होने वाला है। वह बचाव के लिए जोर से चिल्लाती है। लेकिन बचाने वाली मां तो बेसुध ऑपरेशन-थियेटर में पडी होती है। औजार का पहला हमला कमर व पैर के ऊपर होता है। कन्या-भ्रूण दर्द से तडपने लगती है। फिर जब उसके सिर को चकनाचूर किया जाता है, तो एक मूक चीख के साथ तडपकर वह असहाय मां के गर्भाशय की दीवारों पर चोट मारती है। एक अंतिम आस कि शायद मां जग जाए और उसे बचा ले। लेकिन आज मां उसे बचाने के लिए सामने नहीं आती। आज वो नहीं जगेगी क्योंकि उसी ने तो बच्ची से गर्भ में ही छूटकारा पा लेने का फैसला लिया है।
दुनिया में शोषण के लिए लडी ज़ाने वाली सबसे बडी अौर लंबी लडाई आधी आबादी की है। आज मार्क्स जिंदा होते, तो वर्गयुध्द से ज्यादा जोर नारी-सशक्तीकरण की ओर दिए होते। औरत पर जुल्म की शुरुआत कहीं और से नहीं, बल्कि घर की चहारदीवारियों से ही होती है। घर में भेदभाव को नजदीक से महसूस करने वाली बालिका को हर बात पर मां-बाप की उलाहना सुननी होती है। पढाई से लेकर खाने-पीने और रहने-सहने तक। अगर शिक्षा की ही बात करें तो सबसे ज्यादा अनुपात विद्यालय छोडने वालों में बालिकाओं का ही होता है। जब ये नारी घर की दहलीज से बाहर ससुराल में कदम रखती है, तो सास-ससुर के प्रति वही उपेक्षा का भाव महसूस करती है। एक बात जो अक्सर दिल को कचोटती है कि शादी के बाद महिलाओं को ही घर की दहलीज क्यों छोडनी होती है? लेकिन उपभोक्तावादी समाज ने कुछ दूरियां जरूर मिटाई हैं। एक बात जो भारतीय समाज में सदियों से कही जाती रही है कि बेटा ही बुढापे में आखिरी सहारा होता है, रोजगार की तलाश में घर छोडक़र परदेश चला जाता है। ऐसे में मां-बाप बुढापे में या तो ओल्ड एज होम में शरण पाते हैं या फिर घर की सुनसान दीवारों के बीच जिंदगी बिताने को मजबूर होते हैं। शहरों में बसने की प्रवृत्ति ने लडक़ों को ही घर से दूर नहीं किया, बल्कि लडक़ियों को भी बाहर निकाला है। अब लडक़े बुढापे का आखिरी सहारा नहीं होते और न ही लडक़ियां पराया धन।
एक बात और जो लडक़ों के बारे में कही जाती थी कि जितने हाथ, उतने काम। यह धारणा भी धीरे-धीरे टूटी है। शहरातियों में यह चलन बढा है कि अब वे एक या फिर दो बच्चों की ही लालसा रखते हैं और वो भी लडक़े, ताकि दहेज न देना पडे। लेकिन आज लिंगानुपात के कारण हरियाणा, पंजाब में जो कुंआरों की समस्या बढी है, उम्मीद की जाती है कि कुछ अरसे बाद लडक़ियों को दहेज देने का चलन शुरू होगा। अर्थशास्त्र के साधारण मांग-पूर्ति के नियम से भी यह बातें सच के नजदीक दिखती हैं। देखना है कि यह बदलाव कितने साल बाद समाज की मुख्य धारा में जगह बना पाता है।
समाज में एक तबके की सोच है लड़की मरै घड़ी भर दुख, लड़की जिए तो जनम भर दुख। ऐसे लोग अगर अल्ट्रासाउंड के लिए जाते हैं तो किस्म-किस्म की बातें सुनने को मिलती हैं। अरे क्या बताएं जनाब, 'बेटा बताया था बेटी हो गई, लायक नहीं हैं फिर भी अल्ट्रासाउंड मशीन चला रहे हैं पता नहीं कैसे-कैसे लोग डॉक्टर बन जाते हैं? अब ऐसे आदमी को क्या पता कि वो अल्ट्रासांउड करने वाला ही है, कोई एमबीबीएस नहीं, जो पैसा कमाने के लिए इस धंधे में उतर आया है। भ्रूण-परीक्षण के बाद एबार्शन क्लीनिक की दुकान भी तो चलनी है, इसलिए ऐसे मामले में अल्ट्रासाउंड वाले भी चालाक होते हैं, अधिकांश मामलों में बेटी ही बताते हैं। ऐसे में समाज में होनेवाली हर भ्रूण-हत्या कानून को आईना दिखाती है। गलती कानून में नहीं, कार्यान्वयन के तंत्र में हैजो भ्रष्टाचार की बैट्री से संचालित होता है, इसलिए कोख में तलवार जा रही है। जिन्हें मां की गोद में होना चाहिए था या पालने में कूडेदानों में मिल रहे हैं।

मेरी भूख को ये जानने का हक है

चन्दन राय
नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने कभी कहा था कि अगर सरकारी संस्था 'भारतीय खाद्य निगम' के गेहूं और चावल के सभी बोरों को एकसाथ रख दिया जाए तो यह ढेर चांद तक पहुंच जाएगा। भारतीय खाद्य निगम खाद्यान्नों के खरीद एवं वितरण के साथ भंडारण भी करती है ताकि संकट के समय इनका इस्तेमाल किया जा सके। वहीं दूसरी तरफ गरीबों को सस्ते में अनाज बांटने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली है। फिर भी हमारे यहां खाद्यान्न संकट बना रहता है। देश के हर राज्य में कई विदर्भ, बुंदेलखंड हैं जहां गरीब अनाज के अभाव में दम तोड रहे हैं। भारत में हर साल करीब 76 मिलियन टन गेहूं और 96 मिलियन टन चावल का उत्पादन होता है। जबकि खपत 72 मिलियन टन और 91 मिलियन टन ही हैं। हमारे पास इतना अनाज है, कि हम अपना पेट भरने के अलावा कुछ और देशों का भी पेट भर सकते हैं। फिर भारत भूखा क्यों है? जी हां, भारत में अभी भी 42 करोड से ऊपर ऐसे लोग हैं, जिन्हें भरपेट खाना नहीं मिलता। तो इनकी भूख के लिए जिम्मेदार कौन है? सरकार या भारतीय खाद्य निगम या फिर सार्वजनिक वितरण प्रणाली। इसी पर सवाल खडे क़रते हुए चारुल-विनय महाजन ने लोकगीत में गाया है : मेरी भूख को ये जानने का हक रे, क्यों गोदामों में सडते हैं दाने, मुझे मुट्ठी भर धान नहीं।
अनाज के कुप्रबंधन को लेकर विपक्ष भी संसद से लेकर सडक़ तक हंगामे पर उतारू है। भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में करीब 400 लाख टन गेहूं व चावल सड़ रहे हैं। सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी मिली कि पिछले एक दशक में करीब सैकडों करोड रुपए के अनाज सरकारी गोदामों में सड ग़ए। इस अनाज से एक साल तक एक करोड से भी ज्यादा लोगों की भूख मिटाई जा सकती थी। भारत में ये स्थिति तब है जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि भारत के 63 प्रतिशत बच्चे भूखे पेट सोने के लिए मजबूर हैं। ऐसी स्थिति तब है, जब निगम अनाजों के सही भंडारण के लिए 245 करोड रुपए अलग से खर्च कर चुकी है। यहां तक भी होता तो गनीमत थी, इन सडे अनाजों को निबटाने पर भी निगम को तीन करोड रुपए खर्च करने पडे। क़ेंद्र सरकार लोगों को अनाज बांटने की बजाय चुप्पी साधे हुए है। जबकि गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या 42 करोड क़े करीब है। सरकार गरीबों की संख्या की लडाई में ही उलझी है और गरीब अनाज की कमी के कारण दम तोड रहे हैं। सरकार इस बात को लेकर परेशान है कि एक गरीब को कितना अनाज दिया जाए, दूसरी तरफ सरकारी गोदामों में चूहे अनाज खाकर दंड पेल रहे हैं। हर साल जितना अनाज गोदामों में सड ज़ाता है या चूहे खा जाते हैं, भारत की भूख समाप्त करने के लिए पर्याप्त है।
केंद्र का कहना है कि हर राज्य का खाद्यान्न कोटा निर्धारित किया हुआ है। राज्य सरकारें उस कोटे को समय पर नहीं उठाती। यही कारण है कि गोदामों में अनाज सड ज़ाता है। राज्य सरकार कुछ अलग ही दलील देते हैं कि हम अनाज क्यों उठाएं, जब सरकार द्वारा निर्धारित कीमतों से कम में अनाज बाजार में उपलब्ध हो। पंजाब के सरकारी गोदामों का भी ऐसा ही हाल है। खुले में रखने के कारण लाखों टन अनाज हर साल सड ज़ाते हैं। पंजाब देश में गेहूं की सबसे बडी मंडी है। पंजाब की कई एजेंसियां यहां की अनाज मंडियों से अनाज खरीदकर अपने गोदामों में स्टॉक कर लेती हैं। इसके बाद इन अनाजों को केंद्रीय एजेंसियां खरीदती हैं। लेकिन पिछले कई वर्षों से पंजाब के गोदामों से अनाज नहीं उठाया जा रहा है। नई अनाज की फसलें आती जा रही हैं और पुरानी गोदाम में पडी हैं। आज हालात ये हो गए हैं कि ये अनाज पडे-पडे सड ग़ए हैं और लोगों के खाने लायक नहीं रह गए हैं। ये अनाजों के पहाड सरकारी कुप्रबंधन के कारण आज गरीबों की थाली तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार दोनों की जिम्मेदारी बनती है। सब सरीके जुर्म में बराबर के गुनहगार हैं।
अनाज हर इंसान की बुनियादी जरूरत है। तन ढंकने के लिए कपडे न हों, सिर पर छत न हो, तो भी गुजर-बसर कर ही लेते हैं। लेकिन रोटी के बिना लोग कैसे जीएं। महाराष्ट्र सरकार ने इसका एक नायाब तरीका ढूंढ़ निकाला है। वहां अनाज से शराब बनाए जाने के लाइसेंस कंपनियों को दिए जा रहे हैं। इसके लिए अनाज को पहले सडाया जाएगा, फिर उसे शराब बनाकर गरीबों के बीच बेचा जाएगा। महाराष्ट्र में गरीब लोग झुनका-भाकर खाकर ही अपने परिवार का पेट भरते हैं। कई परिवार ऐसे हैं, जिन्हें यह सस्ता राशन भी नसीब नहीं होता। अनाज से शराब बनाने के लिए कंपनियों की नजर गरीबों के इसी निवाले पर है। गरीब भले ही ज्वारी से बने रोटी नहीं खा पाए। लेकिन गरीबी को दूर करने के लिए शराब तो पी ही सकता है। यह उस राज्य की हालत है जहां के विदर्भ इलाके में किसान कर्ज एवं भूखमरी से दम तोड रहे हैं। कुछ ऐसी ही सोच लुधियाना के सरकारी गोदामों की भी है। यहां अनाजों को खुले में निकाल दिया गया और गोदामों के अंदर शराब के कट्टे रखवा दिए गए। आज सरकार से यह कोई नहीं पूछ रहा कि जब जनता के लिए खाने के लिए अनाज नहीं है, तो फिर शराब क्यों?
कुछ इसी बात का जवाब क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो ने कुछ अलग संदर्भ में दिया था, लेकिन आरोप वही थे। विश्व में खाद्यान्न संकट के लिए अमरीका को जिम्मेदार बताते हुए कहा था कि 'अमेरिका अनाज की कीमतों में कृत्रिम तेजी ला रहा है और इससे वैश्विक स्तर पर अकाल भी पड़ सकता है।' जबकि विश्व में खाद्यान्न संकट के लिए कुछ समय पहले अमरीका ने भारत,चीन जैसे देशों को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा था कि दुनिया में खाद्यान्न संकट के लिए भारत जैसे देशों में भरपेट खाना जिम्मेदार है। कास्त्रो के इस तर्क के पीछे अमरीकी उपभोक्तावाद तो एक कारण था ही। साथ ही उन्होंने इस बात की ओर भी इशारा किया था कि वहां अनाज से बायो ईंधन तैयार किया जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार गाडी में 50 लीटर का टैंक भरने में 232 किलो मकई या गन्ने का रस बर्बाद हो जाता है। किसान भी अनाज पैदा कर मोटे मुनाफे के कारण इन कंपनियों को बेच रहे हैं, जिससे खाद्यान्न संकट पैदा होने की स्थिति हो गई है। यही कारण है कि अनाज संकट और गहराता ही जा रहा है। अमरीका तो अपना सरप्लस अनाज समुद्र में फेंकता रहा है। एक तरफ किसानों को सब्सिडी देना और दूसरी तरफ बंपर स्टॉक पैदा होने पर अनाज को समुद्र में फिंकवा देना अमरीका की नीति ही हो सकती है। लेकिन महाराष्ट्र सरकार तो इनसे भी कई कदम आगे निकल चुकी है। अमरीका तो बायो ईंधन बनाने की सोच रहा है, जबकि महाराष्ट्र सरकार तो गरीबों की थाली से अनाज छीनकर शराब माफियाओं को भेंट करने की सोच रही है।
सरकारी नीतियों एवं भारतीय खाद्य निगम के भंडारण के बाद अगर बचा-खुचा अनाज सार्वजनिक वितरण प्रणाली के पास आता भी है, तो बाजार की भेंट चढ ज़ाता है। भारत में गरीबों तक सस्ते दर पर अनाज पहुंचाने के लिए देश भर में पीडीएस के तहत इसका वितरण किया जाता है। लेकिन देश के सबसे भ्रष्ट तंत्र में शुमार हो चुका पीडीएस का पूरा सिस्टम ही ध्वस्त हो चुका है। अगर आज आप भ्रष्ट संस्थाओं में कंपटीशन करवा लें, तो पुलिस और पीडीएस सिस्टम में जंग होगी। तुलसी ने इनके लिए ही शायद लिखा होगाको बड छोट कहत अपराधू। ये अनाज गरीबों के घर तक जाने की बजाय बाजार पहुंच जाता है और फिर वहां से ऊंचे दाम चुकाकर गरीब अपना पेट पालता है। एक तरफ तो आम जनता महंगाई की मार से परेशान है और दूसरी तरफ मंडियों में पडा अनाज सड रहा है। महंगाई बढ़ने की सीधी मार गरीबों पर पड़ेगी क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन में ही खर्च हो जाता है। जबकि अनाज (गेहूं और चावल) की प्रति व्यक्ति पैदावार वर्तमान में भी लगभग उसी स्तर पर है जितनी कि 1970 में हुआ करती थी। यह खाद्यान्न संकट की आहट है, जिसके बारे में चेताते हुए कभी हरित क्रांति के जनक नॉर्मन बोरलॉग ने कहा था कि हमें वर्ष 2050 तक वैश्विक खाद्य आपूर्ति को दोगुना करना होगा अन्यथा खाद्यान्न संकट भयावह रूप ले लेगा। केवल भारत की ही बात करें तो हमें 2020 तक भारी भरकम आबादी को भोजन उपलब्ध कराने के लिए 350 मिलियन मैट्रिक टन खाद्यान्न की जरूरत होगी। अनाज उत्पादन के साथ-साथ समुचित भंडारण की व्यवस्था होना एवं उस अनाज का गरीबों की थाली तक पहुंचना भी जरुरी है। क्या देश के कृषि मंत्री आईपीएल के ग्लैमर से निकलकर गरीबों की आवाज भी सुनेंगे।

इस मर्ज का कोई इलाज है?

चन्दन राय
जब इनसे जुडा कोई मामला मेडिकल काउंसिल के पास आता, तो उसकी जांच भी अध्यक्ष होने के नाते केतन देसाई ही करते। यानी वही जज बने बैठे हैं, जो कल गुनाहे शरीक थे। किसी ऐरे-गैरे मेडिकल संस्थान से मोटा माल लेकर सरकारी मान्यता दिलाना, फिर उनकी क्वालिटी चेक करने के लिए अपने इंस्पैक्टरों को रखना और अगर मामला गडबडाए भी तो खुद इनके मामलों की जांच करना-यानी चित भी मेरी, पट भी मेरी। अब धनपशुओं के इस लोकतंत्र में पैसा बनाना तो कोई गुनाह नहीं। अगर ऐसा हो तो देश के सभी खद्दरधारी जेल की दीवारों के पीछे होते। जो राजनीति में आते तो खाली हाथ हैं, लेकिन दो-चार साल में ही रुपयों के बिस्तर पर चैन की नींद सोते हैं। फिर ऐसे सपने देखने का हक किसी डॉक्टर को क्यों नहीं? ये तो बढिया हुआ कि समय से नेताओं ने खद्दर से पीछा छुडा लिया, वरना मुफ्त में ही गांधी बदनाम होते?
क हावत है कि जब बाड़ ही खक्वेत को निगल जाए, तो भला खेत क्या करे? डॉक्टर केतन देसाई ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि सीबीआई के हाथ उसके गिरेबां तक पहुंचेंगे। राजनेताओं और डॉक्टरों के बेमेल गठजोड क़े कारण कुछ लोग अपने को कानून से ऊपर समझने लगे हैैं। जब नेताओं का इलाज करने भर से पदमश्री, पदमभूषण जैसे अवार्ड बांटे जा रहे हों, तो फिर आम जनता भला कब तक चुप रहे। ऐसे अविश्वास के माहौल में एक डॉक्टर के घर से डेढ टन सोना बरामद होना इस रिश्ते को दागदार करता है। जब सैंया भईल कोतवाल, तब डर काहे का। लेकिन जब सत्ता के साथ समीकरण गडबडाते हैं, तो जेल की काली स्याह दीवारें ही इनकी अंतिम शरणस्थली होती है। अब ये बात तो केतन देसाई जानें कि उनसे कहां चूक हुई और क्यों हवालात के चक्कर लगाने पडे। जेल में वे सोच रहे होंगे, मामला टेबल के नीचे का होता, तो इसका कई गुना देकर मामला रफा-दफा कर लिया होता। लेकिन अब करें क्या, जब सत्ता के रहनुमाओं ने ऐन-वक्त पर नजरें फेर ली हों। वरना सीबीआई यों ही किसी के घर नहीं जाती। खैर सत्ता का खेल तो केतन देसाई बखूबी समझ रहे होंगे कि इनके साथ गोटी फिट रखने में उनसे चूक कहां हुई। लेकिन उनका गुनाह भी तो ऐसा था, जो सफेदपोश मुजरिमों को भी शर्मिंदा करे। कम से कम वे जुर्म की दुनिया में भी अपने पेशे के प्रति इमानदार होते हैं। लेकिन उन्होंने तो इस पेशे की ईमानदारी को भी कलंकित किया था। गुनाहों की फेहरिश्त पर नजर डालें तो, इनका पहला गुनाह था प्राइवेट मेडिकल संस्थानों से मोटी रकम लेकर सरकारी मान्यता देना। भई, इन्हे किसी न किसी संस्थान को मान्यता तो देनी ही थी। ऐसे में उन संस्थानों को जो पैसे के अभाव में दम तोड रहे हों और घोर चिकित्सकीय लापरवाही के बावजूद इलाज करने का माद्दा रखते हों, को ही क्यों न मान्यता दी जाए? हालांकि इसके एवज में एक मोटी रकम, जो कुछेक करोड रुपए होती थी, का सौदा भी कर आते थे। कुकुरमुत्तों की तरह सरकारी मान्यता प्राप्त मेडिकल कॉलेज गली-कूचों में खुलते जा रहे थे, लेकिन सवाल तो डॉक्टरों की विश्वसनीयता पर था। क्या ऐसे चिकित्सक पेट में कैंची या तौलिया छोडने से बेहतर इलाज कर पाते। जिसके लिए मरीजों के फटे पेट को दुबारा खोलना पडा था। क्या मरीजों का कोई हक नहीं बनता कि ऐसे चिकित्सकों की डिग्री पर भी सवाल खडे क़र सकें? वहां भी कोई न कोई केतन देसाई छुपा होगा, जो पैसे लेकर मुफ्त में मुन्ना भाईयों को एमबीबीएस बनाता होगा। दूसरा आरोप जो उनपर लगा है, तीन अतिरिक्त इंस्पेक्टरों की नियुक्ति का, जो किसी मेडिकल कॉलेज के गुणवत्ता की जांच करते थे। यह बात तो सडक़छाप चंपुओं को भी पता है कि जब कोई गिरोह बनाया जाता है, तो पहले अपने लोगों को विश्वास में लिया जाता है। आखिर वही तो आडे वक्त में काम आते हैं। अगर यह अपने गृहप्रदेश के हों, तो फिर कहना ही क्या? कुछ ऐसी ही सोच के साथ केतन देसाई रैकेट काम कर रहा था। जब इनसे जुडा कोई मामला मेडिकल काउंसिल के पास आता, तो उसकी जांच भी अध्यक्ष होने के नाते केतन देसाई ही करते। यानी वही जज बने बैठे हैं, जो कल गुनाहे शरीक थे। किसी ऐरे-गैरे मेडिकल संस्थान से मोटा माल लेकर सरकारी मान्यता दिलाना, फिर उनकी क्वालिटी चेक करने के लिए अपने इंस्पैक्टरों को रखना और अगर मामला गडबडाए भी तो खुद इनके मामलों की जांच करना-यानी चित भी मेरी, पट भी मेरी।
तीसरा इल्जाम भी बेहद बचकानी ही कही जा सकती है। अब धनपशुओं के इस लोकतंत्र में पैसा बनाना तो कोई गुनाह नहीं। अगर ऐसा हो तो देश के सभी खद्दरधारी जेल की दीवारों के पीछे होते। जो राजनीति में आते तो खाली हाथ हैं, लेकिन दो-चार साल में ही रुपयोें के बिस्तर पर चैन की नींद सोते हैं। फिर ऐसे सपने देखने का हक किसी डॉक्टर को क्यों नहीं? आखिर ये भी तो नेताओं की तरह सफेद लिबास में रहना यानी सफेदपोश होते हैं। ये तो बढिया हुआ कि समय से नेताओं ने खद्दर से पीछा छुडा लिया, वरना मुफ्त में ही गांधी बदनाम होते? लेकिन चिकित्सकों ने इस बात की परहेज भी नहीं की। सीट बढवाने से लेकर मान्यता दिलाने तक सब कुछ खुला खेल पेशे की आड में चलाते रहे। जानकारी मिली है कि स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद को इस बात की जानकारी थी कि कुछ ऐसे दलाल हैं, जो इस धंधे मेें लिप्त हैं। फिर उन्होंने कार्रवाई करना क्यों नहीं उचित समझा? क्या सिर्फ पत्र द्वारा सरकारी मान्यता प्राप्त संस्थानों को सूचित करना ही जरुरी था? आखिर इस काले धंधे में कौन ऐसे लोग थे, जिन्होंने स्वास्थ्य मंत्री को कार्रवाई करने से रोक रखा था। इस मामले की गंभीरता से जांच की जाए तो हो सकता है कुछ ऐसे नकाबपोश सामने आएं, जिनसे यूपीए सरकार एक बार फिर मुसीबत में घिरी दिखे। एक और इल्जाम है केतन देसाई पर। एक साल में 300 मेडिकल संस्थानों को मान्यता देने का। आरोप है कि उन्होंने परचून के दूकान की तरह मेडिकल संस्थानों को सरकारी मान्यताओं की रेवडी बांटी। यहां क्वालिटी पर जोर नहीं था, पैसे की क्वांटिटी ज्यादा जरुरी थी। यों भी सरकार डॉक्टरों की संख्या के नाम पर जनता को बरगलाती रही है। अभी स्वास्थ्य मंत्रालय ने जानकारी दी है कि देश भर में करीब 7.63 लाख डॉक्टर हैं, लेकिन इसमें दिवंगत हो चुके एवं अप्रवासी डॉक्टरों का नाम भी शामिल है। एक हजार की जनसंख्या पर अपने देश में अगर एक डॉक्टर भी हो तो आने वाले समय में ही करीब 6 लाख डॉक्टरों की जरुरत होगी। इस कमी को अधिक से अधिक मेडिकल संस्थानों को मान्यता देकर ही तो पूरा किया जा सकता है। यों भी मेडिकल, इंजीनियरिंग कॉलेज खोलना इस देश में सबसे मुनाफे का सौदा है। सरकार से सस्ते रेट पर जमीन लो, बिल्डिंग खडी क़र लो और किसी केतन देसाई को चढावा देकर मान्यता ले लो। फिर तो मजे से दूकान चलनी है। अपने बेटे को डॉक्टर, इंजीनियर बनाने का ख्वाब देखने वाला एक वर्ग अभी भी कैपिटेशन फीस के नाम पर लाखों रुपए देने को तैयार हैं। फिर 300 ही क्यों, ये संख्या कम से कम हजार तक तो जानी ही थी। लगता है, स्वास्थ्य मंत्री के इरादों की भनक केतन देसाई को हो चुकी थी। हालांकि इसके पहले भी 2001 में उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप के कारण एमसीआई के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पडा था।
ज्ञान सिंह मेडिकल कॉलेज के उपाध्यक्ष बलविंदर सिंह पर जब सीबीआई ने शिकंजा कसा, तब यह पूरा खेल सामने आया। जांच में उन्होंने 2 करोड रुपए केतन देसाई के विशेष सहयोगी जेपी सिंह को देने का भी सच उगल दिया था। हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश और एनसीआर क्षेत्र में कई ऐसे कॉलेजों को केतन देसाई ने अपने एहसान से उपकृत किया था। इसमें कुछ विदेशी संस्थानों के नाम भी सामने आए हैं, जो एमसीआई के साथ मिलकर फर्जी डिग्रियां बांट रहे थे। अब देश के कई ऐसे संस्थान सीबीआई के रडार पर हैं।
डॉक्टरों को कई बार अपने फैसले दिल की जगह दिमाग से लेने होते हैं। इसीलिए कई बार रोगी दर्द से कराहता होता है और उसके दुख से बेपरवाह चिकित्सक अपनी मस्ती में होता है। रोगी की मौत होने पर उसका शरीर परिजनों को तब तक नहीं सौंपा जाता, जब तक उन्होंने इलाज का पूरा पैसा चुका नहीं दिया हो। ऐसे डॉक्टर तो समाज के लिए तब हैवान बन जाते हैं, जब शरीर के अंग-व्यापार में इनका नाम सामने आता है। कई बार गुर्दों के अवैध कारोबार में बडे-बडे ड़ॉक्टरों का नाम समाज को कलंकित करता रहा है। लिंग-परीक्षण नहीं करने की लाख कसमें खाने के बाद भी ये भ्रूण-हत्या में लिप्त होते हैं। ऐसे में समाज के इस तबके से ये उम्मीद तो की ही जाती है कि समाज में अपने उन वादों को निभाएं, जो उन्होंने इस पेशे में आने के समय लिया था।

जनगणना या जातिगणना

चन्दन राय
मंडल आयोग रिपोर्ट ने 1990 में जाति के आधार पर आरक्षण लागू कर पूरे देश को थर्रा दिया था। सरकार को गरीब और पिछडी ज़ातियों की संख्या के बारे में जानकारी नहीं थी। फिर भी सरकार की ओर से बडे-बडे दावे किए जाते रहे। अब देश की सर्वोच्च पंचायत में आधी आबादी को आरक्षण दिए जाने की मांग उठी है। लेकिन सरकार अंधेरे में तीर चलाने की कवायद में मशगुल है। फिर कोटे के अंदर कोटे की बात भी तभी मानी जा सकती है, जब सही आंकडे उपलब्ध हों। लोगों के जाति और धर्म के सही आंकडें हों, उनकी सामाजिक एवं आर्थिक हैसियत का अंदाजा हो, तो शायद आज आरक्षण का लाभ उन लोगों को मिल रहा होता जो समाज की सबसे अंतिम कतार में खडे हैं। गांधी का अंतिम आदमी कल भी भूखा था और आज भी उसकी थाली में रोटी नहीं है। कल अगडों ने उसका हक छीना था, तो आज पिछडों में अगडों ने लंगडी मारी है। पिछडों में मलाईदार तबके का सही अनुमान नहीं होना ही उनकी भूख के लिए जिम्मेदार है। आज जाति को हम देश की राजनीति से अलग नहीं कर सकते। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि राजनीतिक पार्टियां निर्वाचन क्षेत्र में बहुसंख्यक जाति के आधार पर ही उम्मीदवारों का चुनाव करती हैं। यही कारण है कि लोहिया की विरासत को ढोने वाले कभी क्षत्रिय महासभा, कभी वैश्य महासभा, तो कभी कायस्थ महासभा का हिस्सा बन गर्व महसूस करते हैं। लोहिया के जाति हटाओ अभियान का अर्थ नेताओं ने यही निकाला कि अपनी नहीं, बल्कि दूसरी जाति के लोगों को हटाना है। गैरजातीय या विधर्मी शादी करने वालों का क्या अंजाम होता है, यह किसी से छिपा नहीं है। आरक्षण लागू होने के बाद स्थितियां बदली हैं, कुछ जातियां ऊपर उभर कर आई हैं, तो कुछ आज तक सिर नहीं उठा सकी हैं। कुछ जातियों को शामिल किया जाना है, तो कुछ को इस बिरादरी से बाहर भी करना है। लेकिन सरकार को इसके खतरे का अंदाजा है। विपक्ष जातिगत गणना के आधार पर कुछ नए लोगों के लिए आरक्षण की मांग कर सकता है। यही कारण है कि गृहमंत्री जी के पिल्लई ने पहले ही इस बात की घोषणा कर दी कि जाति को इस जनगणना में शामिल नहीं किया जाएगा।
15वीं जनगणना का काम जोर-शोर से चल रहा है। देश के करीब 25 लाख अधिकारी पहली बार सरकारी आवास से निकलकर गरीबों के झोंपडे तक जाएंगे। वे धर्म, भाषा, आमदनी, लिंग, आयु, साक्षरता, सामाजिक और आर्थिक स्थिति के बारे में तो पूछेंगे। लेकिन सोलहवां मानक जाति के बारे में पूछने की जहमत नहीं उठाएंगे। राजनीतिक पार्टियां इस सोए हुए जिन्न को हमेशा जगाकर नहीं रखना चाहती। वे चाहती हैं कि जाति रूपी कुंभकर्ण पांच साल में एक बार जगे और फिर गुफा में चैन की नींद सो जाए। हालांकि 1931 के जनगणना में अंग्रेजों ने एक बार ये गलती की थी। तब से इन्हीं आंकडाें का उपयोग सरकार अपनी सामाजिक एवं आर्थिक योजनाओं को लागू करने में करती रही है। हालांकि इसकी विश्वसनीयता पर सवाल 1931 से ही उठते रहे हैं। अभी केंद्र सरकार ने आईआईटी, आईआईएम में इस आधार पर आरक्षण देने से मना कर दिया था कि उनके पास पिछडों की वास्तविक संख्या की जानकारी नहीं है। तो क्यों न हम एक बार इस बात को तय कर ही लें कि हमारे देश में किस जाति के कितने लोग रह रहे हैं? उनकी सामाजिक और आर्थिक हैसियत क्या है? कितने लोगों का हाथ पकडक़र साथ लाने की जरुरत है तो कितनों को अपने पैरों पर चलने के लिए छोड देना है?
राजद प्रमुख लालूप्रसाद यादव ने कहा कि इससे समाज के सभी वर्गों की पहचान करने में तो सहूलियत होगी ही, साथ ही उनके लिए योजनाएं बनाने एवं आरक्षण का प्रावधान करने में भी आसानी होगी। इससे सही व्यक्ति तक लाभ पहुंच सकेगा। लेकिन सरकार को इस बात का डर है कि अगर इस सोए हुए शेर को छेडा गया, तो स्थिति बिगड ज़ाएगी। एक बार यों ही सच्चर कमिटी की रिपोर्ट ने उसे शर्मसार कर छोडा है। अल्पसंख्यकों की हालत का अंदाजा होने पर दूसरे धर्म के कट्टरपंथियों का दिल भी पसीज गया, लेकिन सरकार बेशर्मी की चादर ओढे रही। सरकार की लाल कालीन के नीचे पडी यह रिपोर्ट रोज सरकारी अफसरों के पैरों तले रौंदी जा रही है। कुछ ऐसा ही हाल अर्जुन सेनगुप्ता रिपोर्ट का हुआ। गरीबी की भयावह तस्वीर सामने आने के बाद हमारे हुक्मरान इस बात में उलझे रहे कि उन्हें इकोनॉमी क्लास में सफर करना है या बिजनेस क्लास में। लेकिन गरीबों के कल्याण के लिए सरकारी योजनाएं बनाने वाली सरकार को तो शर्मसार होना ही चाहिए जो भोजन का अधिकार तो देती है, तो वहीं गरीबों की संख्या कम करने की जुगत में सरकारी अमलों को लगा देती है।
देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था के विचार को भी जानना जरूरी है। तमिलनाडु की राजनीतिक पार्टी पीएमके ने यह तर्क देते हुए कि कई विकास और कल्याण योजनाओं के संचालन के लिए जातिवार गणना आवश्यक है, सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इससे जातीय संघर्ष बढेग़ा। हालांकि याचिका में यह तर्क दिया गया था कि भारत में कौटिल्य के अर्थशास्त्र से लेकर 16वीं-17वीं सदी एवं ब्रिटिश शासनकाल में भी जातिगत जनगणना का जिक्र है। भारत न केवल राज्यों का संघ है वरन कई जातियों, जनजातियों और समुदायों का संगम भी है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जनगणना को विकास कार्यों के संबंध में योजना बताने के लिए जरूरी बताया है। लेकिन किनके विकास कार्यों के लिए? क्या शहरों में फ्लाईओवर या मॉल कल्चर को बढावा देने से ही अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछडी ज़ातियों का भला हो जाएगा? अगर आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए जनगणना जरूरी है, तो उन जातियों की संख्या के बारे में जानकारी होनी भी जरूरी है, जिनको विकास कार्यों में जगह देना है। सिर्फ आम जनता को विकास कार्यों के भुलावे में रखकर चुनाव के समय जाति के प्रेत का आह्वान करने भर से ही कल्याण नहीं होने वाला। वामपंथियों को छोड दें तो देश में शायद ही कोई ऐसी पार्टी होगी जो जातिगत समीकरण में न उलझी हो। यानी राजनीतिक पार्टियों का विरोध जातिवाद हटाओ न होकर, जाति आधारित जनगणना तक ही है।
क्या सरकार इस बात का आश्वासन देगी कि छत्तीसगढ क़े सुदूर जंगलों में भी जनगणना का कार्य संभव हो सकेगा? 2001 के जनगणना में गडबडी क़ी ओर इशारा करते हुए वहां लोगों ने आरोप लगाया है कि पिछली जनगणना में बस्तर के 564 गांवों को वीरान बता दिया गया। उम्मीद है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में जनगणना का कार्य जैसे-तैसे निपटा दिया जाएगा। आदिवासियों की संख्या को कम बताया जाना एक साजिश के तहत किया जा रहा है, ऐसा स्थानीय लोगों का कहना है। होता यही है कि आदिवासियों की आबादी के आधार पर ही विकास योजनाओं के लिए राशि स्वीकृत होती है। यों भी ऐसे बीहड ऌलाकों में जाने की जहमत शायद ही कोई सरकारी अधिकारी उठाते हैं। यही कारण है कि सैकडों गांवों के बारे में यह बता दिया जाता है कि नक्सलियों के कारण या तो लोग गांव छोडक़र चले गए हैं या शिविरों में रह रहे हैं। अगर मानव इतिहास की सबसे बडी ज़नगणना का यही सच है, तो आने वाले आंकडे भी सवालिया घेरे में ही नजर आते हैं। चुनाव में प्रत्याशी चुनने से लेकर, निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव तक और जीतने के बाद प्रदेश में जातीय समीकरण को संतुलित करने के लिए मंत्रिमंडल में उचित प्रतिनिधित्व देने तक नेताओं के दिमाग में जाति का समीकरण ही हावी होता है। आरक्षण के नाम पर भी राजनीतिक दलों ने कुछ पिछडी ज़ातियों को खुश रखने की कोशिश की। यही कारण है कि तगडी पिछडी ज़ातियों को भी आरक्षण में उतना ही हक दिया गया, जितना कि जूता सिलकर गुजारा करने वाले एवं रिक्शा चलाकर पेट पालने वाले का। लेकिन जब कुछ पिछडी ज़ातियों ने विरोध का स्वर तेज किया, तो उन्हें भी आरक्षण का झुनझुना थमाने में परहेज नहीं किया। महिलाओं में भी जातिगत आरक्षण की मांग उठाकर लालूप्रसाद यादव ने एक बार फिर अपनी राजनीतिक गोटी सेट करनी चाही। सरकारी नौकरी से लेकर प्राइवेट संस्थानों तक में जाति आधारित आरक्षण की मांग उठती रही है। जब जाति हमारे देश की राजनीति एवं समाज में इतने गहरे पैठ चुकी हो, तो फिर जातिगत जनगणना से परहेज क्यों? ये तो वही बात हुई कि गुड ख़ाएं और गुलगुले से परहेज। क्या सरकार को इस बात का डर है कि एक बार फिर जातिगत आंकडाें का सच उसके रातों की नींद न छीन ले?

कब सीखेंगे विचारों का सम्मान करना

चंदन राय

भारत में अभी भी बहुसंख्यक लोग हैं जो फतवों की दुनिया में ही जीते हैं। फतवों का आशय मेरे विचार में धर्म की रक्षा करना रहा होगा। इसलिए जब कुछ लोगों को ऐसा महसूस होता है कि धर्म खतरे में है, वे उसकी रक्षा के लिए हथियार लेकर सामने आ जाते हैं। चाहे संघ के कार्यकर्ता हों या फतवा जारी करने वाले मुल्ला-मौलवी। कुछ ऐसा ही हुआ अभी ईरान में जहां तेहरान के धर्मगुरु होजत ओ इस्लाम काजम सेदिगी ने लडक़ियों को लो कट टॉप्स और शार्टस पहनने से मना किया। उनका कहना था कि इसी के कारण प्राकृतिक आपदाएं भूकंप, बाढ, सूखा, अकालआदि आते हैं। इंडाना की स्टूडेंट जेनिफर मैग्राइट ने साहस दिखाते हुए इसका विरोध करने का एक अनोखा तरीका ढूंढ़ निकाला। मात्र 20 साल की जेनिफर ने सोशल नेटवर्किंग साइट पर जाकर इसके खिलाफ एक कैंपेन शुरू किया। उसने लडक़ियों से ऐसे कपडे पहनने की अपील की, जो पुरुषों के लिए कामोत्तेजक हों। देखते ही देखते करीब डेढ लाख महिलाएं इस साइट पर पहुंची और करीब 90 हजार महिलाओं ने बदनदिखाऊ कपडे पहनने का फैसला किया। अब संयोग की बात देखिए कि 26 अप्रैल को जब इन लडक़ियों ने ऐसे कपडे पहने, उसी दिन ताईवान में भूकंप आ गया। धर्मगुरुओं ने फिर कमान संभाली-देखिए, मैं न कहता था कि ऐसे कपडे पहनना अल्लाह को मंजूर नहीं। ईरान सरकार चेती और उसने इस्लामिक ड्रेसकोड की अनदेखी करने वालों पर कानूनी कार्रवाई करने की चेतावनी दी। ये दोनों सच्ची घटनाएं चुटकुले जैसी लगती हैं, लेकिन हमारे समाज की यही खूबी है कि यहां हर मिजाज के चुटकुले चलते हैं। एक लोकतांत्रिक देश में तो इस बात की उम्मीद की ही जा सकती है कि हम दूसरों के विचारों की इज्जत करें, चाहे हम उनसे सहमत हों या नहीं। यही कारण है कि भारत में ब्रह्मचर्य की वकालत करने वाले साधु-संत भी सिर माथे लिए गए और वात्सयायन भी पूजे गए जिन्होंने एक-दो नहीं, बल्कि दुनिया को कामशास्त्र की चौसठ कलाएं सीखाईं। मतलब सिर्फ इतना है कि अगर आप अपनी बात बलात् नहीं थोप रहे हैं तो हर तरह की राय का स्वागत होना चाहिए। आपको जो रास्ता अच्छा लगे, जरुर चलें लेकिन एक रास्ते पर चलें और दूसरे पर थूकें, उचित नहीं।
इन तमाम घटनाओं के जिक्र करने की जरुरत इसलिए पडी क्योंकि अपने देश में भी दूसरों के विचारों के प्रति सहिष्णुता खत्म होती जा रही है। दक्षिण की अभिनेत्री खुशबू के प्रकरण को ही लें। विवाह पूर्व यौन-संबंधों को सही ठहराने के कारण उन्हें समाज के बहुसंख्यक हिस्से का कोपभाजन बनना पडा। हो सकता है कि उनका मकसद मीडिया की सुर्खियां बटोरना रहा हो या फिर कांग्रेस का टिकट लेकर सत्ता के गलियारे तक पहुंचना। हमारा मकसद इस बात को जांचना-परखना है कि समाज ने उनके निजी विचारों को किस तरीके से लिया। देखते-देखते उनके खिलाफ ऐसा विषाक्त माहौल बना कि देशभर में 22 मुकदमे दायर कर दिए गए। देश में जगह-जगह धर्म के ठेकेदारों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। एक बार फिर ऐसा लगा कि हमारे विचारों की सहिष्णुता खतरे में है। कुछ ऐसी ही स्थितियों का सामना तसलीमा नसरीन को अपने वतन बांग्ला देश में करना पडा था। जब विवादास्पद लेखों के कारण जगह-जगह फतवे जारी होने लगे और अपनी रक्षा के लिए उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी पडी। मशहूर पेंटर मकबूल फिदा हुसैन से लेकर तसलीमा नसरीन एवं सलमान रश्दी जैसे शख्सियतों को भी समाज के इस तबके का कोपभाजन बनना पडा है। आखिर क्यों हम सोचते हैं कि दुनिया हमारे विचारों के अनुसार ही चले? आखिर क्यों हमें ऐसा लगता है कि दूसरों के विचार हमारे अस्तित्व के लिए खतरे की तरह हैं?
तसलीमा नसरीन 'मैं स्वेच्छाचारी' लेख में कहती हैं, ''जब मैं किशोरी थी,कदम-कदम पर निषेधाज्ञा जारी थी। घर से बाहर मत जाना। खेलना-कूदना नहीं। सिनेमा-थियेटर मत जाना। किसी लडक़े-छोकरे की तरफ आंख उठाकर मत देखना। किसी से प्रेम मत करना-लेकिन मैंने सब किया। मैंने किया, क्योंकि मेरा करने का मन हुआ। कोई भी काम करते हुए लोगों ने क्या कहा-क्या नहीं कहा, मैंने यह कभी नहीं देखा। मैंने यह देखा कि मैंने खुद को क्या तर्क दिए। अपनी चाह या इच्छा के सामने मैं पूरी ईमानदारी से खडी होती हूं। अपना भयभीत, पराजित, नतमस्तक, हाथ जोडे हुए यह रूप मेरी ही नजर को बर्दाश्त नहीं होगा, मैं जानती हूं।...मेरा जो मन करता है, मैं वही करती हूं। हां, किसी का ध्वंस करके कुछ नहीं करती।'' यहीं से दूसरों की स्वतंत्रता शुरू होती है, जहां हम किसी के विचारों को ध्वंस करने की इच्छा नहीं रखते। तसलीमा नसरीन के क्रांतिकारी लेखों से कुछ मौलवियों को ऐसा लगा कि इससे तो इस्लाम ही खतरे में आ जाएगा। बुर्के में रहने वाले समाज को इतनी आजादी देनी उचित नहीं। जहां खतरा धर्म पर मंडराने का दिखलाया जाए, तो फिर लोगों को बरगलाना आसान हो जाता है। वेलेंटाइन डे के दिन ही शिवसैनिक से लेकर बजरंग दल और न जाने कौन-कौन से लोग हाथों में तलवार लेकर धर्मरक्षार्थ बिल से निकल आते हैं। यहां मतलब पाश्चात्य शैली के विरोध करने से ज्यादा, उन लडक़ियों को सबक सीखाना होता है, जो घर की चहारदीवारी लांघ कर मुहब्बत का इजहार करने का दुस्साहस करती हैं। और यह सब होता है भारतीय संस्कृति की रक्षा के नाम पर। ऐसे लोग हमारी सहिष्णुता एवं समरसता की संस्कृति को भूल जाते हैं, जो दुश्मनों की संस्कृति को भी आत्मसात करने का माद्दा रखती है। अगर हमारी संस्कृति इतनी ही कमजोर होती, तो विदेशी हमलावरों के आगे कब की हथियार डाल चुकी होती, जो एक हाथ में तलवार, तो दूसरे हाथ में ध्वजदंड लेकर ही मैदान में आते थे। लेकिन इसी बहाने इन पाखंडियों को यह अधिकार मिल जाता है कि दो प्रेमी युगलों को सरेआम सडक़ पर घसीटें, मारें, जो चाहे करें। चाहे विरोध करने वाले वही शख्स रात के अंधेरे में किसी महिला का शील-हरण करने के लिए उद्दत क्यों न हों।
एक बार फिर बात करते हैं फिल्म अभिनेत्री खुशबू की। देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था ने कहा कि लिव इन रिलेशन और विवाह पूर्व संबंधों पर ये उनके निजी विचार हैं। अगर दो लोग राजी-खुशी बिना शादी के साथ रहते हैं, तो इसमें कौन से कानून का उल्लंघन होता है? इस मामले में किसी को ये अधिकार नहीं है कि दूसरों के निजी विचारों को लेकर हंगामा खडा करें। इस फैसले के बाद अभिनेत्री खुशबू का कहना है कि मैं अपने विचारों को लेकर शर्मिंदा नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने भी मेरे विचारों को और मजबूती दी है। खुशबू ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि पुरुषों को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि उनकी औरत वर्जिन हो और लडक़ियों को भी शादी पूर्व संबंधों में सुरक्षात्मक उपाय अपनाने चाहिए। यह बयान आने के बाद लोगों ने आरोप लगाया कि इससे तमिल महिलाओं की अस्मिता को ठेस पहुंची है। हालांकि उन्हाेंने अपने इंटरव्यू में कहीं भी तमिल लडक़ियों के चरित्र पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं की थी। संविधान ने हमें इस बात की स्वतंत्रता दी है कि सार्वजनिक मसलों पर हम अपने निजी विचार व्यक्त कर सकते हैं, जब तक कि इसका असर देश की आंतरिक सुरक्षा या दूसरे देशों के संबंधों पर न पडता हो। हां, निजी विचार व्यक्त करने का मतलब दूसरों के साथ गाली-गलौज करना नहीं हो सकता। हमें अपनी स्वतंत्रता के साथ दूसरों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी सम्मान करना चाहिए।
अभी कुछ ही दिन हुए जब फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने अपने देश में बुर्के पर प्रतिबंध लगाए जाने का ऐलान करते हुए अपने देश की संसद में कहा था की हम अपने देश में ऐसी महिलाओं को नहीं देख सकते जो पर्दे में कैद हों, सभी सामाजिक गतिविधियों से कटी हों और पहचान से वंचित हों। यह महिलाओं की गरिमा के हमारे विचार से मेल नहीं खाता। साथ में उन्होंने यह भी कहा कि हमें हर हाल में यह सुनिश्चित करना चाहिए कि फ्रांस में इस्लाम धर्म को मानने वाले लोगों का भी उसी प्रकार सम्मान हो जैसा किसी भी दूसरे धर्म के लोगों का होता है। अपने विचार रखने के साथ-साथ दूसरे के विचारों को सम्मान देकर ही सरकोजी कटटरपंथियों के निशाने से बचे रहे। हमें भी अपने विचारों में इसी तरह के संतुलन रखने की जरुरत है, ताकि दूसरे वर्ग की भावनाएं आहत न हों और हमारी कहने की स्वंतत्रता भी बची रह सके।

लोकतंत्र के मंदिर में अपशब्दों का मंत्रपाठ

आ ज से करीब सौ साल पहले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के संसदीय लोकतंत्र को वैश्या बताने पर काफी हंगामा मचा था। गांधी जी ने यह टिप्पणी क्यों की, यह काफी विवाद का विषय हो सकता है क्योंकि इस कथन में वैश्याओं का अपमान छिपा है। इससे गांधी जी की संसद के प्रति मंशा जरूर जाहिर होती है कि वे उस समय संसद को कितना निकृष्ट मान रहे थे। ब्रिटिश महिलाओं ने इसको लेकर काफी हाय-तौबा भी मचाई थी। गांधी ने बाद में लोगों की तीव्र प्रतिक्रिया देखते हुए इसे बांझ महिला कहना ज्यादा उचित समझा। बात 1909 की है और आज हम लोकतंत्र का पंद्रहवां महोत्सव मनाने में मगन हैं। लेकिन आज सांसदों के आचरण को देखकर ऐसा लगता है कि गांधी की पहली प्रतिक्रिया ही ज्यादा सटीक और मारक थी। आज अजीज प्रेमजी, चेतन भगत, सचिन तेंदुलकर, शाहरूख खान, नारायण कार्तिकेयन, नारायण मूर्ति, महाश्वेता देवी सभी नई पीढी क़े रोल मॉडल हैं। लेकिन नेताओं के लिए बडे शर्म की बात है कि इनमें एक नाम भी सियासतदां लोगों का नहीं है। अभी आधी सदी गुजरी है, जब गांधी, पंडित जी, पटेल, नेताजी, लोहिया से लेकर जयप्रकाश नारायण तक की मूर्तियां लोग शौक से अपने ड्राइंग रूम में लगाना पसंद करते थे। लेकिन आज नेताओं की तस्वीरें वहां से गायब हैं। अगर कहीं मैडम या प्रधानमंत्री की तस्वीरें दिखती भी हैं तो नेताओं के दफ्तर में, ताकि सोनिया दरबार में उनकी हाजिरी बराबर लगती रहे।
आज संसदीय लोकतंत्र को सबसे बडा खतरा न तो विदेशी मुल्क से है और न हीं नक्सलियों से। देश के मंदिर को सबसे बडा खतरा तो यहां के पुजारियों और भक्तों से है। हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा-जब हर पार्टियों में बाहुबलियों को बुला-बुलाकर टिकट दिया जा रहा हो, तो संसद गाली-गलौज का अड्डा तो बनना ही था। आज राजनेता अपराधी नहीं हैं, बल्कि अपराधी ही राजनेता बनते जा रहे हैं। जब करोडाें रुपए खर्च कर चुनाव जीतेंगे, तो पांच साल तक तो उनका दिमाग स्विस बैंक की तिजोरियों में ही लगा होगा ना। देश के लिए यह शर्म की बात है कि हमारे माननीय सांसदों को संसद से खींचकर बाहर निकालने के लिए मार्शल बुलाने की जरूरत पडती है। जो देश चलाने का दावा करते हैं, वे चार मार्शलों के सहारे सदन से बाहर धकेले जाते हैं। आज आसन तक पहुंचकर ही उन्हें लगता है कि वे अपनी आवाज लोगों तक पहुंचा सकेंगे। राजद नेता लालूप्रसाद यादव ने एक बार लोकसभा अध्यक्षा मीरा कुमार की नाराजगी पर बोलते हुए कहा- ''हम लोगों का फैशन नहीं है कि आपकी सीट तक आ जाएं लेकिन जब कोई नहीं सुनता है तो नजदीक जाना पडता है। इसको अन्यथा न लें।'' लोकतंत्र तभी जीवित रह सकता है जब हम दूसरों के विचारों को भी सम्मान दें। विचारों से असहमति होने पर भी असहमति से सहमति तो दिखानी ही होगी। इसीलिए पुराने राजनेता इसे शासन पध्दति नहीं, बल्कि जीवन पध्दति मानते थे। वे यह समझते थे कि वाद-विवाद से ही तो संवाद की स्थिति बनेगी, जिससे आम लोगों की बेहतरी के लिए काम किया जा सकता है। लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं कि सभी दल आसन के पास जाकर जोर आजमाईश करें।
इन दिनों संसद में लालू जी फिर नाराज हैं। लालू जी नाराज हों तो संसद में कुछ न कुछ होता ही है। लोगों को अंदेशा था कि सदन एक बार फिर माननीय सांसदों पर होने वाले माइक और जूते-चप्पलों की बौछार का साक्षी बनेगा। लालू जी पहलवानी के अंदाज में लगभग बांह मोडते हुए भाजपा नेता अनंत कुमार की ओर बढे। लेकिन एकाएक जैसे लालू जी को अपने संख्या बल का ब्रह्मज्ञान हुआ और विपक्ष के समझाने पर वे चुप बैठ गए। लेकिन भाजपा नेता अनंत कुमार का गुस्सा शांत नहीं हुआ था। यह विवाद जनगणना में जाति का आधार शामिल करने को लेकर बहस के दौरान हुआ था। भाजपा संघ के प्रिय मुद्दे घुसपैठिए बांग्लादेशियों की राष्ट्रीयता के सवाल पर गरमा रही थी। लालू के टोका-टांकी पर अनंत कुमार ने उनकी ओर यह जुमला दागा कि पहले आप बताएं आप भारत के साथ हैं या बांग्लादेश या फिर पाकिस्तान के साथ। इतना कहना था कि लालू जी आपे से बाहर। वे यह भूल चुके थे कि इससे पहले महिला विधेयक पर चर्चा के दौरान उन्होंने माकपा नेता बासुदेव आचार्य को भी ऐसी ही धमकी दी थी। एक बार लालू जी के बयान पर गौर फरमाएं-''यहां तीन यादवों की बात हो रही है , हम सब अपनी अपनी पार्टी के सुप्रीम हैं.. आपके यहां तो सब सुप्रीम खत्म हो गया है। आप न तो पाकिस्तान में हैं और न ही भारत में। ''करीब-करीब आशय वही था जो अभी अनंत कुमार व्यक्त कर चुके थे। पर लालू ये बर्दाश्त कैसे करें कि कोई उन्हें गद्दार या राष्ट्रविरोधी कहे।
बासुदेव आचार्य इसके पहले तृणमूल कांग्रेस के नेता सुदीप बंदोपाध्याय के निशाने पर भी रह चुके हैं। मुंबई में मोटरमैन हडताल के मुद्दे पर जब मुंबई का माहौल गरमाता जा रहा था, जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया था, माननीया रेल मंत्री कोलकाता में निगम के चुनाव में व्यस्त थीं। जब इसी को लेकर बासुदेव आचार्य ने सवाल खडे क़िए तो सदन में मौजूद सदस्य सुदीप बंदोपाध्याय की अशोभनीय टिप्पणी पर हक्के-बक्के रह गए। लालू-अनंत प्रकरण के पहले ही लोकसभा अध्यक्षा ने सुदीप बंदोपाध्याय की असंसदीय भाषा को लेकर फटकार लगाई थी। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा था कि आसन सदन के किसी भी सदस्य के दोबारा ऐसा व्यवहार बर्दाश्त नहीं करेगा। लेकिन आखिर इसकी परवाह किसे थी? कभी पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने सांसदों के आचरण को लेकर सच ही कहा था कि आप लोकतंत्र को खत्म करने के लिए ओवर-टाइम काम कर रहे हैं।
इसके पहले भी सांसद सभापति के हाथों से महिला आरक्षण विधेयक की प्रतियां छीनकर फाड चुके हैं। इस हल्ले-हंगामे में सभापति का माइक भी उखड ग़या था। सपा के अन्य सांसद भी गुस्से में सभापति के आसन की ओर बढे। अंत में संसद की गरिमा बरकरार रखने के लिए मार्शल बुलाना पडा और उसके बाद जो कुछ हुआ, वह काफी शर्मनाक था। एक बात तो तय है कि अगर सांसदों का आचरण नहीं सुधरा तो लोग संसद की प्रासंगिकता पर ही सवाल खडे क़रने लगेंगे और तब लोकतंत्र के सचेतकों को भी बुरा नहीं लगेगा। अभी अगर संसद में लोगों से हाथ उठवा लें, तो आपको इक्के-दुक्के लोग ही मिलेंगे, जिनपर भ्रष्टाचार, गबन या आपराधिक मामलों का कोई केस न चल रहा हो। अभी कुछ दिनों पहले सभापति के बुलावे पर स्कूल के बच्चे लोकतंत्र का पाठ सीखने के लिए देश के सुपर पंचायत आए थे। हंगामों का दौर जारी था, सांसद लडने-भिडने की मुद्रा में आ चुके थे और उम्मीद थी कि कुछ समय बाद ही संसद की कार्यवाही को टाल दिया जाएगा। हुआ यही और लोकतंत्र की धुंधली तस्वीर अपने जेहन में लेकर ये बच्चे वहां से रुखसत हुए। क्या ये बच्चे बडे होकर कभी वोट देने के बारे में भी सोचेंगे? लोकतंत्र के प्रति युवा वर्ग की विरक्ति यही बताती है कि कोउ नृप होउ, हमें का हानि। इन परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार हमारे आज के राजनेता होंगे और कोई नहीं।
हम लोकतंत्र के सफर में एक ऐसे चौराहे पर आकर खडे हैं, जहां से आगे का रास्ता हमें नहीं सूझ रहा। रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था-''नेता का अब नाम नहीं ले, अंधेपन से काम नहीं ले, हवा देश की बदल गई है, चांद और सूरज ये भी अब, छिपकर नोट जमा करते हैं, और जानता नहीं अभागे, मंदिर का देवता चोर बाजारी में पकडा जाता है? फूल इसे पहनाएगा तू? अपना हाथ घिनाएगा तू?'' नेताओं को लेकर दिनकर की चिंता आज भयावह रूप ले चुकी है। आज जनता पीछे छूट गई और जनता के प्रतिनिधि कहां से कहां निकल गए?
तभी तो दिनकर आजादी के बाद ही नेताओं से सवाल पूछते हैं-''जनता की छाती भिदें, और तुम नींद करो, अपने भर तो यह जुल्म नहीं होने दूंगा, तुम बुरा कहो या भला, मुझे परवाह नहीं, पर दोपहरी मैं तुम्हें नहीं सोने दूंगा।'' यह हिसाब लगाना उचित नहीं कि संसद की कार्यवाही पर प्रति सेकेंड कितने लाख रुपए खर्च होते हैं और उन्हें कितना वेतन-भत्ता मिलता है जिसके लिए वे हमेशा लालायित रहते हैं, लेकिन जनता को यह पूछने का हक है कि आपने सुप्रीम पंचायत में हमारी कितनी मांगें रखीं। आपने बजट सत्र के 115 घंटे लडने-झगडने में क्यों बरबाद किए? आखिर भारत की भूखी-नंगी जनता ही तो उन्हें वेतन से लेकर तमाम सहूलियतें देती है, इसलिए मालिक को यह पूछने का हक है कि तुमने सही ढंग से काम क्यों नहीं किया? आज नहीं तो कल जनता इनका हिसाब लेगी और माननीय सांसदों को जवाब देना होगा।

सावधान, वहशी दरिंदे शहर में हैं

याद है आपको निठारी की खूनी हवेली डी-5 का सच। न जाने कई मासूमों की सिसकियां इन हवेलियों की चहारदीवारियों में कैद हैं। खून से सना ड्राइंगरूम चीख-चीखकर इन राक्षसों की हैवानियत को बयान करता है। इस हवेली के पास कोई भी बच्चा आया, तो जिंदा वापस नहीं जा सका। यहां दो जीवित प्रेतात्माओं का वास था, जो इन मासूमों को अपने हवस का शिकार बनाते थे और बेरहमी से कत्ल कर उनके अधपके गोश्त के साथ जश्न मनाते थे। लेकिन ये हैवान अभी भी जिंदा हैं, आपके घर के आसपास, शातिर नजरों से किसी मासूम को घूरते हुए। उन्हें इंतजार होता है किसी मासूम के अकेलेपन का। मौका मिलते ही ये वहशी दरिंदे अपने असली रूप में बाघ-नख की तरह शिकार की चीर-फाड क़रने बाहर निकल आते हैं। मासूम ये समझ भी नहीं पाता कि उसके साथ समाज कितना घिनौना खेल खेल रहा है। वह हर उस शख्स को अपने पिता के नायकत्व या फिर कहें आदर्श की नजर से देखता है। वह समझ नहीं पाता कि चॉकलेट के लोभ में उसे ऐसा जख्म दिया जाएगा, जो ताउम्र उसकी नजर में समाज को व्यभिचारी बना देगा। हर रिश्तों का मानी तार-तार हो जाएगा। उसकी ओर प्रेम से बढे हर हाथ को वो शंका की नजर से देखेगा। यह एक ऐसा मनोवैज्ञानिक रोग होगा, जो एक डरे हुए भयभीत समाज को जन्म देगा।
ब्लादिमीर नोबोकोव के विश्वविख्यात उपन्यास लौलिता की सराहना करते कई लोग मिल जाएंगे। लेकिन इस उपन्यास को लौलिता की नजर से देखने का साहस कितनों में है? एक मासूम बचपन को वासना के गंदे दलदल में धकेलने के जिम्मेदार शख्स को हम नायकत्व देने का साहस दिखाते हैं, तो कहीं न कहीं वो कुंठित विचार हमारे भीतर भी मौजूद हैं, यह इसी बात की गवाही है। हो सकता है कि लौलिता ने नायक (?) की एंट्री से पहले ही सहपाठियों में यौन-अभिरुचि दिखाई हो। लेकिन हमारे वहशी नायक ने उसे दलदल से बाहर निकालने की बजाय उसे और गहरे धकेलने का ही तो काम किया। अभी हमारे यहां सेना का एक लेफ्टिनेेंट कर्नल मासूम बच्चों के पोर्नोग्राफी इंटरनेट पर डालने के आरोप में पकडा गया है। कहते हैं इसपर देश-विदेश के खुफिया एजेंसियों की नजरें पहले से थीं। हालांकि सेना में सहकर्मियों के साथ यौन-शोषण के आरोप पहले भी लगते रहे हैं। लेकिन यह एक ऐसा आरोप है जो मासूमों के प्रति समाज की घोर उपेक्षा को ही दर्शाता है। देश का भविष्य, कल के भारत की तस्वीर और न जाने क्या-क्या विशेषण हम इन मासूमों के लिए प्रयोग में लाते हैं। लेकिन सभ्य समाज के भले मानसों के दिमाग के किसी कोने में एक ऐसा कीडा कुलबुला रहा होता है, जो इन अबोधोेंं की मासूमियत छीनकर अपनी सभ्यता का भौंडा प्रदर्शन करता है। शायद इन मासूमों की चीख उनकी काम वासना को और तीव्र ही करती होगी।
ये इस बात का परिचय है कि हम 21वीं सदी से आगे का सफर तय करने जा रहे हैं। उत्तर आधुनिकता का जाप करने वाले कुछ लेखक पहले तो ये तय कर लें कि क्या यह समाज आधुनिक होने के स्तर पर भी खडा हो सका है? बाजार के मानकों ने हमारे समाज के आदर्शों को धाराशायी कर दिया है। यहां हर एक व्यक्ति समाज की नजर में एक नंबर है, ऐसा प्रावधान सरकार करने जा रही है कि आपकी पहचान अब एक विशेष नंबर से किया जा सके। जो सरकार आम आदमी को विशेष नंबर से पहचानेगी, उसकी संवेदना समाज के प्रति कितनी मरी हुई होगी, इसका अंदाजा हम-आप खुद लगा सकते हैं। पश्चिम सभ्यता ने हमारे दरवाजे पर दस्तक दी और हमने पूरा दरवाजा ही उनके लिए खोल दिया। फिर समाज के प्रति उन संवेदनाओं को आने से भी हम भला कैसे रोक सकते थे, जो अपने मासूमों को निर्मम बाजार की भेंट चढा चुका हो। उन वहशियाना भेडियों को भी आने से रोकने का कोई तरीका नहीं था हमारे पास जो मासूमों को आसान शिकार बनाते हैं। कल हमारे बच्चे समाज के प्रति विकृति का भाव लेकर बडे होंगे और स्कूल में सहपाठियों पर दनादन गोलियां चलाएंगे। उसके लिए जिम्मेदार हम ही होंगे, मासूम बच्चे नहीं।
ऐसे बच्चे जो इन दरिंदों का शिकार होते हैं, वे समाज से कटे-कटे रहते हैं, चुप रहना एवं एकांतवास उन्हें ज्यादा पसंद होता है। समाज ने इनके दिलो-दिमाग पर जो गहरा जख्म दिया है, उसे भरने में वक्त तो लगेगा ही। हो सकता है समाज के प्रति ये विरक्ति उन्हें गलत रास्तों पर धकेल दे। फिर आनेवाली पीढियों में कई ऐसे होंगे, जो बडे होकर समाज के उसूलों को चुनौती देंगे। और हम कहेंगे, देखिए आज-कल के बच्चों को, संस्कार तो इनमें रहा ही नहीं। जब अपने बच्चों पर हम सारी जिम्मेदारियां लाद देंगे, असमय ही उनका बचपना छीन लेंगे, पैदा होते ही अव्वल रहने के करतब सिखाने लगेंगे, बच्चों को समय नहीं देंगे, तो ये मासूम अव्वल तो होंगे, लेकिन कुंठित इच्छाओं के साथ । फिर हम उनसे यह उम्मीद तो कतई न करें कि वे अपने मां-बाप का वही सम्मान करेंगे, जो कभी आपके समय में होता था। अक्सर देखा गया है कि नजदीक के रिश्तेदार या पडाेसी ही इन मासूमों को अपने हवस का शिकार बनाते हैं। ये ऐसे लोग होते हैं, जिनका आपके घर बराबर आना-जाना होता है। वे किसी ऐसे ही मौके की तलाश में होते हैं, जब वे इन मासूमों को शिकार बना सकें। आपके परिवार में ऐसे शख्स का इतना दबदबा होता है कि बच्चा डर से मुंह भी नहीं खोल पाता। वह अंदर ही अंदर घुटता है और समाज के प्रति संशय, शंका के साथ उपेक्षा का भाव लेकर बडा होता है।
एक हकीकत पर गौर फरमाएं। बिगडैल बच्चों को सुधारने के लिए उन्हें अपराधियों से दूर सुधार गृह में रखा जाता है। यहां की हकीकत भी शर्मसार करने वाली है, जिन अधिकारियों पर इनके चरित्र-निर्माण की जिम्मेदारी होती है, वही इनका चरित्र-हरण करने में अव्वल होते हैं। अनाथालयों में भी ऐसे वहशी दरिंदे आपको मिल जाएंगे, जो अनाथ बच्चों के साथ भी दुराचार करने से परहेज नहीं करते। जब मां-बाप ने ही इनके साथ न्याय नहीं किया, तो फिर वे समाज में भला किससे उम्मीद करें? मंदिरों में भी पंडे-पुजारियों पर कई बार ऐसे आरोप लगते रहे हैं, जो बाल यौन-शोषण में शामिल रहे हैं। लेकिन जब देश की सीमा पर बलिदान होने वाला सिपाही भी चाइल्ड पोर्नोग्राफी बनाता फिरे, तो फिर बाल-सुधार की उम्मीद किनसे की जा सकती है? देश-विदेश की खुफिया एजेंसियों की रडार पर यह सैन्य अधिकारी पहले से ही था। उसकी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी। यह इस बात का गवाह है कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी में रुचि लेने वाले लोगों की संख्या भी इन दिनों बढी है। अब यह जांच का विषय हो सकता है कि इस सैन्य अधिकारी ने पैसा बनाने के लिए मासूमों को बाजार में उतारा या फिर हवस का शिकार बनाने के लिए।
इंटरनेट पर बाल अश्लीलता को परोसने का मतलब है दुनियाभर में सक्रिय ऐसे यौन अपराधियों की कुंठा को जगाना। भारत में ऐसे मामले कम ही लोगों के सामने आ पाते हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि यहां बच्चों की मासूमियत से खिलवाड नहीं किया जाता। एस्कॉन से लेकर साईंधाम के मंदिरों में बिछे कालीनों के नीचे झांक कर देखें, तो धूल का ढेर मिलेगा, जो पुजारियों के धवल वस्त्र को दागदार करते हैं। जो यह बताता है कि सब कुछ साफ-सुथरा नहीं है, जैसा कि ऊपर से दिख रहा है। शहर में कई ऐसे भेडिए हैं, जो दिन के उजाले में ही मासूमों को हवस का शिकार बनाने के लिए निकलते हैं। उनकी खूंखार नजरें ऐसे मासूमों पर होती है, जो घर में अकेले हों या फिर घर से दूर किसी पार्क में हों। निठारी के दहशत से उबरने में समय तो लगेगा, लेकिन यह सदमा हमें कई और दूसरे निठारी न होने देने के लिए आगाह तो कर ही गया। सुरेंद्र कोली और पंढेर के साथ इस देश का कानून जो भी फैसला दे, ये शातिर मानवता के लिए खतरा बनकर सामने आते रहेंगे। मासूमों का बचपन असमय ही न छीन जाए, इसके लिए हमें बच्चों को समझना होगा, समय देना होगा, भले-बुरे की पहचान बतानी होगी, ताकि निठारी के प्रेत को हमेशा के लिए दफन किया जा सके। ताकि सोए हुए देश को जगाने के लिए फिर किसी मासूम को मरने के बाद कोर्ट में जाकर हड्डियों को गवाह के रूप में पेश न होना पडे। अाखिर इन अबोध मासूमों की हडिडयों ने ही तो इन अधम, नरपिशाचों की गवाही दी थी।

बेलगाम होती खाप

इन गांवों में जोडियां ऊपर से बनकर नहीं आती, सब कुछ पंचायतों में तय होता है। यहां प्रेम पर इन तालिबानियों का कडा पहरा है। हुक्के की गुडग़ुडी पंचों के बीच सुलगती-बुझती रहती है और उसी के साथ गांववालों की सांसें भी चढती-उतरती हैं।
मनोज-बबली की मौत के बाद से तो ऐसा लगता है मानो हर घर के आंगन में खाप पंचायतें मौजूद हों। महेंद्र सिंह टिकैत, चौटाला एवं नवीन जिंदल भी इसके दरबार में हाजिरी लगाने आते हैं। फैसला सुनाते समय खाप पंचायतों के बूढे शेरों के हाथों की ऊंगलियां सिकुड ज़ाती हैं और खूनी पंजे बाहर निकल आते हैं। मुंह रक्त से सन जाता है और इन पंचायतों की रवायत को जिंदा रखने के लिए नरबलि की जरूरत महसूस होने लगती है। ऐसे में ही कोई मनोज-बबली इनके शिकार होते हैं, तो कोई और गरीब।
यह हिन्दुओं का कबिलाई तालिबान है। यहां सगोत्रिय शादियों को लेकर मौत के फतवे जारी किए जाते हैं और हरकारे हुक्म की तामिल के लिए दौड पडते हैं। ऐसा लगता है कि आप मध्य युग के किसी गांव में पहुंच गए हों। इन गांवाें पर लक्ष्मी की विशेष कृपा-दृष्टि रही है। लेकिन ऐसा लगता है शहराती बनने के क्रम में यह गांव कहीं ठहर सा गया हो। खाप पंचायतें अलगू चौधरी और जुम्मन शेख की पंचायतें नहीं होती, जहां पंच परमेश्वर माना जाता था। इन गांवों में जोडियां ऊपर से बनकर नहीं आती, सब कुछ पंचायतों में तय होता है। यहां प्रेम पर इन तालिबानियों का कडा पहरा है। हुक्के की गुडग़ुडी पंचों के बीच सुलगती-बुझती रहती है और उसी के साथ गांववालों की सांसें भी चढती-उतरती हैं।
मनोज-बबली की मौत के बाद से तो ऐसा लगता है मानो हर घर के आंगन में खाप पंचायतें मौजूद हों। महेंद्र सिंह टिकैत, चौटाला परिवार एवं नवीन जिंदल भी इसके दरबार में हाजिरी लगाने आते हैं। फैसला सुनाते समय खाप पंचायतों के बूढे शेरों के हाथों की ऊंगलियां सिकुड ज़ाती हैं और खूनी पंजे बाहर निकल आते हैं। मुंह रक्त से सन जाता है और इन पंचायतों की रवायत को जिंदा रखने के लिए नरबलि की जरूरत महसूस होने लगती है। ऐसे में ही कोई मनोज-बबली इनके शिकार होते हैं, तो कोई और गरीब।
खाप पंचायतें 5 से 20 गांवों तक की पंचायतें होती हैं। इसका आगाज लोगों को तब होता है जब गांव के चौपाल पर चारपाइयां बिछनी शुरु हो जाती है। हुक्के की चिलम तैयार किया जाने लगता है।
आस-पास के गांवों के लोग सुबह से जुटने लगते हैं, तब लोगों की समझ में आता है कि आज किसी गरीब के तकदीर का फैसला होना है। गांव में जमींदार किस्म के लोग जो दबंग जातियों से होते हैं एवं बडे-बूढे पंच की जगह आसीन होते हैं। तब शुरु होता है जनसुनवाई का दौर, जिसका आतंक तथाकथित अपराधी के लिए किसी मध्ययुगीन न्यायालय से कम नहीं होता। न्यायालय तो इक्का-दुक्का मामलों में ही फांसी की सजा सुनाती है, लेकिन यहां का हर फैसला नरबलि की मांग करता है। दोनों पक्षों को सजा सुनाई जाती है और उसकी तालिम के लिए गांव के लोग हाथ बांधे खडे होते हैं, कुछ मामलों में तो परिवार वाले भी। इन्हें गांव से जाति-बिरादरी से बाहर निकाले जाने का डर सताता रहता है, हुक्का-पानी बंद होने का मतलब होता है घर में लडक़ियों की शादी तक का न होना। तो ये है दबंग पुरुषों की पंचायत, जहां दलितों, महिलाओं एवं युवाओं के भाग्य का फैसला सुनाया जाता है।
इन खाप पंचायतों का सच तो तब सामने आता है, जब गांव की नामचीन शादियां चाहे सगोत्रीय हों या विधर्मी में ये उनकी शान में कसीदे पढते नजर आते हैं। जब राजेश पायलट के बेटे सचिन पायलट ने फारुक अब्दुल्ला की बेटी से शादी की, तो गुर्जरों की पंचायत का कौन ऐसा बडा चेहरा था, जो वहां नहीं गया। तब इन कठमुल्लाओं ने क्यों फरमान नहीं जारी किया? पति-पत्नी को भाई-बहन बनाना, हत्या एवं बर्बर सजाएं-क्या ये महज संयोग हैं कि इनका शिकार केवल वही लडक़े-लडक़ियां हुए जो छोटी हैसियत वाले थे। यह खाप का कौन सा चेहरा है? यह तो वही बात हुई कि समरथ को नहीं दोष गुसाईं। यानी जो ताकतवर लोग हैं, वही समाज के नियम, कायदे-कानून तय करें और गरीबों को बताएं कि तुम्हें इसी राह पर चलना होगा। मनोज-बबली हत्याकांड में शामिल गुनहगारों को जब न्यायपालिका ने मौत का फरमान जारी किया, तब एक बार फिर इनका विद्रूप चेहरा लोगों के सामने था। इन पंचायतों ने कोर्ट के फैसले का विरोध करते हुए गुनहगारों की मदद के लिए लोगों से आगे आने की अपील की। हिन्दू विवाह अधिनियम में बदलाव किए जाने के लिए ये राजनेताओं पर दवाब भी डाल रहे हैं ताकि संसद में इस मुद्दे पर बहस शुरु की जा सके। हरियाणा, पंजाब में खाप पंचायतों के वर्चस्व के कारण शायद ही कोई नेता हो, जो इनके विरोध करने का साहस जुटा पाता है। यही कारण है कि कभी नवीन जिंदल कांग्रेस नेतृत्व का विरोध करते हुए भी इन पंचायतों का समर्थन करते नजर आते हैं, तो कभी इनेलो और भाजपा। ये नेता भी उसी गांव से निकलकर आते हैं, परंपराओं के नाम पर वे भी मौन साध लेते हैं। बहुसंख्यक लोगों को नाराज कर चुनाव नहीं जीता जा सकता। लेकिन कुछ नेताओं को हाईकमान के आदेश का पालन करते हुए सुबह दिया गया समर्थन रात तक वापस लेने के लिए मजबूर होना पडता है।
वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि एक ही गोत्र में विवाह से होने वाले बच्चों को वंशानुगत रोगों का सामना करना पड सकता है। गोत्र का मतलब एक ही जाति के लोगों के बीच भाईचारे की भावना को बढाना रहा है। कॉमरेड नीलोत्पल बसु का मानना है -'हिन्दू मैरिज एक्ट में बदलाव की मांग का समाज-सुधार से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि यह सामाजिक दबदबा कायम रखने के लिए किया जा रहा है।' जातिगत श्रेष्ठता का दंभ ही ऐसे दकियानूसी विचारों को जन्म देता है। समाज बनने की प्रक्रिया में बहुत सी आधी-अधूरी परंपराएं समय के प्रवाह में पीछे छूट जाती हैं। सती-प्रथा, बाल-विवाह के विरोध के समय भी कुछ ऐसे दकियानूसी लोग सामने आए थे, लेकिन अंतत: इन बुराईयों को मानने से समाज ने इंकार कर दिया। हो सकता है कि इस तर्क के पीछे वैज्ञानिक आधार हो, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इन परंपराओं को जीवित रखने के लिए किसी जीवित इंसान की बलि दी जाए। समाज में वर्ग के आधार को झूठलाने वाला तबका अमीर राजनेताओं एवं दबंगों के विधर्मी या सगोत्रिय शादियों का खुलकर विरोध करने का साहस क्यों नहीं जुटा पाता? इन गावों में अक्सर ये बात कहते लोग मिल जाएंगे-भई क्या करें, छोरे तो हाथ से निकल गए, छोरियों को पकड कर रखो। यहां पकडने से उनका मतलब सामाजिक ताने-बाने, धार्मिक संस्कारों, रीति रिवाजों में बांध कर रखने से है। खाप पंचायतों में आज भी गांव के बडे-बुजुर्गों का दबदबा होता है। दलितों, महिलाओं एवं युवाओं को खाप पंचायतों में कोई जगह नहीं दी जाती। देखा गया है कि जिन इलाकों में खाप पंचायतों का दबदबा है, लडक़ियों एवं दलितों को दोयम दर्जे का ही माना जाता है। महिलाएं घरों एवं खेत-खलिहानों में मेहनत-मजदूरी करती हैं, पुरुष चौपाल में बैठकर हुक्के का आनंद लेते हैं। गाय खिलाने से लेकर उनके लिए चरी लाने तक का काम महिलाओं के जिम्मे है। कन्या-भ्रूण हत्या के मामले में भी ये राज्य दूसरों से कहीं आगे हैं। गांव में छोरों के सामने सबसे ज्यादा समस्या शादी के लिए लडक़ी खोजने की होती है। जैसे-जैसे गांव बसते गए, रवायतें भी बनती गईं। धीरे-धीरे अन्य गोत्र के लोग भी आकर गांव में बसने लगे। गांव के साथ आस-पास के गांवों में भाईचारा होने के कारण समान गोत्र में शादी का विरोध भी इसी रवायत का हिस्सा बनती गई।
अगर किसी न इसके खिलाफ शादी करने का दुस्साहस किया तो गांव से हुक्का-पानी बंद कर दिया जाता है और अल्टीमेटम देकर गांव छोड देने की धमकी दी जाती है। आज परंपराओं को जिंदा रखने के नाम पर हिन्दू तालिबानी एकजुट हो रहे हैं। इनके लिए देश का कानून, न्याय, संविधान कोई मायने नहीं रखता।
ये परंपराओं की गोद में जीने वाला समाज है, जो आधुनिकता को गले लगाते हुए भी कुछ पुरानी चीजों को छोडने का लोभ नहीं छोड पाता। लोकतंत्र में जब अलगाववादियों एवं आतंकवादियों को भी वार्ता के टेबल पर लाया जा सकता है , तो फिर यह समाज भी मिल-जुलकर मामलों को क्यों नहीं सुलझाता? लेकिन कोई भी तालिबानी फैसला जो गरीब लोगों की बलि लेता हो- को सभ्य समाज मान्यता नहीं दे सकता। लेकिन ये गरीबों के लिए तालिबान है, ताकि वे धर्म, जाति की जकडन में उलझे रहें और कोई मार्क्सवादी इन्हें धर्म को अफीम बतलाकर न बरगला सके।

मिर्चपुर का दर्द

दिल्ली से महज डेढ सौ किलोमीटर की दूरी पर बसा है हरियाणा का मिर्चपुर गांव। बहुसंख्यक आबादी दबंग जाति जाटों की है, करीब दौ सौ घर वाल्मिकी समाज के हैं, जो भारत के दूसरे गांवों की तरह ही गांव के बाहर बसे हैं। इस देश की सामासिक संस्कृति ने विदेशी हमलावरों को तो गले लगाया, लेकिन दलितों को अछूत ही मानता रहा। इस गांव में गरीबी अगर कहीं दिखती है, तो इन दलितों के झोपडियाें में ही। गांव की जोत बहुसंख्यक जाटों के पास है और दूसरे लोग इनकी खेतों में ही खेती-मजूरी कर जिंदगी गुजारते हैं। जाट समुदाय के बच्चे गांव के अंग्रेजीदां स्कूलों में पढते हैं, तो दलितों के बच्चे सरकारी स्कूलों में। गांव में करीब 400 सरकारी शिक्षक हैं, जिनमें 380 के करीब जाट शिक्षक ही हैं। पुलिस विभाग में भी यहां के जाट बिरादरी के लोग भरे-पडे हैं। गांव में सामाजिक विभाजन स्पष्ट रूप से दिखता हैएक तरफ जाट तो दूसरी तरफ दलित एवं पिछडी ज़ातियां। वाल्मिकी समाज के लोग बाबू जी के रहमो-करम पर गुजर-बसर करते हैं, पर गांव के आवारा कुत्ते इस सोशल इंजीनियरिंग से अनभिज्ञ किसी पर भी भौंकने का दुस्साहस करने से बाज नहीं आते। इनका अकारण भौंकना इतने बडे हादसे को जन्म देगा, इसका अंदाजा लोगों को न था।
हुआ यूं कि वाल्मिकी समाज की ओर से गुजर रहे जाट युवकों को देखकर ये भौंकने लगे। इन युवकों को असमय इन कुत्तों का भौंकना रास नहीं आया। आम दिनों की तरह ही मामला गाली-गलौज से होता हुआ मार-पीट तक जाकर रुका। कर्णपाल और वीरभान नामक दलित युवक इनके हमलों में बुरी तरह जख्मी हो गए। मामला यहीं तक होता, तो गनीमत थी। गांव में अशांति को देखते हुए पुलिस की एक टीम आ चुकी थी। लेकिन जाटों का गुस्सा इनकी मार-पिटाई के बाद भी शांत नहीं हुआ था। पुलिस की मौजूदगी में ही 400 के करीब जाट समुदाय के लोगों ने दलितों के घरों को चारों ओर से घेर लिया। दलित भी आत्मरक्षा के लिए घरों की छतों पर चले गए और हमलावर भीड पर ईंट-पत्थर बरसाने लगे। पुलिस ने, जिसमें अधिकांश गांव के जाट परिवार के लोग ही थे, दलितों को बहला-फुसलाकर पंचायत के लिए चौपाल ले आए। जाटों को मौका मिल चुका था और उन्होंने दलितों के घरों को चारों तरफ से घेरकर आग लगा दी। बच्चे एवं महिलाएं चीखने-चिल्लाने लगीं। तब चौपाल में इकट्ठे दलितों को यह समझ में आया कि उनके साथ क्या साजिश रची गई थी। जाट युवक नंग-धडंग़ उन महिलाओं के आगे नाच रहे थे, जो दलित महिलाओं एवं लडक़ियों को अपमानित करने का उनका नायाब नुस्खा था। दलितों के छोटे-छोटे बच्चे और असहाय महिलाएं जलते हुए घरों की चहारदीवारियों में कैद थीं। इन्हीं जलते घरों में एक सोलह साल की विकलांग बच्ची थी सुमन, जो बचकर निकल भागने में असमर्थ थी। जब उसके पिता ताराचंद विकलांग जलती हुई बच्ची को बचाने के लिए दौडे, तो उपद्रवी भीड में से कुछ लोगों ने उन दोनों पर पेट्रोल छिडक़ दिया। कुछ ही समय में तडपते बाप-बेटी ने लोगों के सामने दम तोड दिया। बीस से ऊपर घर धू-धू कर जल रहे थे और उन्हें बुझाने वाला कोई न था।
सत्तारूढ क़ांग्रेस पार्टी इस बात में उलझी रही कि कहीं यह मामला राजनीतिक रंग न ले ले। दलितों के हिमायती कांग्रेस महासचिव एक बार फिर लाव-लश्कर के साथ दलितों के बीच थे। कुछ दिनों पहले ही दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बिल गेटस के साथ चार्टर्ड प्लेन से अमेठी के गांवों के दौरे पर उनका जाना सुर्खियों में रहा था। उनका मकसद जो भी रहा हो, लेकिन मिर्चपुर की यात्रा के कई दिन बाद भी दलितों में आक्रोश है और प्रशासन इस मामले को रफा-दफा करने में लगा है। खाप पंचायतों ने अपने स्वभाव के अनुकूल आस-पास के गांवों में फरमान जारी कर दिया है कि कोई भी गांव इन्हें अपने यहां शरण नहीं देगा। दरअसल इस विवाद की जड में जाएं तो वहां भी इन पंचायतों का खौफ ही नजर आता है। अस्सी के दशक में खाप पंचायत ने एक जाट परिवार का हुक्का-पानी बंद करवा दिया था। इसकी अनदेखी करते हुए दलितों ने उस परिवार के फंक्शन में जाकर बैंड बजाने की हिमाकत की थी। यह एक तरह से सशक्त जाट समाज को चुनौती थी, जिसे वह आज तक नहीं भूल सका है। इसके पहले भी दबंग जाति के लोगों ने सांसियों एवं चमारों को मार-पीट कर इस गांव से भगा दिया था। सामंती व्यवस्था के टूटने से तिलमिलाया यह वर्ग अब गांव में दलितों-पिछडों की मौजूदगी को बर्दाश्त नहीं करना चाहता। दलित अब खेतों में काम नहीं करते, साफ-सफाई नहीं करते, मैला नहीं ढोते। अब युवा दलित दकियानूसी सामंती विचारों को ठुकराकर शहरों में मजदूरी करना ज्यादा पसंद करता है। बचे लोग नरेगा के तहत गांव में रोजगार कर रहे हैं, ऐसे में बाबू जी का यह आधार तो टूटना ही था। अब वे बराबरी की मांग करने लगे हैं। गुपचुप तरीके से अपने हक की बात करते हैं। खाप पंचायतों में जहां दबंग जातियों का दबदबा है, में शामिल किए जाने की मांग करने लगे हैं। खाप पंचायतें के बीस साल पहले के 'बंद' का भय भी अब इन्हें परेशान नहीं करता। ऐसे 'बंद' के दौरान भूपति श्रमिकों का बहिष्कार करते थे। अब दलित ही बहिष्कार करने की हिम्मत दिखा रहे हैं। ऐसे में एक सभ्य कहा जाने वाला समाज आखिर इन चीजों को कब तक बर्दाश्त करता?
मिर्चपुर का दलित समाज राजधानी के जंतर-मंतर पर इकट्ठा है ताकि सरकार को अपना दुख-दर्द सुना सके। इनके चौपाल में राजधानी के बुध्दिजीवियों की चहलकदमी भी देखी जा रही है। मिर्चपुर के बहाने दलित फिर अपने अधिकारों के लिए एकजुट होते दिख रहे हैं। वे इस बात को जानते हैं कि वह दिन दूर नहीं, जब गांव में उनके भगवान का मंदिर होगा, जो दबंगों के विरोध के कारण अभी बारिश के थपेडे झेलने को मजबूर हैं। गौरतलब है कि गांव के शिव मंदिर में दलितों का प्रवेश वर्जित है। डर है कि कहीं दलित समुदाय हिंदुओं के भगवान को ठुकरा अपने भगवान न गढ लें। ऐसा ही कुछ साल पहले साउथ अफ्रीका के कांगो में हुआ। अश्वेतों को बताया गया था कि भगवान श्वेत हैं और स्वर्ग में केवल श्वेत लोग ही जा सकते हैं। अश्वेतों ने अपना अलग चर्च बनाया, जिसमें अश्वेत भगवान की पूजा होने लगी और देखते-देखते इस चर्च के अनुयायियों की संख्या डेढ क़रोड पार कर चुकी है। दलितों पर आए दिन हो रहे अत्याचारों के खबरें भी राष्ट्रीय अखबारों में जगह बनाने में सफल रही हैं। कभी अंबाला में दलित दुल्हे को घोडे से उतार अपमानित किया जाता है, तो कभी तमिलनाडु में दलितों को अपमानित करने के लिए मुंह में विष्ठा भर दिया जाता है। कहीं दलित महिलाओं को नंगा कर गांव में घुमाया जाता है, तो कहीं खेत में काम करने गई दलित महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता है। ऐसी कई घटनाएं हैं, जो हमें अब चौंकाती नहीं, हमारे संवेदनाओं को नहीं झकझोरती। लेकिन एक समुदाय है जो इन खबरों पर पैनी नजर रखता है और हर ऐसी घटना के बाद जार-जार रोता है। कहीं न कहीं मानवता के प्रति उसका सदियों का भ्रम जो टुकडे-टुकडे होकर बिखरता है।
जिस देश के इतिहास पर हम फूले नहीं समाते, उसी ने इन दलितों के गले में नगाडा बांधा था, ताकि सडक़ों पर इस बात की डुगडुगी बजाते चलें कि वे अछूत हैं और हमारा भद्र समाज इनसे दूरी बना सके। अपने गौरव ग्रंथों में हम आर्य विजेताओं को आज भी सम्मान देते हैं, जिन्होंने अनार्य कहे जाने वाले दलितों, आदिवासियों को उनके जमीन से उजाडा। रक्त शुध्दता बरकरार रखने के लिए समाज में मनुवादी ढांचा खडा किया। दलित वर्ग की इस पीढी क़ो अपने समाज और संस्कृति का ज्ञान होने पर निराशा ही हाथ लगती है, वह अपने इतिहास पर बौखलाता है और गैर दलितों के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करता है। मायावती लाख कडक़डिया नोटों की माला पहने, वह उन्हें जातिगत स्वाभिमान से जोडक़र देखता है। दलितों में लोकतंत्र की बढती चेतना से राजनीतिक पार्टियां बौखला गई हैं। तभी तो कभी कलावती, कभी शशिकला, तो कभी किसी और दलित महिला के यहां भोज का आयोजन होता है, तो अगली रात पंचसितारा होटलों के स्वादिष्ट व्यंजनों का रसास्वादन करते बीतती हैं।
दलित वर्ग आक्रोशित है। राहत के नाम पर मिर्चपुर के दलितों को दो बोरी गेंहू दी गई है। पिछले दिनों खाप पंचायतें एकतरफा समझौते करते हुए दलितों के साथ भाईचारापूर्वक गांव में रहने को तैयार हुए हैं। लेकिन दलित समुदाय इस कांड के दोषियों के लिए सजा की मांग कर रहा है। दलितों ने इस कांड में जान गंवाने वाले बाप-बेटी के अंतिम संस्कार से भी इंकार कर दिया है। सरकार चुप्पी साधे है। एक जागृत समाज में ऐसी बर्बर कार्रवाई करने का हौसला लोगों को कहां से मिलता है। जातीय उन्माद की स्थिति में सरकार और तंत्र इतने पंगु, असहाय क्यों हो जाते हैं, सोचने वाली बात तो यही है।

जनादेश का चीरहरण

पार्टी छोड़ने और बदलने के सिलसिले को पहले 'आयाराम गयाराम' कहा जाता था। दल-बदलू एक तरह की गाली हुआ करती थी, आज नहीं है। चार धाम की यात्रा करने वाले तीर्थयात्रियों की तरह हमारे नेता भी यहां से वहां आते-जाते रहते हैं। उनका उद्देश्य येन-केन प्रकारेण सत्ता में आना और आ गए तो किसी भी तरह वहां बने रहने का प्रयास करना रह गया। नीतियां और कार्यक्रम केवल चुनावी घोषणापत्रों तक ही सीमित रहने लगे। सरकारें भी जनता से मिले जनादेश के आधार पर नहीं, बल्कि चुनावों के बाद दलों और सदस्यों के बीच होने वाली सांठ-गांठ, समझौते, सौदेबाजी, खरीद-फरोख्त, दल-बदल और पर्दे के पीछे सत्ता के लिए साझेदारी के आधार पर बनने-गिरने लगीं।
भारतीय राजनीति का एक काला चेहरा है दलबदल। अगर दूसरे शब्दों में कहें तो यह लोकतंत्र का माखौल उडाना ही है, जहां नेता एक दल से चुनकर आते हैं परंतु अपने फायदे के लिए दल बदल लेते हैं। जिस जनता ने उसे चुना है उसके भावनाओं का जरा भी ख्याल नहीं करते ये नेता। दलबदल का नंगा नाच अभी लोगों को झारखंड में देखने को मिला। जनता ने किसी दल विशेष के लिए चुना था, आखिर नेताओं को किसने ये अधिकार दिया की वे दलबदल कर इस जनमत का अपमान करें। आज दलबदल ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है। इसकी हकीकत सूटकेस कांड में दिख ही चुकी है। लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए यह जरूरी है कि इसे पूर्णत: प्रतिबंधित कर दिया जाए। अगर किसी को यह लगता है की उसे दुसरे दल में जाना चाहिए तो वह इस्तीफा देकर पुन: जनता के पास जाए और पुन: स्पष्ट जनमत ले। किसी दल विशेष का सांसद या विधायक बनने का अवसर उसे जनता ने दिया है। अत: यह जनता का निर्णय है अत: इसे बदलने का अधिकार भी जनता को ही होना चाहिए। भारतीय राजनीति में दलबदल करना एक कोढ क़ी तरह हो गया है। सत्ता सुख पाने के लिए आज नेता कुछ भी करने को तैयार हैं। लोकतंत्र को मजाक बना दिया गया है। दल बदल कर पैसा कमाना सबसे सरल हो गया है। इतिहास गवाह है कि जनता ने विगत पचास वर्षों में केंद्र व राय सरकारों में ये तमाशा कई बार देखा। दलबदल के सहारे अपने जनमत को बिकते हुए खुलेआम देखा। दलबदल कानून के चलते अब नेता लोग थोक में बिकने लगे हैं। आज जरुरत यह है कि दलबदल कानून को निरस्त कर दलबदल को पूर्णत: अवैधानिक घोषित किया जाए। दलबदल जनता के मतों का खुला अपमान है अत: इसे पूर्णत: प्रतिबंधित किया जाए। यह कदम भारतीय लोकतंत्र की शुचिता के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।
झारखंड में गुरूजी ने जनता के साथ विश्वासघात करते हुए कभी भाजपा के पाले में जाने की घोषणा की, तो कभी कांग्रेस को पटाने में मशगूल रहे। उनकी यह राजनीतिक नौटंकी जारी रहती, लेकिन बात न बनती देख भाजपा ने समर्थन वापस लेना ही उचित समझा। हालांकि इससे पहले भाजपा और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने भाजपा के अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में नई गठबंधन सरकार के गठन पर सहमति दिखाई थी। लेकिन मुख्यमंत्री शिबू सोरेन लगातार अपना बयान बदलते रहे और उनके इस बयान के बाद कि वे राय में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस के भी संपर्क में हैं।, भाजपा के सब्र का बांध टूट गया। राय में राजनीतिक संकट एकाएक उस समय उठ खड़ा हुआ जब केंद्रीय बजट पर कटौती प्रस्ताव के दौरान शिबू सोरेन कांग्रेस के पाले में जा खडे हुए। एक अंदेशा यह भी था कि हो सकता है विधानसभा का चुनाव वे न जीत पाएं और ऐसा कर केंद्र में मंत्रिपद पर काबिज हो जाएं और बेटे हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री बना दें। गुरूजी ने तरह-तरह की राजनीतिक कलाबाजियां दिखाईं। कभी राय विधानसभा के बचे हुए 56 माह के कार्यकाल के दौरान 28-28 माह के लिए दोनों पार्टियों में सरकार बनाने पर सहमति के लिए राजी दिखे, तो कभी आदिवासी मुख्यमंत्री के नाम पर अडे। मामला जो भी हो, चुनाव पूर्व का राजनीतिक गठबंधन ही लोकतांत्रिक कहा जा सकता है, जहां जनता को यह पता होता है कि कौन सी पार्टी किसके साथ है? चुनाव के बाद जब धुर विरोधी पार्टियां हाथ मिलाकर सत्ता का बंदर बांट करती दिखती हैं, तो लोकतंत्र के प्रति एक वितृष्णा ही जन्म लेती है। ये तो वही बात हुई कि एक दूसरे के खिलाफ आप लडक़र आए और बाद में सत्ता के लालच में पाले बदल लिए। अगर कोई नेता व्यक्तिगत रूप से दल बदल करता है तो उसे अयोग्य ठहराने के लिए कानून है, लेकिन जब दल ही पाले बदलने लगें तो भला कौन सा कानून भारतीय लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए है।
उन दलों की पाला बदली में अगर कोई ठगा जाता है, तो वह है जनता। ऐसे में भारत का मौजूदा संविधान और कानून जनता की इच्छा के हिफाजत का कोई रास्ता नहीं दिखाता क्योंकि तब जनता बाहर होती है और माननीय अंदर। क्या ऐसी कोई संवैधानिक या कानूनी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए कि एक-दूसरे के खिलाफ जनादेश लेकर आए दल सत्ता के लिए गठजोड क़र लोक-इच्छा का अपहरण न कर सकें। हां, यह ठीक है कि खंडित जनादेश की स्थिति में मामला पेचीदा हो जाता है, यह भी ठीक है कि बार-बार चुनाव का बोझ इस देश की गरीब जनता पर नहीं डाला जा सकता। लेकिन क्या यह दोनों कारण इतने बडे हैं कि इसके लिए जनादेश का बलात अपहरण होने दिया जाए।
1985 में सत्ता संभालने के साथ ही राजीव गांधी ने 52वें संविधान संशोधन के जरिए देश के संसदीय लोकतंत्र की एक बड़ी बुराई दल-बदल पर अंकुश लगाने की कोशिश की थी। इस तरह दसवीं अनुसूची, जिसे आमतौर पर दलबदल विरोधी कानून कहा जाता है, को संविधान में जोड़ा गया था। मगर इस कानून में कमियां बरकरार हैं। इन्हीं का फायदा उठाकर नरसिंह राव ने अपनी अल्पमत सरकार को बचा लिया था। उसके बाद एनडीए सरकार ने 2003 में 90वें संशोधन के जरिए इस कानून को सख्त करने की कोशिश की थी। ऐसा नहीं है कि दलबदल किसी स्वार्थ के लिए ही किया जाता है। राजनीतिक अपराधी भी दलबदल करते हैं। आज विभिन्न राजनैतिक दलों के टिकट पर अथवा अपने व्यक्तिगत बाहुबल पर चुनाव जीतकर यह लोग आज हमारे देश की लोकसभा व कई विधानसभाओं में मौजूद हैं। एक पेशेवर अपराधी के दल-बदल का मकसद सत्ता या सिध्दान्त अथवा टिकट आदि देने दिलाने जैसी बातें न होकर केवल एक ही होती है कि आखिर उसके जीवन की गारंटी किस राजनैतिक दल की छत्रछाया में सुनिश्चित है। अपने इसी लक्ष्य के तहत आमतौर पर अपराधी लोग एक राजनैतिक दल का दामन छोड़कर दूसरे राजनैतिक दल का दामन थामने में लगे रहते हैं।
दलबदल विरोधी कानून कहता है कि अगर कोई संसद सदस्य या विधायक खुद पार्टी से इस्तीफा देता है तो उसकी सदस्यता भी खत्म हो जाती है। लेकिन अगर पार्टी निकालती है तो असंबध्द सदस्य के तौर पर उसकी सदस्यता बनी रहती है। संविधान विशेषज्ञ और जम्मू-कश्मीर के कांग्रेसी विधायक रवींद्र शर्मा कहते हैं, यह कानून राजनीतिक भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए बनाया गया था। सदन में वोटिंग के वक्त विधायकों के बिक जाने के कारण सरकारें अस्थिर हो जाती थीं। लेकिन यह कानून पार्टी की तानाशाही को भी स्वीकार नहीं करता। यदि किसी सदस्य को पार्टी से निकाला जाता है तो यह पार्टी का अंदरूनी मामला है, उसकी वजह से चुने हुए प्रतिनिधि को काम करने से नहीं रोका जा सकता। क्योंकि जिन्होंने उसे चुना है, वे अपने प्रतिनिधि को वापस नहीं बुला सकते। ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं है। यही कारण है कि अपने नेताओं की जोरदार मांग और अमर सिंह के उकसाने के बावजूद मुलायम उन्हें पार्टी से नहीं निकाल रहे।
पार्टी छोड़ने और बदलने के सिलसिले को पहले आयाराम गयाराम कहा जाता था। दल बदलू एक तरह की गाली हुआ करता था। आज नहीं है। चार धाम की यात्रा करने वाले तीर्थयात्रियों की तरह हमारे नेता भी यहां से वहां आते-जाते रहते हैं। उनका उद्देश्य येन-केन प्रकारेण सत्ता में आना और आ गए तो किसी भी तरह वहां बने रहने का प्रयास करना रह गया। नीतियां और कार्यक्रम केवल चुनावी घोषणापत्रों तक ही सीमित रहने लगे। सरकारें भी जनता से मिले जनादेश के आधार पर नहीं, बल्कि चुनावों के बाद दलों और सदस्यों के बीच होने वाली सांठ-गांठ, समझौते, सौदेबाजी, खरीद-फरोख्त, दल-बदल और पर्दे के पीछे सत्ता के लिए साझेदारी के आधार पर बनने-गिरने लगीं।