रविवार, 20 जून 2010

असली गांधी तो दक्षिण अफ्रीका में मिले


हासिम सीदास ने बताया कि देखिए, गांधी को तो हम लोगों ने तराशा है। जब वे भारत से यहां आए थे, तो एक अनगढ हीरे की तरह थे। हमने दुनिया को गांधी नाम का सबसे बडा हीरा दिया है। असली गांधी तो यहां हैं। अगर तुम्हें लिखना ही है, तो यहां के गांधी पर लिखो
साक्षात्कार
गांधी पर लिखने का विचार कहां से आया? आपने अपने उपन्यास 'पहला गिरमिटिया' में भारत के गांधी से ज्यादा दक्षिण अफ्रीका के गांधी को महत्व दिया है? इसके पीछे क्या वजह रही होगी?
मैंने 1947 में गांधी को देखा था। हताश, निराश गांधी को, जो देश के विभाजन से दुखी थे। हुआ यूं कि गांधी जी दिल्ली से हरिद्वार जा रहे थे। मैं उस समय छठी कक्षा में पढ रहा था। स्कूल में अध्यापक महोदय ने कहा कि चलो, आज तुम लोगों को गांधी का दर्शन करवाते हैं। हम लोग लाइन लगाकर सडक़ के किनारे गांधी के इंतजार में खडे थे। उस समय तक गांधी के बारे में बस इतनी जानकारी थी कि उन्होंने हमें आजादी दिलाई है। लेकिन देखने की ललक थी। एक कार तेजी से गुजरी। पता चला कि वो महिला मीरा बेन थी। बाद में गांधी एक बस से आए। संयोग ऐसा था कि गांधी जिस खिडक़ी के पास से बाहर झांक रहे थे, वो मेरे सामने ही थी। बापू नीचे हमारी ओर ही देख रहे थे। बापू की वो तस्वीर, वो आवाज आज भी हमारे दिल में रिकाडर्ेड है। गांधी को सुस्त, उदास देखकर मन उदास हो गया था। विभाजन के बाद देश की राजनीति में बापू को लोगों ने अप्रासंगिक बना दिया था। मामा आचार्य जुगल किशोर गांधी के निकट रहे हैं। उनसे भी बापू के बारे में बहुत कुछ जाना-समझा। गांधी मेरी जिंदगी में ऐसे व्यक्ति थे, जो हमेशा अपनी ओर आकर्षित करते रहे। इस किताब को लिखने में मुझे आठ साल लगे। जब मैं दक्षिण अफ्रीका गया, तो वहां हासिम सीदास नाम के एक व्यक्ति ने बताया कि देखिए, गांधी को तो हमने तराशा है। जब वे भारत से यहां आए थे, तो एक अनगढ हीरे की तरह ही थे। हमने दुनिया को गांधी नाम का सबसे बडा हीरा दिया है। तब असली गांधी तो यहां हैं। अगर तुम्हें लिखना ही है, तो यहां के गांधी पर लिखो। देश-विदेश भटकते हुए मैंने गांधी के बारे में जानकारियां बटोरी और तब पहला गिरमिटिया लोगों के सामने आया।

आईआईटी कानपुर के परिवेश की क्या भूमिका रही इस उपन्यास-लेखन में?
हिन्दी का होने की वजह से लोग शुरू से ही मुझे नापसंद करते थे। वहां का माहौल ही अंग्रेजियत भरा था। वहां की अमरीकन फैकल्टी मुझे बार-बार परेशान करती रही। कभी सस्पेंड किया, तो कभी कुछ और। ऐसे समय में मुझे बापू की दक्षिण अफ्रीका की पीडा याद आती थी, जब उन्हें वहां उपेक्षित, प्रताडित किया जा रहा था। वहां के परिवेश और संघर्ष में मुझे गांधी का प्रतिबिंब ही दिखा, जिसने मेरी रचना को निखारने के लिए अंर्तदृष्टि दी।

एक बार आपने मुलायम सिंह यादव के बारे में कहा था, 'एक बार मैंने चंदन का वृक्ष देखा तो मुझे सांप याद आया। लेकिन आज मुझे सचमुच का चंदन का वृक्ष याद आया।' तो क्या आज भी आप इन बातों को मानते हैं?
स्व. मित्र जनेश्वर मिश्र ने मुलायम सिंह से मिलवाया था। उस समय मुझे पैसे की जरूरत थी। उन्होंने मुझे 75 हजार रुपए दिए जिसके कारण मैं दक्षिण अफ्रीका जा सका, नहीं तो इस किताब के आकार लेने में काफी मुश्किलें आती। जनेश्वर मिश्र के जन्मदिन के अवसर पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया था, जिसमें अध्यक्षीय भाषण देते हुए मैंने समाजवादियों की खूब खबर ली थी। समाजवादी धीरे-धीरे सामान्य जनों से दूर ग्लैमर की दुनिया में खोते जा रहे थे। जनता के बीच पकड दूर होती चली गई थी। मेरे जैसे लोग भी मुलायम सिंह से नहीं मिल पाते थे। सिक्यूरिटी वाले इधर का उधर दौडाते रहते थे। मुझे बडा अफसोस होता था कि गांधी के देश में यह कैसी स्थिति है कि नेता लोगों से मिलना तो दूर, सुरक्षा के घेरे में चलने में ही अपनी शान समझते हैं।

लोहिया जी हमेशा आपको लिखने के लिए प्रेरित करते रहे। उनका क्या प्रभाव मानते हैं अपनी रचनाओं पर?
इलाहाबाद के कॉफी हाउस में मैं अक्सर जाता रहता था। लोहिया जी भी वहां पर आते थे। वे हमेशा पूछते थे-क्या कर रहे हो? क्या लिख-पढ रहे हो? वे अक्सर समझाते हुए कहते थे कि जैसे हमारे लिए राजनीति जरूरी है, उसी तरह साहित्यकारों के लिए लिखते-पढते रहना जरूरी है। जैसे मैं राजनीति में किसी से नहीं डरता, उसी तरह तुम भी निडर होकर खूब लिखो। ये सब बातें आज भी जब कलम उठाता हूं, याद आती हैं।
बाजार जब अपना प्रभाव बढाती है तो खुद की भाषा भी गढती चलती है, क्या आप इससे सहमत हैं?
यह एक दुखद घटना है। हमारे देश में जो भी भाषा रही, वो राजा-महाराजों की भाषा रही या उनके माध्यम से होकर आई। बाजार अपने साथ एक सभ्यता भी लेकर आती है। गांधी ने इसे ही शैतानी सभ्यता कहा है। आप कल्पना करें कि भारत के गांव में जैसे कोई यूरोपियन महिला चली आए, कुछ ऐसा ही दुर्भाग्य रहा हिंदुस्तान में कि राजा की भाषा यहां चली आई। गांधी ने देश के हरेक गांव को समृध्द और आत्मनिर्भर बनाना चाहा। लेकिन नेहरू इस बात को मानने को तैयार नहीं थे। वे कहते थे कि मैं नहीं मानता कि गांव में कोई उजाला है। गांव तो अंधेरे में डूबा है, फिर वे क्या रास्ता दिखलाएंगे। अगर नेहरू ने गांधी की बात मान ली होती, तो कई समस्याएं जो आज विकराल रूप लेती जा रही हैं, नहीं होती। इसी में भाषा की समस्या भी शामिल है। देशी एवं ग्रामीण बाजार से स्थानीय भाषा का ही भला होना था।

आपके उपन्यास में एक जगह एक छात्र के आत्महत्या की बात आई है। ऐसा ही संदेश थ्री इडियटस फिल्म के माध्यम से भी दिया गया। क्या आप इसमें कुछ समानता पाते हैं?
नहीं, बात ही दूसरी है। मेरे उपन्यास में परीक्षा के तनाव की चर्चा नहीं है। इसमें दलितों के दाखिले को लेकर आईआईटी कैंपस में किस तरह लोग सोचते हैं, इसको लेकर है। दरअसल आईआईटी कानपुर में मेरी लडाई की शुरुआत भी यहीं से हुई। उस समय मैं वहां पर रजिस्ट्रार था। वहां दलित छात्रों को बहुत अपमानित किया जाता था। जिस लडक़े ने आत्महत्या की थी, वो अन्य छात्रों की तरह ही कंपटीशन पास कर आया था। स्वभाव से विद्रोही था, किसी की नहीं सुनने वाला। पता नहीं क्या हुआ, कि इनके तनावों से उबकर एक दिन उसने आत्महत्या कर ली। इंक्वायरी हुई। लेकिन देश में जैसा दूसरे तरह के जांच का नतीजा होता है, वही यहां भी हुआ। आठ-दस साल बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है।

पहला गिरमिटिया और आज के मॉडर्न गिरमिटिया में आप क्या अंतर पाते हैं?
पहले गिरमिटिया को दस पाउंड मिलता था सालाना। जबकि आज के लोग लाखों डॉलर लेते हैं। पता नहीं इनका देश के प्रति क्या कमिटमेंट है, लेकिन यहां रह गए मां-बाप को पैसे भेजकर ये अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। गिरमिटिया समाज को दक्षिण अफ्रीका से निकाला जा रहा था, जिसकी लडाई बीस सालों तक गांधी ने लडी। अाज ओबामा भारतीय, चीनी छात्रों का भय दिखाकर अमरीका में यही करने जा रहे हैं। आईआईटी फैकल्टी की शिक्षा पध्दति भी अमरीका-केंद्रित है। वहां के सिलेबस और उदाहरण देकर छात्रों को पढाया जा रहा है। फिर तो वे धन कमाने की मशीन ही बनेंगे, अच्छे नागरिक, सुपुत्र नहीं। पहला गिरमिटिया जब यहां से गया था, तो अपने साथ रामायण का गुटका, माला और गंगा जल लेकर रोजी-रोटी के लिए वहां गया था। वे चाहे हिंदू थे, मुसलमान, तमिल या पारसी। लेकिन आज के गिरमिटिया तो सब कुछ यहीं छोडक़र जाते हैं, भारतीयता को भी और वहां से अंग्रेजियत लेकर आते हैं। हमारे समाज में मजदूर 100 रुपए भी कमाता है, तो 5 रुपए बचा लेता है। जबकि वहां सबकुछ वीजा कार्ड पर चलता है। अमरीकन दिवालिएपन का कारण यही वीजा कार्ड ही रहा, जिसने कर्ज लेकर लोगों को मकान, गाडी ख़रीदना सीखाया।

एक अंतिम सवाल, कवि भवानी सिंह ने एक बार साक्षात्कार के दौरान कहा था कि 'मुरारजी भाई की ऐसी की तैसी, गांधी से लोगों का काम हल नहीं होगा, तो मार्क्स तक जाने में उन्हें कोई रोक नहीं पाएगा।' क्या आप इससे सहमत हैं?
जहां तक मार्क्स की बात है, उनका सिध्दांत बहुत ही उपयोगी है। लेकिन भारत में स्थितियां दूसरी रही। यहां मजदूर से ज्यादा किसानों की हालत खराब थी। कम्यूनिस्ट भाई तो केवल मजदूरों की बात करते थे। गांधी ही थे जिन्होंने मजदूरों, किसानों को एकजुट किया। मार्क्स आज सब जगह से बाहर किए जा रहे हैं। पार्टी वर्कर भी जनता से कट रहे हैं, ऐश कर रहे हैं। आजादी के समय पुराने मार्क्सवादियों में कुछ लोग ही थे जो इसे कैपिटलिस्ट की लडाई न मान सीधे आंदोलन में शरीक हुए।
जब तक गरीब, संघर्षशील लोग रहेंगे, गांधी लोगों को रास्ता दिखाते रहेंगे। आज दुनिया के लोग गांधी को स्वीकार कर रहे हैं। आज के मार्क्सवादी तो जनता की राजनीति से ही कट गए हैं। एक बात तो तय है कि नेताओं को देश के लोगों से जुडना होगा, चाहे आप गांधी, मार्क्स, गोलवलकर को स्वीकार करें या नहीं।

हमसे बातचीत करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद
(साहित्यकार गिरिराज किशोर से चंदन राय की बातचीत)

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