मंगलवार, 1 जून 2010

समय से फैसला हो तो बचे 'मान'और धन

चन्दन राय
दरियागंज के एक स्कूल टीचर उमा खुराना का केस आपको याद होगा। एक निजी चैनल के फर्जी स्टिंग में उनपर स्कूल-छात्राओं को देह व्यापार में धकेलने का आरोप लगाया गया था। इस आरोप के बाद उग्र भीड ने उमा खुराना को जमकर पीटा और उनके कपडे तक फाड ड़ाले थे। जांच में यह मामला झूठा साबित हुआ। लेकिन अब तक जो होना था, वो हो चुका। उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया और समाज ने एक ऐसा गहरा घाव दिया, जिसे वह लोगों से छिपाती घूम रही थी। मीडिया ने उनके भीड द्वारा पीटे जाने एवं कपडे फ़ाडने के विजुअल को बार-बार दिखाया। इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने उमा खुराना को अपनी खोई छवि की भरपाई के लिए मानहानि और हर्जाने का मुकदमा दायर करने को कहा। अब एक दूसरे मामले पर नजर डालते हैं। अरबों रुपयों के घोटाले के आरोपी झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा ने कोर्ट में यह कहते हुए मानहानि का मुकदमा दायर किया कि उन्हें राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया जा रहा है। दोनों मामलों में मानहानि का मुकदमा दायर किया गया। हमारा मकसद यहां उचित या अनुचित मुकदमों के मामले में फैसला देने का नहीं, बल्कि इस बात की ओर इशारा करना है कि बढते मानहानि के मुकदमों के कारण न्यायपालिका के क्रिया-कलापों पर कितना असर पडा है? कई ऐसे मानहानि के मुकदमों के कारण देश की न्यायिक व्यवस्था चरमराती नजर आ रही है। देश में आए दिन इस तरह के मुकदमे देश के विभिन्न अदालतों में दायर किए जाते हैं, जिसमें व्यक्ति यह आरोप लगाता है कि उसकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचा है। पहले ही मुकदमों के बोझ से दबे न्यायालय के लिए यह एक दोहरी मार है।
अमिताभ बच्चन ने इस बात का जिक्र अपने ब्लॉग पर करते हुए कहा है कि मानहानि या माफी मंगवाने के लिए अदालत का रुख करना एक थका देने वाली प्रक्रिया है। ऐसे किसी मामले में अदालत का निर्णय आने में कई साल लग जाते हैं। किसी-किसी मामले में तो फैसला आने में 15-20 साल तक लग जाते हैं या मामले में शामिल लोगों का निधन तक हो जाता है। जब फैसला आता भी है तो या तो बहुत देर हो चुकी होती है या उस फैसले का कोई महत्व नहीं रह जाता। इस मामले में सदी के महानायक की चिंता जायज ही है। अगर ऐसे मामलों में वे कोर्ट जाने लगे, तो बाकि की जिंदगी उन्हें कोर्ट के चक्कर काटने में ही गुजारनी पडे। मीडिया सेलिब्रिटियों की लाइफ-स्टाइल पर पैनी नजर रखती है। उनसे जुडी हर छोटी-बडी घटनाएं मीडिया में सुर्खियां बनती हैं। उनके बीमार होने की खबर मिलते ही देश में उनके स्वास्थ्य को लेकर पूजा-पाठ का दौर शुरू हो जाता है। ऐसे में किसानी को अपना पेशा बताना कभी सुर्खियों में बनता है तो कभी विदेशी महंगी गाडी ज़न्मदिन के मौके पर अपने बेटे को देने के लिए कर बचाने की सरकार से अपील भी। इस तरह के मामलों का चर्चा में आना परेशान तो करता ही है। लेकिन उन्हें दुख तब होता है जब परिवार की बहू ऐश्वर्या राय को लेकर मीडिया में चर्चाएं होती हैं। उनका इशारा ऐसे ही मामलों में मानहानि को लेकर था, जब मीडिया की बेडरुम में अनर्गल तांक-झांक से सेलिब्रेटियों की निजी जिंदगी प्रभावित होती है। ऐसे में वे मानहानि के दावे के बारे में सोचने लगें, तो उन्हें स्थायी रुप से एक वकील की सेवा लेनी होगी।
उनकी चिंता का दायरा सिर्फ यहीं तक नहीं, बल्कि न्याय मिलने में देरी को लेकर भी है। ऐसे मामलों में अगर सुनवाई होती भी है, तो उनका फिल्मी कॅरियर बुरी तरीके से प्रभावित होगा। उम्र के आखिरी पडाव पर भी वे फिल्मी कॅरियर की तीसरी पारी खेलने मैदान में जमे हैं। बुध्दु बक्से पर भी अपनी धाक जमाने वाले अभिनेता ये कभी नहीं चाहेंगे कि वे अदालतों के चक्कर में उलझें। यही कारण है कि ब्लॉग पर वे मात्र अपनी हताशा जाहिर करते हैं।
अब मानहानि के मुकदमों की हकीकत भी समझ लें। कोच्चि आईपीएल फ्रेंचाइजी की मिल्कियत पर उठे विवादों को लेकर चर्चा में आई सुनंदा पुष्कर भी मानहानि का मुकदमा दायर करने के लिए अदालत का रुख करनेवाली हैं। उनका आरोप है कि मीडिया ने उन्हें एक ब्यूटीशियन, स्पा की मालकिन और सोशलाइट कहा है। जबकि वे कभी स्पा व्यवसाय में शामिल नहीं रहीं। मीडिया में गलत छवि पेश करने के मामले में वे क्षतिपूर्ति का दावा करने पर भी विचार कर रही हैं। सानिया-शोएब निकाह मामले में पाकिस्तान से उनके जीजा इमरान मलिक दिल्ली आए ताकि शोएब मलिक की पत्नी होने का दावा करने वाली आयशा सिद्दीकी पर मानहानि का मुकदमा चलाया जा सके। हालांकि इस मामले में शोएब मलिक की काफी किरकिरी हुई जब लोगों के सामने उन्हें स्वीकार करना पडा कि आयशा उनकी पत्नी रह चुकी हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण अडवानी को भी तीन सांसदों सहित मानहानि का मुकदमा झेलना पडा, जब सपा के एक नेता ने संसद में नोट लहराने के मामले को लेकर कहा कि इससे समाजवादी पार्टी की साख पर असर पडा है और ऐसा जानबूझकर पार्टी के खिलाफ माहौल बनाने की बदनीयती से किया गया है। अगर ऐसे मुकदमों में अदालतों का वक्त जाया हो, तो स्वाभाविक है कि मुकदमों की सुनवाई के लिए हमें लंबा इंतजार करना होगा। यों ही न्यायाधीशों की कमी का रोना रोती अदालतें सायंकालीन अदालत लगाने पर भी विचार कर रही हैं। पर आलम यह है कि जितने मामलों में सुनवाई होती है, उससे कई गुना ज्यादा मामले अदालतों की चौखट पर होते हैं।

लेकिन कोई व्यक्ति ये महसूस करे कि किसी व्यक्ति ने उसकी सार्वजनिक छवि को ठेस पहुंचाई है, तो अदालत में जाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं। अभी पटना के कंकडबाग इलाके में करोडाें की जमीन हडपने के कारण चर्चा में आए आसाराम बापू को भी मानहानि के मुकदमे का सामना करना पड रहा है। अदालत का उनके विरुध्द फैसला आने के बाद उनके शिष्यों द्वारा जमीन मालिक के खिलाफ जुलूस निकालकर आपत्तिजनक नारे लगाने का मामला सामने आया था। एक सार्वजनिक सभा में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जदयू पार्टी के पूर्व अध्यक्ष ललन सिंह पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के कारण पूर्व मुख्यमंत्री राबडी देवी को भी मानहानि के चक्कर में अदालत के चक्कर लगाने पडे। अगर राजनेता अपनी वाणी पर संयम रखें तो कई ऐसे मामलों से बचा जा सकता है, जिससे अदालत के समय की भी बचत होगी।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माने-जाने वाले मीडिया को सबसे ज्यादा मानहानि के मुकदमों का डर सताता है। लोकतंत्र में एक सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाने के कारण कभी-कभी वह राजनीतिज्ञों एवं सेलिब्रिटियों पर भी छींटाकशी करता रहता है। अगर इन लेखों से किसी की सार्वजनिक छवि पर असर पडता हो, तो मीडिया को भी बिना सच्चाई की तह में गए ऐसी खबरों से बचना चाहिए। फिल्मी गॉशिप के बहाने सेलिब्रिटिज की निजी जिंदगी की बखिया उधेडने को भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि कई मामलों में बेवजह ही उसे अदालत में घसीटा जाता है। हाल में एक अंग्रेजी अखबार को 'प्रताडित करना' शब्द-प्रयोग के कारण मानहानि का सामना करना पडा। संपत्ति विवाद को लेकर यह मामला न्यायालय में लंबित था। हालांकि अखबार के वकील का कहना था कि उक्त व्यक्ति ने कुछ मौकों पर दूसरे पक्ष को धमकाया था, इसलिए इस शब्द का प्रयोग अपमानजनक नहीं। इस मामले में बांबे हाईकोर्ट ने अखबार का पक्ष रखते हुए कहा कि जरूरी नहीं कि अदालत की कार्यवाही की मानहानि करने वाली खबर वाकई अदालत की आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आती हो।
मानहानि किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि अदालतों की भी होती है। कानून की भाषा में इसे कोर्ट की अवमानना या कंटेम्ट ऑफ कोर्ट कहते हैं। अगर अदालत को ऐसा लगे कि किसी व्यक्ति के आचरण से न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुंचा हो तो संबंधित व्यक्ति को कंटेम्ट ऑफ कोर्ट का सामना करना पडता है। देखा गया है कि अदालत अपने गरिमा को लेकर कुछ ज्यादा ही सचेत रहती है। अभी एक ऐसा ही मामला काफी चर्चा में रहा, जब न्यायालय में
एक लडक़ी ने जस्टिस पसायत को मि. पसायत कहते हुए संबोधित किया। कोर्ट की मर्यादा का ध्यान दिलाए जाने पर उसने कहा कि कानून के सामने सभी समान हैं और आप लोग भी मेरी तरह आम आदमी हैं। कोर्ट ने इस बात पर ऐतराज जताते हुए कहा कि उसे संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादाओं का ख्याल रखना चाहिए। लडक़ी का जवाब भी बेहद शालीन था कि वह सिर्फ देश के संविधान का सम्मान करती है। जस्टिस पसायत पर सुनवाई के दौरान जूता फेंकने के मामले में वह पहले ही कोर्ट की अवमानना का सामना कर रही थी, उसपर कई नए अवमानना के मुकदमे और जड दिए गए। अभी ऑस्ट्रेलिया के हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि इंटरनेट वेबसाइट पर छपे लेख के लिए दूसरे देशों की अदालतों में जाकर भी मानहानि का मुकदमा दायर किया जा सकता है। वादी ने यह दलील दी कि उसे जानने वाले मेलबोर्न में भी रहते हैं, जबकि यह लेख अमरीका स्थित वेबसाइट में छपा था। संभवत: यह पहला ऐसा मामला है जिसमें किसी भी देश के न्यायालय ने इंटरनेट और कानून की सीमा पर विचार किया है। इंटरनेट साइट पर छपे लेखों के कारण अब दुनिया भर में मुकदमों की झडी लग सकती है। ऐसे में सदी के महानायक की मानहानि के मुकदमों को लेकर चिंता जायज है।

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