मंगलवार, 1 जून 2010

राहत बिना कैसा बीमा?

बीमा कंपनियों का अनुमान है कि सरकार की सामाजिक योजनाओं के चलते ग्रामीण आबादी का रुझान बीमा की तरफ बढ़ा है। बीमा प्रीमियम राशि के 2015 तक एक लाख करोड़ रुपए छू लेने का अनुमान है। ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा अभी भी बीमा कवर के बाहर है। इन कंपनियों का अगला निशाना गांव के भोले-भाले किसान हैं, जिन्हें तमाम तरह के आश्वासन देकर इस कारोबार को आगे बढाया जा सकता है। लेकिन बीमा कंपनियों के मुनाफे के इस बाजार में आम आदमी अभी भी ठगा सा महसूस करता है
दि ल का दौरा पडने पर सर्जरी लगभग दो से ढाई लाख रुपए, वाहन दुर्घटनाग्रस्त होने पर चार से आठ लाख का नुकसान, ऐसे में एक आम आदमी बीमा की शरण में जाकर ही इन झंझटों से मुक्ति पाना चाहता है। तेज भाग-दौड भरी जिंदगी में स्वास्थ्य का क्या भरोसा, कब दगा दे जाए और आपको चार से पांच दिनों के लिए अस्पताल में भर्ती होना पडे, एेसे में इलाज पर आए बिल को देखकर ही आदमी फिर से बीमार हो जाता है। सडक़ पर गाडियों में मचे रेलम-पेल के बीच कब आपकी गाडी क़ो पीछे से कोई टक्कर मार दे और लाखों की चपत लगा जाए, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। वाकई स्वास्थ्य सेवाओं एवं वाहन-दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या के कारण बीमा कराना आज की जरूरत बन चुका है। लेकिन मात्र बीमा करा लेने भर से ही आपकी दुश्वारियों का अंत नहीं हो जाता, ये शुरुआत है आपके परेशानी भरी जिंदगी की।
दरअसल बीमा कंपनियों द्वारा सरकार को आर्थिक विकास की गति बनाए रखने के लिए लांग टर्म फंड सृजित करने में मदद मिलती है। सरकार इन पैसों का उपयोग इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर उद्योगों को तमाम सुविधाएं देने पर खर्च करती है। सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में गिरावट के कारण आम आदमी निजी अस्पतालों में जाने के लिए मजबूर हुआ है। इलाज लगातार खर्चीला होता जा रहा है। सरकार पंचसितारा अस्पतालों को आगे लाने के लिए तमाम सुविधाएं तो देती नजर आती है, वहीं सरकारी अस्पतालों की सुविधाएं बढाने पर कोई ध्यान नहीं देती। यही कारण है कि भारत में हेल्थ इंश्योरेंस का बाजार फलता-फूलता जा रहा है। आम आदमी का स्वास्थ्य बीमा कंपनियों के भरोसे है। भारत में चिकित्सा सुविधा के नाम पर लूटने वाली व्यवस्था काम कर रही है। ऐसे में मध्यवर्ग हेल्थ बीमा कराने के लिए मजबूर होता है, ताकि संकट के समय में इलाज के लिए पैसे की समस्या न रहे। मेहनत की कमाई से कुछ पैसे प्रीमियम के रूप में जमाकर वह बीमा कराता है, ताकि आडे समय में आई विपदा से छुटकारा पा सके। होता ये है कि क्लेम करने के कई महीनों बाद ही उसे बीमा का पैसा मिल पाता है, तब तक या तो बीमार आदमी की मौत हो चुकी होती है या फिर वो खुद परेशान होकर उस पैसे से तौबा कर लेता है। बीमा कंपनियां ऐसे-ऐसे कानूनी दाव-पेंच निकालती है, जिसमें आम आदमी उलझकर रह जाता है। ऐसे मामलों में आम आदमी को उपभोक्ता अदालत से लेकर कोर्ट तक के चक्कर लगाने पड ज़ाते हैं। बहुतेरे मामलों में एक लंबा समय बीत जाने के बाद ही न्याय हो पाता है? क्या आपमें बीमारी या दुर्घटना के बाद भी इतनी दौड-भाग करने की कूव्वत है, अगर है तभी आप बीमा कराने के बारे में सोचें।
आइए जानें स्वास्थ्य बीमा है क्या और इसके दायरे में आम आदमी कैसे क्लेम कर सकता है? जहां जीवन बीमा आय के विकल्प की अवधारणा पर आधारित है, वहीं स्वास्थ्य बीमा सबके लिए एक समान जरूरत के मुद्दे पर आधारित होता है। स्वास्थ्य बीमा स्त्री, पुरूष, बच्चों तथा सभी नौकरी करने वालों के लिए एक समान है। स्वास्थ्य बीमा में यादातर कंपनियां थ्री डी प्रोटेक्शन प्रदान करती हैं यानी डिजीज, डेथ और डिसएबिलिटी। इन तीनों स्थितियों में हेल्थ बीमा काम आता है और कंपनी पॉलिसी होल्डर को जोखिम के अनुरूप क्लेम देती है। खासकर स्वास्थ्य बीमा किसी बीमारी, दुर्घटना या हादसे में लगने वाली चोट के लिए सुरक्षा कवच के रूप में करवाया जाता है। हेल्थ इंश्योरेंस में दवाइयों, खून और ऑक्सीजन का खर्चा, जांच, डॉक्टर और अस्पताल में भर्ती होने का खर्चा, अस्पताल की अन्य सेवाएं जैसे ऑपरेशन कक्ष, एक्स रे, लैब जांच, परीक्षण और मेडिकल एप्लायंस जैसे पेसमेकर, कृत्रिम अंग और यंत्रों आदि के खर्च के साथ-साथ कई बार आपातकालीन स्थितियों में ट्रांसपोटर्ेशन सुविधाएं भी उपलब्ध करवाई जाती हैं। बीमा कंपनियों की ओर से बडे-बडे दावे किए जाते हैं। अकस्मात दुर्घटना या बीमारी की स्थिति में अगर आपने स्वास्थ्य बीमा का कवच धारण किया हो तो ऐसा कहा जाता है कि आप निश्चित रूप से इस मुश्किल से उबर सकते हैं।
जमीनी धरातल पर हालात कुछ और ही नजर आते हैं। अभी हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया। खाड़ी देश में काम कर रहे आमोद की दुर्घटना में मौत होने पर उसकी पत्नी आरती देवी ने बीमा के लिए क्लेम किया। बीमा कंपनी द्वारा भुगतान नहीं देने पर जिला उपभोक्ता फोरम में उसने शिकायत दर्ज कराई। फोरम ने बीमा कंपनी के विरुद्ध आदेश देते हुए पंद्रह हजार रुपए का जुर्माना लगाया और पूरी बीमा राशि के भुगतान के लिए कहा। ऐसे कई मामले होते हैं, जिनमें बीमा कंपनियां बेवजह लोगों को परेशान करती हैं।
आजकल बीमा कंपनियों की एक पॉलिसी कैशलेस हास्पीटलाइजेशन सामने आई है। इस प्लान में बीमित व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती होने पर अस्पताल के बिलों का भुगतान नहीं करना होता; बीमा कंपनी सीधे बिलों का निपटान कर देती है। लेकिन होता ये है कि कंपनियां बीमा लेते समय कुछ शर्तों को छिपा लेती हैं। इसके अंतर्गत घायल व्यक्ति जहां इलाज करा रहा हो, उस अस्पताल का बीमा कंपनी से टाइ-अप होना जरूरी होता है और क्लेम के लिए दस्तावेज भी सही क्रम में होने चाहिए। उपभोक्ताओं को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि बीमा कंपनियां दस्तावेजों के सही नहीं होने को लेकर किसी भी स्तर पर आना-कानी कर सकती हैं।
बीमा कंपनियां केवल हेल्थ बीमा के क्षेत्र में ही क्लेम राशि देने के लिए ऐसा नहीं करती। वाहन बीमा के मामले में भी इनका रवैया कुछ ऐसा ही रहा है। सरकार ने नए वाहन खरीदते समय ही वाहन इंश्योरेंस लेना अनिवार्य कर दिया है। बीमा कंपनियों को इसके कारण काफी मुनाफा हुआ। लेकिन अभी भी कोर्ट के तमाम फैसले और बीमा नियामक प्राधिकरण के दिशा-निर्देश के बावजूद जब बात मुआवजे की आती है, तो उपभोक्ताओं को काफी पेचिदगियों से गुजरना पडता है। ऐसे ही एक मामले में अभी बीमा कंपनियों को सुप्रीम कोर्ट की फटकार भी सुननी पडी। अपने एक फैसले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन होने पर भी बीमा कंपनियां सडक़ दुर्घटना में क्षतिग्रस्त वाहनों का मुआवजा देने से बच नहीं सकती। एक प्रतिष्ठित बीमा कंपनी ने पश्चिम बंगाल के अभलेन्दु साहू को यह कहकर मुआवजा देने से इंकार कर दिया था कि उन्होंने अपनी निजी कार बैंक को किराए पर दिया था। बैेंक कर्मचारी कार में जा रहे थे कि गाडी दुर्घटनाग्रस्त हो गई। पॉलिसी की शर्तों के अनुसार साहू की कार निजी इस्तेमाल के लिए थी। कार का व्यावसायिक इस्तेमाल करके साहू ने पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन किया था, लिहाजा उन्हें मुआवजा नहीं दिया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मालवाहक गाडियों का उदाहरण देते हुए कहा कि ये गाडियां ओवरलोड होने पर दुर्घटनाग्रस्त हो जाती हैं, तो उस दशा में बीमा कंपनियां 75 प्रतिशत मुआवजे राशि का भुगतान करती हैं। इसी प्रकार अगर साहू ने अपनी निजी कार किराए पर देकर शर्तों को तोडा है, तो उसे 50 प्रतिशत मुआवजा दिया जा सकता है। लेकिन कुछ ऐसे भी मामले सामने आए जिसमें इंश्योरेंस कंपनी ने दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जिस समय दुर्घटना हुई उस समय ड्राइवर के पास वैध लाइसेंस नहीं था। इसलिए कंपनी क्षतिपूर्ति देने के लिए बाध्य नहीं है।
मामले बहुतेरे हैं, एक और उदाहरण पर नजर डालते चलें। मध्यप्रदेश के एक करोड़ छात्रों को बीमा कवर देने वाली योजना अदालती विवादों में उलझ कर रह गई। योजना के अनुसार प्रति छात्र एक रुपए प्रीमियम के रूप में लिया जाता था। दुर्घटना में मौत होने पर छात्र के परिजनों को 50 हजार रुपए सहायता के रूप में दिया जाना था। साइकिल क्षतिग्रस्त होने व किताबें खोने पर भी राशि का प्रावधान था। वर्ष 2007-09 के दौरान 55 क्लेम प्रकरण निरस्त करने वाली बीमा कंपनी के खिलाफ शिक्षा विभाग ने अदालत की शरण ली। कंपनी ने कई वजह गिनाते हुए इन दावों को खारिज कर दिया था। वहीं शिक्षा विभाग का कहना था कि अनुबंध की शर्तों के मुताबिक कंपनी को सभी दस्तावेज मुहैया करा दिए गए थे। मामला उपभोक्ता फोरम में पहुंचने पर ही दंड राशि के साथ क्लेम राशि का भुगतान किया गया। बीमा कंपनियों का अनुमान है कि सरकार की सामाजिक योजनाओं के चलते ग्रामीण आबादी का रूझान बीमा की तरफ बढ़ा है। बीमा प्रीमियम राशि के 2015 तक एक लाख करोड़ रुपए छू लेने का अनुमान है। ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा अभी भी बीमा कवर के बाहर है। इन कंपनियों का अगला निशाना गांव के भोले-भाले किसान हैं, जिन्हें तमाम तरह के आश्वासन देकर इस कारोबार को आगे बढाया जा सकता है। लेकिन बीमा कंपनियों के मुनाफे के इस बाजार में आम आदमी अभी भी ठगा सा महसूस करता है। कंपनियां लोगों को बीमा कराने के लिए तरह-तरह से लुभाती हैं, एक ऐसी तस्वीर निर्मित की जाती है मानो क्लेम लेना बहुत सरल और आसान हो-लेकिन जब आदमी फंसता है तो एक तो बीमारी से और दूसरा कंपनी से क्लेम लेने के लिए लडता है। यह उसके लिए दोहरा संकट होता है, जब मुश्किल भरे हालात में वह अकेले जूझ रहा होता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें