बुधवार, 2 जून 2010

मुझे चुप रहने दो

चन्दन राय
अक्सर होता यही है कि बडे अपराधों में क्रिमिनल कोई सुराग नहीं छोडते। ऐसे में अपराधियों की तफ्तीश करना भूसे के ढेर में से सूई खोजने सरीखा होता है। जांच एजेंसियों को उम्मीद होती है कि चलो कुछ लोगों का नार्को या ब्रेन मैपिंग करवा लिया जाए, ताकि कुछ तो सूत्र हाथ आएंगे, जिसके आधार पर जांच आगे बढाई जा सकती है। हालांकि यह सब इतना आसान होता तो सीबीआई कब की अपराधियों को जेल की सलाखों में कैद कर चुकी होती। स्टांप घोटाले के आरोपी तेलगी के नार्को टेस्ट में कई राजनेताओं के नाम सामने आए, लेकिन सीबीआई हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। कोर्ट भी मात्र उतने ही अंश को स्वीकार करती है, जितना कि नार्को टेस्ट के आधार पर पुख्ता सबूत जुटा लिए जाएं
तु म आरुषि को कब से जानते हो? तुमने उसका मर्डर क्यों किया, जवाब दो? तुमने उसको क्यों मारा? लगातार प्रश्नों की बौछार से उकताया युवक स्ट्रेचर पर लेटा है और लगभग अर्ध्दबेहोशी की स्थिति में कुछ का कुछ बुदबुदा रहा है? उसे पता नहीं कि वह क्या कह रहा है? वह तो बस इतना चाहता है कि जल्द से जल्द वह इनके चंगुल से बाहर निकल जाए। ये फुटेज तो आपको याद होगा, जो बार-बार टेलीविजन पर चलाया गया था। मीडिया की भाषा में कहें तो यह देश की सबसे बडी मर्डर मिस्ट्री थी, जिसमें न जाने कइयों को कई बार इस तरह के प्रश्नों से दो-चार होना पडा। बंगलुरु का मशहूर फारेंसिक साइंसेज विभाग जहां जाने के नाम से ही कई शातिर, सफेदपोश अपराधियों को भी नानी याद आने लगती है। लेकिन होता यही है कि डेढ-दो घंटे की असह्य यातना के बाद भी मामला शिफर का शिफर। आरुषि के मामले में सीबीआई से लेकर देश की आला जांच एजेंसियां अंधेरे में तीर चलाती रही, पर हत्यारे की बात तो जानें दें, धारदार हथियार भी आज तक नहीं मिल सके जिनसे कत्ल किया गया था। यहीं से नार्को टेस्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठने शुरू हो गए थे। नशे की हालत में झूमते हुए राजकपूर का यादगार अभिनय बरबस लोगों के जेहन में कौंध जाता है-''मुझको यारों माफ करना, मैं नशे में हूं। अब तो मुमकिन है बहकना, मैं नशे में हूं। तुम बस इतना याद रखना, मैं नशे में हूं।'' यह गाना आम आदमी को तो याद रहा लेकिन सीबीआई इसी अर्धसत्य के आधार पर गुहनहगारों की तलाश में लगी रही। लगभग नशे में बेसुध आदमी के बयानों पर ही सच की तलाश में हाथ-पैर मारती रही। लोग कहते भी हैं भला शराबी का क्या भरोसा? कब क्या बक जाए? लेकिन देश की बडी-बडी ज़ांच एजेंसियां इसी को साक्ष्य के तौर पर मानती-जांचती रहीं। तो ये है नार्को टेस्ट का सच जो इस तर्क में विश्वास करता है कि 'सोडियम पेंटाथाल' नामक रसायन के नशे में बेसुध आदमी झूठ नहीं बोल सकता। अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 20 (3) स्वदोषारोपण से छूट के मौलिक अधिकार का हवाला देते हुए नार्को, पोलिग्राफिक और ब्रेन मैपिंग को असंवैधानिक करार दिया है।
हालांकि इसमें कई पेंच हैं, जो इसकी वैधानिकता को लेकर पहले भी उठते रहे हैं। नार्को और ब्रेन मैपिंग टेस्ट में साधारण अपराधी तो फंस जाता है, लेकिन कोई चालाक, शातिर अपराधी जो इस टेस्ट की खूबियों, खामियों से परिचित है, बचकर निकल जाता है। अगर कोई नशे में जाने के पहले यह ठान ले कि उसे कुछ नहीं कहना, तो लाख प्रयत्न करने के बाद भी कुछ उगलवा लेना मुश्किल है। यही कारण है कि डॉ. राजेश तलवार जैसे लोगों को कई बार इस टेस्ट से गुजरना पडा। इसके बावजूद सीबीआई हाथ मलती रही और कोई भी सबूत नहीं इकट्ठा कर सकी, जिससे इस दोहरे हत्याकांड की गुत्थी सुलझ सके। अगर वैधता के सवाल को भी छोड दें तो मनोवैज्ञानिक दवाब में किसी से जुर्म कबूल करवाना संवैधानिक अपराध है, कोर्ट ने इसी पक्ष को पकडा है। भारतीय कानून में धारा 164 के अनुसार बिना किसी दवाब के न्यायाधीश के सामने दिए गए बयान ही न्यायालयों को मान्य हैं। इसी को आधार बनाते हुए कोर्ट ने कहा है कि जांच एजेंसियों को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि जबरन किसी को यह कहने के लिए बाध्य करें कि तुमने ये हत्या की है या गुनाह किया है? सवाल तो आम आदमी के मौलिक अधिकारों को लेकर है, जिसमें देश के शातिर अपराधियों से लेकर संतों तक को भी एक ही श्रेणी में रखा गया है।
अगर देश में आतंकवादियों के लिए टाडा जैसे कानून की जरूरत सरकार बताती रही है, तो अजमल आमिर कसाब, अब्दुल करीम तेलगी, संतोखबेन जडेजा, देवेंद्र यादव जैसे लोगों को छूट क्यों? क्या देश के गद्दारों, आतंकवादियों एवं देशद्रोहियों के लिए इन मामलों में कुछ विशेष उपबंध नहीं किए जा सकते, जिससे कानून की मर्यादा भी रह जाए और ऐसे अपराधियों में भय का माहौल भी पैदा हो। ये ऐसे लोग हैं, जिन्होंने देश की अस्मिता को किसी न किसी रूप में चुनौती दी है। लेकिन सवाल तो ये है कि फिर तय कौन करे कि कौन देश के दुश्मन हैं और कौन सरकार की नीतियों का विरोध करने के कारण तथाकथित दुश्मन। सरकार सीबीआई की बदौलत इस हथियार का इस्तेमाल राजनैतिक विरोधियों को दबाने के लिए भी कर सकती है। इन दिनों ऐसे आरोप सडक़ से लेकर सदन तक सरकार पर लगते भी रहे हैं। हालांकि जांच के विषय में सीबीआई के आला अधिकारियों का मानना है कि अब कई राज इन अपराधियों के जहन में ही दफन हो जाएंगे। अक्सर होता यही है कि बडे अपराधों में क्रिमिनल कोई सुराग नहीं छोडते। ऐसे में अपराधियों की तफ्तीश करना भूसे के ढेर में से सूई खोजने सरीखा होता है। जांच एजेंसियों को उम्मीद होती है कि चलो कुछ लोगों का नार्को या ब्रेन मैपिंग करवा लिया जाए, ताकि कुछ तो सूत्र हाथ आएंगे, जिसके आधार पर जांच आगे बढाई जा सकती है। या अपराधियों के मोडस ओपरेंडी की या फिर उनके गैंग के बारे में जानकारी जुटाई जा सकती है। हालांकि यह सब इतना आसान होता तो सीबीआई कब की अपराधियों को जेल की सलाखों में कैद कर चुकी होती। स्टांप घोटाले के आरोपी तेलगी के नार्को टेस्ट में कई राजनेताओं के नाम सामने आए, लेकिन सीबीआई हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। सिर्फ अपराधी का कहना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि इनके कहे के आधार पर साक्ष्य भी जुटाने होते हैं। कोर्ट भी मात्र उतने ही अंश को स्वीकार करती है, जितना कि नार्को टेस्ट के आधार पर पुख्ता सबूत जुटा लिए जाएं। जैसे अपराधी ने नार्को टेस्ट के दौरान कबूला हो कि आरुषि की हत्या में धारदार हथियार को नाले में बहा दिया गया और सीबीआई उस हथियार को खोज निकाले। यहां हथियार दिखाना तो कोर्ट में साक्ष्य के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकता है, लेकिन सिर्फ उस व्यक्ति ने नार्को टेस्ट के दौरान ऐसा कहा को साक्ष्य नहीं माना जा सकता।
न्यायालय का इस मामले में स्पष्ट मानना है कि अगर सहमति या स्वेच्छा से इस तरह के टेस्ट किए जाते हैं और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देशों का पालन किया जाता है, तभी इस तरह के टेस्ट की इजाजत दी जानी चाहिए। इस मामले में कोर्ट का ये भी कहना है कि जनहित की दुहाई देने के बाद भी इन मामलों में छूट नहीं दी जा सकती। मानव अधिकारों के सजग प्रहरी होने के नाते सुप्रीम कोर्ट की चिंता वाजिबहै।
देश के वरिष्ठ न्यायविदों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। लेकिन क्या कोई अपराधी ऐसे टेस्ट के लिए तैयार होगा, जिसमें उसके फंसने की संभावना हो? हाल में आंध्रप्रदेश के पूर्व राज्यपाल एनडी तिवारी ने अवैध संतान के आरोप के मामले में डीएनए टेस्ट कराए जाने से इंकार किया है। यहां भी हवाला यही दिया जा रहा है कि मुझे जबरन मेरे ही खिलाफ गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। हालांकि इसकी वैधानिकता नार्को एवं लाइ डिटेक्टर से ज्यादा वैज्ञानिक धरातल पर आधारित है। लेकिन तर्क तो वही हैं। गुजरात की गॉडमदर संतोखबेन के नाम से आप परिचित होंगे ही। न जाने कई अपराध एवं हत्या के मामलों में आरोपी संतोखबेन ने नार्को टेस्ट कराए जाने की याचिका को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। ये जीत उन अपराधियों की है, जो मानवाधिकारों की आड में अपने क्रूर चेहरों पर नकाब डाल सकेंगे। हालांकि टेस्ट के नतीजों के बाद भी इनकी सेहत पर कोई असर नहीं होना था। अगर विश्वास न हो तो आज तक के नार्को टेस्ट के आंकडाें पर गौर फरमाएं, जिनमें पांच प्रतिशत सुराग भी जांच एजेंसियों को नहीं मिला है।
सुप्रीम कोर्ट ने कई गंभीर मामलों में नार्को टेस्ट के फुटेज मीडिया को जारी किए जाने पर भी आपत्ति जाहिर की थी। इन मामलों में जांच एजेंसियों को कोई सुराग मिले या नहीं, लेकिन ट्रायल कोर्ट बेशक प्रभावित होता है। हालांकि न्यायाधीश इस बात को जानते हैं कि ये पुख्ता सबूत नहीं, लेकिन बोलती तस्वीरों के असर से बाहर निकलने में समय तो लगता ही है। ऐसा हो सकता है कि फैसले को कुछ हद तक ये प्रभावित भी करें, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। नार्को टेस्ट में परिणाम प्रश्न पूछने के तरीकों पर ही निर्भर करता है। जांच के दौरान ऐसा देखा गया है कि व्यक्ति ज्यादातर पेश किए गए सुझावों पर हामी ही भरता है। नशे में तो आदमी घर का पता तक भूल जाता है, फिर ऐसे में नकारने का दुस्साहस उसमें नहीं होता। क्योंकि उसे पता है कि उसका एक 'न' कहना कई और अटपटे सवालों को खडा करेगा और उसे यह दुस्सह्य वेदना देर तक झेलनी होगी। अगर ब्रेन मैपिंग की ही बात करें तो हडबडाहट में वह कुछ का कुछ जवाब दे सकता है। आदमी को पता होता है कि उसका ब्रेन मैपिंग किया जा रहा है, तो फिर सहज होने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जब आदमी को कुछ चित्र या आवाज सुनाई जाती है, तो हो सकता है मिलते-जुलते दृश्यों के कारण या हडबडी में मस्तिष्क तीव्र गति से प्रतिक्रिया दिखाए। कुछ लोग यों भी दिल के कमजोर होते हैं, जो मस्तिष्क से निकली तरंगों के आधार पर अपराधी सिध्द किए जा सकते हैं। कुछ ऐसा ही होता है पॉलीग्राफ टेस्ट के दौरान भी। इसमें आदमी के ब्लड प्रेशर, हार्टबीट, श्वसन और मांसपेशियों की गति का सवाल पूछने के दौरान अध्ययन किया जाता है। वैज्ञानिक परीक्षण होने के बाद भी इसके निष्कर्षों को वैज्ञानिक कसौटी पर नहीं सही माना जाता। यह 1+1=2 की तरह का वैज्ञानिक सच नहीं है। देश के भले नागरिकों को नेक सलाह है कि अगली बार किसी 'सच का सामना' में जाएं तो जरा संभलकर, क्योंकि हो सकता है कि आपका सच मशीन के लिए झूठा हो। आप खामखां बदनाम भी हों और करोडों की माया भी हाथ न आए। संविधान ने स्वदोषारोपण के सवाल पर बोलने या चुप रहने में से एक विकल्प चुनने का अधिकार नागरिकों को दिया है। न्यायालय ने इस अधिकार की रक्षा के लिए फैसला तो दिया है, लेकिन देखना होगा कि कहीं अपराधी तबका इसकी आड में देश की कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती न साबित हों।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें