बुधवार, 2 जून 2010

यह है सस्ते इलाज का रास्ता

अस्पतालों को महंगी दवाओं के खरीदने पर मिलता है मोटा कमीशन। अस्पताल ही क्यों, डॉक्टरों को भी महंगी दवाएं ही सुहाती हैं, क्योंकि उन्हीं से उनके घर-परिवार की आर्थिक सेहत सुधरती है। सरकार का फरमान जारी करना एक अलग बात है, लेकिन यह देखना होगा कि कितने डॉक्टर अपने कमीशन की कीमत पर गरीब ननकू के लिए सस्ती दवा लिखने को तैयार होंगे?
भारतीय दवा कंपनियां मजबूती से उदारीकरण की आंधी में पैर जमा सकें, इसके लिए जरूरी है कि सरकारी अस्पतालों में जेनेरिक दवाओं की खरीद को शह दी जाए। भारतीय कंपनियां किफायती कीमतों पर दवाएं बेचती हैं जो काफी सक्षम और सुरक्षित मानी जाती हैं
पि छले दिनों चंडीगढ़ में आयरन की गोलियां खाकर बीमार हुए बच्चों ने सरकार की नींद उड़ा दी। इन बच्चों को जो दवाएं दी गई थीं, वे एक्सपायरी डेट की थी। रायपुर की दवा फैक्ट्रियों में धांधली की जांच के दौरान अजीबोगरीब गोलमाल उजागर हुआ। इन फैक्ट्रियों में एक्सपायरी डेट दवाओं की तारीख पेन से बढ़ाकर बाजार में बेचने की तैयारी थी। ऐसा लगता है कि भारतीय बाजार में एक्सपायरी और नकली दवाओं के कारोबार ने जड बना लिया है। इस घटना से सरकारी अस्पतालों की दवा खरीद नीति फिर से विवादों में आ गई है। करोड़ों रुपए की हर साल खरीदी जाने वाली दवाएं जो सरकारी अस्पतालों के जरिए निशुल्क दी जाती हैं , को लेकर हमारे देश में कोई एक नीति नहीं है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलामनबी आजाद ने देर से ही सही लेकिन सरकारी अस्पतालों और केंद्रीय स्वास्थ्य योजनाओं में ऐसी दवाओं को खरीदने पर जोर दिया है, जो पेटेंट मुक्त हों। यह गरीब भारत के स्वास्थ्य बाजार के लिए एक सही कदम होगा। भारत जैसे विकासशील देश में जहां दवा की कीमत बेहद मायने रखती है वहां इसको लेकर चिंता उठना जायज है। एनएसओ के सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में इलाज के कुल खर्च में 79 फीसदी लागत दवाओं की होती है। ऐसे में अगर दवाओं की वैकल्पिक आपूर्ति बंद हो जाती है तो कम इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतें भी आसमान छूने लगेंगी।
अगर पंजाब की ही बात करें तो यहां बड़े स्तर पर दवाओं की खरीद पंजाब हेल्थ सिस्टम कार्पोरेशन करता है वहीं सीएमओ भी लोकल कंपनियों से दवा खरीदते हैं।
मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल चाहते हैं कि दवा केवल स्टैंडर्ड कंपनियों की खरीदी जाएं । लेकिन ये लोकल कंपनियों की अपेक्षा महंगी हैं इसलिए महंगी दवा खरीदने के लिए सरकार के पास बजट की कमी है। विभाग ने स्टेंडर्ड ऊंचा करने के लिए केवल उसी कंपनी से दवा खरीदने की नई शर्त लगा दी है जिसकी टर्न ओवर 15 करोड़ है। हरियाणा ने यही शर्त 35 करोड़ की रख दी है। अभी तक पांच करोड़ रुपए की टर्नओवर वाली कंपनियां ही दवा सप्लाई कर सकती थीं। इस शर्त के चलते अधिकांश छोटी कंपनियां सरकारी अस्पतालों को दवा बेचने की दौड़ से बाहर हो गई हैं। अब एक और दवा से जुडी ख़बर पर नजर डाल लेते हैं। अमेरिकी फार्मा कंपनी एबॉट ने भारत की पिरामल हेल्थकेयर के दवा कारोबार को 3.72 अरब डॉलर यानी करीब साढ़े सत्रह हजार करोड़ रुपए में खरीदा है। अधिग्रहण से जहां विदेशी कंपनियों को विकसित देशों के महज 2-3 फीसदी सालाना बढ़त वाले फार्मा सेक्टर के मुकाबले 14-20 फीसदी बढ़ोतरी की संभावना वाला विशाल भारतीय बाजार मिलता है, वहीं देसी कंपनियां इसके बदले भारी-भरकम पूंजी हासिल करती हैं।
कहीं न कहीं सरकार की नीतियों से यह लग रहा था कि राज्य सरकार बडे दवा कंपनियों की दवाओं को ही गुणवत्तापूर्ण मान रही है। इसलिए छोटे एवं मंझोले स्तर के दवा कंपनियों पर दबाव था कि वे अपनी क्वालिटी को सुधारें। जेनरिक दवाओं के मामले में भारतीय दवा कंपनियों को आर-एंड-डी पर भारी निवेश करने की जरूरत है और उनके बेहतर नतीजों के लिए 10 से 15 साल तक इंतजार करना होगा। इससे उनके प्रतिस्पर्धा में बुरी तरह पिछड़ने का खतरा है, बल्कि उनके पास इसके लिए पूंजी भी नहीं है। दूसरे, उन्हें उन पेटेंट कानूनों और क्वॉलिटी कंट्रोल की उन कड़ी शर्तों का पालन करने के लिए तैयार होना होगा जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियां उन्हें कड़ी टक्कर दे सकती हैं। इस सौदे के साथ 55 हजार करोड़ रुपए के भारतीय दवा बाजार में एबॉट की हिस्सेदारी सात फीसदी हो गई है। इससे उसे भारत की सबसे बड़ी दवा कंपनी बनने का अवसर मिल गया है। दो वर्षों में किसी भारतीय दवा कंपनी के कारोबार का बहुराष्ट्रीय कंपनी के हाथों बिकने का यह दूसरा मामला है। 2008 में जापानी कंपनी दायची ने भारतीय कंपनी रेनबैक्सी का अधिग्रहण किया था। दवाओं के सरकारी खरीद की बात करें तो यह कहा जा सकता है कि महंगे इलाज के दंश से इस गरीब मुल्क को निजात दिलाने के लिए इस पहल को स्वागतयोग्य कहा जा सकता है। बाजार में विदेशी दवा कंपनियों की दवाएं जहां पांच सौ रुपए में मिलती है, वहीं जेनेरिक दवाओं पर खर्चा सौ रुपए के आस-पास ही होता है। अगर सरकारी अस्पतालों में ऐसी दवाओं के खरीद पर जोर दिया जाता है, तो इससे भारतीय दवा कंपनियों को भी एक सहारा मिलेगा ताकि वे विदेशी कंपनियों के एकाधिकार की चुनौती को समय रहते स्वीकार कर सकें। यहां विदेशी कंपनियों द्वारा देशी दवा कंपनियों के अधिग्रहण का कारण भी सरकार की नीतियों को ही जाता है, जो कहीं न कहीं महंगी दवाओं को ही गुणवत्तापूर्ण मानकर सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध करा रही थी। डॉक्टर भी दवा कंपनियों से मिल रही सुविधाओं का उपभोग करते हुए गरीब लोगों की पर्चियों पर महंगी दवाएं ही लिख रहे थे। आखिर दवा कंपनियों को प्रतिस्पध्र्दा में बने रहने के लिए दवा के मार्केटिंग की भी जरूरत थी, ताकि जेनेरिक दवाओं को मात दिया जा सके। लेकिन दवा खरीद का जो भारत में सुस्थापित नेक्सस है, वो सरकार की इस नीति को पलीता लगा सकता है। क्योंकि अस्पतालों को महंगी दवाओं के खरीदने पर मिलता है मोटा कमीशन। अस्पताल ही क्यों, डॉक्टरों को भी महंगी दवाएं ही सुहाती हैं, क्योंकि उन्हीं से उनके घर-परिवार की आर्थिक सेहत सुधरती है। सरकार का फरमान जारी करना एक अलग बात है, लेकिन यह देखना होगा कि कितने डॉक्टर अपने कमीशन की कीमत पर गरीब ननकू के लिए सस्ती दवा लिखने को तैयार होंगे?
भारतीय दवा कंपनियां मजबूती से उदारीकरण की आंधी में पैर जमा सकें, इसके लिए जरूरी है कि सरकारी अस्पतालों में जेनेरिक दवाओं की खरीद को शह दिया जाए। भारतीय कंपनियां किफायती कीमतों पर दवाएं बेचती हैं जो काफी सक्षम और सुरक्षित मानी जाती हैं जबकि वैश्विक दवा कंपनियां 'नई' के नाम पर महंगी दवाएं बेचने के लिए जानी जाती हैं। एक छोटा सा उदाहरण ही पूरी विदेशी दवा कंपनियों की हकीकत को बयान करता है। ऑट्रिविन नाम की नाक में डालने वाली दवाई एक वक्त 5 रुपए में मिलती थी और अब वैश्विक दिग्गज उसके ही स्प्रे को 45 रुपए में बेच रही हैं। ऐसे में किफायत को लेकर लोगों की चिंताएं समझी जा सकती हैं। भारतीय जेनेरिक उद्योग के अस्तित्व का सवाल बहुत बड़ा है। इस तरह की अफवाहें भी तैर रही हैं कि अब बिकने की किसकी बारी है। वैश्विक दवा कंपनियां की परंपरागत बाजार में संभावनाएं सीमित हैं और उन पर कीमतें घटाने के दबाव के साथ-साथ नियामक की सख्ती भी झेलनी पड़ रही है। ये मजबूरियां वैश्विक दवा दिग्गजों को अपनी सीमाओं से बाहर दूसरे बाजारों में विस्तार करने को विवश कर रही हैं। भारत किसी भी लिहाज से बेहद आकर्षक बाजार है। इसका ही नतीजा है कि भीमकाय विदेशी दवा कंपनियां भारत में दवा कंपनियों को खरीदने के लिए उम्मीद से भी यादा कीमत चुकाने को तैयार हैं।
विदेशों में दवा कंपनियों का मानना है कि वे नई दवाओं की खोज के लिए पर्याप्त राशि खर्च करती हैं और भारतीय कंपनियां इनकी मेहनत को चुराकर सस्ते में बाजार में दवाएं उतार देती हैं। इसके कारण दवा तो सस्ती मिलती है, लेकिन इसका खामियाजा विदेशी दवा कंपनियों को भुगतना पडता है। भारत सरकार को भी इस बात का ध्यान रखना होगा कि सस्ती दवाओं के चक्कर में कहीं नकली और एक्सपाइरी दवाएं ही सरकारी अस्पतालों में न मिलने लगें, जैसा कि हरियाणा और छत्तीसगढ में देखने को मिला। भारत में नकली दवाओं का बडा बाजार है और अगर इनकी घुसपैठ इन सरकारी अस्पतालों तक हुई, तो यह भारत की गरीब जनता के साथ खिलवाड होगा। ये अपनी दवाएं चलाने के लिए दवा खरीदी में दलाली के लिए एक बडी रकम भी देने को तैयार होंगी। भारत में कुछ दिनों पहले पोलियो ड्रॉप पीने से भी कुछ बच्चों के बीमार पडने की खबर काफी चर्चा में रही थी। सरकार अगर गरीब जनता का ख्याल करते हुए सस्ती दवाएं सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध कराना चाहती है, एक अच्छी पहल तो है, लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि दवाएं लोगों को मिले भी। डॉक्टरों और दवा कंपनियों के सांठ-गांठ को कमजोर करने के लिए भी सरकार को कदम उठाना चाहिए ताकि गरीबों को इलाज के लिए महंगी दवाओं का डोज न लेना पडे।

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