मंगलवार, 1 जून 2010

जब नियामक ही लडें तो...

इन विवादों के लिए जिम्मेदार वित्त मंत्रालय कठघरे में है। आम निवेशक जानना चाहता है कि क्या वित्त मंत्रालय को विवाद की स्थिति में दोनों नियामक संस्थाओं के अधिकार-क्षेत्र के निर्धारण के लिए आगे नहीं आना चाहिए था। विवाद की शुरुआत सेबी, जो कि शेयर बाजार की नियामक संस्था है, ने चौदह निजी बीमा कंपनियों को यूलिप जारी करने पर रोक लगाने से की।
चन्दन राय
सेबी और इरडा के विवाद का असर शेयर बाजार पर पडना ही था। शेयर बाजार की चाल सुस्त होती देख सरकार हरकत में आई। वित्त मंत्रालय जो इन विवादों को अपने स्तर पर सुलझा सकती थी, ने दोनों नियामक संस्थाओं को अदालत में जाने की सलाह दी। ऐसे में ग्राहकों का करीब डेढ लाख करोड रुपए दांव पर लगे हैं, और दोनों नियामक संस्थाएं अधिकार-क्षेत्र के विवाद में उलझी हैं। वित्तीय स्थिरता की गारंटी को बहाल रखने के लिए जरुरी था कि सरकार निवेशकों को भरोसे में ले। कुछ ही घंटों बाद बीमा कंपनियों की नियामक संस्था इरडा के अधिकारियों का बयान जारी होता है कि इन कानूनी पेचिदगियों का असर ग्राहकों पर नहीं पडेग़ा, ये दोनों संस्थाओं के बीच का मामला है, जिसे जल्द ही सुलझा लिया जाएगा। इन विवादों के लिए जिम्मेदार वित्त मंत्रालय कठघरे में है। आम निवेशक जानना चाहता है कि क्या वित्त मंत्रालय को विवाद की स्थिति में दोनों नियामक संस्थाओं के अधिकार-क्षेत्र के निर्धारण के लिए आगे नहीं आना चाहिए था। विवाद की शुरुआत सेबी, जो कि शेयर बाजार की नियामक संस्था है, ने चौदह निजी बीमा कंपनियों को यूलिप जारी करने पर रोक लगाने से की। इसके तहत पुरानी यूलिप की बिक्री पर इस आदेश का कोई असर नहीं होना था। यूलिप यानी यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान बीमा कंपनियों की एक ऐसी स्कीम है, जिसमें ग्राहकों को रिस्क कवर करने के साथ ही बाजार में निवेश का मौका भी मिलता है। ऐसे में स्वाभाविक है कि शेयर बाजार के उतार-चढाव का असर यूलिप स्कीम पर पडे। ऌस तरह की पॉलिसी में निवेश का खतरा निवेशक को ही झेलना पडता है। कह सकते हैं कि ये मामला सीधे शेयर बाजार से जुडा है। भारत में आयकर की धारा 8 सी के तहत यूलिप पर निवेश की छूट है। मामला यहीं से शुरु होता है। सेबी का मानना है कि शेयर बाजार में पैसा लगाए जाने के कारण इसे म्यूच्युअल फंड की तरह ही माना जाए। बीमा कंपनियों को बिना सेबी में रजिस्ट्रेशन कराए यूलिप की बिक्री करने का अधिकार नहीं है। ऐसा करने से पहले उन्हें रजिस्ट्रेशन कराना होगा, ताकि समय आने पर उन बीमा कंपनियों की निगरानी की जा सके, जो शेयर बाजार में पैसा लगा रही हैं।
इरडा ने भी इस मामले को लेकर कानूनी चुनौती देने का मन बना लिया। इसके पहले उसने बीमा कंपनियों को आदेश जारी कर यूलिप पर सेबी के किसी तरह के प्रतिबंध को मानने से इंकार कर दिया था। इस मामले पर सेबी के सदस्य प्रशांत सरन का कहना है कि कंपनियों ने इस बात को स्वीकार किया है कि यूलिप के दो घटक हैं। पहला है इनश्योरेंस घटक, जहां जीवन बीमा का हिस्सा बीमा कंपनी के पास होता है और दूसरा निवेश घटक, जहां जोखिम निवेशक के साथ होता है। यानी यूलिप एक मिश्रित उत्पाद हैं और निवेश घटक के पंजीकरण और सेबी द्वारा नियंत्रित होने की आवश्यकता है। हालांकि यूलिप की बिक्री विदेशों में भी बीमा कंपनियों के अधीन हैं। ग्राहक ऐसी स्थिति को देखकर अपना पैसा लगाने से हिचकिचा सकते थे, जिसका असर शेयर बाजार के साथ बीमा कंपनियों पर भी पडना था। इसलिए आनन-फानन मेेंं इरडा ने एक बयान जारी कर यूलिप के पॉलिसीधारकों को विश्वास दिलाने की कोशिश की कि ये पॉलिसियां सुरक्षित हैं और इस मामले का निबटारा जल्द ही कानून के दायरे में किसी उचित फोरम में कर लिया जाएगा। ग्राहक इस पूरे प्रकरण से हतोत्साहित न हों, उनका पैसा सुरक्षित है। लेकिन खतरे के समय ही ऐसे सरकारी बयानों की बाढ अा जाती है, ये आम निवेशक भी समझता है। बीमा कंपनियां जिनको यूलिप की बिक्री रोकने का आदेश सेबी ने दिया है में एगॉन रेलिगेयर, अविवा, बजाज अलियांज, भारती एएक्सए, बिरला सन, एचडीएफसी स्टैंडर्ड, आईसीआईसीआई प्रूडेंसियल, आईएनजी वैश्य, कोटक महिंद्रा , मैक्स न्यूयार्क, मेटलाइफ इंडिया, रिलायंस लाइफ इनश्योरेंस, एसबीआई लाइफ इनश्योरेंस और टाटा एआईजी शामिल हैं। वित्त मंत्रालय ने यथास्थिति बहाल रखने का दावा कर विवाद को और बढाने का ही काम किया। दोनों नियामक संस्थाएं अपने-अपने हित में इसका अर्थ निकालने में उलझी हैं। बीमा कंपनियों का कहना है कि सरकार के इस फैसले का अर्थ यह है कि बीमा कंपनियां नई यूलिप पॉलिसियां लांच कर सकती हैं। जबकि सेबी के अधिकारियों का कहना है कि वित्त मंत्रालय ने ऐसा कहकर 14 बीमा कंपनियों पर उनके लगाए प्रतिबंध को उचित ठहराया है। मामला अधिकार-क्षेत्र को लेकर है और सरकार, जो इसके लिए जिम्मेदार थी, दूर खडी होकर तमाशा देख रही है। इरडा के सदस्य आर कन्नन का कहना है कि हम आगे भी नए बीमा उत्पाद जारी करते रहेंगे क्योंकि यह बीमा नियमों के दायरे में आता है। यूलिप के मामले में किसके पास फैसला करने का ज्यादा अधिकार है, इसका निर्णय कोर्ट करेगा। लेकिन जब तक इरडा कोर्ट में जाने का मन बना रही थी, सेबी उसके इरादे को भांपते हुए पहले ही कोर्ट की शरण में चली गई।
भारत में बीमा कंपनियों में प्रतियोगिता निजी कंपनियों के आने से शुरु हुई थी। निजी कंपनियां चाहे बीमा-क्षेत्र में काम करें या उत्पादन के क्षेत्र में-मुनाफा ही उनका बिजनेस मंत्र होता है। जहां भी इन्हें मुनाफे की संभावना दिखती है, पैसे लगाने को दौड पडते हैं। इस क्षेत्र में विदेशी निवेश को भी 26 प्रतिशत तक बढा दिया गया। प्रतिद्वंद्विता तेज होनी ही थी। बीमा कंपनियों में निवेश करने वाला वर्ग अपनी कमाई का एक छोटा हिस्सा बीमा कंपनियों में लगाता है, ताकि आडे समय में उसका भविष्य सुरक्षित हो। बीमा कंपनियां ग्राहकों को लुभाने के लिए तरह-तरह की स्कीम लेकर आती हैं। इसी के तहत मामला आता है-यूलिप का। ग्राहकों को लुभाया जाता है कि जल्द ही उनका पैसा दुगुना हो जाएगा। लंबे समय के निवेश में आयकर में छूट भी मिलती है। आज सभी बीमा कंपनियां यूलिप प्लान बेचने के कारोबार में एक दूसरे से होड ले रही हैं। इसमें निवेशक की पूंजी का एक हिस्सा शेयर बाजार में और दूसरा हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों में लगाया जाता है। इसके अंतर्गत अधिक जोखिम से लेकर कम जोखिम लेने वाले निवेशकों के लिए अलग-अलग स्कीमें हैं। जैसे-जैसे हम कम जोखिम की ओर जाते हैं, हमारा रिस्क तो कम होता है साथ ही मुनाफे भी कम होता जाता है, क्योंकि इनका 20-50 प्रतिशत रकम ही शेयर बाजार में लगा होता है। आम निवेशक जो जल्द ही अपनी रकम दुगुनी करना चाहते हैं, हाई रिस्क लेते हुए मोटा मुनाफा कमाते हैं। इस समय सभी बीमा कंपनियों का 70 फीसदी राजस्व यूलिप से ही आ रहा है। इस मुनाफे को देखते हुए ही जनवरी में सेबी ने इन कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा कि वे बिना सेबी की इजाजत के यूलिप पॉलिसी कैसे बेच रहे हैं? शेयर बाजार पर नजर रखने वाली संस्था सेबी ने पहली बार इस तरह का कदम उठाया है।
मामला दो नियामक संस्थाओं के बीच उलझकर रह गया है। निजी कंपनियां अपने हितों को लेकर ग्राहकों को ठेंगा दिखाती रही हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि मोटे मुनाफे के चक्कर में यदि बीमा कंपनियां ग्राहकों को बिना बताए अधिक पैसा शेयर बाजार में निवेश करें, तो ग्राहकों के सामने क्या रास्ता बचता है? वह इसकी शिकायत इरडा में करे या सेबी के पास जाए। इस लडाई से आम आदमी को कोई मतलब नहीं, बशर्ते कि उसका पैसा सुरक्षित होने की गारंटी उसे हो। वित्त मंत्रालय को सुपर नियामक संस्था बनाने की पहल करनी चाहिए ताकि इन नियामक संस्थाओं के अधिकार-क्षेत्र के निर्धारण के साथ ही विवादों का निबटारा भी किया जा सके।

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