बुधवार, 14 जुलाई 2010

श्रमशील स्त्रियों पर स्वतंत्र विमर्श जरूरी: मंडलोई


यूरोप के नारी-स्वातंत्र्य को भारतीय परिवेश में लागू नहीं किया जा सकता। आदिवासी, दलित, निम्न जातियों की स्त्रियों की पीडा को समझने के लिए अलग नजरिए से चीजों को देखना होगा। श्रमशील स्त्रियों की चिंताओं को आधुनिक विचार के दायरे में लाना होगा। हालांकि इन स्त्रियों के उध्दार के लिए कोई अलग से रूप-रेखा समाज में दिखाई नहीं देती

स्कूल में मजदूर बच्चों के साथ गाली-गलौज होने पर आप सहपाठियों से मार-पीट पर उतारू हो जाते थे। आपने कभी कहा भी था कि अगर कवि नहीं होता, तो गुंडा-मवाली होता। इस उग्र तेवर ने कविता-लेखन की ओर कैसे प्रेरित किया?
ये तो बचपन के दौर की बातें हैं, जब कविता-लेखन शुरु भी नहीं किया था। घर के माहौल, आस-पास के परिवेश और सांस्कृतिक माहौल ने कभी गलत रास्ते पर जाने नहीं दिया। हालांकि पूरी गुंजाइश थी बिगडने की। मेरे भीतर बहुत गुस्सा भरा था जीवन की विपरीत परिस्थितियों को लेकर। इसके कारण मेरी सहपाठियों से मार-पीट और गाली-गलौज भी हो जाती थी। अगर अच्छा सांस्कृतिक माहौल न मिलता, तो जरूर वैसा ही हो जाता। घर की शिक्षा का वातावरण एवं खासकर मां जिनकी रुचि रामायण, धार्मिक-ग्रन्थों में थी, ने अच्छे संस्कार बचपन से ही डाले। पिता कबीर के गीतों को गाते थे। मानस-पाठ भी घर पर बराबर होता रहता था। कुछ इन्हीं कारणों से कभी गलत रास्ते पर नहीं भटके।

'तोडल मौसिया' जैसे किरदार क्या आज भी ग्रामीण परिवेश में देखने को मिलते हैं?
अभी भी कई ऐसे किरदार ग्रामीण परिवेश में मिल जाएंगे, जहां तक अभी नई हवाएं नहीं पहुंची हैं। खेती, किसानी, गरीबों की बस्तियों में अभी भी जीवन वैसे ही ठहरा है। किताबी शिक्षा तो वहां पहुंची नहीं, लेकिन जीवन की किताब से उन्होंने बहुत कुछ सीखा है। हाशिए के जीवन पर ऐसे किरदार बहुतायत में हैं-परसादी, श्री कृष्ण इंजीनियर, दमडू नाई अभी भी जिंदा हैं। लेकिन इनसे मिलने के लिए घुमक्कडी ज़ीवन जीना होगा, यायावर की तरह भटकना होगा। गांवों, सतपुडा जैसे घने जंगलों की खाक छाननी होगी। तोडल मौसिया ने तो गांव का भाईचारा निभाने के लिए जीते-जी अपना श्राध्द-कर्म कर लिया था ताकि पूरे गांव को एक साथ जिमाया जा सके। वे शादी-शुदा तो थे नहीं, गांव के हर भोज में उनकी उपस्थिति जरूरी थी तो उन्हें यह बुरा लगता कि वे ऐसे ही मरें और क्रिया-कर्म के बाद गांववालों को खिलाने वाला भी कोई न हो। तो उन्होंने लोगों को बिना कारण बताए पूरे गांव को न्यौता दे डाला। तो ऐसे थे हमारे तोडल मौसिया।

आपने बचपन में गरीबी को काफी नजदीक से महसूस किया है। कविता में 'श्रम-शक्ति को प्रतिष्ठा' देने के पीछे क्या यह भी एक वजह रही?
हां, ये तो है ही। लेकिन कुछ लोग अपने संदर्भ में ही नहीं, समाज के संदर्भ में भी जीते हैं। दरअसल कोई रचना सामाजिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर ही लिखी जाती है। मैं लिखता हूं, तो इसमें आस-पास के तमाम लोगों की जिंदगियां भी शामिल होती हैं। ये सभी स्मृति का हिस्सा हैं, जो जाने-अनजाने आपकी रचनाओं में चले आते हैं। ऐसा ही कोई भी रचनाकार करता है। मेरे अनुभव को ही देखें तो यह किसी भी मजदूर के अनुभव से मिलता जुलता होगा, जो दुनिया में कहीं का भी हो सकता है। मैंने कविता में एक जगह दमडू कक्का का जिक्र किया है, जो नाखून बनाने के लिए आया करते थे। शायद आपने पढी हो...
जी, उस कविता में कुछ ऐसा भाव था- 'देखता हूं नाखून तो, बस एक तीखी याद हिडस भरी, वह जो होती तो होते कक्का कहीं, नेलकटरों के इस दौर में, काट तो लेता हूं लेकिन रगडने की मशक्कत, सुविधा कोई कला नहीं।' इसी संदर्भ में आपने एक हुनर के मौत के गर्त में समा जाने की चर्चा भी की है।
इस समाज में कई कलाएं यूं ही विलुप्त होती जा रही हैं, जिसकी ओर हमारा ध्यान नहीं जा रहा। इस भाग-दौड भरी जिंदगी में लोगों के पास समय ही कहां है कि इनके बारे में भी कुछ सोच सकें।

समुद्री हवाओं से उठते नमक की गंध, सघन वन की नीरवता और आदिम जन-जातियों का संगीत-आपकी कविता को व्यापक फलक देते हैं। प्रकृति से जुडाव आपने कब महसूस किया?
मेरा बचपन तो सतपुडा के जंगलों में ही बीता। चारों ओर प्रकृति अपने तमाम सौंदर्य को समेटे आस-पास ही पसरी थी। सरसराती हवाएं, चहचहाते पक्षी, पेडों से छनकर आती गोलाकार रोशनियों का पुंज, ऊंची पर्वत श्रृंखलाएं, खूंखार जंगली जानवर से लेकर आदिवासियों का जन-जीवन तक सबकुछ तो जीवन के संगीत के रूप में मौजूद था।
जरूरत थी, तो उस बिखरे संगीत को गुनगुनाने की। प्रकृति एवं जीवन के संगीत को बहुत नजदीक से सुनने का मौका मिला। प्रकृति में सौंदर्य तो है ही, जीवन का संघर्ष भी मौजूद है। इन सबों को अलग कर देखने की जरूरत नहीं। सतपुडा के जीव-जंतु, आदिवासी, वहां के बोल को संदर्भ से काटकर देखना कठिन होगा। मालवा, छत्तीसगढ, अंडमान-निकोबार न जाने कहां-कहां घुमक्कडी करता रहा। आदिवासी, समुद्र का संबंध तो जीवन का हिस्सा ही बन चुके हैं।

जीवन का बोध, जीवन-संघर्ष से ही अर्जित किया जाता है। निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन की लंबी परंपरा हमारे यहां रही है। वातानुकूलित कमरों में बैठकर साहित्य-सृजन को आप किस रूप में देखते हैं, जहां प्रकृति एवं आमजनों का संघर्ष नहीं दिखता?
हमारा समय तो रिएलिटी पर आधारित था। लेकिन आज रिएलिटी के साथ वर्चुअल रिएलिटी का भी दौर है। चीजें वर्चुअल ज्यादा हो गई हैं। स्क्रीन, फिल्मों, पत्र-पत्रिकाओं ने देखने की एक दृष्टि पैदा की ही है। जो रचनाकार जैसा होगा, उसी हिसाब से चीजों को देखेगा। जहां एक तरफ आज सही कविताएं हैं, तो दूसरे तरह की कविताएं भी मौजूद हैं। विशुध्द अनुभव से कविता तो क्या, कोई भी विधा नहीं लिखी जा सकती। जीवन का संघर्ष झेलने के बाद ही उनकी गहनतम पीडा रचनाओं में झलकती हैं और रचनाएं लोगों के दिलों में जगह बना पाती हैं।

भवानी प्रसाद मिश्र ने आदिवासी समाज के सामने अपनी अकिंचनता व्यक्त करते हुए कहा था-'मैं इतना असभ्य हूं कि तुम्हारे गीत नहीं गा सकता।' विलुप्त होते आदिवासी समाज की पीडा आपकी रचनाओं में मुखर हैं। आज आपके जन्मस्थान छिंदवाडा में उनकी क्या स्थिति है, किन हालातों में जीने को मजबूर हैं वे?
आदिवासी समाज तो पहले भी उपेक्षित था, आज भी हालात कमोबेश वैसे ही हैं। ग्लोबलाइजेशन के दौर में बाजार एवं सत्ता का घिनौना खेल जंगलों तक जा पहुंचा है। औद्योगिकरण के नाम पर जंगलों में जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है, पेडों की कटाई जारी है। चाहे छत्तीसगढ हो, मध्यप्रदेश या हिमाचल प्रदेश। यह समाज कहीं भी मुख्यधारा में जगह नहीं बना पाया है। महाश्वेता देवी उन लोगों के बीच रह रही हैं, उन्हें शिक्षित कर रही हैं। कुछ और लोग भी लगे हैं। शिक्षा के कारण ही स्वतंत्र चेतना का विकास हो पाता है और कोई समाज विचारवान बनता है। स्वतंत्र रूप से सोचने का विकास इस समाज में नहीं हो पाया है। इनकी सादगी, सरलता को शहरी समाज अपने तरीके से छलता रहा है। दरअसल जब तक वे शिक्षा से महरूम रहेंगे, विचार का आलोक उन तक नहीं पहुंचेगा, मुख्यधारा में जगह बना पाना मुश्किल होगा।

शहरी जीवन की चिंताएं एवं मध्यवर्ग के दोहरे चरित्र की ओर आपका ध्यान क्यों नहीं गया?
नहीं, मेरी रचनाओं में शहरी वर्ग की चिंताएं भी शामिल हैं। ये मेरी रचनाओं कविता, गद्य, निबंध, लेख में तमाम जगह बिखरी पडी हैं। दरअसल शहरी मध्य वर्ग अपने में ही सिमटा हुआ समाज है। शहरी जीवन में मालिक वर्ग की मक्कारियों के आगे मजदूरों की चालाकियां कुछ भी नहीं। मुझे लगता है कि जो चीज उनका है और उन्हें नहीं दिया जा रहा है, उसे मालिकों से छीन लेने में कोई बुराई नहीं।

स्त्री-विमर्श शहर की मॉडर्न एवं बुध्दि विलास महिलाओं का शगल मात्र बनकर रह गया है? ऐसे में एक मजदूर स्त्री का वात्सल्य भाव, जब मिल का भोंपू बजते ही वह बच्चे को दूध पिलाने बरसात में भींगती दौड पडती है, की चिंताएं कहां जगह पाती हैं?
सीमित अर्थ में ही जगह बना पाई हैं। यूरोप के नारी-स्वातंत्र्य को भारतीय परिवेश में लागू नहीं किया जा सकता। आदिवासी, दलित, निम्न जातियों की स्त्रियों की पीडा को समझने के लिए अलग नजरिए से चीजों को देखना होगा। श्रमशील स्त्रियों की चिंताओं को आधुनिक विचार के दायरे में लाना होगा। हालांकि इन स्त्रियों के उध्दार के लिए कोई अलग से रूप-रेखा समाज में दिखाई नहीं देती। मजदूर या आदिवासियों के लिए स्वतंत्र विमर्श की जरूरत है। इनकी चिंताओं एवं संघर्ष को महसूस करना होगा। नई सोच का उत्खनन करना होगा, सीमित सोच से कुछ नहीं होनेवाला। महाश्वेता देवी के उपन्यास, नागार्जुन की कविताएं और कुछ जगह तो ये चिंताएं दिखती हैं। हालांकि स्पांसर्ड विमर्श में ये चीजें नहीं मिलेंगी।

आजकल आप क्या कर रहे हैं? फिल्म, डाक्यूमेंट्री, कविता या गद्य लेखन।
शमशेर जी और बिरजू महाराज पर डॉक्यूमेंट्री बनाने की तैयारी चल रही है। इन दिनों मूलत: गद्य लिख रहा हूं। उर्दू के प्रभाव वाली कविताओं का संकलन निकालने की भी योजना है। 'कवि का गद्य' जिसमें आलोचना, लेख, निबंध, डायरी और कॉलम भी शामिल होगा, पर भी एक किताब लिख रहा हूं।

नए लेखकों के लिए कोई संदेश।
युवा लेखकों को बंद कमरों से निकलकर समाज, देश, दुनिया को देखना, समझना होगा। यायावरी की जिंदगी जीनी होगी, घुमक्कडी क़र दुनिया के फलसफे को समझना होगा। यही एक रास्ता है।

वरिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई के साथ चन्दन राय की बातचीत

शनिवार, 26 जून 2010

लडने वाला समाज अपनी भाषा भी गढ़ता चलता है- अनामिका


कवयित्री अनामिका से चंदन राय की बातचीत
जब कोई समाज युध्दरत होता है, तो वह उसकी अस्मिता की लडाई होती है। उसकी भाषा में संघर्ष की चेतना होती है, एक तरह का ओज होता है। चाहे तो आप अफ्रीकी समाज की भाषा ही देख लें। वहां की बोली जानेवाली अंग्रेजी और ब्रिटिश अंग्रेजी या क्विन्स अंग्रेजी कह लें, में अंतर मिल जाएगा
कविता की ओर झुकाव आपने कब महसूस किया? घर के परिवेश का क्या असर आप महसूस करती हैं?
बचपन में पिताजी के साथ अंत्याक्षरी खेलती थी। पिताजी हमेशा मुझे हरा देते थे। मैं भी हार से बचने के लिए कुछ जोर-आजमाईश करने लगी थी। पिताजी ने भी लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। नई डायरी लाई गई और खेल-खेल में ही कविता शुरू हो गई।
बाल्यावस्था का दौर काफी राजनीतिक रूप से उथल-पुथल भरा रहा होगा। आपातकाल, जयप्रकाश नारायण और लोहिया का दौर था वह। क्या उस राजनीतिक माहौल का भी कुछ असर रहा?
वो समय ही कुछ और था। पडाेस के बच्चे भी क्रांतिकारी बन स्कूल-कॉलेज छोडक़र आंदोलन में कूद पडे थे। ऐसा लगता था मानो दूसरा स्वतंत्रता-संग्राम लडा जा रहा हो। जगह-जगह लोग सरकार के विरोध में नारे लगाते थे। उसमें ज्यादातर हमारी उम्र के बच्चे ही होते थे। घर में भी भाई इस आंदोलन में बढ-चढक़र भाग ले रहे थे। जेल जाने वालों में भी वे आगे रहते थे। मुजप्फरपुर में एक बार जेपी आए थे, तो उन्होंने मंच से रामायण की एक पंक्ति कही थी-अब लौं नसानि, अब न नसैंहों। यानी कि अब तक तो बर्दाश्त कर लिया, आगे नहीं करेंगे। इस पंक्ति का आंदोलन में कुछ अलग ही राजनीतिक अर्थ निकाला गया। जेपी के दिए भाषण को मैं आजतक भूल नहीं पाई हूं। लेकिन इस आंदोलन का सच भी लोगों के सामने आ गया। जैसा कि हरेक आंदोलन में होता है, ऊपर के लोग तो आंदोलन का लाभ उठा लेते हैं, लेकिन जो आंदोलन का झंडा उठानेवाले लोग होते हैं, वे कहीं पीछे छूट जाते हैं। मैंने देखा कि जिन बच्चों ने आंदोलन के दौरान स्कूल-कॉलेज छोडे, ज़ेल भी गए, आज बेरोजगारी की त्रासदी झेलने को विवश हैं। मैंने आंदोलन में शरीक ऐसे लोगों की जिंदगी को गहरे से महसूस किया और 'सारिका' में इनकी व्यथा पर एक कहानी भी लिखी। जैसे एक पौधे को उखाडक़र, दूसरी जगह बो देंगे, तब भी वह जड पकड लेता है। वही टेक्निक कुछ-कुछ रचनाओं के क्षेत्र में भी होती है। एक संदर्भ से दूसरे संदर्भ जुडते चले जाते हैं और वे अपने आप आपकी रचनाओं में आकार ले लेते हैं। लोक घटना, लोक कहावतों और मुहावरों को रचनाओं में पुनर्रोपित करने का भी अपने ढंग से प्रयास किया।
बचपन की कोई घटना जिसे आज तक भूल नहीं पाई हों।
स्कूल के दिनों में एक खूबसूरत सी लडक़ी पढती थी। किसी से बात नहीं करती, बस अपने में खोई रहती। सहपाठियों को ऐसा लगने लगा था कि वह स्वभाव से घमंडी है। पता चला कि उसकी मां नर्तकी है। बाजार से जब गुजरती थी, तो एक ऐसी जगह थी, जहां केवल महिलाएं ही दिखती थी। घर के बाहर नेमप्लेट पर केवल महिलाओं का ही नाम लिखा होता था। हारमोनियम-तबले और घुंघरू की सुमधुर आवाज बाहर आती रहती थी। बचपन में कुछ समझ तो थी नहीं, मुझे लगता था कि यह कलाकारों की कोई बस्ती है। एक दिन जब मैं यों ही वहां से गुजर रही थी, तो मैंने उस बस्ती में स्कूल की खूबसूरत लडक़ी को खडे देखा। संयोग से मेरी आंखें उससे मिल गई। उसके आंखों में जो पीडा मैंने देखी, वो कभी भूल नहीं पाई। लेकिन इसके बाद की एक घटना ने मेरी सोच को ही बदल दिया। उसी दिन से उस मासूम बच्ची ने स्कूल आना छोड दिया। वो कभी दिखी भी नहीं। बाद में जब मैंने उसके बारे में जानने का प्रयास किया, तो पता चला कि उसकी शादी हो गई और वह कहीं शहर से दूर चली गई। उन मासूम आंखों की पीडा मेरी जिंदगी का हमसफर बन गई। आज भी वेश्याओं के बच्चों को देखती हूं, तो दिल मायूस हो जाता है।
आप कविता में प्रवेश कैसे करती हैं? लिखने की शुरूआत कैसे होती है?
जब आप शांति से बैठे होते हैं, तो बहुत सी असंबध्द चीजें यादों में उभर कर आती हैं। समाज में, घर-परिवार में, हर जगह दुख, अभाव, पीडा का भाव तो टपकता ही रहता है। आस-पास के जीवन का कोई टुकडा, बस में चलते हुए, कुछ पढा हुआ या बात करते हुए बच्चों को देखकर भी कभी-कभी कविता अपना आकार लेने लगती है। जैसे बचपन में घर-आंगन में सेमल की रूई उडती आती थी और उसे पकडने सभी बच्चे दौड पडते थे। वैसे ही कविता का एक सिरा पकड में आ गया, तो फिर कविता बनते देर नहीं लगती। कभी एक पंक्ति बनी, तो बाकी का आह्वान करना पडता है। कुछ ऐसे ही जैसे गांव में महिलाएं आटा गूंथकर छोड देती हैं, तो रोटी का मजा ही कुछ और हो जाता है। कुछ ऐसा ही कविताओं के साथ भी होता है।
स्थानीयता आपकी कविता की धरोहर हैं। क्या आप ऐसा महसूस करती हैं कि राजधानी में यह कहीं खो-सी गई है?
जो जिंदगी आप नहीं जी पाते, वही कविता के रूप में जीने का प्रयास करते हैं। बचपन के जो दस-पंद्रह साल होते हैं, वही जिंदगी को स्थाई भाव देते हैं और आपमें भाषा का संस्कार भी गढते हैं। जैसे आप सफर पर निकले हों और मां ने एक पोटली में बांधकर चूडा, चना-चबेना, सत्तू और अचार दिया हो तो हंसते-खेलते सफर आसानी से कट जाता है।
लोकसंदर्भ, लोककथाएं और अपने जीवन की कथाएं भी जिंदगी भर के लिए साथ नहीं छोडती। जब आप मशाल जलाते हैं, तो कतारबध्द दीयों को जलाते चलते हैं और वही ज्योति दूर तक चली जाती है। कविता में भी कुछ ऐसा ही मसलसल सिलसिला चलता रहता है और कविता अपने रूप में बनी रहती है। यही कारण है कि राजधानी की भाग-दौड में भी मैं अपनी कविता के माध्यम से स्थानीयता को ही जी रही होती हूं।
आपने कभी कहा था कि मनोवैज्ञानिक युध्द में भाषा हथियार का काम करती है। जिसको भी हाशिए पर धकेल दिया जाता है, उसकी भाषा ओजपूर्ण रूप ले लेती है। तो क्या एक लडता हुआ समाज अपनी भाषा भी आंदोलन के साथ-साथ गढता चलता है?
जब कोई समाज युध्दरत होता है, तो वह उसकी अस्मिता की लडाई होती है। उसकी भाषा में संघर्ष की चेतना होती है, एक तरह का ओज होता है। चाहे तो आप अफ्रीकी समाज की भाषा ही देख लें। वहां की बोली जानेवाली अंग्रेजी और ब्रिटिश अंग्रेजी या क्विन्स अंग्रेजी कह लें, में अंतर मिल जाएगा। ब्रिटिश अंग्रेजी में औपनिवेशिक संस्कार दिखेंगे, जबकि एशिया, अफ्रीकी, जर्मन, पोलैंड या एशिया की भाषा, जो संघर्षशील जनों की भाषा है, में एक तरह के विरोध का भाव दिखता है, आक्रोश दिखता है, वहां शिष्टता का ज्यादा ख्याल नहीं किया जाता।
हे परमपिताओं, परमपुरूषों, बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो। ये आपकी कविता में किस तरह की बेचैनी है, छटपटाहट है आजादी की?
इस कविता में नए तरह के पुरूष गढने की कल्पना की गई है। पुरुष में जो पूर्वग्रह हैं, अहंकार हैं- चाहे वे जाति, लिंग, संप्रदाय या किसी और सोच को लेकर हों-उसे बदलने की जरूरत है। ईसा मसीह हंसते-हंसते सूली पर चढ ग़ए थे, उन्होंने कहा-'हे ईश्वर इन्हें माफ करना,ये नहीं जानते कि ये क्या करने जा रहे हैं।' जब कोई औरत अपने जख्म दिखाती है, तभी पुरुष को इसका भास होता है। अगर ये नहीं जानते कि वे भूलवश क्या कर रहे हैं तो मैं कहूंगी कि वे जानें कि वे क्या कर रहे हैं? स्त्री शरीर ही नहीं आत्मा भी गढती है। पुरुष ही कहीं भाई है, पिता है, मित्र है, बुरे वे नहीं, बल्कि वह सोच है जो सदियों से स्त्रियों का शोषण करती रही है। आज का पढा-लिखा पुरुष कल के मर्दवादी सोच से कहीं अलग है।
'राम की शक्ति पूजा' के लेखक निराला ने 'गर्म पकौडी' क़ी रचना कर कविता के आतंक को मिटाकर आमलोगों को भी कविता-लेखन से जोडा। नई कविता छंद-मुक्त हुई। क्या इस चलन को आप सही मानती हैं?
देखिए, कविता में किसी प्रकार का आग्रह नहीं होना चाहिए। छंद तो कविता में आते-जाते रहते हैं। हमारे यहां कविता का एक रूप लोकगीतों के रूप में भी देखने को मिलता है जो विवाह या किसी उत्सव के अवसर पर गाए जाते रहे हैं। 'आग लगी झोपडिया में, हम गावईं मल्हार' तो गेयता में एक तरह का सेलिब्रेशन भी होता है। हमारे यहां तो सबकुछ एक साथ रहा है। बाबा नागार्जुन ने भी तो कहा है-'लय करो ठीक फिर फिर गुनगुनाओ, मत करो परवाह-क्या है कहना, कैसे कहोगे, इस पर ध्यान रहे, चुस्त हो सेंटेंस, दुरूस्त हो कडियां, पके इतमीनान से गीत की बडियां।' कहीं छंद-मुक्त तो कहीं छंद भी। कविता तो अंतरंगता की भाषा है, मेल-जोल की भाषा- आदेशात्मक स्वर में तो कविता नहीं हो सकती ना। फिर वहां राग नहीं रहेगा और राग नहीं हो, तो कविता गेय भी नहीं रह जाती। लोक गीत संस्कार में रचे-बसे हों, तो कविता में गेयता बनी रहेगी।
क्या आप ऐसा महसूस करती हैं कि कविता समकालीन परिवेश से कट सी गई है? यही कारण है कि कविता लोगों से दूर होती चली गई।
जीवन के दुख-दर्द कविता में शामिल हैं। हां, व्यस्तता के कारण लोगों के पास समय नहीं रहा फिर इतने बडे देश में शिक्षा भी कितने लोगों के पास है? कवि कहने से किसी को भी लगता है कि अपना व्यक्ति होगा, हमारे हित की बात करेगा, खिलाफ नहीं जाएगा। कोई भी आदमी विश्वास की नजरों से आपको देखेगा, तो यही अपनापन ही तो एक कवि की धरोहर है।
लेकिन कुछ लोग तो कविता के मौत की भी घोषणा करने लगे हैं। धर्मवीर भारती ने भी एक बार ऐसे लोगों को ललकारते हुए कहा था-'कौन कहता है कि कविता मर गई।' आप क्या सोचती हैं इसके बारे में।
'हम न मरें, मरिहैं संसारा।' आप बताएं, कविता कहां नहीं है? आप हंसकर किसी को सडक़ पार करा दें, वहीं कविता है। जब तक मनुष्यता में विश्वास है, धरती पर हरियाली है, संवेदनशीलता जीवित है, कविता बनी रहेगी। सिर्फ जो लिखी जाए, वही कविता नहीं है। कविता वह भी है जो महसूस की जाती है। जब तक लोगों में उम्मीद की किरण, प्रेम का भाव जिंदा है, कविता मर ही नहीं सकती। आए दिन हम किसी न किसी चीज की मौत की घोषणा करते रहते हैं। नदी बहती रहती है, आप तो आते-जाते रहेंगे। ऐसा ही कविता के प्रवाह के साथ भी है। आप आए दिन की जिंदगी में भी कविता को ही जी रहे हैं। कविता तो संबंधों की भाषा है। नामी-गिरामी कंपनियां भी जीवन की कविता को ही मार्केटिंग के जरिए भुनाती हैं।
आजकल रचनाएं कालजयी क्यों नहीं होती?
रचनाएं तो चरैवेति, चरैवेति अपना सफर तय करती हैं। समय तय करता है कि क्या ढह गया और क्या बचा रह गया? समकालीन रचनाओं को आप कैसे तय कर सकते हैं कि वे कालजयी हैं या नहीं। ये तो 50 साल बाद ही पता चलेगा ना।
हमसे बात करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

रविवार, 20 जून 2010

असली गांधी तो दक्षिण अफ्रीका में मिले


हासिम सीदास ने बताया कि देखिए, गांधी को तो हम लोगों ने तराशा है। जब वे भारत से यहां आए थे, तो एक अनगढ हीरे की तरह थे। हमने दुनिया को गांधी नाम का सबसे बडा हीरा दिया है। असली गांधी तो यहां हैं। अगर तुम्हें लिखना ही है, तो यहां के गांधी पर लिखो
साक्षात्कार
गांधी पर लिखने का विचार कहां से आया? आपने अपने उपन्यास 'पहला गिरमिटिया' में भारत के गांधी से ज्यादा दक्षिण अफ्रीका के गांधी को महत्व दिया है? इसके पीछे क्या वजह रही होगी?
मैंने 1947 में गांधी को देखा था। हताश, निराश गांधी को, जो देश के विभाजन से दुखी थे। हुआ यूं कि गांधी जी दिल्ली से हरिद्वार जा रहे थे। मैं उस समय छठी कक्षा में पढ रहा था। स्कूल में अध्यापक महोदय ने कहा कि चलो, आज तुम लोगों को गांधी का दर्शन करवाते हैं। हम लोग लाइन लगाकर सडक़ के किनारे गांधी के इंतजार में खडे थे। उस समय तक गांधी के बारे में बस इतनी जानकारी थी कि उन्होंने हमें आजादी दिलाई है। लेकिन देखने की ललक थी। एक कार तेजी से गुजरी। पता चला कि वो महिला मीरा बेन थी। बाद में गांधी एक बस से आए। संयोग ऐसा था कि गांधी जिस खिडक़ी के पास से बाहर झांक रहे थे, वो मेरे सामने ही थी। बापू नीचे हमारी ओर ही देख रहे थे। बापू की वो तस्वीर, वो आवाज आज भी हमारे दिल में रिकाडर्ेड है। गांधी को सुस्त, उदास देखकर मन उदास हो गया था। विभाजन के बाद देश की राजनीति में बापू को लोगों ने अप्रासंगिक बना दिया था। मामा आचार्य जुगल किशोर गांधी के निकट रहे हैं। उनसे भी बापू के बारे में बहुत कुछ जाना-समझा। गांधी मेरी जिंदगी में ऐसे व्यक्ति थे, जो हमेशा अपनी ओर आकर्षित करते रहे। इस किताब को लिखने में मुझे आठ साल लगे। जब मैं दक्षिण अफ्रीका गया, तो वहां हासिम सीदास नाम के एक व्यक्ति ने बताया कि देखिए, गांधी को तो हमने तराशा है। जब वे भारत से यहां आए थे, तो एक अनगढ हीरे की तरह ही थे। हमने दुनिया को गांधी नाम का सबसे बडा हीरा दिया है। तब असली गांधी तो यहां हैं। अगर तुम्हें लिखना ही है, तो यहां के गांधी पर लिखो। देश-विदेश भटकते हुए मैंने गांधी के बारे में जानकारियां बटोरी और तब पहला गिरमिटिया लोगों के सामने आया।

आईआईटी कानपुर के परिवेश की क्या भूमिका रही इस उपन्यास-लेखन में?
हिन्दी का होने की वजह से लोग शुरू से ही मुझे नापसंद करते थे। वहां का माहौल ही अंग्रेजियत भरा था। वहां की अमरीकन फैकल्टी मुझे बार-बार परेशान करती रही। कभी सस्पेंड किया, तो कभी कुछ और। ऐसे समय में मुझे बापू की दक्षिण अफ्रीका की पीडा याद आती थी, जब उन्हें वहां उपेक्षित, प्रताडित किया जा रहा था। वहां के परिवेश और संघर्ष में मुझे गांधी का प्रतिबिंब ही दिखा, जिसने मेरी रचना को निखारने के लिए अंर्तदृष्टि दी।

एक बार आपने मुलायम सिंह यादव के बारे में कहा था, 'एक बार मैंने चंदन का वृक्ष देखा तो मुझे सांप याद आया। लेकिन आज मुझे सचमुच का चंदन का वृक्ष याद आया।' तो क्या आज भी आप इन बातों को मानते हैं?
स्व. मित्र जनेश्वर मिश्र ने मुलायम सिंह से मिलवाया था। उस समय मुझे पैसे की जरूरत थी। उन्होंने मुझे 75 हजार रुपए दिए जिसके कारण मैं दक्षिण अफ्रीका जा सका, नहीं तो इस किताब के आकार लेने में काफी मुश्किलें आती। जनेश्वर मिश्र के जन्मदिन के अवसर पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया था, जिसमें अध्यक्षीय भाषण देते हुए मैंने समाजवादियों की खूब खबर ली थी। समाजवादी धीरे-धीरे सामान्य जनों से दूर ग्लैमर की दुनिया में खोते जा रहे थे। जनता के बीच पकड दूर होती चली गई थी। मेरे जैसे लोग भी मुलायम सिंह से नहीं मिल पाते थे। सिक्यूरिटी वाले इधर का उधर दौडाते रहते थे। मुझे बडा अफसोस होता था कि गांधी के देश में यह कैसी स्थिति है कि नेता लोगों से मिलना तो दूर, सुरक्षा के घेरे में चलने में ही अपनी शान समझते हैं।

लोहिया जी हमेशा आपको लिखने के लिए प्रेरित करते रहे। उनका क्या प्रभाव मानते हैं अपनी रचनाओं पर?
इलाहाबाद के कॉफी हाउस में मैं अक्सर जाता रहता था। लोहिया जी भी वहां पर आते थे। वे हमेशा पूछते थे-क्या कर रहे हो? क्या लिख-पढ रहे हो? वे अक्सर समझाते हुए कहते थे कि जैसे हमारे लिए राजनीति जरूरी है, उसी तरह साहित्यकारों के लिए लिखते-पढते रहना जरूरी है। जैसे मैं राजनीति में किसी से नहीं डरता, उसी तरह तुम भी निडर होकर खूब लिखो। ये सब बातें आज भी जब कलम उठाता हूं, याद आती हैं।
बाजार जब अपना प्रभाव बढाती है तो खुद की भाषा भी गढती चलती है, क्या आप इससे सहमत हैं?
यह एक दुखद घटना है। हमारे देश में जो भी भाषा रही, वो राजा-महाराजों की भाषा रही या उनके माध्यम से होकर आई। बाजार अपने साथ एक सभ्यता भी लेकर आती है। गांधी ने इसे ही शैतानी सभ्यता कहा है। आप कल्पना करें कि भारत के गांव में जैसे कोई यूरोपियन महिला चली आए, कुछ ऐसा ही दुर्भाग्य रहा हिंदुस्तान में कि राजा की भाषा यहां चली आई। गांधी ने देश के हरेक गांव को समृध्द और आत्मनिर्भर बनाना चाहा। लेकिन नेहरू इस बात को मानने को तैयार नहीं थे। वे कहते थे कि मैं नहीं मानता कि गांव में कोई उजाला है। गांव तो अंधेरे में डूबा है, फिर वे क्या रास्ता दिखलाएंगे। अगर नेहरू ने गांधी की बात मान ली होती, तो कई समस्याएं जो आज विकराल रूप लेती जा रही हैं, नहीं होती। इसी में भाषा की समस्या भी शामिल है। देशी एवं ग्रामीण बाजार से स्थानीय भाषा का ही भला होना था।

आपके उपन्यास में एक जगह एक छात्र के आत्महत्या की बात आई है। ऐसा ही संदेश थ्री इडियटस फिल्म के माध्यम से भी दिया गया। क्या आप इसमें कुछ समानता पाते हैं?
नहीं, बात ही दूसरी है। मेरे उपन्यास में परीक्षा के तनाव की चर्चा नहीं है। इसमें दलितों के दाखिले को लेकर आईआईटी कैंपस में किस तरह लोग सोचते हैं, इसको लेकर है। दरअसल आईआईटी कानपुर में मेरी लडाई की शुरुआत भी यहीं से हुई। उस समय मैं वहां पर रजिस्ट्रार था। वहां दलित छात्रों को बहुत अपमानित किया जाता था। जिस लडक़े ने आत्महत्या की थी, वो अन्य छात्रों की तरह ही कंपटीशन पास कर आया था। स्वभाव से विद्रोही था, किसी की नहीं सुनने वाला। पता नहीं क्या हुआ, कि इनके तनावों से उबकर एक दिन उसने आत्महत्या कर ली। इंक्वायरी हुई। लेकिन देश में जैसा दूसरे तरह के जांच का नतीजा होता है, वही यहां भी हुआ। आठ-दस साल बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है।

पहला गिरमिटिया और आज के मॉडर्न गिरमिटिया में आप क्या अंतर पाते हैं?
पहले गिरमिटिया को दस पाउंड मिलता था सालाना। जबकि आज के लोग लाखों डॉलर लेते हैं। पता नहीं इनका देश के प्रति क्या कमिटमेंट है, लेकिन यहां रह गए मां-बाप को पैसे भेजकर ये अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। गिरमिटिया समाज को दक्षिण अफ्रीका से निकाला जा रहा था, जिसकी लडाई बीस सालों तक गांधी ने लडी। अाज ओबामा भारतीय, चीनी छात्रों का भय दिखाकर अमरीका में यही करने जा रहे हैं। आईआईटी फैकल्टी की शिक्षा पध्दति भी अमरीका-केंद्रित है। वहां के सिलेबस और उदाहरण देकर छात्रों को पढाया जा रहा है। फिर तो वे धन कमाने की मशीन ही बनेंगे, अच्छे नागरिक, सुपुत्र नहीं। पहला गिरमिटिया जब यहां से गया था, तो अपने साथ रामायण का गुटका, माला और गंगा जल लेकर रोजी-रोटी के लिए वहां गया था। वे चाहे हिंदू थे, मुसलमान, तमिल या पारसी। लेकिन आज के गिरमिटिया तो सब कुछ यहीं छोडक़र जाते हैं, भारतीयता को भी और वहां से अंग्रेजियत लेकर आते हैं। हमारे समाज में मजदूर 100 रुपए भी कमाता है, तो 5 रुपए बचा लेता है। जबकि वहां सबकुछ वीजा कार्ड पर चलता है। अमरीकन दिवालिएपन का कारण यही वीजा कार्ड ही रहा, जिसने कर्ज लेकर लोगों को मकान, गाडी ख़रीदना सीखाया।

एक अंतिम सवाल, कवि भवानी सिंह ने एक बार साक्षात्कार के दौरान कहा था कि 'मुरारजी भाई की ऐसी की तैसी, गांधी से लोगों का काम हल नहीं होगा, तो मार्क्स तक जाने में उन्हें कोई रोक नहीं पाएगा।' क्या आप इससे सहमत हैं?
जहां तक मार्क्स की बात है, उनका सिध्दांत बहुत ही उपयोगी है। लेकिन भारत में स्थितियां दूसरी रही। यहां मजदूर से ज्यादा किसानों की हालत खराब थी। कम्यूनिस्ट भाई तो केवल मजदूरों की बात करते थे। गांधी ही थे जिन्होंने मजदूरों, किसानों को एकजुट किया। मार्क्स आज सब जगह से बाहर किए जा रहे हैं। पार्टी वर्कर भी जनता से कट रहे हैं, ऐश कर रहे हैं। आजादी के समय पुराने मार्क्सवादियों में कुछ लोग ही थे जो इसे कैपिटलिस्ट की लडाई न मान सीधे आंदोलन में शरीक हुए।
जब तक गरीब, संघर्षशील लोग रहेंगे, गांधी लोगों को रास्ता दिखाते रहेंगे। आज दुनिया के लोग गांधी को स्वीकार कर रहे हैं। आज के मार्क्सवादी तो जनता की राजनीति से ही कट गए हैं। एक बात तो तय है कि नेताओं को देश के लोगों से जुडना होगा, चाहे आप गांधी, मार्क्स, गोलवलकर को स्वीकार करें या नहीं।

हमसे बातचीत करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद
(साहित्यकार गिरिराज किशोर से चंदन राय की बातचीत)

बुधवार, 16 जून 2010

यह निवेश किस काम का...



इस देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि वही यूनियन कार्बाइड, जो भोपाल के लोगों का सबसे बडा गुनहगार है, धड़ल्ले से गुजरात में कारोबार कर रहा है। अगर इस कंपनी के गुनाहों को धोना है तो एंडरसन का इस देश में प्रत्यर्पण कराने के बाद देश के कटघरे में खडा करना होगा। जनता को यह भी ध्यान रखना होगा कि फिर कोई जस्टिस अहमदी इनकी मौत को अदालत में कम आंकने की तिकडम न करे। फिर कोई देश का सौदा करने वाला राजनेता एंडरसन को बचाने के लिए सरकारी गाडी में मेहमान न बनाए
धीरे-धीरे मौत के आगोश में दम तोडता हुआ मध्यप्रदेश का एक शांत शहर भोपाल। पुराना भोपाल के छोला इलाके के पास ही है जेपी नगर जहां सैकडाें एकड में फैला है यूनियन कार्बाइड का कारखाना। एकाएक टैंक नंबर 610 के दैत्य ने जहरीली गैस उगलना शुरू किया। पल भर में भोपाल शहर एक गैस चैंबर में बदल चुका था जिसमें हर भोपालवासी तडप-तडप कर मरने को विवश था। कुछ ही दिनों में करीब पंद्रह हजार बच्चे, जवान, बुजुर्ग, स्त्रियां सभी इसकी जद में थे और चारों ओर बिखरा था अपनों का शव। सरकार ने अलग-अलग नंबर उन लावारिस लाशों पर टांग दिए थे, ताकि मरे हुए लोगों की पहचान हो सके। भोपाल शहर का हर वाशिंदा चारों तरफ पसरे मौत के सन्नाटे को नजदीक से महसूस कर रहा था और अपनों की तलाश में भटक रहा था। अभी भी 26 साल पहले हुए मौत का तांडव फिजाओं में चारों तरफ पसरा है। अमीया बानो कि एक ही चाह है कि उसकी ढाई साल की पोती रेशमा दूसरे बच्चों की तरह दौडती हुई आए और उसके गले से चिपट जाए। न जाने कई विकलांग रेशमाओं का दोषी एंडरसन अमरीका के एक आलीशान कोठी में अपनी बची-खुची जिंदगी गुजार रहा है। अंधाधुंध विकास की कीमत चुका रहे हैं भोपालवासी। कभी माओत्से तुंग ने कहा था कि अगर चीन पर साम्राज्यवादी देशों का हमला होता है, तो कुछ लाख लोग मरेंगे, लेकिन जितने लोग बचेंगे वही समाजवाद लेकर आएंगे। कुछ ऐसा ही तर्क आज 'ग्लोबलाइजेशन' के दौर में भी गढा जा रहा है, जहां विकास की कीमत चुकाने के लिए कुछ लाख या करोड लोग भी मर जाएं, तो बचे हुए लोग ही उदारीकरण की असली संतान के रूप में पेश किए जाएंगे। इस बुलंद इमारत की नींव में तो कुछ लाख आदिवासियों, किसानों, मजदूरों और गरीबों को तो दफन होना ही होगा। इस मामले में आला दर्जे के नेता चुप्पी साधे हैं, दूसरे स्तर के नेता मैदान में हैं, जिन्हें पता है कि ऊपर के लोगों को कब बोलना है और कब मौन धारण करना है। मामला एंडरसन का हो या क्वात्रोची का, देश के विदेशी गुनहगारों के लिए हर खून माफ है। बस शर्त एक ही है वे यहां निवेश करें और मुनाफे में कुछ हिस्सेदारी भी दें और चाहें तो उसका एक बडा हिस्सा अपने देश ले जाएं। विदेशी कंपनियां भी भारत की मजबूरी समझती हैं और समय पर सरकार की बांह मरोडने में परहेज नहीं करती। भारत अभी भी उनके लिए सोने की चिडियों वाला देश है, जो रोज उनके लिए सोने के अंडे देती है। ये दुनिया का सबसे बडा औद्योगिक हादसा था, जिसने करीब ढाई लाख लोगों को किसी न किसी बीमारी की चपेट में ले लिया। अभी भी जन्म लेते बच्चे जहरीली गैस के प्रभावों से अछूते नहीं हैं। बच्चे अपने पैरों पर खडे नहीं हो पाते, बोलते हैं तो हकलाकर, कितने बच्चे तो मानसिक विकलांग पैदा हो रहे हैं, जहरीली गैस की घुटन उन्हें तिल-तिल कर मार रही है। अभी भी वहां की सरकार आंखें मूंदकर लोगों को खनन के पट्टे दे रही है, पर्यावरण मानकों को धत्ता बताते हुए। इसके कारण यहां के जलाशयों में लेड, कैडमियम, आर्सेनिक की मात्रा बढ ग़ई है। ये तो वही मिसाल है कि बोझ से दबे जानवर के ऊपर चार मन का बोझ लादो या दस मन का, क्या फर्क पडता है? पर भोपाल के लोग आखिर करें भी तो क्या? भारत का पूरा तंत्र जिस अपराधी को बचाने में लगा हो, उसके आगे इन बेबसों की क्या बिसात? कहते हैं, इस त्रासदी की धमक अमरीकी सत्ता गलियारें में भी सुनी गई थी। अमरीकी सरकार परेशान हो तो क्या केंद्र, क्या राज्य, सबों के लिए अमरीका की सलाह निर्देश के रूप में लेने की होड लग जाती है। इस आपाधापी में इन्हें यह ख्याल भी नहीं रहता कि पांच साल बाद उन्हें जनता को मुंह भी दिखाना है।
विदेशी कंपनियों का अपने देश में स्वागत है, चाहे वे मॉरीशस के रास्ते आएं या दुबई से, सरकार का एक ही मकसद है कि वे निवेश के साथ लोगों को रोजगार भी दें। लेकिन निवेश और रोजगार के लोभ में लोगों की जिंदगियों से तो समझौता नहीं किया जा सकता। देश की सुरक्षा को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। निवेश के बहाने अगर बहुराष्ट्रीय कंपनियां देश की राजनीति में हस्तक्षेप करें, तो यह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए जरूरी है कि मल्टीनेशनल कंपनियों से सियासी दल चंदा लेना बंद करें। आप चंदा लेंगे तो वे राजनीति में दखल देंगे ही। क्या भारत की जनता को इतनी समझ नहीं कि इन चंदों का सच क्या है? सीमित संसाधनों की लूट में छूट मिले तो कुछ करोड ड़ॉलर का चंदा भला उनके लिए क्या मायने रखता है। आने वाली सदी में वही देश शक्तिशाली होगा, जिसके पास अधिक से अधिक आर्थिक संसाधन होंगे। अफ्रीका से लेकर एशिया एवं लातिन अमरीकी देशों के संसाधनों पर कब्जे की होड में विदेशी कंपनियां जाल बिछाने में लगी हैं। जो कंपनियां 'कंपनी सोशल रिस्पांसिबिलिटी' यानी सीएसआर के नाम पर कुछ लाख डॉलर खर्च कर सरकार से तमाम करों से रियायत लेने में लगी होती हैं, वे भला मुफ्त में चंदा क्यों देंगी? इन कंपनियों के लिए दूसरे देशों में रास्ता तलाशने के लिए खतरनाक खुफिया एजेंसियों मोसाद, सीआइए का नेटवर्क भी होता है, जो इनके इशारों पर किसी भी देश में तख्ता पलट के लिए तैयार होती हैं। लातिन अमरीका हो या अफ्रीका या फिर अफगानिस्तान से लेकर पाकिस्तान तक, लोकतंत्र के नाम पर दूसरे देशों में सरकार पर हमला बोलना, उन्हें हराकर कठपुतली सरकार बिठाना और फिर कंपनियों को लूटने की खुली छूट देना। इसमें खुफिया एजेंसियां और कंपनियां सरकार की शह पर दूसरे देशों में उखाड-पछाड क़ा खेल खेलती रही हैं। भारत में विदेशी कंपनियों का इतिहास फिर से दोहराया जा रहा है। सरकार के पास जनता को फुसलाने के लिए विकास का नारा है। विदेशी कंपनियां अपनी कही जाने वाली सरकार के कान में मंतर फूं क चुकी है। परमाणु करार का ही अगला चरण लायबिलिटी बिल के रूप में जनता के सामने पेश किया जा रहा है। जिम्मेदारी सरकार की, मरें देश के नागरिक और माल उडाकर ले जाएं विदेशी कंपनियां। फिर एंडरसन की तरह हमें उनके प्रत्यर्पण की मांग करने का अधिकार भी तो नहीं होगा। वे कुछ लाख चुकाकर तमाम जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाएंगे। इस देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि वही यूनियन कार्बाइड, जो भोपाल के लोगों का सबसे बडा गुनहगार है, धड़ल्ले से गुजरात में कारोबार कर रहा है। अगर इस कंपनी के गुनाहों को धोना है तो एंडरसन का इस देश में प्रत्यर्पण कराने के बाद देश के कटघरे में खडा करना होगा। जनता को यह भी ध्यान रखना होगा कि फिर कोई जस्टिस अहमदी इनकी मौत को अदालत में कम न आंकने की तिकडम करे। फिर कोई देश का सौदा करने वाला राजनेता एंडरसन को बचाने के लिए सरकारी गाडी में सरकारी मेहमान न बनाए। फिर देश-सेवा की कसमें खाने वाला सरकारी अधिकारी राजनेता को देश से ऊपर मानने की गुस्ताखी न करे। हाल में आंध्र प्रदेश सरकार जॉर्जिया टेक यूनिवर्सिटी को अपने यहां बुलाने के लिए रियायती दरों पर जमीन उपलब्ध कराने के लिए बिछी जा रही थी। विदेशी यूनिवर्सिटी उस जमीन का ज्यादा कीमत देने के लिए तैयार थी, लेकिन सरकार ने सदाशयता दिखाते हुए एक करोड प्रति एकड क़ी जमीन एक से डेढ लाख प्रति एकड में ही देने की पेशकश की। एक विदेशी यूनिवर्सिटी अगर जमीन का अधिक पैसा देने के लिए तैयार हो और रियायत की मांग भी न करे, तो क्या जरूरत है कि उन्हें छूट देने के लिए हम गिडग़िडाएं ही। इस बात का खुलासा लोगों को सूचना के अधिकार से मिला। क्या कारण है कि हमारे यहां का पूरा तंत्र और राजनैतिक नेतृत्व विदेशी कंपनियों के सामने वफादारी दिखाने की होड में लग जाता है। नियम-कायदों को ताक पर रखकर सारी सुविधाएं देने की होड लग जाती है। यहीं से इन विदेशी कंपनियों को यह संदेश जाता है कि भारत जैसे देश में सबकुछ चलता है। जनता हर घटना पर प्रतिक्रिया देने के लिए सामने नहीं आती और जब लोकतंत्र के चुनावी दंगल में जवाब देती है, तो फिर सरकार औंधे मुंह मैदान पर धूल चाट रही होती है। एक ईस्ट इंडिया कंपनी के जख्म को सहलाते हमारी कई पीढियां गुजर चुकी, फिर एक यूनियन कार्बाइड के घाव भला इतनी जल्दी कैसे भरेंगे? भोपाल में जो हो गया, उन मासूमों की जान को वापस तो नहीं लाया जा सकता, लेकिन इससे मिले सबक को हमेशा याद रखना होगा कि विदेशी कंपनियां भारत को चारागाह न समझ सकें।

रविवार, 13 जून 2010

असंतोष से ही सर्जनात्मक लेखन संभव : चित्रा

चित्रा मुद्गल से चंदन राय की बातचीत
साक्षात्कार
आपने बचपन में एक बार अम्मा से शेर की खाल मांगी थी, लेकिन मिला आपको बप्पा का लिखा हुआ नाटक और कुछ कविताएं। तो क्या साहित्य-लेखन में इस घटना का भी कोई योगदान आप महसूस करती हैं?
आश्चर्य से...अरे, आपको कैसे पता। हां, सफाई तो नहीं, रिनोवेशन हो रहा था, बप्पा के न रहने पर मैं उनकी याद अपने पास रखना चाहती थी। बप्पा के शिकार किए कई शेर की खालें और बारहसिंगा की झाडीदार नुकीली सिंगें ड्राइंगरूम में लगी रहती थी। अम्मा ने देने से मना कर दिया था। घर का माहौल तो था ही, साथ ही आस-पास के परिवेश से प्रभावित होकर ही लिखने की ओर उन्मुख हुई। उस समय समाज सामंतवादी माहौल की जकडन में था। औरतों की स्थिति को देखकर मन खटकता था। साथ ही इस बात पर अफसोस भी होता था कि दूसरे लोगों को भी क्यों इनके हालात पर गुस्सा नहीं आता। गांव की स्थितियां शहरों से और भी बदतर थी। शहर में तो एक तरफ का खुलापन होता था, लेकिन गांव का वातावरण तो संकीर्ण था। महिलाओं को घर के पिछवाडे बनी खिडक़ी से ही घर में आना-जाना होता था। इस सवाल ने बचपन से परेशान किया कि अगर भैय्या और अन्य लोग घर के मुख्य दरवाजे से भीतर आ सकते हैं, तो हम क्यों नहीं? एक बात और भीतर तक कचोटती थी- यह करना है, यह नहीं करना है-के निर्देश खासकर घर की महिलाओं के लिए। जबकि भैय्या कुंवर कमलेश प्रताप सिंह के लिए कोई रोक-टोक नहीं। इसी तरह के असंतोष और टूटन ने लिखने को प्रेरित किया।
द्वआपकी रचनाओं में समाज के छोर पर खडे व्यक्ति की आवाज सुनाई पडती है, जिन लोगों की सत्ता के गलियारों में आवाज कभी नहीं सुनी गई। क्या जुडाव महसूस करती हैं आप उस वर्ग से?
मैं बचपन से ही इनसे एक प्रकार का अपनापन महसूस करती रही हूं। हंसते हुए...पिछले जन्म में मैं जरूर इसी वर्ग से रही होऊंगी। हुआ यूं कि जब मैं स्कूल से घर लौटी, तो दत्ता सावंत को घर में पाया, जो किसी बात पर जोर-जोर से बहस कर रहे थे। हमारे घर के पास से ही मजदूरों के आने-जाने का रास्ता था। कुर्ला से लेकर मुलुंड तक जहां से पहाडी ड़ॉकयार्ड शुरू होती है, तक पत्थर का दीवाल बनाया जा रहा था। इस तरफ अफसरों की बस्तियां थी, दूसरी तरफ मजदूरों की बस्ती, जो इधर के औद्योगिक इलाकों में काम करने जाते थे। इन्हीं के घर के पास से छोटा सा रास्ता गुजरता था, जहां से सुबह-शाम मजदूर अपनी ही मस्ती में खोए, फावडा-कुदाल लिए गुजरते थे। अफसर शाम को बंगले के बाहर लॉन में अपने परिवार या मित्रों के साथ कुर्सी लगाकर बैठे होते थे। अफसरों की पत्नियां भी नाक-भौं सिकोडती थीं, जब मजदूरों का झुंड हु-हु करता हुआ मदमस्ती में गाते हुए बगल के रास्ते से गुजरता था। अगर यह दीवाल बनाई जाती, तो मजदूरों को 3-4 किलोमीटर सुबह-शाम आने-जाने में ज्यादा चक्कर लगाना पडता। मैंने कहा कि अगर मेरा बस चले तो मैं इस दीवाल पर फावडा चला दूं। दत्ता सावंत आश्चर्य से मेरी ओर देखने लगे और अगले ही दिन से मुझे कुछ अशिक्षित मजदूर स्त्रियों को पढाने का काम सौंप दिया गया। सिर्फ शहरों में बदहाल मजदूर ही नहीं, बल्कि गांव की दुनिया को भी इससे जोडा। अनायास प्रतिबंध से चिढ क़े कारण ही इस वर्ग के दुख-दर्द में महिलाओं को भी शरीक किया। गांव में जब मेले या हाट में जाना होता था, तो अम्मा बैलगाडी में चादर डालकर पीछे के दरवाजे से आती थी। बैलों को घुमाकर आगे लाया जाता था, तभी महिलाएं घर से निकलती थी। गांव से बाहर निकलते ही दलितों की बस्तियां थीं, जिनसे होकर जाने की मनाही थी। इन सभी बातों का विरोध करते हुए मैंने हमेशा अपने को इस वर्ग के आस-पास ही पाया।
द्वआप विचारों से लोहियावादी रही हैं। आप साहित्य में विचार को कितना महत्व देती हैं?
लोहियावादी तो नहीं, हां लोहिया जी के विचारों से प्रभावित जरूर रही हूं। बहुत कुछ सीखा है, पाया है, तो प्रभावित होना स्वाभाविक ही था। बराबर ट्रेड यूनियन के आंदोलन में शरीक होती रही, दत्ता अंकल का सहयोग भी मिलता रहा। हालांकि वे थे तो कांग्रेसी, लेकिन इससे लोगों के बीच काम करने पर कोई प्रभाव नहीं पडा। बाद में सीपीआई के संपर्क में भी आई। जगदंबा प्रसाद दीक्षित जी लोगों को विचारों से दीक्षित करने में ही लगे रहते थे, जिसका असर काम पर पडता था। पार्टी अनुशासन से ज्यादा रूचि मेरी लोगों के भले के लिए काम करने की थी। अहिल्या ताई के साथ हम लोगों से चंदा लेकर ही काम करते थे, कोई डॉलर या पाउंड के अनुदान से चलने वाली संस्था नहीं थी, हम लोगों की। आज दुख होता है जब चंदे के पैसे को लोगों को दारू, मीट पर खर्च करते हुए देखते हैं। क्रांति और शराब का भला कैसा संबंध। उतना ही दुखी होती हूं किसी मजदूर को देशी शराब की दुकान पर खडे देखकर। यही पैसा एक वक्त परिवार को भूखा सुलाता है। मैं लोहिया जी के देसी समाजवाद से प्रेरित रही। समाजवाद में भी तो भूगोल, इतिहास का ख्याल रखना ही होगा। क्या सीमोन द बउआर के देश में विधवा नारियों को चिता पर जलाया जाता था। अगर नहीं, तो नारी विमर्श के स्वरूप भी तो देश काल में बदलने स्वाभाविक हैं। आज राजनीति ने पूंजीपतियों के साथ मिलकर मजदूर-शक्ति का क्षरण किया है। जेपी के आह्वान पर पूरे देश में छात्रों ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया था। साहित्य के केंद्र में विचार का तो अपना महत्व है ही।
आज के उग्र वामपंथ को आप किस रूप में देखती हैं?
हम लोगों का घर तो सबों के लिए खुला होता था, दूसरों के बारे में नहीं जानती। समाज में जब तक कुछ लोगों के पैसे कमाने की हवस के कारण अधिकांश हाशिए पर धकेले जाते रहेंगे, लोग सडक़ पर उतरेंगे या गुरिल्ला लडाई में शामिल होंगे ही। क्या हमने इन लोगों की बात सुने जाने के लिए लोकतंत्र में कोई स्पेस छोडा है? हालांकि नक्सल अपने शुरूआती दौर में जेनुइन था। बहुत बडे नाटककार गौतम घोष बराबर इन लोगों के बीच जागरूकता फैलाने का काम करते रहते थे। दुबले-पतले, मरियल-से दिखने वाले मिथुन चक्रवर्ती सहित उस समय के सभी नाटककार इफ्टा के तहत वहां प्रचार में लगे थे। लोग खुलकर चंदा देते थे, जबरदस्ती जेब में पैसा निकालकर डाल देते थे। लेकिन आज मजदूरों की शक्तियों को सत्ता ने पूंजीपतियों के साथ मिलकर तोड दिया है, यही कारण है कि ऐसे आंदोलन अब विकराल रूप लेते जा रहे हैं।
आज मिर्चपुर से लेकर तमाम जगहों पर दलितों पर अत्याचार बढे हैं, सत्ता का स्वरूप भी बदला है, अब वह कमजोर की बजाय ताकतवर के साथ खडी दिखती है, आपका क्या विचार है?
छत्तीसगढ हो या अमरीका, हर जगह सत्ता का एक ही चरित्र होता है। पूंजीपति सरकार के साथ मिलकर देश के संसाधनों को जमकर लूट रहे हैं। स्वराज को आकार-प्रकार देने वाली राजनीति का यह कैसा रूप है? हत्यारे एंडरसन को भगाने के लिए केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक पूरा अमला लगा था। अर्जुन सिंह चाहते तो जनता की जवाबदेही का हवाला देकर केंद्र के आदेश को मानने से इंकार कर सकते थे। ऐसे नेताओं को तो सरेआम चौराहों पर फांसी लगा देनी चाहिए। इसे छद्म राजनीति नहीं तो, और क्या कहेंगे?
द्वएक अंतिम सवाल, आपको पाठक किस रूप में जानें-एक उपन्यासकार, कहानीकार, समाजसेविका या कुछ और...?
पाठकों के पास वही अनुभव पहुंचते हैं, जो उन्हीं के परिवेश से अर्जित किए गए हैं। यह सवाल मैं पाठकों पर ही छोडती हूं। हालांकि अब उनके पत्र कम ही आते हैं, हां फोन जरूर आते रहते हैं। पाठक ही तय करें कि वे मुझे किस रूप में अपने नजदीक महसूस करते हैं। हमसे बात करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद...

बुधवार, 9 जून 2010

एक लापरवाह धार्मिक देश में...

आप किसी सुरक्षा चेक पोस्ट पर खड़े हो जाएं। किसी बढ़ी हुई दाढ़ी वाले को मुल्लाजी की तरह टोपी लगाए एवं घुटने तक पायजामा पहने देखकर ही सुरक्षा अधिकारी कुछ ज्यादा ही मुस्तैद नजर आने लगते हैं। उनकी बकायदे चेकिंग के समय ऐसा लगता है मानो उन अधिकारियों की नजर में ये पहले से ही आतंकवादी घोषित हो चुके हों। कुछ ऐसी ही छवि को लेकर हमारा समाज भी बड़ा होता है। यही कारण है कि एक समरस कहे जाने वाले समाज में मुसलमानों की बस्ती आज भी हिन्दू बहुल कॉलोनियों से दूर ही बसी होती है और शायद दूर रहकर ही वे अपने को सुरक्षित भी महसूस करते हैं। सबकुछ खेल हमारे मनोमस्तिष्क में छवि क्रिऐट किए जाने को लेकर है। आज सरकार के नुमांइदों की नजर में हरेक मुसलमान आतंकी है और हरेक आदिवासी माओवादी। इस तर्क को लेकर उनके लिए अपराधियों की तलाश करने में आसानी होती है। ऐसे में इस समुदाय की ओर से किए गए सार्थक पहल भी अखबारों की सुर्खियां नहीं बटोर पाते। कुछ ऐसा ही हुआ लखनऊ के एक मुसलमान बहुल इलाके में। मुसलमानों ने जल संरक्षण को लेकर एक मुहिम की शुरूआत की है, कहते हैं ना कि किसी नेक काम की शुरूआत घर से होनी चाहिए, कुछ ऐसे ही अंदाज में लखनऊ के ये मुसलमान मस्जिदों में वजू करने के लिए लोटे के इस्तेमाल पर जोर दे रहे हैं। नेक मुसलमान खुदा की बंदगी में दिन में पांच बार नमाज अदा करता है। एक बार वजू करने में नल से करीब पांच लोटा पानी बर्बाद होता है, जबकि लोटे के इस्तेमाल से चार लोटा पानी बचाया जा सकता है। है न एक छोटी, लेकिन सार्थक पहल।
हम रोज शिवालयों में न जाने कई बाल्टियां शिवलिंग पर रोज उड़ेल आते हैं। कुछ इस सोच में कि जितना गंगा जल शिवलिंग पर चढ़ाया जाएगा, भगवान उतने ही प्रसन्न होंगे। ऐसे में अंधविश्वास का दौर चला तो इसी पानी की जगह दूध की नदियां बहाने में भी गुरेज नहीं करते। हो सकता है कि पड़ोस में बच्चा दूध के बिना छटपटा रहा हो, या कोई गरीब भूख से बेबस होकर दम तोड़ दे, लेकिन भगवान को खुश रखना जरूरी है। दुनिया का शायद ही कोई भगवान हो, जो भूखे बच्चे के हिस्से का दूध गटककर भी चैन से रह सके। भद्र समाज की कलियुगी लीलाएं देखकर तो किसी भी नेक इंसान का कलेजा मुंह को आ जाए। सड़क के बीचों-बीच चौराहे पर कई बार पूडिय़ां, चने, लड्डू, खीर के साथ सिंदूर और पता नहीं क्या-क्या पत्तलों पर बिखरे होते हैं। इस भूखे देश में चौराहे पर अनाज बिखेरकर न जाने किस भगवान की पूजा होती होगी। कुछ देर बाद ही उन प्रसादों पर कुत्तेां की फौज टूट पड़ती है। खैर इसी बहाने कुछ सड़कछाप कुत्तों की भूख तो मिट जाती है। लेकिन दुख तब होता है, जब इन्हीं के बीच अधनंगे बच्चे, बच्चियां भी प्रसाद में एक हिस्सा झपट लेने के लिए कुत्तों से संघर्ष करती दिखती हैं। हमारा भद्र समाज इन्हें एक भद्दी सी गाली देकर अपनी राह लेता है-स्स्स्...ाले, खिलाने की औकात नहीं, तो पैदा ही क्यों करते हैं? कोई इनके शहर आने पर ही लानत मलामत करते हुए सात पुश्तों को गाली से नवाजने में भी गुरेज नहीं करता। लेकिन इनमें शायद ही कोई ऐसा बंदा हो, जो किसी बच्चे का हाथ थामकर पास के होटल में ले जाकर एक रोटी ही खिला दे। हालांकि ये अभागे बच्चे आपके लाडले की तरह सोने का चम्मच लेकर नहीं पैदा हुए, लेकिन इनके मां-बाप को भी उतना ही दर्द होता होगा, जितना आप अपने बच्चे की कोई जिद पूरी करने में अपने को असमर्थ महसूस करते होंगे। लेकिन यहां जिद किसी हवाई जहाज या लग्जरी कार को लेकर नहीं होता, बल्कि एक सूखी रोटी के लिए होती है, जिसे सड़क पर बिखरा देखकर रोता हुआ बच्चा कुत्ते से भी झपट लेने के लिए तैयार होता है।
ब्लॉगर के लिए किसी एक विषय पर टिककर रहना बड़ा ही मुश्किल होता है। विचारों का ताना-बाना किसी बंधन को स्वीकार नहीं करता। अब देखिए, बात तो यहां हो रही थी वजू के लिए जल संरक्षण की और निकलते-निकलते अधनंगे बच्चों पर आ गई। क्या आपने गांव या आस-पास कभी सुना है कि पानी के लिए किसी ने पड़ोसी का गला काट दिया हो? आपका जवाब नहीं ही होगा, हालांकि वहां पानी के लिए एक दूसरी तरह की लड़ाई हो सकती है। सवर्णों के कुएं से अछूत मानी जाने वाली बिरादरी को पानी लेने पर रोक हो सकता है या फिर कुछ ऐसी विभत्स हिंसा का रूप देखने को मिल सकता है। लेकिन पानी की कमी को लेकर हिंसा तो कभी नहीं होती होगी। जैसे-जैसे मेट्रो सिटीज बसते गए, गांव का पानी शहरों की तरफ आने लगा, तब भी इन शहरातियों की प्यास नहीं बुझी। भला बुझती कैसे, सरकार ने शहर में पानी पर भी पहरा जो बिठा दिया था। पानी यहां कुओं की जगह बड़े-बड़े मशीनी टैंकरों में जो मिलने लगा था। फिर पानी के लिए लूट होनी ही थी, जिसमें दबंग लोग गरीबों के हक का पानी भी छीनने लगे। हालांकि मध्य वर्ग जो बिसलरी के पानी से ही नहाता था, उसके लिए शहर के हर मॉल, कॉलोनी के कोने वाली दुकान में बोतलबंद पानी उपलब्ध थी। कंपनियां लोगों की जरूरतों को आंकने में अव्वल होती हैं। यहां उनकी कल्पनाशीलता कवियों की रचना से भी तेज होती है। यही कारण है कि कभी रिलांयस को सब्जी के स्टॉल लगाने पड़ते हैं, तो कभी एमएनसीज को बोतलबंद पानी बेचना पड़ता है, तो कभी विदेशों में शुद्ध हवा लेने के लिए ऑक्सीजन बार में जाना पड़ता है। इनका बस चले तो अभी से चांद पर सब्जियां उगाने के लिए उन्नत प्रोद्योगिकी का दावा करने वाले बीज बेचना शुरू कर दें।
देश के राष्टï्रपिता बापू का कथन आज के राजनेताओं और पूंजीपतियों को तो नहीं याद रहा, लेकिन लखनऊ के इन मुसलमान भाईयों ने इसे आजमा कर समाज के सामने एक मिसाल कायम किया है। सचमुच प्रकृति सारे संसार का पेट भरने में समर्थ है, लेकिन कुछ लालची पूंजीपतियों का पेट भरने में नहीं। जल हमें प्रकृति ने एक विरासत के रूप में दिया था, ताकि हम अपने लिए इसका इस्तेमाल करते हुए आगे की पीढ़ी को सौंप सकें। लेकिन हमने प्रकृति के इस संदेश को किसी कोक बनाने वाली कंपनी या किसी बोतलबंद एमएनसी के हाथों एमओयू पर साईन कर उन्हें सौंप दिया। इन भद्र मुसलमान भाइयों का लक्ष्य महीने में सौ मस्जिदों में जाकर इस संदेश को फैलाना है ताकि लोग जल संरक्षण के लिए प्रेरित हो सकें। ऐसे में समाज में एक उम्मीद की किरण नजर आती है कि अभी भी समाज में कुछ लोग हैं, जो प्रकृति के अनमोल धरोहर को आने वाली पीढिय़ों के लिए बचाकर रखने के बारे में सोचते हैं।

सोमवार, 7 जून 2010

सोनिया मैडम को गुस्सा क्यों आता है

चन्दन राय
कांग्रेस की शक्तिपीठ माने जाने वाली सोनिया परिवार एक बार फिर विवादों में है। कांग्रेस के निचले स्तर के नेता गणेश परिक्रमा में लग गए हैं, सोनिया परिवार की मान की खातिर। आखिर क्यों सोनिया पर लिखी कोई किताब, उपन्यास या सिनेमा को प्रतिबंधित करने का प्रयास किया जाता है? क्यों सोनिया नहीं चाहती कि वे भारत की राजनीति के केंद्र में आएं? क्या खतरा महसूस करती हैं वे सत्ता के सांप-सीढ़ी के खेल से? कई ऐसी जानी-अनजानी वजहें हैं, जिसके कारण यह परिवार मुख्यधारा की राजनीति से अलग होकर राजनीति की गंगोत्री ही बने रहना चाहता है। गंगोत्री पर खतरा महसूस होते ही कांग्रेस को ऐसा महसूस होने लगता है कि अब तो हमारी राजनीति की गंगा ही सूखने लगेगी। इसलिए इस पर आए खतरे को टालने के लिए कांग्रेस के दूसरे दर्जे के नेताओं को आगे कर लड़ाई लड़ी जाती है। अब कोई अभिषेक मनु सिंघवी बलिदान हो तो, अपनी बला से। लेकिन कांग्रेस अपने सिपाहसलारों की चारण-वंदना का पुरस्कार भी समय पर मंत्रिमंडल में जगह देकर अदा करती है। शर्त भी सिर्फ एक ही होती है कि वह अपनी निष्ठा इस शक्तिपीठ के प्रति राजनीति से संन्यास लेने तक बनाए रखे। जितनी बड़ी परिक्रमा करने वाला होता है, उसे राजनीति में उतने ही शीर्ष पद से नवाजा जाता है। जिसने भी इस परिवार की छत्रछाया को चुनौती दी, चाहे वे मराठा छत्रप हों या ममता बनर्जी, बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। ये बातें कांग्रेस पार्टी में नेहरू के दौर से ही शुरू हो गई थी, जिस परंपरा को इस पार्टी ने आज तक जीवित रखा है। ताजा विवाद प्रसिद्ध उपन्यासकार डॉमिनिक लापियर के भतीजे जेवियर मोरो के उपन्यास 'एल सारी रोसोÓ यानी 'द रेड सारीÓ को लेकर है। इस उपन्यास को लेकर कांग्रेस के सिपाहसलार यह कयास लगा रहे हैं कि जरूर सोनिया के अनछुए पहलुओं की चर्चा भी इसमें होगी। सोनिया-राजीव के प्रेम-संबंधों से लेकर राजीव की हत्या के बाद वतन वापसी के मुद्दे को भी इस उपन्यास में उठाया गया है।
भारत के प्रबुद्ध वर्ग इस बात से अवगत होंगे कि सोनिया गांधी एक समय अपने बच्चों को लेकर इटली लौट जाना चाहती थीं। कांगे्रस के बुद्धिजीवियों के मान-मनुहार के बाद ही उन्होंने राजनीति में आने का फैसला लिया और देश में एक सशक्त राजनेता बनकर उभरी। कांग्रेस को इस बात का डर सालता रहा है कि सोनिया के कमजोर पहलूओं को जनता के बीच लाने से उनकी सशक्त छवि धूमिल होगी। इसलिए इस उपन्यास का अंग्रेजी संंस्करण भारत में आने से पहले ही वह चाहती है कि इस किताब को प्रतिबंधित कर दिया जाए। कुछ ऐसी ही गुस्ताखी हाल में फिल्म निर्देशक एवं राजनेता प्रकाश झा ने भी की थी। इस हिमाकत की वजह से उनकी फिल्म 'राजनीतिÓ को कड़े सेंसर के दौर से गुजरना पड़ा। कांग्रेस के सहयोगियों की एक कमिटी बना दी गई, जिसने अपनी मर्जी से फिल्म के दृश्यों की कांट-छांट की। आपात काल के दौर में तमाम फिल्म निर्माता-निर्देशकों पर भी इसी तरह का अघोषित सेंसर लागू था। अगर आप कांग्रेस की विचारधारा से सहमत हैं, तो फिल्म बेरोकटोक 'केवल व्यस्कों के लिएÓ होते हुए भी 'यूÓ सर्टिफिकेट से मुक्त। अगर आपने कांग्रेस के विचारों से अलग लाईन लेने की कोशिश की तो फिर आपकी खैर नहीं। सरकार का दिखाई नहीं देनेवाला डंडा इन निर्देशकों को हमेशा लाईन पर रखता था। कुछ ऐसा ही डर फिल्मकार जो राइट की रातों की नींद हराम किए है जिन्होंने लेडी माउंटबेटेन और नेहरू के संबंधों को लेकर इंडियन समर नाम से फिल्म बनाने की तैयारी कर ली थी। जिस डर ने उनकी नींद छीन ली थी, वही हुआ।
हमेशा सत्ताधारी पार्टियों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से अपने अस्तित्व पर खतरा महसूस किया है। ये राजनीतिक हमले पहले दबे-छुपे रूप में होते थे, अब खुलकर होने लगे हैं। राजनेताओं का छद्म आवरण इन दिनों जनता के आगे उतर चुका है। चाहे जसवंत सिंह की किताब को लेकर संघ परिवार में मचा तूफान हो या फिर कभी भाजपा अध्यक्ष रह चुके आडवानी के जिन्ना को लेकर पाकिस्तान की सरजमीं पर दिया गया बयान। राजनेताओं में 'सच का सामनाÓ करने की लोकतांत्रिक आदत इस देश का जाग्रृत समाज विकसित नहीं कर पाया है। यहां एक तरफ तो महामहिम होते हैं, तो दूसरी तरफ भूखी-नंगी जनता। एक तरफ सत्ता की नजदीकियों का मजा लेते पूंजीपति वर्ग हैं, तो दूसरी तरफ अपने हक के लिए सड़क पर उतरे किसान, मजदूर, आदिवासी । हम सशस्त्र नक्सली संघर्ष की हिमायत करने वाली अरुंधति राय की अभिव्यक्ति की आजादी के तर्क पर समर्थन करते हैं, तो वहीं स्पेनिश लेखक मूर के सोनिया गांधी के जीवन पर आधारित उपन्यास पर लाल-पीले हो जाते हैं। प्रकाश झा की 'राजनीतिÓ पर झल्लाने लगते हैं। क्यों? आखिर यह दोहरे मानदंड क्यों? अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही कसौटी है, तो अरुंधति और मूर में अंतर कैसे किया जा सकता है? हम मानते हैं कि अरुंधति के बयान से सुरक्षा बलों से लेकर देश का वह बड़ा तबका भी आहत हुआ, जो नक्सली हिंसा से ग्रस्त है। लेकिन फिर भी हमने बोलने-लिखने की आजादी के मूलभूत सिद्धांत का सम्मान किया। लेकिन मूर को तो कांग्रेस ने कानूनी नोटिस थमा दिया। जबकि मूर यह कह चुके हैं कि उनकी यह कृति सोनिया गांधी की जीवनी नहीं है,महज एक उपन्यास है। इस नाते उपन्यास में जिस कल्पनाशीलता के लिए अवकाश रहता है, वह यहां भी रहना चाहिए। एक बात और मूर ने इस पुस्तक की पांडुलिपि सोनिया की बहन के जरिए प्रकाशन से पूर्व सोनिया गांधी तक भिजवाई थी- इस अपेक्षा से कि अगर कुछ कहना हो तो कहें। लेकिन तब गांधी परिवार की ओर से कोई आपत्ति नहीं जताई गई थी।
क्या कारण है कि अरूंधति राय और महाश्वेता देवी जैसे लोगों को सशस्त्र क्रांति की वकालत करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इस सवाल में ही व्यवस्था के सारे दुख-दर्द का हल छुपा है। हम कह सकते हैं कि गांधीवादी तरीकों से विमुख होते समाज की पीठ सहलाने को सरकार ही उन्हें मजबूर करती है। लेकिन देश के तमाम बुद्धिजीवियों की मांग ठुकराते हुए हमारे गृहमंत्री माओवादियों पर किसी तरह का बहस नहीं चाहते। चाहेंगे भी क्यों, फिर तो विकास का मुद्दा आएगा, आदिवासियों को 'जल, जंगल, जमीनÓ से बेदखल करने की बात सामने आएगी, देशी-विदेशी कंपनियों को जंगल के खनिज संपदाओं के दोहन के लिए अवैध तरीके से एमओयू का मामला भी उठेगा, वनरक्षकों एवं स्थानीय पुलिस की आदिवासी महिलाओं पर अत्याचार की बातें सामने आएगी। सरकार बेवजह एक चर्चा को तूल देकर क्यों 'आ बैल मुझे मारÓ का खतरा घर बैठे मोल लेगी।
कई राज्य सरकारों का ध्येय तो 'माओवादी, माओवादीÓ चिल्लाकर ही केंद्र से पैसा ऐंठना होता है। नक्सलियों की खबरों को प्रमुखता दी जाती है, वहीं गुपचुप तरीके से जंगल में 'आपरेशन ग्रीन हंटÓ के नाम पर आदिवासियों को निशाना बनाया जाता है। कितने माओवादी मरते हैं और कितने आदिवासी, इसका आंकड़ा तो सरकार की फाइलों में भी नहीं दर्ज होता होगा। मरते तो आदिवासी ही हैं, नक्सलियों के साथ न जाओ, तो नक्सली मारते हैं, सलवा जुड़ुूम का साथ दो, तब भी उनकी बंदूकें तनी होती हैं और बाकि कोर-कसर वनरक्षक, स्थानीय पुलिस और आपरेशन ग्रीन हंट चलाने वाले पूरा करते हैं। सरकार को यह सोचना होगा कि आदिवासी डर कर नक्सलियों का समर्थन करते हैं या विकास की धारा वहां तक नहीं पहुंचने के कारण। उनका तो सरकार से एक ही आग्रह हैै कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाए। जंगलों में रहना उनके लिए वैसा ही है जैसे किसी जंगली जानवर को जंगल की सरहदें से बाहर निकालकर शहर में बसाना। उन्हें घर से उजाड़ेंगे, तब वे किसी का भी दामन थामने को तैयार होंगे, चाहे वे नक्सली हों या मिशनरी या फिर कोई संघी। शहरों में कई ऐसे लोग मिल जाएंगे जो आदिवासियों की कल्पना नंगे रहने वाले, मुंह से जंगली आवाज निकालने वाले, नरबलि देने वाले, अजीब से देवता की पूजा करने वाले समुदाय के रूप में ही करते हैं। ह्वïाईट मैन बर्डेन की तरह नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर तबके के साथ खड़े होने का साहस आज हमें दिखाना होगा और गांधी के अंतिम आदमी की तरह उसका हाथ थामकर चलना होगा। तभी माओवादियों के लाल गलियारे पर शांति के फूल बिखेरे जा सकते हैं। मुख्यधारा की पार्टियों को भी जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को महत्व देना होगा ताकि लोकतंत्र का नवजात पौधा इस देश की मिट्टी में जड़ पकड़ सके और हम गर्व से कहें कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हैं।

बुधवार, 2 जून 2010

बोल की लब आजाद हैं तेरे

गालिब का सीने का नासूर साहित्यकारों की वही पीडा है जो मौन में उन्हें व्यक्त करने को कचोटती है-वह इश्क पर लिखी कोई रचना हो सकती है, या मजदूरों के वेदना पर या फिर मानवता पर लिखी कोई रचना। प्रसिध्द रचनाकारों से जब आज के लोग प्रश्न करते हैं कि बहुत दिनों से आपकी कोई रचना नहीं आई, तब वे हंसकर मौन रह जाते हैं। रचना के लिए तो समाज के सरोकारों से जुडना होता है, गरीब, मजलूम की पीडा को खुद पर झेलनी होती है, तब जाकर कोई फैज आकार लेता है
ये चाहे तो दुनिया को अपना बना लें
ये आकाओं की हड्डियां तक चबा लें
कोई इनको अह्सासे जिल्लत दिला दे
कोई इनकी सोई हुई दुम हिला दे
फैज साहब की शायरी में गरीब मजलूमों की भूख तो मौजूद है ही, लेकिन इसमें क्रांति की आवाज को भी साफ महसूस किया जा सकता है। ये उम्मीद उनकी हर शायरी में बरकरार है कि हालात बदलेंगे जरूर। एक दिन जब ये जागेंगे, तो दुनिया का नक्शा ही कुछ और होगा। कहते हैं कि जब स्वयं साहित्य और समाज दोनों मिलकर अनंतकाल तक तपस्या करते हैं, तब जाकर कोई फैज जन्म लेता है, जो दुनिया को अपने नक्शे-कदम पर झूमने को मजबूर कर देता है।
रचनाकारों की जिंदगी में एक समय ऐसा भी आता है जब वो उकता कर कहता है-यार, अब बहुत हो चुकी शेरो-शायरी। फैज अपने पहले कविता-संग्रह 'नक्शे फरियादी' में भी कुछ ऐसी ही बातें कहते हैं- शेर लिखना जुर्म न सही लेकिन बेवजह शेर लिखते रहना ऐसी अक्लमंदी भी नहीं है। गालिब भी दिल में छिपे दर्द को कुछ यूं बयान करते हैं जब से मेरे सीने का नासूर बंद हो गया है, मैंने शेर कहना छोड दिया है।
गालिब का सीने का नासूर साहित्यकारों की वही पीडा है जो मौन में उन्हें व्यक्त करने को कचोटती है-वह इश्क पर लिखी कोई रचना हो सकती है, या मजदूरों के वेदना पर या फिर मानवता पर लिखी कोई रचना। प्रसिध्द रचनाकारों से जब आज के लोग प्रश्न करते हैं कि बहुत दिनों से आपकी कोई रचना नहीं आई, तब वे हंसकर मौन रह जाते हैं। रचना के लिए तो समाज के सरोकारों से जुडना होता है, गरीब, मजलूम की पीडा को खुद पर झेलनी होती है, तब जाकर कोई फैज आकार लेता है। तभी तो वे कहते हैं-'ऐसी सूरते-हालात पैदा होने से पहले ही जौक और मसलहत का तकाजा यही है कि शायर को जो कुछ कहना हो कह ले, अहले-महफिल का शुक्रिया अदा करे और इजाजत चाहे।'
इन दमकते हुए शहरों की फरावां
मखलूक (विशाल जनता)
क्यों फकत मरने की हसरत में जिया
करती है
ये हसीं खेत फटा पड़ता है जोबन जिनका
किसलिए इन में फकत भूक उगा करती है,
जिसने भी अपनी रचनाओं के केंद्र में इस विषय को रखा, उसे जमाने ने महफिल से उठने नहीं दिया। इन्हीं साधारण प्रश्नों की तलाश ने उन्हें अहले-महफिल का शुक्रिया अदा करके उठ जाने से रोका।
प्रेम जो संसार के ताने-बाने को जोडता है पर फैज ने बेबाक होकर लिखा। कई अर्सों तक वे गली-कूचों के मजनुंओं के पसंदीदा शायर बने रहे। आज के इंटरनेटी प्रेमी भी अपने प्रेम का इजहार कुछ यूं ही करते दिखते हैं-
रात यूं दिल में तेरी खोई हुई याद आई
जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए
जैसे सहराओं में हौले से चले बादे-नसीम
जैसे बीमार को बेवजह करार आ जाए।
इसी तरह अयूब शाही के दिनों में लिखी उनकी एक मशहूर नम है- ''निसार मैं तेरी गलियों के ए वतन कि जहां। चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले। जो काई चाहनेवाला तवाफ को निकले। नजर चुरा के चले जामा ओ जां बचा के चले।'' फैज साहब ता-उम्र दुश्वारियों से जूझते रहे बावजूद फैज साहब ने कभी हालात से समझौता नहीं किया।
उस दौर में जब फैज साहब का लिखा शेर जैसे ही बाजार में आता तो पाकिस्तान की हुकूमत हिलने लगती थी। उनकी शायरी की दबाने के लिए पाकिस्तान सरकार ने उन्हें नजर बंद भी किया। मगर जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि की आवाज को क्या किसी जमाने में शासक वर्ग दबा सका है।....दरअसल फैज में जो क्रांति है उसे उन्होंने एक इश्किया जामा पहना दिया है।
कुछ परंपराएं, चाहे वे साहित्य की हों, संस्कृति की हों या अन्य सामाजिक क्षेत्रों की, अपनी एतिहासिक भूमिका निभाने के बाद अपनी मौत आप मर जाती हैं। उन्हें नए सिरे से जिलाने का मतलब गड़े मुर्दे उखाड़ना और ऐतिहासिक विकास से अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना है। लेकिन फैज की रचनाएं दोनों युगों के संधिकाल पर ही नहीं खडी हैं बल्कि आज के रचनाकारों को रास्ता भी दिखाती हैं। आज का शायद ही कोई मशहूर शायर हो जो फैज की छाया से बाहर निकलने का साहस दिखा सके। उनके किसी शेर उनका नाम पढ़े बिना हम बता सकते हैं कि यह 'फैज' का शेर है। उर्दू के एक बुजुर्ग शायर 'असर' लखनवी ने शायद बिलकुल ठीक लिखा है कि '' 'फै ज' की शायरी तरक्की के मदारिज (दर्जे' तय करके अब इस नुक्ता-ए-उरूज (शिखर-बिन्दु) पर पहुंच गई है, जिस तक शायद ही किसी दूसरे तरक्की-पसंद (प्रगतिशील) शायर की रसाई हुई हो। तखय्युल (कल्पना) ने सनाअत (शिल्प) के जौहर दिखाए हैं और मासूम जज्बात को हसीन पैकर (आकार) बख्शा है। ऐसा मालूम होता है कि परियों का एक गौल (झुण्ड) एक तिलिस्मी फजा (जादुई वातावरण) में इस तरह मस्ते-परवाज (उड़ने में मस्त) है कि एक पर एक की छूत पड़ रही है और कौसे-कुजह (इन्द्रधनुष) के अक्कास (प्रतिरूपक) बादलों से सबरंगी बारिश हो रही है......................।''
अपनी शायरी की तरह अपने व्यक्तिगत जीवन में भी किसी ने उन्हें ऊंचा बोलते नहीं सुना। बातचीत के अतिरिक्त मुशायरों में भी वह इस तरह अपने शेर पढ़ते हैं जैसे उनके होंठों से यदि एक जरा ऊंची आवाज निकल गई तो न जाने कितने मोती चकनाचूर हो जाएंगे। वे सेना में कर्नल रहे, जहां किसी नर्मदिल अधिकारी की गुंजाइश नहीं होती। कॉलेज की प्रोफेसरी की, जहां कॉलेज के लड़के प्रोफेसर तक को अपना स्वभाव बदलने पर विवश कर दें। उन्होंने पत्रकारिता जैसा जोखिम का पेशा भी अपनाया और फिर जब पाकिस्तान सरकार ने इस देवता-स्वरूप व्यक्ति पर हिंसात्मक विद्रोह का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया तब भी मेजर मोहम्मद इसहाक ('फैज' के जेल के साथी) के कथनानुसार, ''कहीं पास-पड़ोस में तू-तू मैं-मैं हो, दोस्तों में तल्ख-कलामी हो, या यूं ही किसी ने त्योरी चढ़ा रखी हो, उनकी तबीयत जरूर खराब हो जाती थी और इसके साथ ही शायरी की कैफियत (मूड) भी काफूर हो जाती थी।''
फैज जिंदादिल इंसान हैं, उन्होंने ता-उम्र क्रांति की मशाल को हाथ में थामे रखा। हालांकि क्रांतितो सफल नहीं हुई। ऐसे में जो क्रांतिकारी कवि हैं वे निराश होकर बैठ जाते हैं। कई तो आत्महत्या कर लेते हैं और कई जमाने को गालियां देते हैं।
लेकिन फैज वैसे नहीं हैं। वे कहते हैं कि अभी फख्र करो कि तुममें जान बची है
बोल कि लब आजाद हैं तेरे
बोल जबां अब तक तेरी है
तेरा सुतवां जिस्म है तेरा
बोल कि जां अब तक तेरी है
उनका एक शेर है- ''करो कुज जबी पे सर-ए-कफन, मेरे कातिलों को गुमां न हो। कि गुरूर इश्क का बांकपन, पसेमर्ग हमने भुला दिया।'' अर्थात कफन में लिपटे हुए मेरे शरीर के माथे पर टोपी थोड़ी तिरछी कर दो, इसलिए कि मेरी हत्या करनेवालों का यह भरम नहीं होना चाहिए कि मरने के बाद मुझ में प्रेम के स्वाभिमान का बांकपन नहीं रह गया है। ऐसे थे हरदिल अजीज शायर फैज अहमद फैज।

यह है सस्ते इलाज का रास्ता

अस्पतालों को महंगी दवाओं के खरीदने पर मिलता है मोटा कमीशन। अस्पताल ही क्यों, डॉक्टरों को भी महंगी दवाएं ही सुहाती हैं, क्योंकि उन्हीं से उनके घर-परिवार की आर्थिक सेहत सुधरती है। सरकार का फरमान जारी करना एक अलग बात है, लेकिन यह देखना होगा कि कितने डॉक्टर अपने कमीशन की कीमत पर गरीब ननकू के लिए सस्ती दवा लिखने को तैयार होंगे?
भारतीय दवा कंपनियां मजबूती से उदारीकरण की आंधी में पैर जमा सकें, इसके लिए जरूरी है कि सरकारी अस्पतालों में जेनेरिक दवाओं की खरीद को शह दी जाए। भारतीय कंपनियां किफायती कीमतों पर दवाएं बेचती हैं जो काफी सक्षम और सुरक्षित मानी जाती हैं
पि छले दिनों चंडीगढ़ में आयरन की गोलियां खाकर बीमार हुए बच्चों ने सरकार की नींद उड़ा दी। इन बच्चों को जो दवाएं दी गई थीं, वे एक्सपायरी डेट की थी। रायपुर की दवा फैक्ट्रियों में धांधली की जांच के दौरान अजीबोगरीब गोलमाल उजागर हुआ। इन फैक्ट्रियों में एक्सपायरी डेट दवाओं की तारीख पेन से बढ़ाकर बाजार में बेचने की तैयारी थी। ऐसा लगता है कि भारतीय बाजार में एक्सपायरी और नकली दवाओं के कारोबार ने जड बना लिया है। इस घटना से सरकारी अस्पतालों की दवा खरीद नीति फिर से विवादों में आ गई है। करोड़ों रुपए की हर साल खरीदी जाने वाली दवाएं जो सरकारी अस्पतालों के जरिए निशुल्क दी जाती हैं , को लेकर हमारे देश में कोई एक नीति नहीं है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलामनबी आजाद ने देर से ही सही लेकिन सरकारी अस्पतालों और केंद्रीय स्वास्थ्य योजनाओं में ऐसी दवाओं को खरीदने पर जोर दिया है, जो पेटेंट मुक्त हों। यह गरीब भारत के स्वास्थ्य बाजार के लिए एक सही कदम होगा। भारत जैसे विकासशील देश में जहां दवा की कीमत बेहद मायने रखती है वहां इसको लेकर चिंता उठना जायज है। एनएसओ के सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में इलाज के कुल खर्च में 79 फीसदी लागत दवाओं की होती है। ऐसे में अगर दवाओं की वैकल्पिक आपूर्ति बंद हो जाती है तो कम इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतें भी आसमान छूने लगेंगी।
अगर पंजाब की ही बात करें तो यहां बड़े स्तर पर दवाओं की खरीद पंजाब हेल्थ सिस्टम कार्पोरेशन करता है वहीं सीएमओ भी लोकल कंपनियों से दवा खरीदते हैं।
मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल चाहते हैं कि दवा केवल स्टैंडर्ड कंपनियों की खरीदी जाएं । लेकिन ये लोकल कंपनियों की अपेक्षा महंगी हैं इसलिए महंगी दवा खरीदने के लिए सरकार के पास बजट की कमी है। विभाग ने स्टेंडर्ड ऊंचा करने के लिए केवल उसी कंपनी से दवा खरीदने की नई शर्त लगा दी है जिसकी टर्न ओवर 15 करोड़ है। हरियाणा ने यही शर्त 35 करोड़ की रख दी है। अभी तक पांच करोड़ रुपए की टर्नओवर वाली कंपनियां ही दवा सप्लाई कर सकती थीं। इस शर्त के चलते अधिकांश छोटी कंपनियां सरकारी अस्पतालों को दवा बेचने की दौड़ से बाहर हो गई हैं। अब एक और दवा से जुडी ख़बर पर नजर डाल लेते हैं। अमेरिकी फार्मा कंपनी एबॉट ने भारत की पिरामल हेल्थकेयर के दवा कारोबार को 3.72 अरब डॉलर यानी करीब साढ़े सत्रह हजार करोड़ रुपए में खरीदा है। अधिग्रहण से जहां विदेशी कंपनियों को विकसित देशों के महज 2-3 फीसदी सालाना बढ़त वाले फार्मा सेक्टर के मुकाबले 14-20 फीसदी बढ़ोतरी की संभावना वाला विशाल भारतीय बाजार मिलता है, वहीं देसी कंपनियां इसके बदले भारी-भरकम पूंजी हासिल करती हैं।
कहीं न कहीं सरकार की नीतियों से यह लग रहा था कि राज्य सरकार बडे दवा कंपनियों की दवाओं को ही गुणवत्तापूर्ण मान रही है। इसलिए छोटे एवं मंझोले स्तर के दवा कंपनियों पर दबाव था कि वे अपनी क्वालिटी को सुधारें। जेनरिक दवाओं के मामले में भारतीय दवा कंपनियों को आर-एंड-डी पर भारी निवेश करने की जरूरत है और उनके बेहतर नतीजों के लिए 10 से 15 साल तक इंतजार करना होगा। इससे उनके प्रतिस्पर्धा में बुरी तरह पिछड़ने का खतरा है, बल्कि उनके पास इसके लिए पूंजी भी नहीं है। दूसरे, उन्हें उन पेटेंट कानूनों और क्वॉलिटी कंट्रोल की उन कड़ी शर्तों का पालन करने के लिए तैयार होना होगा जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियां उन्हें कड़ी टक्कर दे सकती हैं। इस सौदे के साथ 55 हजार करोड़ रुपए के भारतीय दवा बाजार में एबॉट की हिस्सेदारी सात फीसदी हो गई है। इससे उसे भारत की सबसे बड़ी दवा कंपनी बनने का अवसर मिल गया है। दो वर्षों में किसी भारतीय दवा कंपनी के कारोबार का बहुराष्ट्रीय कंपनी के हाथों बिकने का यह दूसरा मामला है। 2008 में जापानी कंपनी दायची ने भारतीय कंपनी रेनबैक्सी का अधिग्रहण किया था। दवाओं के सरकारी खरीद की बात करें तो यह कहा जा सकता है कि महंगे इलाज के दंश से इस गरीब मुल्क को निजात दिलाने के लिए इस पहल को स्वागतयोग्य कहा जा सकता है। बाजार में विदेशी दवा कंपनियों की दवाएं जहां पांच सौ रुपए में मिलती है, वहीं जेनेरिक दवाओं पर खर्चा सौ रुपए के आस-पास ही होता है। अगर सरकारी अस्पतालों में ऐसी दवाओं के खरीद पर जोर दिया जाता है, तो इससे भारतीय दवा कंपनियों को भी एक सहारा मिलेगा ताकि वे विदेशी कंपनियों के एकाधिकार की चुनौती को समय रहते स्वीकार कर सकें। यहां विदेशी कंपनियों द्वारा देशी दवा कंपनियों के अधिग्रहण का कारण भी सरकार की नीतियों को ही जाता है, जो कहीं न कहीं महंगी दवाओं को ही गुणवत्तापूर्ण मानकर सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध करा रही थी। डॉक्टर भी दवा कंपनियों से मिल रही सुविधाओं का उपभोग करते हुए गरीब लोगों की पर्चियों पर महंगी दवाएं ही लिख रहे थे। आखिर दवा कंपनियों को प्रतिस्पध्र्दा में बने रहने के लिए दवा के मार्केटिंग की भी जरूरत थी, ताकि जेनेरिक दवाओं को मात दिया जा सके। लेकिन दवा खरीद का जो भारत में सुस्थापित नेक्सस है, वो सरकार की इस नीति को पलीता लगा सकता है। क्योंकि अस्पतालों को महंगी दवाओं के खरीदने पर मिलता है मोटा कमीशन। अस्पताल ही क्यों, डॉक्टरों को भी महंगी दवाएं ही सुहाती हैं, क्योंकि उन्हीं से उनके घर-परिवार की आर्थिक सेहत सुधरती है। सरकार का फरमान जारी करना एक अलग बात है, लेकिन यह देखना होगा कि कितने डॉक्टर अपने कमीशन की कीमत पर गरीब ननकू के लिए सस्ती दवा लिखने को तैयार होंगे?
भारतीय दवा कंपनियां मजबूती से उदारीकरण की आंधी में पैर जमा सकें, इसके लिए जरूरी है कि सरकारी अस्पतालों में जेनेरिक दवाओं की खरीद को शह दिया जाए। भारतीय कंपनियां किफायती कीमतों पर दवाएं बेचती हैं जो काफी सक्षम और सुरक्षित मानी जाती हैं जबकि वैश्विक दवा कंपनियां 'नई' के नाम पर महंगी दवाएं बेचने के लिए जानी जाती हैं। एक छोटा सा उदाहरण ही पूरी विदेशी दवा कंपनियों की हकीकत को बयान करता है। ऑट्रिविन नाम की नाक में डालने वाली दवाई एक वक्त 5 रुपए में मिलती थी और अब वैश्विक दिग्गज उसके ही स्प्रे को 45 रुपए में बेच रही हैं। ऐसे में किफायत को लेकर लोगों की चिंताएं समझी जा सकती हैं। भारतीय जेनेरिक उद्योग के अस्तित्व का सवाल बहुत बड़ा है। इस तरह की अफवाहें भी तैर रही हैं कि अब बिकने की किसकी बारी है। वैश्विक दवा कंपनियां की परंपरागत बाजार में संभावनाएं सीमित हैं और उन पर कीमतें घटाने के दबाव के साथ-साथ नियामक की सख्ती भी झेलनी पड़ रही है। ये मजबूरियां वैश्विक दवा दिग्गजों को अपनी सीमाओं से बाहर दूसरे बाजारों में विस्तार करने को विवश कर रही हैं। भारत किसी भी लिहाज से बेहद आकर्षक बाजार है। इसका ही नतीजा है कि भीमकाय विदेशी दवा कंपनियां भारत में दवा कंपनियों को खरीदने के लिए उम्मीद से भी यादा कीमत चुकाने को तैयार हैं।
विदेशों में दवा कंपनियों का मानना है कि वे नई दवाओं की खोज के लिए पर्याप्त राशि खर्च करती हैं और भारतीय कंपनियां इनकी मेहनत को चुराकर सस्ते में बाजार में दवाएं उतार देती हैं। इसके कारण दवा तो सस्ती मिलती है, लेकिन इसका खामियाजा विदेशी दवा कंपनियों को भुगतना पडता है। भारत सरकार को भी इस बात का ध्यान रखना होगा कि सस्ती दवाओं के चक्कर में कहीं नकली और एक्सपाइरी दवाएं ही सरकारी अस्पतालों में न मिलने लगें, जैसा कि हरियाणा और छत्तीसगढ में देखने को मिला। भारत में नकली दवाओं का बडा बाजार है और अगर इनकी घुसपैठ इन सरकारी अस्पतालों तक हुई, तो यह भारत की गरीब जनता के साथ खिलवाड होगा। ये अपनी दवाएं चलाने के लिए दवा खरीदी में दलाली के लिए एक बडी रकम भी देने को तैयार होंगी। भारत में कुछ दिनों पहले पोलियो ड्रॉप पीने से भी कुछ बच्चों के बीमार पडने की खबर काफी चर्चा में रही थी। सरकार अगर गरीब जनता का ख्याल करते हुए सस्ती दवाएं सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध कराना चाहती है, एक अच्छी पहल तो है, लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि दवाएं लोगों को मिले भी। डॉक्टरों और दवा कंपनियों के सांठ-गांठ को कमजोर करने के लिए भी सरकार को कदम उठाना चाहिए ताकि गरीबों को इलाज के लिए महंगी दवाओं का डोज न लेना पडे।

सरकारी बाबू समझो इशारे...

चन्दन राय
सरकारी बाबुओं और नेताओं में एक बात पर स्पष्ट मतैक्य है॥ आजादी के बाद वाले दौर से ही दोनों में इस बात की होड लगी है कि कौन भ्रष्टाचार में एक-दूसरे को पछाडता है। सरकारी बाबुओं को इस बात का अफसोस है कि आमतौर पर नेता उनसे बाजी मार ले जाते हैं। जैसे नेताओं में कई वर्ग होते हैं-छुटभैये नेता, प्रदेश और जिला स्तर के नेता या राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नेता, उसी तरह सरकारी बाबुओ में भी चपरासी से लेकर आईएएस लॉबी तक के कई लोग होते हैं। लोगों के हैसियत के हिसाब से रेट तय होता है। आम लोग भी इस बात को समझते हैं कि चपरासी है तो कुछेक हजार में काम निकल सकता है, ऊपर का अधिकारी हो तो फिर बात लाखों, करोडों तक भी जा सकती है। शायद ही कोई ऐसा हो, जिनका साबका सरकारी बाबुओं की इस बिरादरी से न पडा हो। एक बार जो इनके चंगुल में फंसा, जिंदगी भर के लिए इनसे तौबा कर लेता है। इनकी फितरत ही कुछ ऐसी होती है। चाहे राशन कार्ड बनवाना हो, ड्राइविंग लाइसेंस का रिन्यूवल करवाना हो, पासपोर्ट बनवाना हो या फिर कुछ और लालफीताशाही के फीतों में उलझकर बडों-बडों की सांसें दम तोड देती हैं। कहते हैं ऊपर से लेकर नीचे तक के बाबुओं का रेट बंधा होता है। बडा बाबू तक जाने के लिए छोटे बाबू को चढावा दिया जाता है। हालांकि सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार से देश के नेता तो नहीं उकताए, लेकिन न्यायपालिका जरूर सख्त हो गई। अभी मुंबई हाईकोर्ट ने सरकारी बाबुओं को भ्रष्टाचार के आरोप में पकडे ज़ाने पर आजीवन कारावास की सजा तजवीज की है। अपना घर साफ करते-करते न्यायपालिका को ऐसा लगा कि आस-पास के कूडों की भी सफाई होनी लाजिमी है। नहीं तो यह संक्रामक रोग फिर न्याय के मंदिर को भीतर से खोखला कर देगा। खैर यहां की व्यवस्था से हमारे मुख्य न्यायाधीश निपटें, हमारी चिंता तो लोकतंत्र के रहनुमाओं के स्थायी अधिकारियों से है। अभी मध्यप्रदेश के आईएएस लॉबी के यहां छापे के दौरान सीबीआई इस गुत्थी को सुलझाने में लगी रही कि यह पैसा तिरूपति के मंदिरों के चढावे से कितना गुना ज्यादा है। केतन देसाई के घर सीबीआई छापे के दौरान तो ऐसा लगता था मानो इनकी दिलचस्पी डॉक्टरी से ज्यादा सोना जमा करने में रही हो। एक बात तो तय है कि अगर यह सोना चंद्रशेखर सरकार के समय में होता, तो हमें अपने देश की इज्जत विदेशी बैंकों में गिरवी नहीं रखनी होती। ऐसे अफसरों के यहां कुछेक करोड पाया जाना तो आम बात है। फिर चल-अचल संपत्ति, बैंक लॉकर में जमा की गई रकम, मॉरिशस के रास्ते देश में भेजा गया टैक्स रहित पैसा, विदेशों में आलीशान कोठियां, अनगिनत हवाई यात्राएं, रिश्तेदारों के नाम संपत्ति, स्विस बैंक में काला धन और न जाने क्या-क्या? फिर ये वर्ग आम जनता को कैटल क्लास समझता भी है तो इसपर सदन में इतना हल्ला-हंगामा क्यों? सचमुच वे कीडों की तरह ही तो जी रहे हैं, विश्वास न हो तो धूल खा रही अर्जुन सेनगुप्ता की रिपोर्ट पर ही नजर दौडा लें। जब तक जीने लायक रहे जीया, नहीं तो मरने के लिए किसानों के पास कीटनाशक तो होता ही है।
मुंबई हाईकोर्ट के सब्र का बांध तभी टूटा, जब आत्महत्या करने के कगार पर खडे क़िसानों की जमाराशि को भी ये सरकारी बाबू ले उडे। ऌन प्रदेशों में तो ऐसा लग रहा है मानो आत्महत्या करने के लिए देश भर के गरीब किसान आंध्रप्रदेश, विदर्भ, बुंदेलखंड में इकट्ठे हो रहे हों। हो सकता है सरकार को इसमें विपक्षी साजिश की भी बू आती हो। हुआ यूं कि विदर्भ के गरीब किसानों का 1.30 करोड क़ा फंड एक को-ऑपरेटिव बैंक में कमिश्नर ने यह जानते हुए जमा करवाया कि एक महीने के बाद यह बैंक बंद हो जाएगा। सरकारी अफसरों की सांठ-गांठ से इन गरीबों के पैसे का हेर-फेर किया गया। इसी मामले में संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने सरकारी बाबुओं को भ्रष्टाचार के मामले में उम्रकैद दिए जाने की सलाह दी। वर्तमान नियम के तहत सिर्फ सात साल की सजा का प्रावधान है, जो कि इसे रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। उम्मीद है कि उम्रकैद का डर सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार को कुछ हद तक नियंत्रित करेगा। हालांकि कानून बनने से पहले ही सरकारी बाबू उसकी काट निकाल लेने में माहिर होते हैं। आजादी के बाद सूचना का अधिकार पहला ऐसा कानून था, जिसने इन बाबुओं की नींद हराम कर दी थी। सरकारी बाबुओं को यह बात हजम नहीं हुई कि जो तबका काम करवाने के लिए उनके आगे हाथ-पैर जोडक़र खडा रहता था, एकाएक साधिकार, गर्दन ऊंची करके उनसे बात कर रहा है। अभी भी आम आदमी के इस अधिकार पर बाबुओं की टेढी नजर है कि कैसे इस कानून को पटखनी दी जाए? अब तो सरकारी बाबुओं का मामला भी हाईटेक हो गया है। वो जमाना कल की बात हो चुकी जब सारा लेन-देन टेबल के नीचे होता था। मीडिया के स्टिंग ने सरकारी बाबुओं को काफी दंश दिया है।
अब राशन, पासपोर्ट दफ्तरों के बाहर ही सरकारी बाबुओं ने दलालों का जाल फैला रखा है। जो मोटी रकम लेने के बाद आपके काम हो जाने की गारंटी देता है, उसका एक अंश ऊपर से नीचे तक के बाबुओं में बंटता है। यही कारण है कि कमाऊ थानों के लिए थानेदार एक मोटी रकम चुकाते हैं, जिससे भ्रष्टाचार रूपी गंगा सतत प्रवाहित होती रहे। सरकार जब अपने मातहतों के बारे में यह जानने की जहमत नहीं उठाती कि मामूली तनख्वाह की बदौलत कैसे कोई नेता कुछ दिनों में ही करोडपति, अरबपति और न जाने कितने पति बन जाते हैं, तो भला सरकारी बाबुओं की लगाम कौन थामे? लूट के मामले में लोकतंत्र के हर कोने में मौन सहमति है। लूट नीति मंथन करी-लोकतंत्र में इस मंत्र का पाठ करके ही आप इस व्यवस्था का हिस्सा बन सकते हैं। बिहार में बाढ आने पर गंदे पानी में पलनेवाले जाेंक भी हर साल आ जाते हैं। बाढ में अपना घर-बार गंवा चुके लोगों को इस जोंक की भी ज्यादा चिंता नहीं होती। ये तो उस सरकारी जोंक से परेशान होते हैं, जिनके लिए बाढ, सुखाड या महामारी इनके खून चूसने का बेहतर मौसम होता है।
भारत में कई ऐसे देश हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था ही भारत जैसे भ्रष्ट देशों से आए काले पैसों पर चलती है। स्विटजरलैंड हो या मॉरीशस-ये देश अपने यहां के बैंकों में काले या सफेद पैसों को नहीं देखते। इन पैसों पर ही तो इनकी अर्थव्यवस्था का मजबूत ढांचा खडा होता है। मॉरीशस जैसे देशों में कंपनियां रजिस्टर्ड करवाने के बाद भारत में निवेश किया जाता है ताकि टैक्स से राहत मिल सके। क्या सरकार को इस बात की जानकारी नहीं-सोचना हमारी नादानी होगी। फिर सरकार के हाथ किन लोगों ने कार्रवाई करने से रोक रखे हैं-यह जानना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। यहीं से लोकतंत्र के ढोंग का पोल खुलेगा, जब अफसरशाह और राजनेता सभी इस खेल में नंगे, बेपर्दा होकर आम जनता के सामने लाए जाएंगे। आज भारत की तस्वीर ही दूसरी होती, यदि आजादी के बाद नेहरू ने आम जनता से किया अपना वादा निभाया होता। भ्रष्टाचारी बाबुओं और नेताओं को नजदीक के बिजली के पोल पर लटकाने की नेहरू की धमकी जीप घोटाले में फंसे अपने साथियों को देखकर मौन रह गई। यह देश के साथ पहला ऐसा धोखा था, जिसने भ्रष्टाचार के राक्षस को आज तक खाद-पानी देकर जीवित रखा है। आम लोगों में यह जुमला काफी प्रचलित है कि ऊंट किस करवट बैठेगा, जानना उतना ही मुश्किल है, जितना यह जानना कि सरकारी बाबू चढावे की रकम कितनी बोलेगा? हालांकि ऊंटों का नेचर काफी हद तक उन अफसरों से मिलता है जो सरकारी निर्णयों की फाइल किसी भी करवट दबाकर लेट जाते हैं और हुकूमत इस खुशफहमी में होती है कि उन योजनाओं का लाभ नीचे के लोगों तक पहुंच रहा होगा। कितने भी रोजगार गारंटी लागू कर लो, बिना व्यवस्था के बदले गरीबों के घर में मानसून नहीं आने वाला। तभी तो एक बार भटकता हुआ भ्रष्टाचार का राक्षस व्यंग्यकार शैल चतुर्वेदी के घर आकर अपना परिचय देता है- ''मैं आज का वक्त हूं, कलयुग की धमनियों में बहता हुआ रक्त हूं, मेरे ही इशारे पर रात में हुस्न नाचता है और दिन में पंडित रामायण बांचता है। '' इन हालातों में सरकारी बाबूओं की क्या बिसात जो उम्रकैद के डर से भ्रष्टाचार से तौबा कर लें?

मुझे चुप रहने दो

चन्दन राय
अक्सर होता यही है कि बडे अपराधों में क्रिमिनल कोई सुराग नहीं छोडते। ऐसे में अपराधियों की तफ्तीश करना भूसे के ढेर में से सूई खोजने सरीखा होता है। जांच एजेंसियों को उम्मीद होती है कि चलो कुछ लोगों का नार्को या ब्रेन मैपिंग करवा लिया जाए, ताकि कुछ तो सूत्र हाथ आएंगे, जिसके आधार पर जांच आगे बढाई जा सकती है। हालांकि यह सब इतना आसान होता तो सीबीआई कब की अपराधियों को जेल की सलाखों में कैद कर चुकी होती। स्टांप घोटाले के आरोपी तेलगी के नार्को टेस्ट में कई राजनेताओं के नाम सामने आए, लेकिन सीबीआई हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। कोर्ट भी मात्र उतने ही अंश को स्वीकार करती है, जितना कि नार्को टेस्ट के आधार पर पुख्ता सबूत जुटा लिए जाएं
तु म आरुषि को कब से जानते हो? तुमने उसका मर्डर क्यों किया, जवाब दो? तुमने उसको क्यों मारा? लगातार प्रश्नों की बौछार से उकताया युवक स्ट्रेचर पर लेटा है और लगभग अर्ध्दबेहोशी की स्थिति में कुछ का कुछ बुदबुदा रहा है? उसे पता नहीं कि वह क्या कह रहा है? वह तो बस इतना चाहता है कि जल्द से जल्द वह इनके चंगुल से बाहर निकल जाए। ये फुटेज तो आपको याद होगा, जो बार-बार टेलीविजन पर चलाया गया था। मीडिया की भाषा में कहें तो यह देश की सबसे बडी मर्डर मिस्ट्री थी, जिसमें न जाने कइयों को कई बार इस तरह के प्रश्नों से दो-चार होना पडा। बंगलुरु का मशहूर फारेंसिक साइंसेज विभाग जहां जाने के नाम से ही कई शातिर, सफेदपोश अपराधियों को भी नानी याद आने लगती है। लेकिन होता यही है कि डेढ-दो घंटे की असह्य यातना के बाद भी मामला शिफर का शिफर। आरुषि के मामले में सीबीआई से लेकर देश की आला जांच एजेंसियां अंधेरे में तीर चलाती रही, पर हत्यारे की बात तो जानें दें, धारदार हथियार भी आज तक नहीं मिल सके जिनसे कत्ल किया गया था। यहीं से नार्को टेस्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठने शुरू हो गए थे। नशे की हालत में झूमते हुए राजकपूर का यादगार अभिनय बरबस लोगों के जेहन में कौंध जाता है-''मुझको यारों माफ करना, मैं नशे में हूं। अब तो मुमकिन है बहकना, मैं नशे में हूं। तुम बस इतना याद रखना, मैं नशे में हूं।'' यह गाना आम आदमी को तो याद रहा लेकिन सीबीआई इसी अर्धसत्य के आधार पर गुहनहगारों की तलाश में लगी रही। लगभग नशे में बेसुध आदमी के बयानों पर ही सच की तलाश में हाथ-पैर मारती रही। लोग कहते भी हैं भला शराबी का क्या भरोसा? कब क्या बक जाए? लेकिन देश की बडी-बडी ज़ांच एजेंसियां इसी को साक्ष्य के तौर पर मानती-जांचती रहीं। तो ये है नार्को टेस्ट का सच जो इस तर्क में विश्वास करता है कि 'सोडियम पेंटाथाल' नामक रसायन के नशे में बेसुध आदमी झूठ नहीं बोल सकता। अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 20 (3) स्वदोषारोपण से छूट के मौलिक अधिकार का हवाला देते हुए नार्को, पोलिग्राफिक और ब्रेन मैपिंग को असंवैधानिक करार दिया है।
हालांकि इसमें कई पेंच हैं, जो इसकी वैधानिकता को लेकर पहले भी उठते रहे हैं। नार्को और ब्रेन मैपिंग टेस्ट में साधारण अपराधी तो फंस जाता है, लेकिन कोई चालाक, शातिर अपराधी जो इस टेस्ट की खूबियों, खामियों से परिचित है, बचकर निकल जाता है। अगर कोई नशे में जाने के पहले यह ठान ले कि उसे कुछ नहीं कहना, तो लाख प्रयत्न करने के बाद भी कुछ उगलवा लेना मुश्किल है। यही कारण है कि डॉ. राजेश तलवार जैसे लोगों को कई बार इस टेस्ट से गुजरना पडा। इसके बावजूद सीबीआई हाथ मलती रही और कोई भी सबूत नहीं इकट्ठा कर सकी, जिससे इस दोहरे हत्याकांड की गुत्थी सुलझ सके। अगर वैधता के सवाल को भी छोड दें तो मनोवैज्ञानिक दवाब में किसी से जुर्म कबूल करवाना संवैधानिक अपराध है, कोर्ट ने इसी पक्ष को पकडा है। भारतीय कानून में धारा 164 के अनुसार बिना किसी दवाब के न्यायाधीश के सामने दिए गए बयान ही न्यायालयों को मान्य हैं। इसी को आधार बनाते हुए कोर्ट ने कहा है कि जांच एजेंसियों को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि जबरन किसी को यह कहने के लिए बाध्य करें कि तुमने ये हत्या की है या गुनाह किया है? सवाल तो आम आदमी के मौलिक अधिकारों को लेकर है, जिसमें देश के शातिर अपराधियों से लेकर संतों तक को भी एक ही श्रेणी में रखा गया है।
अगर देश में आतंकवादियों के लिए टाडा जैसे कानून की जरूरत सरकार बताती रही है, तो अजमल आमिर कसाब, अब्दुल करीम तेलगी, संतोखबेन जडेजा, देवेंद्र यादव जैसे लोगों को छूट क्यों? क्या देश के गद्दारों, आतंकवादियों एवं देशद्रोहियों के लिए इन मामलों में कुछ विशेष उपबंध नहीं किए जा सकते, जिससे कानून की मर्यादा भी रह जाए और ऐसे अपराधियों में भय का माहौल भी पैदा हो। ये ऐसे लोग हैं, जिन्होंने देश की अस्मिता को किसी न किसी रूप में चुनौती दी है। लेकिन सवाल तो ये है कि फिर तय कौन करे कि कौन देश के दुश्मन हैं और कौन सरकार की नीतियों का विरोध करने के कारण तथाकथित दुश्मन। सरकार सीबीआई की बदौलत इस हथियार का इस्तेमाल राजनैतिक विरोधियों को दबाने के लिए भी कर सकती है। इन दिनों ऐसे आरोप सडक़ से लेकर सदन तक सरकार पर लगते भी रहे हैं। हालांकि जांच के विषय में सीबीआई के आला अधिकारियों का मानना है कि अब कई राज इन अपराधियों के जहन में ही दफन हो जाएंगे। अक्सर होता यही है कि बडे अपराधों में क्रिमिनल कोई सुराग नहीं छोडते। ऐसे में अपराधियों की तफ्तीश करना भूसे के ढेर में से सूई खोजने सरीखा होता है। जांच एजेंसियों को उम्मीद होती है कि चलो कुछ लोगों का नार्को या ब्रेन मैपिंग करवा लिया जाए, ताकि कुछ तो सूत्र हाथ आएंगे, जिसके आधार पर जांच आगे बढाई जा सकती है। या अपराधियों के मोडस ओपरेंडी की या फिर उनके गैंग के बारे में जानकारी जुटाई जा सकती है। हालांकि यह सब इतना आसान होता तो सीबीआई कब की अपराधियों को जेल की सलाखों में कैद कर चुकी होती। स्टांप घोटाले के आरोपी तेलगी के नार्को टेस्ट में कई राजनेताओं के नाम सामने आए, लेकिन सीबीआई हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। सिर्फ अपराधी का कहना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि इनके कहे के आधार पर साक्ष्य भी जुटाने होते हैं। कोर्ट भी मात्र उतने ही अंश को स्वीकार करती है, जितना कि नार्को टेस्ट के आधार पर पुख्ता सबूत जुटा लिए जाएं। जैसे अपराधी ने नार्को टेस्ट के दौरान कबूला हो कि आरुषि की हत्या में धारदार हथियार को नाले में बहा दिया गया और सीबीआई उस हथियार को खोज निकाले। यहां हथियार दिखाना तो कोर्ट में साक्ष्य के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकता है, लेकिन सिर्फ उस व्यक्ति ने नार्को टेस्ट के दौरान ऐसा कहा को साक्ष्य नहीं माना जा सकता।
न्यायालय का इस मामले में स्पष्ट मानना है कि अगर सहमति या स्वेच्छा से इस तरह के टेस्ट किए जाते हैं और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देशों का पालन किया जाता है, तभी इस तरह के टेस्ट की इजाजत दी जानी चाहिए। इस मामले में कोर्ट का ये भी कहना है कि जनहित की दुहाई देने के बाद भी इन मामलों में छूट नहीं दी जा सकती। मानव अधिकारों के सजग प्रहरी होने के नाते सुप्रीम कोर्ट की चिंता वाजिबहै।
देश के वरिष्ठ न्यायविदों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। लेकिन क्या कोई अपराधी ऐसे टेस्ट के लिए तैयार होगा, जिसमें उसके फंसने की संभावना हो? हाल में आंध्रप्रदेश के पूर्व राज्यपाल एनडी तिवारी ने अवैध संतान के आरोप के मामले में डीएनए टेस्ट कराए जाने से इंकार किया है। यहां भी हवाला यही दिया जा रहा है कि मुझे जबरन मेरे ही खिलाफ गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। हालांकि इसकी वैधानिकता नार्को एवं लाइ डिटेक्टर से ज्यादा वैज्ञानिक धरातल पर आधारित है। लेकिन तर्क तो वही हैं। गुजरात की गॉडमदर संतोखबेन के नाम से आप परिचित होंगे ही। न जाने कई अपराध एवं हत्या के मामलों में आरोपी संतोखबेन ने नार्को टेस्ट कराए जाने की याचिका को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। ये जीत उन अपराधियों की है, जो मानवाधिकारों की आड में अपने क्रूर चेहरों पर नकाब डाल सकेंगे। हालांकि टेस्ट के नतीजों के बाद भी इनकी सेहत पर कोई असर नहीं होना था। अगर विश्वास न हो तो आज तक के नार्को टेस्ट के आंकडाें पर गौर फरमाएं, जिनमें पांच प्रतिशत सुराग भी जांच एजेंसियों को नहीं मिला है।
सुप्रीम कोर्ट ने कई गंभीर मामलों में नार्को टेस्ट के फुटेज मीडिया को जारी किए जाने पर भी आपत्ति जाहिर की थी। इन मामलों में जांच एजेंसियों को कोई सुराग मिले या नहीं, लेकिन ट्रायल कोर्ट बेशक प्रभावित होता है। हालांकि न्यायाधीश इस बात को जानते हैं कि ये पुख्ता सबूत नहीं, लेकिन बोलती तस्वीरों के असर से बाहर निकलने में समय तो लगता ही है। ऐसा हो सकता है कि फैसले को कुछ हद तक ये प्रभावित भी करें, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। नार्को टेस्ट में परिणाम प्रश्न पूछने के तरीकों पर ही निर्भर करता है। जांच के दौरान ऐसा देखा गया है कि व्यक्ति ज्यादातर पेश किए गए सुझावों पर हामी ही भरता है। नशे में तो आदमी घर का पता तक भूल जाता है, फिर ऐसे में नकारने का दुस्साहस उसमें नहीं होता। क्योंकि उसे पता है कि उसका एक 'न' कहना कई और अटपटे सवालों को खडा करेगा और उसे यह दुस्सह्य वेदना देर तक झेलनी होगी। अगर ब्रेन मैपिंग की ही बात करें तो हडबडाहट में वह कुछ का कुछ जवाब दे सकता है। आदमी को पता होता है कि उसका ब्रेन मैपिंग किया जा रहा है, तो फिर सहज होने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जब आदमी को कुछ चित्र या आवाज सुनाई जाती है, तो हो सकता है मिलते-जुलते दृश्यों के कारण या हडबडी में मस्तिष्क तीव्र गति से प्रतिक्रिया दिखाए। कुछ लोग यों भी दिल के कमजोर होते हैं, जो मस्तिष्क से निकली तरंगों के आधार पर अपराधी सिध्द किए जा सकते हैं। कुछ ऐसा ही होता है पॉलीग्राफ टेस्ट के दौरान भी। इसमें आदमी के ब्लड प्रेशर, हार्टबीट, श्वसन और मांसपेशियों की गति का सवाल पूछने के दौरान अध्ययन किया जाता है। वैज्ञानिक परीक्षण होने के बाद भी इसके निष्कर्षों को वैज्ञानिक कसौटी पर नहीं सही माना जाता। यह 1+1=2 की तरह का वैज्ञानिक सच नहीं है। देश के भले नागरिकों को नेक सलाह है कि अगली बार किसी 'सच का सामना' में जाएं तो जरा संभलकर, क्योंकि हो सकता है कि आपका सच मशीन के लिए झूठा हो। आप खामखां बदनाम भी हों और करोडों की माया भी हाथ न आए। संविधान ने स्वदोषारोपण के सवाल पर बोलने या चुप रहने में से एक विकल्प चुनने का अधिकार नागरिकों को दिया है। न्यायालय ने इस अधिकार की रक्षा के लिए फैसला तो दिया है, लेकिन देखना होगा कि कहीं अपराधी तबका इसकी आड में देश की कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती न साबित हों।

मंगलवार, 1 जून 2010

समय से फैसला हो तो बचे 'मान'और धन

चन्दन राय
दरियागंज के एक स्कूल टीचर उमा खुराना का केस आपको याद होगा। एक निजी चैनल के फर्जी स्टिंग में उनपर स्कूल-छात्राओं को देह व्यापार में धकेलने का आरोप लगाया गया था। इस आरोप के बाद उग्र भीड ने उमा खुराना को जमकर पीटा और उनके कपडे तक फाड ड़ाले थे। जांच में यह मामला झूठा साबित हुआ। लेकिन अब तक जो होना था, वो हो चुका। उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया और समाज ने एक ऐसा गहरा घाव दिया, जिसे वह लोगों से छिपाती घूम रही थी। मीडिया ने उनके भीड द्वारा पीटे जाने एवं कपडे फ़ाडने के विजुअल को बार-बार दिखाया। इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने उमा खुराना को अपनी खोई छवि की भरपाई के लिए मानहानि और हर्जाने का मुकदमा दायर करने को कहा। अब एक दूसरे मामले पर नजर डालते हैं। अरबों रुपयों के घोटाले के आरोपी झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा ने कोर्ट में यह कहते हुए मानहानि का मुकदमा दायर किया कि उन्हें राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया जा रहा है। दोनों मामलों में मानहानि का मुकदमा दायर किया गया। हमारा मकसद यहां उचित या अनुचित मुकदमों के मामले में फैसला देने का नहीं, बल्कि इस बात की ओर इशारा करना है कि बढते मानहानि के मुकदमों के कारण न्यायपालिका के क्रिया-कलापों पर कितना असर पडा है? कई ऐसे मानहानि के मुकदमों के कारण देश की न्यायिक व्यवस्था चरमराती नजर आ रही है। देश में आए दिन इस तरह के मुकदमे देश के विभिन्न अदालतों में दायर किए जाते हैं, जिसमें व्यक्ति यह आरोप लगाता है कि उसकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचा है। पहले ही मुकदमों के बोझ से दबे न्यायालय के लिए यह एक दोहरी मार है।
अमिताभ बच्चन ने इस बात का जिक्र अपने ब्लॉग पर करते हुए कहा है कि मानहानि या माफी मंगवाने के लिए अदालत का रुख करना एक थका देने वाली प्रक्रिया है। ऐसे किसी मामले में अदालत का निर्णय आने में कई साल लग जाते हैं। किसी-किसी मामले में तो फैसला आने में 15-20 साल तक लग जाते हैं या मामले में शामिल लोगों का निधन तक हो जाता है। जब फैसला आता भी है तो या तो बहुत देर हो चुकी होती है या उस फैसले का कोई महत्व नहीं रह जाता। इस मामले में सदी के महानायक की चिंता जायज ही है। अगर ऐसे मामलों में वे कोर्ट जाने लगे, तो बाकि की जिंदगी उन्हें कोर्ट के चक्कर काटने में ही गुजारनी पडे। मीडिया सेलिब्रिटियों की लाइफ-स्टाइल पर पैनी नजर रखती है। उनसे जुडी हर छोटी-बडी घटनाएं मीडिया में सुर्खियां बनती हैं। उनके बीमार होने की खबर मिलते ही देश में उनके स्वास्थ्य को लेकर पूजा-पाठ का दौर शुरू हो जाता है। ऐसे में किसानी को अपना पेशा बताना कभी सुर्खियों में बनता है तो कभी विदेशी महंगी गाडी ज़न्मदिन के मौके पर अपने बेटे को देने के लिए कर बचाने की सरकार से अपील भी। इस तरह के मामलों का चर्चा में आना परेशान तो करता ही है। लेकिन उन्हें दुख तब होता है जब परिवार की बहू ऐश्वर्या राय को लेकर मीडिया में चर्चाएं होती हैं। उनका इशारा ऐसे ही मामलों में मानहानि को लेकर था, जब मीडिया की बेडरुम में अनर्गल तांक-झांक से सेलिब्रेटियों की निजी जिंदगी प्रभावित होती है। ऐसे में वे मानहानि के दावे के बारे में सोचने लगें, तो उन्हें स्थायी रुप से एक वकील की सेवा लेनी होगी।
उनकी चिंता का दायरा सिर्फ यहीं तक नहीं, बल्कि न्याय मिलने में देरी को लेकर भी है। ऐसे मामलों में अगर सुनवाई होती भी है, तो उनका फिल्मी कॅरियर बुरी तरीके से प्रभावित होगा। उम्र के आखिरी पडाव पर भी वे फिल्मी कॅरियर की तीसरी पारी खेलने मैदान में जमे हैं। बुध्दु बक्से पर भी अपनी धाक जमाने वाले अभिनेता ये कभी नहीं चाहेंगे कि वे अदालतों के चक्कर में उलझें। यही कारण है कि ब्लॉग पर वे मात्र अपनी हताशा जाहिर करते हैं।
अब मानहानि के मुकदमों की हकीकत भी समझ लें। कोच्चि आईपीएल फ्रेंचाइजी की मिल्कियत पर उठे विवादों को लेकर चर्चा में आई सुनंदा पुष्कर भी मानहानि का मुकदमा दायर करने के लिए अदालत का रुख करनेवाली हैं। उनका आरोप है कि मीडिया ने उन्हें एक ब्यूटीशियन, स्पा की मालकिन और सोशलाइट कहा है। जबकि वे कभी स्पा व्यवसाय में शामिल नहीं रहीं। मीडिया में गलत छवि पेश करने के मामले में वे क्षतिपूर्ति का दावा करने पर भी विचार कर रही हैं। सानिया-शोएब निकाह मामले में पाकिस्तान से उनके जीजा इमरान मलिक दिल्ली आए ताकि शोएब मलिक की पत्नी होने का दावा करने वाली आयशा सिद्दीकी पर मानहानि का मुकदमा चलाया जा सके। हालांकि इस मामले में शोएब मलिक की काफी किरकिरी हुई जब लोगों के सामने उन्हें स्वीकार करना पडा कि आयशा उनकी पत्नी रह चुकी हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण अडवानी को भी तीन सांसदों सहित मानहानि का मुकदमा झेलना पडा, जब सपा के एक नेता ने संसद में नोट लहराने के मामले को लेकर कहा कि इससे समाजवादी पार्टी की साख पर असर पडा है और ऐसा जानबूझकर पार्टी के खिलाफ माहौल बनाने की बदनीयती से किया गया है। अगर ऐसे मुकदमों में अदालतों का वक्त जाया हो, तो स्वाभाविक है कि मुकदमों की सुनवाई के लिए हमें लंबा इंतजार करना होगा। यों ही न्यायाधीशों की कमी का रोना रोती अदालतें सायंकालीन अदालत लगाने पर भी विचार कर रही हैं। पर आलम यह है कि जितने मामलों में सुनवाई होती है, उससे कई गुना ज्यादा मामले अदालतों की चौखट पर होते हैं।

लेकिन कोई व्यक्ति ये महसूस करे कि किसी व्यक्ति ने उसकी सार्वजनिक छवि को ठेस पहुंचाई है, तो अदालत में जाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं। अभी पटना के कंकडबाग इलाके में करोडाें की जमीन हडपने के कारण चर्चा में आए आसाराम बापू को भी मानहानि के मुकदमे का सामना करना पड रहा है। अदालत का उनके विरुध्द फैसला आने के बाद उनके शिष्यों द्वारा जमीन मालिक के खिलाफ जुलूस निकालकर आपत्तिजनक नारे लगाने का मामला सामने आया था। एक सार्वजनिक सभा में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जदयू पार्टी के पूर्व अध्यक्ष ललन सिंह पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के कारण पूर्व मुख्यमंत्री राबडी देवी को भी मानहानि के चक्कर में अदालत के चक्कर लगाने पडे। अगर राजनेता अपनी वाणी पर संयम रखें तो कई ऐसे मामलों से बचा जा सकता है, जिससे अदालत के समय की भी बचत होगी।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माने-जाने वाले मीडिया को सबसे ज्यादा मानहानि के मुकदमों का डर सताता है। लोकतंत्र में एक सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाने के कारण कभी-कभी वह राजनीतिज्ञों एवं सेलिब्रिटियों पर भी छींटाकशी करता रहता है। अगर इन लेखों से किसी की सार्वजनिक छवि पर असर पडता हो, तो मीडिया को भी बिना सच्चाई की तह में गए ऐसी खबरों से बचना चाहिए। फिल्मी गॉशिप के बहाने सेलिब्रिटिज की निजी जिंदगी की बखिया उधेडने को भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि कई मामलों में बेवजह ही उसे अदालत में घसीटा जाता है। हाल में एक अंग्रेजी अखबार को 'प्रताडित करना' शब्द-प्रयोग के कारण मानहानि का सामना करना पडा। संपत्ति विवाद को लेकर यह मामला न्यायालय में लंबित था। हालांकि अखबार के वकील का कहना था कि उक्त व्यक्ति ने कुछ मौकों पर दूसरे पक्ष को धमकाया था, इसलिए इस शब्द का प्रयोग अपमानजनक नहीं। इस मामले में बांबे हाईकोर्ट ने अखबार का पक्ष रखते हुए कहा कि जरूरी नहीं कि अदालत की कार्यवाही की मानहानि करने वाली खबर वाकई अदालत की आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आती हो।
मानहानि किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि अदालतों की भी होती है। कानून की भाषा में इसे कोर्ट की अवमानना या कंटेम्ट ऑफ कोर्ट कहते हैं। अगर अदालत को ऐसा लगे कि किसी व्यक्ति के आचरण से न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुंचा हो तो संबंधित व्यक्ति को कंटेम्ट ऑफ कोर्ट का सामना करना पडता है। देखा गया है कि अदालत अपने गरिमा को लेकर कुछ ज्यादा ही सचेत रहती है। अभी एक ऐसा ही मामला काफी चर्चा में रहा, जब न्यायालय में
एक लडक़ी ने जस्टिस पसायत को मि. पसायत कहते हुए संबोधित किया। कोर्ट की मर्यादा का ध्यान दिलाए जाने पर उसने कहा कि कानून के सामने सभी समान हैं और आप लोग भी मेरी तरह आम आदमी हैं। कोर्ट ने इस बात पर ऐतराज जताते हुए कहा कि उसे संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादाओं का ख्याल रखना चाहिए। लडक़ी का जवाब भी बेहद शालीन था कि वह सिर्फ देश के संविधान का सम्मान करती है। जस्टिस पसायत पर सुनवाई के दौरान जूता फेंकने के मामले में वह पहले ही कोर्ट की अवमानना का सामना कर रही थी, उसपर कई नए अवमानना के मुकदमे और जड दिए गए। अभी ऑस्ट्रेलिया के हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि इंटरनेट वेबसाइट पर छपे लेख के लिए दूसरे देशों की अदालतों में जाकर भी मानहानि का मुकदमा दायर किया जा सकता है। वादी ने यह दलील दी कि उसे जानने वाले मेलबोर्न में भी रहते हैं, जबकि यह लेख अमरीका स्थित वेबसाइट में छपा था। संभवत: यह पहला ऐसा मामला है जिसमें किसी भी देश के न्यायालय ने इंटरनेट और कानून की सीमा पर विचार किया है। इंटरनेट साइट पर छपे लेखों के कारण अब दुनिया भर में मुकदमों की झडी लग सकती है। ऐसे में सदी के महानायक की मानहानि के मुकदमों को लेकर चिंता जायज है।

सावधान, कोई सुन रहा है?

आपात काल के दिनों में भी नेता संभलकर फोन पर बात-चीत करते थे। उन्हें पता था कि कांग्रेस हाईकमान के निर्देश पर सभी विरोधी नेताओं की टोली पर सरकार की नजर है। फोन टैप करना ही नहीं, बल्कि उसी के आधार पर विरोधियों पर कार्रवाई भी की जाती थी। क्या हम अभी तक आपातकाल के सदमे से उबरने में सफल हो सके हैं? नेहरू लोकतंत्र में अपने राजनैतिक विरोधियों को भी जगह देते थे। इतना ही नहीं, वे राजनीति में ऐसे लोगों का सम्मान भी करते थे। लोहिया चाहे सदन में नेहरु को कितनी भी खरी-खरी सुना दें, बाहर आते ही हंस कर गले मिलते थे। सारे गिले-शिकवे दूर करने का नेहरु का ये अपना तरीका था, जिसका राजनैतिक विरोधी भी सम्मान करते थे। क्या कांग्रेस अपनी राजनीतिक विरासत भूलती जा रही है?
चंदन राय
भा रत में राजा-महाराजाओं के अपने खुफिया तंत्र होते थे। उनका काम जनता के बीच जाकर गुप्त तरीके से यह पता लगाना होता था कि राजा के खिलाफ लोग षडयंत्र तो नहीें कर रहे। धीरे-धीरे समय बदला और देश में लोकतंत्र की बयार आई। रातों-रात राजा-महाराजा चोगा बदल लोकतंत्र के रहनुमा बन गए। लेकिन एक परिवर्तन आ चुका था, अब जनता के मौलिक अधिकार के साथ कर्तव्य भी निर्धारित कर दिए गए थे। सत्ता का चाल-चरित्र बदला, लेकिन सिंहासन के पुराने कायदे-कानून वही रहे। वंशानुगत अधिकारों को अब लोकतांत्रिक रूप दे दिया गया, लेकिन राजनैतिक विरोधियों के लिए खुफिया विभाग जस-का-तस बना रहा। आईबी और रॉ के होने का मकसद तो कुछ और बताया जाता रहा, लेकिन वे राजनैतिक विरोधियों के शह-मात के खेल में ही लगे रहे। आपातकाल के दिनों में खुलकर, तो बाकि दिनों में दबे-छुपे तरीके से। यही कारण है कि नेताओं के फोन टैप किए जाने के मामले पर जनता के बीच कोई तीखी प्रतिक्रिया
नहीं हुई।
राजतंत्र से लोकतंत्र तक की यात्रा में एक परिवर्तन आ चुका था। अब संख्याबल ही सत्ता का मिजाज तय करता था। सरकार को अपने विरोधियों से भी ज्यादा खतरा अपने पार्टी के विभीषणों से था। न जाने कब पाला बदल, गच्चा दे जाएं। इसलिए जरुरी था कि इनकी लगाम को मजबूती से थामकर रखा जाए। आईपीएल प्रकरण में तो वह अपने विश्वस्त सिपाहसलार शशि थरूर को दांव पर लगा ही चुकी थी। अब इस मामले में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ था नहीं। यही कारण है कि वह आईपीएल की साफ-सफाई में खासा रुचि ले रही थी। मराठा छत्रप को अंकुश में रखने के लिए प्रफुल्ल पटेल पर दांव खेला गया। राजनीति के बिसात पर अपना मोहरा पिटता देख कांग्रेस ने अंतिम हथियार के रूप में आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी पर शिकंजा कसा। सरकार को पता था कि मुसीबत में वे अपने राजनैतिक आकाओं को फोन जरूर करेंगे और इसी दांव पर कुछ केंद्रीय मंत्रियों के नाम भी सामने आने लगे जो आईपीएल की आड में काला धन सफेद करने में लगे थे।
अगस्त 2007 में बिहार के मुख्यमंत्री दिल्ली यात्रा पर थे। देश के बीमारु प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने वाले नीतीश केंद्र सरकार से विशेष फंड की फिराक में थे। वे अपने मित्रों से सहायता राशि के बारे में फोन पर बात-चीत कर रहे थे। लेकिन उन्हें क्या पता था कि वे सरकार की नजर में देश के लिए बडे ख़तरों में से एक हैं और उनका फोन टैप किया जा रहा है? बिहार में राजनैतिक धरातल की तलाश में जुटी केंद्र सरकार के लिए यह जरूरी था कि सूबे के मुख्यमंत्री के मंसूबों को जांचा-परखा जाए। कुछ ऐसी ही गलती माकपा के महासचिव प्रकाश करात ने भी कर दी थी। वे विपक्ष को एकजुट कर सदन में यूपीए सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी में थे।
उन दिनों यूपीए सरकार के एकसूत्रीय एजेंडे में शामिल था भारत-अमरीकी असैन्य परमाणु करार और वे उसके खिलाफ राजनैतिक माहौल बना रहे थे। सरकार को गिराने का दांव खेलने के कारण वे सरकार की नजर में राष्ट्रद्रोही माने जा रहे थे। इसलिए वे भी केंद्र सरकार के खुफिया एजेंसियों के दायरे में थे। कांग्रेस के महासचिव दिग्गी राजा की समझ में नहीं आ रहा था कि उनसे कौन सी खता हो गई कि सरकार ने उनकी भी जासूसी शुरु कर दी। लेकिन उनकी यही गलती थी कि वे पार्टी लाईन से कभी-कभी अलग कदम उठा लेते थे। कांग्रेस कार्यकारिणी का चुनाव होने वाला था और वे कौन सा तुरूप का पत्ता चलेंगे इसलिए उनका फोन भी खुफिया एजेंसियों के दायरे में था। आपात काल के दिनों में भी नेता संभलकर फोन पर बात-चीत करते थे। उन्हें पता था कि कांग्रेस हाईकमान के निर्देश पर सभी विरोधी नेताओं की टोली पर सरकार की नजर है। फोन टैप करना ही नहीं, बल्कि उसी के आधार पर विरोधियों पर कार्रवाई भी की जाती थी। क्या हम अभी तक आपातकाल के सदमे से उबरने में सफल हो सके हैं? क्या इन घटनाओं ने एक बार फिर लोगों को 1975 के काले दिनों की याद नहीं दिला दी? जब लोगों के राजनैतिक एवं मौलिक अधिकार छीने जा रहे थे और हर जगह खामोशी छाई थी।
नेहरू लोकतंत्र में अपने राजनैतिक विरोधियों को भी जगह देते थे। इतना ही नहीं, वे राजनीति मेें ऐसे लोगों का सम्मान भी करते थे। लोहिया चाहे सदन में नेहरु को कितनी भी खरी-खरी सुना दें, बाहर आते ही हंस कर गले मिलते थे। सारे गिले-शिकवे दूर करने का नेहरु का ये अपना तरीका था, जिसका राजनैतिक विरोधी भी सम्मान करते थे। क्या कांग्रेस अपनी राजनीतिक विरासत भूलती जा रही है? क्या लोकतंत्र में बिना सशक्त विपक्ष के उचित नीति-निर्धारण संभव है? कहीं न कहीं तो हमें राजनैतिक विरोधियों को स्पेस देना ही होगा, उनके विचारों का सम्मान करना होगा, उनकी आलोचनाओं की कसौटी पर सरकार की नीतियों को कसा जाना होगा, यही एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।
जानकारी मिली है कि सरकार के पास करीब 90 ऐसे उपकरण हैं, जिनका इस्तेमाल दंगों, राष्ट्रीय आपदाओं एवं आतंकवाद से लडने के लिए किया जाना है। लेकिन इस बात की कल्पना कर ही मन कांप उठता है कि अगर ये उपकरण आतंकवादियों के हाथ लग गए, तो सरकार की उनपर निगरानी की सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाएंगी। और वे जब चाहे, जहां चाहे, कुछ भी करने को स्वतंत्र होंगे। सत्ता की नजदीकी का फायदा उठाकर उद्योगपति अपने विरोधी कंपनियों को मात देने के लिए या उनकी योजनाओं पर नजर रखने के लिए भी इस उपकरण का इस्तेमाल कर सकते हैं।
कानूनी दृष्टि से बात करें तो ये संविधान के अनुच्छेद 21 का सरासर उल्लंघन है। लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। प्रत्येक व्यक्ति का अपना दायरा होता है, जहां उसे उम्मीद होती है कि उसकी निजता सुरक्षित है। अगर इसपर हमला हुआ, तो लोकतंत्र भी खतरे में पड ज़ाएगा। फोन टैपिंग की आड में 2 किलोमीटर तक के दायरे में आने वाले किसी भी व्यक्ति के फोन को सुना जा सकता है। क्या यह अधिकार हम सरकार को देंगे कि वह हमारी निजी बात-चीत पर भी नजर रखे? ऐसे हालात में सभी पार्टियों से यह उम्मीद करना कि वे सरकार के सुर में सुर मिलाएं-कहां तक उचित है? राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने भी एक बार राजीव गांधी सरकार पर यह आरोप लगाया था कि राष्ट्रपति भवन में उनका फोन टैप किया जा रहा है। इसी प्रकार के आरोप कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े पर भी लगे थे, जिसके कारण बाद में उन्हें अपने पद से भी इस्तीफा देना पड़ा था। अमर सिंह ने भी अपना फोन टैप किए जाने का आरोप लगाया था। चंद्रशेखर सरकार से कांग्रेस की समर्थन वापसी की अहम वजह भी फोन टैपिंग ही थी। ऐसे में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार फोन टैपिंग को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहरा सकती। पहले थाने के प्रभारी को भी यह अधिकार था कि वह टेलीफोन कंपनी से कहकर किसी का फोन टैप करा लेता था। लेकिन अब आईजी स्तर के अधिकारी की सहमति से ही किसी का फोन टैप किया जा सकता है। हालांकि राज्य स्तर पर गृहसचिव की स्वीकृति को भी जरुरी माना गया है। लेकिन अब ऐसे डिवाइस आ गए हैं, जिसमें मंजूरी की कोई जरूरत ही नहीं। एक चलती कार में यह डिवाइस लगा होता है, जो 2 किलोमीटर तक के दायरे में आने वाले किसी भी व्यक्ति का फोन टैप कर सकता है।
उम्मीद की जा रही है कि इस मामले को लेकर संसद का आगामी सत्र काफी हंगामेदार होगा। विपक्ष केंद्र सरकार को पूरी तरह से घेरने की तैयारी में है। महंगाई, महिला आरक्षण, आईपीएल ने पहले ही सरकार की नाक में दम कर रखा है। ऐसे में फोन टैपिंग प्रकरण की आंच प्रधानमंत्री को थिम्फू के वातानुकूलित कक्ष में भी महसूस होगी।

जब नियामक ही लडें तो...

इन विवादों के लिए जिम्मेदार वित्त मंत्रालय कठघरे में है। आम निवेशक जानना चाहता है कि क्या वित्त मंत्रालय को विवाद की स्थिति में दोनों नियामक संस्थाओं के अधिकार-क्षेत्र के निर्धारण के लिए आगे नहीं आना चाहिए था। विवाद की शुरुआत सेबी, जो कि शेयर बाजार की नियामक संस्था है, ने चौदह निजी बीमा कंपनियों को यूलिप जारी करने पर रोक लगाने से की।
चन्दन राय
सेबी और इरडा के विवाद का असर शेयर बाजार पर पडना ही था। शेयर बाजार की चाल सुस्त होती देख सरकार हरकत में आई। वित्त मंत्रालय जो इन विवादों को अपने स्तर पर सुलझा सकती थी, ने दोनों नियामक संस्थाओं को अदालत में जाने की सलाह दी। ऐसे में ग्राहकों का करीब डेढ लाख करोड रुपए दांव पर लगे हैं, और दोनों नियामक संस्थाएं अधिकार-क्षेत्र के विवाद में उलझी हैं। वित्तीय स्थिरता की गारंटी को बहाल रखने के लिए जरुरी था कि सरकार निवेशकों को भरोसे में ले। कुछ ही घंटों बाद बीमा कंपनियों की नियामक संस्था इरडा के अधिकारियों का बयान जारी होता है कि इन कानूनी पेचिदगियों का असर ग्राहकों पर नहीं पडेग़ा, ये दोनों संस्थाओं के बीच का मामला है, जिसे जल्द ही सुलझा लिया जाएगा। इन विवादों के लिए जिम्मेदार वित्त मंत्रालय कठघरे में है। आम निवेशक जानना चाहता है कि क्या वित्त मंत्रालय को विवाद की स्थिति में दोनों नियामक संस्थाओं के अधिकार-क्षेत्र के निर्धारण के लिए आगे नहीं आना चाहिए था। विवाद की शुरुआत सेबी, जो कि शेयर बाजार की नियामक संस्था है, ने चौदह निजी बीमा कंपनियों को यूलिप जारी करने पर रोक लगाने से की। इसके तहत पुरानी यूलिप की बिक्री पर इस आदेश का कोई असर नहीं होना था। यूलिप यानी यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान बीमा कंपनियों की एक ऐसी स्कीम है, जिसमें ग्राहकों को रिस्क कवर करने के साथ ही बाजार में निवेश का मौका भी मिलता है। ऐसे में स्वाभाविक है कि शेयर बाजार के उतार-चढाव का असर यूलिप स्कीम पर पडे। ऌस तरह की पॉलिसी में निवेश का खतरा निवेशक को ही झेलना पडता है। कह सकते हैं कि ये मामला सीधे शेयर बाजार से जुडा है। भारत में आयकर की धारा 8 सी के तहत यूलिप पर निवेश की छूट है। मामला यहीं से शुरु होता है। सेबी का मानना है कि शेयर बाजार में पैसा लगाए जाने के कारण इसे म्यूच्युअल फंड की तरह ही माना जाए। बीमा कंपनियों को बिना सेबी में रजिस्ट्रेशन कराए यूलिप की बिक्री करने का अधिकार नहीं है। ऐसा करने से पहले उन्हें रजिस्ट्रेशन कराना होगा, ताकि समय आने पर उन बीमा कंपनियों की निगरानी की जा सके, जो शेयर बाजार में पैसा लगा रही हैं।
इरडा ने भी इस मामले को लेकर कानूनी चुनौती देने का मन बना लिया। इसके पहले उसने बीमा कंपनियों को आदेश जारी कर यूलिप पर सेबी के किसी तरह के प्रतिबंध को मानने से इंकार कर दिया था। इस मामले पर सेबी के सदस्य प्रशांत सरन का कहना है कि कंपनियों ने इस बात को स्वीकार किया है कि यूलिप के दो घटक हैं। पहला है इनश्योरेंस घटक, जहां जीवन बीमा का हिस्सा बीमा कंपनी के पास होता है और दूसरा निवेश घटक, जहां जोखिम निवेशक के साथ होता है। यानी यूलिप एक मिश्रित उत्पाद हैं और निवेश घटक के पंजीकरण और सेबी द्वारा नियंत्रित होने की आवश्यकता है। हालांकि यूलिप की बिक्री विदेशों में भी बीमा कंपनियों के अधीन हैं। ग्राहक ऐसी स्थिति को देखकर अपना पैसा लगाने से हिचकिचा सकते थे, जिसका असर शेयर बाजार के साथ बीमा कंपनियों पर भी पडना था। इसलिए आनन-फानन मेेंं इरडा ने एक बयान जारी कर यूलिप के पॉलिसीधारकों को विश्वास दिलाने की कोशिश की कि ये पॉलिसियां सुरक्षित हैं और इस मामले का निबटारा जल्द ही कानून के दायरे में किसी उचित फोरम में कर लिया जाएगा। ग्राहक इस पूरे प्रकरण से हतोत्साहित न हों, उनका पैसा सुरक्षित है। लेकिन खतरे के समय ही ऐसे सरकारी बयानों की बाढ अा जाती है, ये आम निवेशक भी समझता है। बीमा कंपनियां जिनको यूलिप की बिक्री रोकने का आदेश सेबी ने दिया है में एगॉन रेलिगेयर, अविवा, बजाज अलियांज, भारती एएक्सए, बिरला सन, एचडीएफसी स्टैंडर्ड, आईसीआईसीआई प्रूडेंसियल, आईएनजी वैश्य, कोटक महिंद्रा , मैक्स न्यूयार्क, मेटलाइफ इंडिया, रिलायंस लाइफ इनश्योरेंस, एसबीआई लाइफ इनश्योरेंस और टाटा एआईजी शामिल हैं। वित्त मंत्रालय ने यथास्थिति बहाल रखने का दावा कर विवाद को और बढाने का ही काम किया। दोनों नियामक संस्थाएं अपने-अपने हित में इसका अर्थ निकालने में उलझी हैं। बीमा कंपनियों का कहना है कि सरकार के इस फैसले का अर्थ यह है कि बीमा कंपनियां नई यूलिप पॉलिसियां लांच कर सकती हैं। जबकि सेबी के अधिकारियों का कहना है कि वित्त मंत्रालय ने ऐसा कहकर 14 बीमा कंपनियों पर उनके लगाए प्रतिबंध को उचित ठहराया है। मामला अधिकार-क्षेत्र को लेकर है और सरकार, जो इसके लिए जिम्मेदार थी, दूर खडी होकर तमाशा देख रही है। इरडा के सदस्य आर कन्नन का कहना है कि हम आगे भी नए बीमा उत्पाद जारी करते रहेंगे क्योंकि यह बीमा नियमों के दायरे में आता है। यूलिप के मामले में किसके पास फैसला करने का ज्यादा अधिकार है, इसका निर्णय कोर्ट करेगा। लेकिन जब तक इरडा कोर्ट में जाने का मन बना रही थी, सेबी उसके इरादे को भांपते हुए पहले ही कोर्ट की शरण में चली गई।
भारत में बीमा कंपनियों में प्रतियोगिता निजी कंपनियों के आने से शुरु हुई थी। निजी कंपनियां चाहे बीमा-क्षेत्र में काम करें या उत्पादन के क्षेत्र में-मुनाफा ही उनका बिजनेस मंत्र होता है। जहां भी इन्हें मुनाफे की संभावना दिखती है, पैसे लगाने को दौड पडते हैं। इस क्षेत्र में विदेशी निवेश को भी 26 प्रतिशत तक बढा दिया गया। प्रतिद्वंद्विता तेज होनी ही थी। बीमा कंपनियों में निवेश करने वाला वर्ग अपनी कमाई का एक छोटा हिस्सा बीमा कंपनियों में लगाता है, ताकि आडे समय में उसका भविष्य सुरक्षित हो। बीमा कंपनियां ग्राहकों को लुभाने के लिए तरह-तरह की स्कीम लेकर आती हैं। इसी के तहत मामला आता है-यूलिप का। ग्राहकों को लुभाया जाता है कि जल्द ही उनका पैसा दुगुना हो जाएगा। लंबे समय के निवेश में आयकर में छूट भी मिलती है। आज सभी बीमा कंपनियां यूलिप प्लान बेचने के कारोबार में एक दूसरे से होड ले रही हैं। इसमें निवेशक की पूंजी का एक हिस्सा शेयर बाजार में और दूसरा हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों में लगाया जाता है। इसके अंतर्गत अधिक जोखिम से लेकर कम जोखिम लेने वाले निवेशकों के लिए अलग-अलग स्कीमें हैं। जैसे-जैसे हम कम जोखिम की ओर जाते हैं, हमारा रिस्क तो कम होता है साथ ही मुनाफे भी कम होता जाता है, क्योंकि इनका 20-50 प्रतिशत रकम ही शेयर बाजार में लगा होता है। आम निवेशक जो जल्द ही अपनी रकम दुगुनी करना चाहते हैं, हाई रिस्क लेते हुए मोटा मुनाफा कमाते हैं। इस समय सभी बीमा कंपनियों का 70 फीसदी राजस्व यूलिप से ही आ रहा है। इस मुनाफे को देखते हुए ही जनवरी में सेबी ने इन कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा कि वे बिना सेबी की इजाजत के यूलिप पॉलिसी कैसे बेच रहे हैं? शेयर बाजार पर नजर रखने वाली संस्था सेबी ने पहली बार इस तरह का कदम उठाया है।
मामला दो नियामक संस्थाओं के बीच उलझकर रह गया है। निजी कंपनियां अपने हितों को लेकर ग्राहकों को ठेंगा दिखाती रही हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि मोटे मुनाफे के चक्कर में यदि बीमा कंपनियां ग्राहकों को बिना बताए अधिक पैसा शेयर बाजार में निवेश करें, तो ग्राहकों के सामने क्या रास्ता बचता है? वह इसकी शिकायत इरडा में करे या सेबी के पास जाए। इस लडाई से आम आदमी को कोई मतलब नहीं, बशर्ते कि उसका पैसा सुरक्षित होने की गारंटी उसे हो। वित्त मंत्रालय को सुपर नियामक संस्था बनाने की पहल करनी चाहिए ताकि इन नियामक संस्थाओं के अधिकार-क्षेत्र के निर्धारण के साथ ही विवादों का निबटारा भी किया जा सके।