बुधवार, 2 जून 2010

बोल की लब आजाद हैं तेरे

गालिब का सीने का नासूर साहित्यकारों की वही पीडा है जो मौन में उन्हें व्यक्त करने को कचोटती है-वह इश्क पर लिखी कोई रचना हो सकती है, या मजदूरों के वेदना पर या फिर मानवता पर लिखी कोई रचना। प्रसिध्द रचनाकारों से जब आज के लोग प्रश्न करते हैं कि बहुत दिनों से आपकी कोई रचना नहीं आई, तब वे हंसकर मौन रह जाते हैं। रचना के लिए तो समाज के सरोकारों से जुडना होता है, गरीब, मजलूम की पीडा को खुद पर झेलनी होती है, तब जाकर कोई फैज आकार लेता है
ये चाहे तो दुनिया को अपना बना लें
ये आकाओं की हड्डियां तक चबा लें
कोई इनको अह्सासे जिल्लत दिला दे
कोई इनकी सोई हुई दुम हिला दे
फैज साहब की शायरी में गरीब मजलूमों की भूख तो मौजूद है ही, लेकिन इसमें क्रांति की आवाज को भी साफ महसूस किया जा सकता है। ये उम्मीद उनकी हर शायरी में बरकरार है कि हालात बदलेंगे जरूर। एक दिन जब ये जागेंगे, तो दुनिया का नक्शा ही कुछ और होगा। कहते हैं कि जब स्वयं साहित्य और समाज दोनों मिलकर अनंतकाल तक तपस्या करते हैं, तब जाकर कोई फैज जन्म लेता है, जो दुनिया को अपने नक्शे-कदम पर झूमने को मजबूर कर देता है।
रचनाकारों की जिंदगी में एक समय ऐसा भी आता है जब वो उकता कर कहता है-यार, अब बहुत हो चुकी शेरो-शायरी। फैज अपने पहले कविता-संग्रह 'नक्शे फरियादी' में भी कुछ ऐसी ही बातें कहते हैं- शेर लिखना जुर्म न सही लेकिन बेवजह शेर लिखते रहना ऐसी अक्लमंदी भी नहीं है। गालिब भी दिल में छिपे दर्द को कुछ यूं बयान करते हैं जब से मेरे सीने का नासूर बंद हो गया है, मैंने शेर कहना छोड दिया है।
गालिब का सीने का नासूर साहित्यकारों की वही पीडा है जो मौन में उन्हें व्यक्त करने को कचोटती है-वह इश्क पर लिखी कोई रचना हो सकती है, या मजदूरों के वेदना पर या फिर मानवता पर लिखी कोई रचना। प्रसिध्द रचनाकारों से जब आज के लोग प्रश्न करते हैं कि बहुत दिनों से आपकी कोई रचना नहीं आई, तब वे हंसकर मौन रह जाते हैं। रचना के लिए तो समाज के सरोकारों से जुडना होता है, गरीब, मजलूम की पीडा को खुद पर झेलनी होती है, तब जाकर कोई फैज आकार लेता है। तभी तो वे कहते हैं-'ऐसी सूरते-हालात पैदा होने से पहले ही जौक और मसलहत का तकाजा यही है कि शायर को जो कुछ कहना हो कह ले, अहले-महफिल का शुक्रिया अदा करे और इजाजत चाहे।'
इन दमकते हुए शहरों की फरावां
मखलूक (विशाल जनता)
क्यों फकत मरने की हसरत में जिया
करती है
ये हसीं खेत फटा पड़ता है जोबन जिनका
किसलिए इन में फकत भूक उगा करती है,
जिसने भी अपनी रचनाओं के केंद्र में इस विषय को रखा, उसे जमाने ने महफिल से उठने नहीं दिया। इन्हीं साधारण प्रश्नों की तलाश ने उन्हें अहले-महफिल का शुक्रिया अदा करके उठ जाने से रोका।
प्रेम जो संसार के ताने-बाने को जोडता है पर फैज ने बेबाक होकर लिखा। कई अर्सों तक वे गली-कूचों के मजनुंओं के पसंदीदा शायर बने रहे। आज के इंटरनेटी प्रेमी भी अपने प्रेम का इजहार कुछ यूं ही करते दिखते हैं-
रात यूं दिल में तेरी खोई हुई याद आई
जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए
जैसे सहराओं में हौले से चले बादे-नसीम
जैसे बीमार को बेवजह करार आ जाए।
इसी तरह अयूब शाही के दिनों में लिखी उनकी एक मशहूर नम है- ''निसार मैं तेरी गलियों के ए वतन कि जहां। चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले। जो काई चाहनेवाला तवाफ को निकले। नजर चुरा के चले जामा ओ जां बचा के चले।'' फैज साहब ता-उम्र दुश्वारियों से जूझते रहे बावजूद फैज साहब ने कभी हालात से समझौता नहीं किया।
उस दौर में जब फैज साहब का लिखा शेर जैसे ही बाजार में आता तो पाकिस्तान की हुकूमत हिलने लगती थी। उनकी शायरी की दबाने के लिए पाकिस्तान सरकार ने उन्हें नजर बंद भी किया। मगर जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि की आवाज को क्या किसी जमाने में शासक वर्ग दबा सका है।....दरअसल फैज में जो क्रांति है उसे उन्होंने एक इश्किया जामा पहना दिया है।
कुछ परंपराएं, चाहे वे साहित्य की हों, संस्कृति की हों या अन्य सामाजिक क्षेत्रों की, अपनी एतिहासिक भूमिका निभाने के बाद अपनी मौत आप मर जाती हैं। उन्हें नए सिरे से जिलाने का मतलब गड़े मुर्दे उखाड़ना और ऐतिहासिक विकास से अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना है। लेकिन फैज की रचनाएं दोनों युगों के संधिकाल पर ही नहीं खडी हैं बल्कि आज के रचनाकारों को रास्ता भी दिखाती हैं। आज का शायद ही कोई मशहूर शायर हो जो फैज की छाया से बाहर निकलने का साहस दिखा सके। उनके किसी शेर उनका नाम पढ़े बिना हम बता सकते हैं कि यह 'फैज' का शेर है। उर्दू के एक बुजुर्ग शायर 'असर' लखनवी ने शायद बिलकुल ठीक लिखा है कि '' 'फै ज' की शायरी तरक्की के मदारिज (दर्जे' तय करके अब इस नुक्ता-ए-उरूज (शिखर-बिन्दु) पर पहुंच गई है, जिस तक शायद ही किसी दूसरे तरक्की-पसंद (प्रगतिशील) शायर की रसाई हुई हो। तखय्युल (कल्पना) ने सनाअत (शिल्प) के जौहर दिखाए हैं और मासूम जज्बात को हसीन पैकर (आकार) बख्शा है। ऐसा मालूम होता है कि परियों का एक गौल (झुण्ड) एक तिलिस्मी फजा (जादुई वातावरण) में इस तरह मस्ते-परवाज (उड़ने में मस्त) है कि एक पर एक की छूत पड़ रही है और कौसे-कुजह (इन्द्रधनुष) के अक्कास (प्रतिरूपक) बादलों से सबरंगी बारिश हो रही है......................।''
अपनी शायरी की तरह अपने व्यक्तिगत जीवन में भी किसी ने उन्हें ऊंचा बोलते नहीं सुना। बातचीत के अतिरिक्त मुशायरों में भी वह इस तरह अपने शेर पढ़ते हैं जैसे उनके होंठों से यदि एक जरा ऊंची आवाज निकल गई तो न जाने कितने मोती चकनाचूर हो जाएंगे। वे सेना में कर्नल रहे, जहां किसी नर्मदिल अधिकारी की गुंजाइश नहीं होती। कॉलेज की प्रोफेसरी की, जहां कॉलेज के लड़के प्रोफेसर तक को अपना स्वभाव बदलने पर विवश कर दें। उन्होंने पत्रकारिता जैसा जोखिम का पेशा भी अपनाया और फिर जब पाकिस्तान सरकार ने इस देवता-स्वरूप व्यक्ति पर हिंसात्मक विद्रोह का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया तब भी मेजर मोहम्मद इसहाक ('फैज' के जेल के साथी) के कथनानुसार, ''कहीं पास-पड़ोस में तू-तू मैं-मैं हो, दोस्तों में तल्ख-कलामी हो, या यूं ही किसी ने त्योरी चढ़ा रखी हो, उनकी तबीयत जरूर खराब हो जाती थी और इसके साथ ही शायरी की कैफियत (मूड) भी काफूर हो जाती थी।''
फैज जिंदादिल इंसान हैं, उन्होंने ता-उम्र क्रांति की मशाल को हाथ में थामे रखा। हालांकि क्रांतितो सफल नहीं हुई। ऐसे में जो क्रांतिकारी कवि हैं वे निराश होकर बैठ जाते हैं। कई तो आत्महत्या कर लेते हैं और कई जमाने को गालियां देते हैं।
लेकिन फैज वैसे नहीं हैं। वे कहते हैं कि अभी फख्र करो कि तुममें जान बची है
बोल कि लब आजाद हैं तेरे
बोल जबां अब तक तेरी है
तेरा सुतवां जिस्म है तेरा
बोल कि जां अब तक तेरी है
उनका एक शेर है- ''करो कुज जबी पे सर-ए-कफन, मेरे कातिलों को गुमां न हो। कि गुरूर इश्क का बांकपन, पसेमर्ग हमने भुला दिया।'' अर्थात कफन में लिपटे हुए मेरे शरीर के माथे पर टोपी थोड़ी तिरछी कर दो, इसलिए कि मेरी हत्या करनेवालों का यह भरम नहीं होना चाहिए कि मरने के बाद मुझ में प्रेम के स्वाभिमान का बांकपन नहीं रह गया है। ऐसे थे हरदिल अजीज शायर फैज अहमद फैज।

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