रविवार, 9 अक्तूबर 2011

... आखिर क्यों अंकल सैम नजर आते हैं अन्ना


चंदन राय
राम विलास शर्मा ने कभी जिक्र किया था, हर कुत्ता जो आपके घर की ओर मुंह उठाकर भूंकता हो, को लट्ठ लेकर नहीं दौड़ाना चाहिए। अन्ना हजारे और उनके कट्टर समर्थक आजकल यही करते नजर आ रहे हैं। बाल ठाकरे ने कुछ कह दिया, तो उसे दौड़ा लिया। कांग्रेस के किसी अदने से मंत्री ने भी टीका-टिप्पणी कर दी, तो बयानबाजियों का दौर शुरू हो गया। अगर अरुंधति राय ने जनलोकपाल पर कुछ सवाल खड़े किए, तो वे भी उनके निशाने पर हो ग। आखिर क्यों कटखने होते जा रहे हैं अन्ना टीम के लोग? अमेरिका कहता है, जो हमारे साथ है, वह मित्र और जो साथ नहीं है, वह हमारा दुश्मन। अन्ना सहयोगी भी कुछ-कुछ इसी राह पर चल रहे हैं। वे एकजुट होकर अन्ना विरोधियों पर हमला बोलते हैं। हाथों में झंडे लिए भारत माता के गीत गाते हुए लोकतंत्र पर अप्रत्यक्ष हमला बोलते हैं। एक वरिष्ठ पत्रकार महोदय को फोन आता है, आप उन लोगों के नाम और इमेल एड्रेस बताएं, जिन्होंने अन्ना आंदोलन के खिलाफ कुछ लिखा या बोला हो। हमारे सहयोगी ने बहाना बनाकर निकल लेने में ही भलाई समझी। एक और अन्ना सहयोगी बताते हैं कि उन लोगों को कानूनी नोटिस भेजा जाना है, जिन्होंने अन्ना आंदोलन के विरोध में कुछ लिखा हो। डर लगता है, अपने लिखे को भी एक बार पलटकर देखता हूं, कहीं भूलवश महात्मा का दर्जा पाए व्यक्ति के खिलाफ कभी कुछ कहने या लिखने की गुस्ताखी तो नहीं कर बैठा। फिर पता चलता है, वे छोटे पत्रकारों की बजाय बड़े लोगों को निशाना बना रहे हैं। वे अदने से पत्रकार को अनावश्यक चर्चा के केंद्र में नहीं लाना चाहते। खैर बताता चलूं कि उनकी इस लिस्ट में अन्ना के खिलाफ एक किताब लिख चुके दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉक्टर प्रेम सिंह भी नहीं हैं। ये कौन सी वैचारिक तानाशाही का घूंट देश को पिलाया जा रहा है, जो किसी की सुनने के लिए तैयार नहीं। डर लगता है, हिटलर भी कभी राष्ट्रवाद का नारा लगाते हुए ही सत्ता की सीढिय़ों पर चढ़ता मदांध तानाशाह बना था।
अरुणा रॉय , जेपी के लोकपाल ड्राफ्ट पर अगर संसद चर्चा करना चाहती हो, तो आखिर इसमें आपत्ति क्या है? क्यों अन्ना जनलोकपाल बिल पर संसद में चर्चा के लिए भी तैयार नहीं। आखिर इसके पीछे क्या वजह हो सकती है? ये वैचारिक तानाशाही नहीं, तो और क्या है-क्या अन्ना समर्थक इस बात का जवाब देंगे। अरविंद की मीटिंग में पहले भी गया हूं। मैंने ऐसा महसूस किया कि वे बहस-मुबाहिसे में ज्यादा विश्वास नहीं करते। अगर किसी ने विरोध किया, तो उसे दरकिनार कर दिया गया। ठीक उसी तरह, जैसे जस्टिस संतोष हेगड़े अन्ना मंडली से उसी दिन साइड कर दिए गए, जब उन्होंने कहा कि पीएम और न्यायपालिका को जनलोकपाल के दायरे से बाहर रखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि ये उनका व्यक्तिगत विचार है।लेकिन उन्हें सफाई देने के लिए समय भी नहीं दिया गया और अनसुना फरमान जारी हो गया। वे धीरे-धीरे इस आंदोलन से कटते चले गए।
अमेरिकी खुफिॅया एजेंसी एफबीआई और इजराइल के मोसाद जैसे बदनाम संगठन दक्षिण अमेरिका अफ्रीका और कई अमेरिका विरोधी देशों में लोकतांत्रिक सरकारों के खिलाफ धन देर सरकार गिराने का प्रयास कर चुके हैं। अगर वे इसमें सफल नहीं होते, तो सरकार विरोधी गुटों को धन देकर छापेमार लड़ाकों की फौज खड़ी करने में भी गुरेज नहीं करते। अन्ना आंदोलन में तो नहीं, लेकिन अरविंद केजरीवाल और मैडम किरण बेदी के कई गैर सरकारी संगठनों को विदेशी धन दिए जाने के ठोस सबूत सामने आए हैं। फोर्ड फाउंडेशन और लेहमैन ब्रदर्स आखिर सीएसआर के नाम पर ऐसे देशों में पैसा लगाकर कोई आंदोलन क्यों खड़ा करना चाहते हैं। आखिर इसके पीछे उनका क्या हित है? खैर दूर जाने की जरूरत नहीं। कुछ दिनों तक अरविंद बनाम मनीष सिसौदिया के एनजीओ कबीर में काम करने का मौका मिला, जिसमें फोर्ड फाउंडेशन का पैसा आता है। बीच में अरविंद ने स्वराज अभियान चलाया, जिसमें फोर्ड से भी मदद मांगी गई, लेकिन उनकी ओर से कोई मदद नहीं दी गई। आश्चर्य इस बात को लेकर था कि पैसा क्यों नहीं दिया गया? मेरी सहज बुद्धि इसी निष्कर्ष पर पहुंच सकी कि जिस पैसे से सरकार कमजोर होती हो, लोकतंत्र की चूलें हिलाई जा सकती हों, सरकार को अस्थिर किया जा सकता हो, ऐसे मामलों में तो खूब पैसा दिया गया, लेकिन स्वराज आंदोलन जिससे उनका हित न सधता हो, में पैसा फेंकने से मल्टी नेशनल कंपनियों का क्या मतलब? जिस आंदोलनकारी को विदेशी पैसे लेने से गुरेज नहीं, वह क्या खाक स्वदेशी की बात करेगा। लेकिन कई हमारे समाजवादी मित्र भी आजकल इस आंदोलन के इर्द-गिर्द मंडराने लगे हैं। उन्हें इस बात का डर सता रहा होगा कि आज तक अपने बूते कोई आंदोलन तो नहीं खड़ा कर सके, तो चलो इन्हीं के साथ गंगा नहा लें। पर इनके साथ खड़े होने के अपने खतरे भी हैं। राजनीतिक विश्लेषक इस बात को चाहे जितना भी नकारें, कांग्रेस विरोध का एकमात्र मकसद भाजपा को आगे बढ़ाना है। या तो अन्ना कोई राजनीतिक विकल्प खडी करें या फिर भाजपा की गोद में जाकर बैठ जाएं। अब तो इतिहास ही तय करेगा कि अन्ना आंदोलन को वह कौन सा दर्जा देता है। एक अन्ना समर्थक कल कह रहे थे कि हम जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति को भी पीछे छोड़ चुके हैं। मैंने कहा कि जेपी के समय मीडिया नहीं था, नहीं तो वे भी जननायक की जगह महात्मा या उससे भी ऊपर की चीज होते। खतरा तो इस बात का भी है कि महात्मा गांधी के बराबर आने की होड़ में उनके समर्थक कहीं उन्हें राष्ट्रपिता से भी ऊपर की चीज न ठहराने लगें। ये तो तय है कि बाजारवाद के इस दौर में मीडिया ने अन्ना को एक सबसे ज्यादा सेलेबल प्रोडक्ट जरूर बना दिया है। जी हां, बाजार में सबसे बिकाऊ माल बन चुके हैं अन्ना। एक जबरदस्त यूथ आइकॉन बन चुके हैं अन्ना। हॉलीवुड स्टार की बजाय लड़कियां अब नंगी पीठ पर अन्ना का टैटू लगा रही हैं।
मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना- अन्ना-अन्ना और बस अन्ना। लोकतंत्र में हर बीमारी की रामबाण हैं अन्ना। हर मर्ज, हर कष्ट, हर दुख-दर्द की दवा हैं अन्ना। अन्ना ही तय करेंगे कि किसकी सरकार बननी है और किसकी नहीं। वे जबरदस्त जनसमर्थन से बौखला गए हैं। वे समझ भी नहीं पा रहे कि आखिर रालेगण सिद्धि जैसे छोटे गांव से उठकर वे कब और कैसे जननायक बन बैठे। मैं अन्ना का समर्थक या विरोधी नहीं, न ही कांग्रेस का समर्थक या विरोधी हूं, बल्कि इस देश का आम नागरिक हूं। मेरी भी अपनी पीड़ा है, दुख दर्द हैं। मैं अपनी रोज की लड़ाई में ही उलझा रहने वाला इंसान हूं। मेरे पास कोई विदेशी फंड के गुमनाम खातों से आता पैसा भी नहीं। आखिर मैं कहा जाऊं। किससे अपनी पीड़ा कहूं, क्या जनलोकपाल विधेयक पारित हो जाने से मेरी नौकरी सुरक्षित रह पाएगी। क्या इसके बाद मुझे राशन कार्ड बनाने के लिए दलालों को पैसा नहीं देना होगा, क्या पासपोर्ट, वीजा बनवाने के लिए जेब नहीं ढीली करनी होगी,क्या देश में रामराज्य आ जाएगा। पता नहीं, कौन सा सपना लोगों को दिखा रही है अन्ना टीम।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें