Friday, May 28, 2010

कब सीखेंगे विचारों का सम्मान करना

चंदन राय

भारत में अभी भी बहुसंख्यक लोग हैं जो फतवों की दुनिया में ही जीते हैं। फतवों का आशय मेरे विचार में धर्म की रक्षा करना रहा होगा। इसलिए जब कुछ लोगों को ऐसा महसूस होता है कि धर्म खतरे में है, वे उसकी रक्षा के लिए हथियार लेकर सामने आ जाते हैं। चाहे संघ के कार्यकर्ता हों या फतवा जारी करने वाले मुल्ला-मौलवी। कुछ ऐसा ही हुआ अभी ईरान में जहां तेहरान के धर्मगुरु होजत ओ इस्लाम काजम सेदिगी ने लडक़ियों को लो कट टॉप्स और शार्टस पहनने से मना किया। उनका कहना था कि इसी के कारण प्राकृतिक आपदाएं भूकंप, बाढ, सूखा, अकालआदि आते हैं। इंडाना की स्टूडेंट जेनिफर मैग्राइट ने साहस दिखाते हुए इसका विरोध करने का एक अनोखा तरीका ढूंढ़ निकाला। मात्र 20 साल की जेनिफर ने सोशल नेटवर्किंग साइट पर जाकर इसके खिलाफ एक कैंपेन शुरू किया। उसने लडक़ियों से ऐसे कपडे पहनने की अपील की, जो पुरुषों के लिए कामोत्तेजक हों। देखते ही देखते करीब डेढ लाख महिलाएं इस साइट पर पहुंची और करीब 90 हजार महिलाओं ने बदनदिखाऊ कपडे पहनने का फैसला किया। अब संयोग की बात देखिए कि 26 अप्रैल को जब इन लडक़ियों ने ऐसे कपडे पहने, उसी दिन ताईवान में भूकंप आ गया। धर्मगुरुओं ने फिर कमान संभाली-देखिए, मैं न कहता था कि ऐसे कपडे पहनना अल्लाह को मंजूर नहीं। ईरान सरकार चेती और उसने इस्लामिक ड्रेसकोड की अनदेखी करने वालों पर कानूनी कार्रवाई करने की चेतावनी दी। ये दोनों सच्ची घटनाएं चुटकुले जैसी लगती हैं, लेकिन हमारे समाज की यही खूबी है कि यहां हर मिजाज के चुटकुले चलते हैं। एक लोकतांत्रिक देश में तो इस बात की उम्मीद की ही जा सकती है कि हम दूसरों के विचारों की इज्जत करें, चाहे हम उनसे सहमत हों या नहीं। यही कारण है कि भारत में ब्रह्मचर्य की वकालत करने वाले साधु-संत भी सिर माथे लिए गए और वात्सयायन भी पूजे गए जिन्होंने एक-दो नहीं, बल्कि दुनिया को कामशास्त्र की चौसठ कलाएं सीखाईं। मतलब सिर्फ इतना है कि अगर आप अपनी बात बलात् नहीं थोप रहे हैं तो हर तरह की राय का स्वागत होना चाहिए। आपको जो रास्ता अच्छा लगे, जरुर चलें लेकिन एक रास्ते पर चलें और दूसरे पर थूकें, उचित नहीं।
इन तमाम घटनाओं के जिक्र करने की जरुरत इसलिए पडी क्योंकि अपने देश में भी दूसरों के विचारों के प्रति सहिष्णुता खत्म होती जा रही है। दक्षिण की अभिनेत्री खुशबू के प्रकरण को ही लें। विवाह पूर्व यौन-संबंधों को सही ठहराने के कारण उन्हें समाज के बहुसंख्यक हिस्से का कोपभाजन बनना पडा। हो सकता है कि उनका मकसद मीडिया की सुर्खियां बटोरना रहा हो या फिर कांग्रेस का टिकट लेकर सत्ता के गलियारे तक पहुंचना। हमारा मकसद इस बात को जांचना-परखना है कि समाज ने उनके निजी विचारों को किस तरीके से लिया। देखते-देखते उनके खिलाफ ऐसा विषाक्त माहौल बना कि देशभर में 22 मुकदमे दायर कर दिए गए। देश में जगह-जगह धर्म के ठेकेदारों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। एक बार फिर ऐसा लगा कि हमारे विचारों की सहिष्णुता खतरे में है। कुछ ऐसी ही स्थितियों का सामना तसलीमा नसरीन को अपने वतन बांग्ला देश में करना पडा था। जब विवादास्पद लेखों के कारण जगह-जगह फतवे जारी होने लगे और अपनी रक्षा के लिए उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी पडी। मशहूर पेंटर मकबूल फिदा हुसैन से लेकर तसलीमा नसरीन एवं सलमान रश्दी जैसे शख्सियतों को भी समाज के इस तबके का कोपभाजन बनना पडा है। आखिर क्यों हम सोचते हैं कि दुनिया हमारे विचारों के अनुसार ही चले? आखिर क्यों हमें ऐसा लगता है कि दूसरों के विचार हमारे अस्तित्व के लिए खतरे की तरह हैं?
तसलीमा नसरीन 'मैं स्वेच्छाचारी' लेख में कहती हैं, ''जब मैं किशोरी थी,कदम-कदम पर निषेधाज्ञा जारी थी। घर से बाहर मत जाना। खेलना-कूदना नहीं। सिनेमा-थियेटर मत जाना। किसी लडक़े-छोकरे की तरफ आंख उठाकर मत देखना। किसी से प्रेम मत करना-लेकिन मैंने सब किया। मैंने किया, क्योंकि मेरा करने का मन हुआ। कोई भी काम करते हुए लोगों ने क्या कहा-क्या नहीं कहा, मैंने यह कभी नहीं देखा। मैंने यह देखा कि मैंने खुद को क्या तर्क दिए। अपनी चाह या इच्छा के सामने मैं पूरी ईमानदारी से खडी होती हूं। अपना भयभीत, पराजित, नतमस्तक, हाथ जोडे हुए यह रूप मेरी ही नजर को बर्दाश्त नहीं होगा, मैं जानती हूं।...मेरा जो मन करता है, मैं वही करती हूं। हां, किसी का ध्वंस करके कुछ नहीं करती।'' यहीं से दूसरों की स्वतंत्रता शुरू होती है, जहां हम किसी के विचारों को ध्वंस करने की इच्छा नहीं रखते। तसलीमा नसरीन के क्रांतिकारी लेखों से कुछ मौलवियों को ऐसा लगा कि इससे तो इस्लाम ही खतरे में आ जाएगा। बुर्के में रहने वाले समाज को इतनी आजादी देनी उचित नहीं। जहां खतरा धर्म पर मंडराने का दिखलाया जाए, तो फिर लोगों को बरगलाना आसान हो जाता है। वेलेंटाइन डे के दिन ही शिवसैनिक से लेकर बजरंग दल और न जाने कौन-कौन से लोग हाथों में तलवार लेकर धर्मरक्षार्थ बिल से निकल आते हैं। यहां मतलब पाश्चात्य शैली के विरोध करने से ज्यादा, उन लडक़ियों को सबक सीखाना होता है, जो घर की चहारदीवारी लांघ कर मुहब्बत का इजहार करने का दुस्साहस करती हैं। और यह सब होता है भारतीय संस्कृति की रक्षा के नाम पर। ऐसे लोग हमारी सहिष्णुता एवं समरसता की संस्कृति को भूल जाते हैं, जो दुश्मनों की संस्कृति को भी आत्मसात करने का माद्दा रखती है। अगर हमारी संस्कृति इतनी ही कमजोर होती, तो विदेशी हमलावरों के आगे कब की हथियार डाल चुकी होती, जो एक हाथ में तलवार, तो दूसरे हाथ में ध्वजदंड लेकर ही मैदान में आते थे। लेकिन इसी बहाने इन पाखंडियों को यह अधिकार मिल जाता है कि दो प्रेमी युगलों को सरेआम सडक़ पर घसीटें, मारें, जो चाहे करें। चाहे विरोध करने वाले वही शख्स रात के अंधेरे में किसी महिला का शील-हरण करने के लिए उद्दत क्यों न हों।
एक बार फिर बात करते हैं फिल्म अभिनेत्री खुशबू की। देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था ने कहा कि लिव इन रिलेशन और विवाह पूर्व संबंधों पर ये उनके निजी विचार हैं। अगर दो लोग राजी-खुशी बिना शादी के साथ रहते हैं, तो इसमें कौन से कानून का उल्लंघन होता है? इस मामले में किसी को ये अधिकार नहीं है कि दूसरों के निजी विचारों को लेकर हंगामा खडा करें। इस फैसले के बाद अभिनेत्री खुशबू का कहना है कि मैं अपने विचारों को लेकर शर्मिंदा नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने भी मेरे विचारों को और मजबूती दी है। खुशबू ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि पुरुषों को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि उनकी औरत वर्जिन हो और लडक़ियों को भी शादी पूर्व संबंधों में सुरक्षात्मक उपाय अपनाने चाहिए। यह बयान आने के बाद लोगों ने आरोप लगाया कि इससे तमिल महिलाओं की अस्मिता को ठेस पहुंची है। हालांकि उन्हाेंने अपने इंटरव्यू में कहीं भी तमिल लडक़ियों के चरित्र पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं की थी। संविधान ने हमें इस बात की स्वतंत्रता दी है कि सार्वजनिक मसलों पर हम अपने निजी विचार व्यक्त कर सकते हैं, जब तक कि इसका असर देश की आंतरिक सुरक्षा या दूसरे देशों के संबंधों पर न पडता हो। हां, निजी विचार व्यक्त करने का मतलब दूसरों के साथ गाली-गलौज करना नहीं हो सकता। हमें अपनी स्वतंत्रता के साथ दूसरों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी सम्मान करना चाहिए।
अभी कुछ ही दिन हुए जब फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने अपने देश में बुर्के पर प्रतिबंध लगाए जाने का ऐलान करते हुए अपने देश की संसद में कहा था की हम अपने देश में ऐसी महिलाओं को नहीं देख सकते जो पर्दे में कैद हों, सभी सामाजिक गतिविधियों से कटी हों और पहचान से वंचित हों। यह महिलाओं की गरिमा के हमारे विचार से मेल नहीं खाता। साथ में उन्होंने यह भी कहा कि हमें हर हाल में यह सुनिश्चित करना चाहिए कि फ्रांस में इस्लाम धर्म को मानने वाले लोगों का भी उसी प्रकार सम्मान हो जैसा किसी भी दूसरे धर्म के लोगों का होता है। अपने विचार रखने के साथ-साथ दूसरे के विचारों को सम्मान देकर ही सरकोजी कटटरपंथियों के निशाने से बचे रहे। हमें भी अपने विचारों में इसी तरह के संतुलन रखने की जरुरत है, ताकि दूसरे वर्ग की भावनाएं आहत न हों और हमारी कहने की स्वंतत्रता भी बची रह सके।

लोकतंत्र के मंदिर में अपशब्दों का मंत्रपाठ

आ ज से करीब सौ साल पहले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के संसदीय लोकतंत्र को वैश्या बताने पर काफी हंगामा मचा था। गांधी जी ने यह टिप्पणी क्यों की, यह काफी विवाद का विषय हो सकता है क्योंकि इस कथन में वैश्याओं का अपमान छिपा है। इससे गांधी जी की संसद के प्रति मंशा जरूर जाहिर होती है कि वे उस समय संसद को कितना निकृष्ट मान रहे थे। ब्रिटिश महिलाओं ने इसको लेकर काफी हाय-तौबा भी मचाई थी। गांधी ने बाद में लोगों की तीव्र प्रतिक्रिया देखते हुए इसे बांझ महिला कहना ज्यादा उचित समझा। बात 1909 की है और आज हम लोकतंत्र का पंद्रहवां महोत्सव मनाने में मगन हैं। लेकिन आज सांसदों के आचरण को देखकर ऐसा लगता है कि गांधी की पहली प्रतिक्रिया ही ज्यादा सटीक और मारक थी। आज अजीज प्रेमजी, चेतन भगत, सचिन तेंदुलकर, शाहरूख खान, नारायण कार्तिकेयन, नारायण मूर्ति, महाश्वेता देवी सभी नई पीढी क़े रोल मॉडल हैं। लेकिन नेताओं के लिए बडे शर्म की बात है कि इनमें एक नाम भी सियासतदां लोगों का नहीं है। अभी आधी सदी गुजरी है, जब गांधी, पंडित जी, पटेल, नेताजी, लोहिया से लेकर जयप्रकाश नारायण तक की मूर्तियां लोग शौक से अपने ड्राइंग रूम में लगाना पसंद करते थे। लेकिन आज नेताओं की तस्वीरें वहां से गायब हैं। अगर कहीं मैडम या प्रधानमंत्री की तस्वीरें दिखती भी हैं तो नेताओं के दफ्तर में, ताकि सोनिया दरबार में उनकी हाजिरी बराबर लगती रहे।
आज संसदीय लोकतंत्र को सबसे बडा खतरा न तो विदेशी मुल्क से है और न हीं नक्सलियों से। देश के मंदिर को सबसे बडा खतरा तो यहां के पुजारियों और भक्तों से है। हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा-जब हर पार्टियों में बाहुबलियों को बुला-बुलाकर टिकट दिया जा रहा हो, तो संसद गाली-गलौज का अड्डा तो बनना ही था। आज राजनेता अपराधी नहीं हैं, बल्कि अपराधी ही राजनेता बनते जा रहे हैं। जब करोडाें रुपए खर्च कर चुनाव जीतेंगे, तो पांच साल तक तो उनका दिमाग स्विस बैंक की तिजोरियों में ही लगा होगा ना। देश के लिए यह शर्म की बात है कि हमारे माननीय सांसदों को संसद से खींचकर बाहर निकालने के लिए मार्शल बुलाने की जरूरत पडती है। जो देश चलाने का दावा करते हैं, वे चार मार्शलों के सहारे सदन से बाहर धकेले जाते हैं। आज आसन तक पहुंचकर ही उन्हें लगता है कि वे अपनी आवाज लोगों तक पहुंचा सकेंगे। राजद नेता लालूप्रसाद यादव ने एक बार लोकसभा अध्यक्षा मीरा कुमार की नाराजगी पर बोलते हुए कहा- ''हम लोगों का फैशन नहीं है कि आपकी सीट तक आ जाएं लेकिन जब कोई नहीं सुनता है तो नजदीक जाना पडता है। इसको अन्यथा न लें।'' लोकतंत्र तभी जीवित रह सकता है जब हम दूसरों के विचारों को भी सम्मान दें। विचारों से असहमति होने पर भी असहमति से सहमति तो दिखानी ही होगी। इसीलिए पुराने राजनेता इसे शासन पध्दति नहीं, बल्कि जीवन पध्दति मानते थे। वे यह समझते थे कि वाद-विवाद से ही तो संवाद की स्थिति बनेगी, जिससे आम लोगों की बेहतरी के लिए काम किया जा सकता है। लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं कि सभी दल आसन के पास जाकर जोर आजमाईश करें।
इन दिनों संसद में लालू जी फिर नाराज हैं। लालू जी नाराज हों तो संसद में कुछ न कुछ होता ही है। लोगों को अंदेशा था कि सदन एक बार फिर माननीय सांसदों पर होने वाले माइक और जूते-चप्पलों की बौछार का साक्षी बनेगा। लालू जी पहलवानी के अंदाज में लगभग बांह मोडते हुए भाजपा नेता अनंत कुमार की ओर बढे। लेकिन एकाएक जैसे लालू जी को अपने संख्या बल का ब्रह्मज्ञान हुआ और विपक्ष के समझाने पर वे चुप बैठ गए। लेकिन भाजपा नेता अनंत कुमार का गुस्सा शांत नहीं हुआ था। यह विवाद जनगणना में जाति का आधार शामिल करने को लेकर बहस के दौरान हुआ था। भाजपा संघ के प्रिय मुद्दे घुसपैठिए बांग्लादेशियों की राष्ट्रीयता के सवाल पर गरमा रही थी। लालू के टोका-टांकी पर अनंत कुमार ने उनकी ओर यह जुमला दागा कि पहले आप बताएं आप भारत के साथ हैं या बांग्लादेश या फिर पाकिस्तान के साथ। इतना कहना था कि लालू जी आपे से बाहर। वे यह भूल चुके थे कि इससे पहले महिला विधेयक पर चर्चा के दौरान उन्होंने माकपा नेता बासुदेव आचार्य को भी ऐसी ही धमकी दी थी। एक बार लालू जी के बयान पर गौर फरमाएं-''यहां तीन यादवों की बात हो रही है , हम सब अपनी अपनी पार्टी के सुप्रीम हैं.. आपके यहां तो सब सुप्रीम खत्म हो गया है। आप न तो पाकिस्तान में हैं और न ही भारत में। ''करीब-करीब आशय वही था जो अभी अनंत कुमार व्यक्त कर चुके थे। पर लालू ये बर्दाश्त कैसे करें कि कोई उन्हें गद्दार या राष्ट्रविरोधी कहे।
बासुदेव आचार्य इसके पहले तृणमूल कांग्रेस के नेता सुदीप बंदोपाध्याय के निशाने पर भी रह चुके हैं। मुंबई में मोटरमैन हडताल के मुद्दे पर जब मुंबई का माहौल गरमाता जा रहा था, जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया था, माननीया रेल मंत्री कोलकाता में निगम के चुनाव में व्यस्त थीं। जब इसी को लेकर बासुदेव आचार्य ने सवाल खडे क़िए तो सदन में मौजूद सदस्य सुदीप बंदोपाध्याय की अशोभनीय टिप्पणी पर हक्के-बक्के रह गए। लालू-अनंत प्रकरण के पहले ही लोकसभा अध्यक्षा ने सुदीप बंदोपाध्याय की असंसदीय भाषा को लेकर फटकार लगाई थी। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा था कि आसन सदन के किसी भी सदस्य के दोबारा ऐसा व्यवहार बर्दाश्त नहीं करेगा। लेकिन आखिर इसकी परवाह किसे थी? कभी पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने सांसदों के आचरण को लेकर सच ही कहा था कि आप लोकतंत्र को खत्म करने के लिए ओवर-टाइम काम कर रहे हैं।
इसके पहले भी सांसद सभापति के हाथों से महिला आरक्षण विधेयक की प्रतियां छीनकर फाड चुके हैं। इस हल्ले-हंगामे में सभापति का माइक भी उखड ग़या था। सपा के अन्य सांसद भी गुस्से में सभापति के आसन की ओर बढे। अंत में संसद की गरिमा बरकरार रखने के लिए मार्शल बुलाना पडा और उसके बाद जो कुछ हुआ, वह काफी शर्मनाक था। एक बात तो तय है कि अगर सांसदों का आचरण नहीं सुधरा तो लोग संसद की प्रासंगिकता पर ही सवाल खडे क़रने लगेंगे और तब लोकतंत्र के सचेतकों को भी बुरा नहीं लगेगा। अभी अगर संसद में लोगों से हाथ उठवा लें, तो आपको इक्के-दुक्के लोग ही मिलेंगे, जिनपर भ्रष्टाचार, गबन या आपराधिक मामलों का कोई केस न चल रहा हो। अभी कुछ दिनों पहले सभापति के बुलावे पर स्कूल के बच्चे लोकतंत्र का पाठ सीखने के लिए देश के सुपर पंचायत आए थे। हंगामों का दौर जारी था, सांसद लडने-भिडने की मुद्रा में आ चुके थे और उम्मीद थी कि कुछ समय बाद ही संसद की कार्यवाही को टाल दिया जाएगा। हुआ यही और लोकतंत्र की धुंधली तस्वीर अपने जेहन में लेकर ये बच्चे वहां से रुखसत हुए। क्या ये बच्चे बडे होकर कभी वोट देने के बारे में भी सोचेंगे? लोकतंत्र के प्रति युवा वर्ग की विरक्ति यही बताती है कि कोउ नृप होउ, हमें का हानि। इन परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार हमारे आज के राजनेता होंगे और कोई नहीं।
हम लोकतंत्र के सफर में एक ऐसे चौराहे पर आकर खडे हैं, जहां से आगे का रास्ता हमें नहीं सूझ रहा। रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था-''नेता का अब नाम नहीं ले, अंधेपन से काम नहीं ले, हवा देश की बदल गई है, चांद और सूरज ये भी अब, छिपकर नोट जमा करते हैं, और जानता नहीं अभागे, मंदिर का देवता चोर बाजारी में पकडा जाता है? फूल इसे पहनाएगा तू? अपना हाथ घिनाएगा तू?'' नेताओं को लेकर दिनकर की चिंता आज भयावह रूप ले चुकी है। आज जनता पीछे छूट गई और जनता के प्रतिनिधि कहां से कहां निकल गए?
तभी तो दिनकर आजादी के बाद ही नेताओं से सवाल पूछते हैं-''जनता की छाती भिदें, और तुम नींद करो, अपने भर तो यह जुल्म नहीं होने दूंगा, तुम बुरा कहो या भला, मुझे परवाह नहीं, पर दोपहरी मैं तुम्हें नहीं सोने दूंगा।'' यह हिसाब लगाना उचित नहीं कि संसद की कार्यवाही पर प्रति सेकेंड कितने लाख रुपए खर्च होते हैं और उन्हें कितना वेतन-भत्ता मिलता है जिसके लिए वे हमेशा लालायित रहते हैं, लेकिन जनता को यह पूछने का हक है कि आपने सुप्रीम पंचायत में हमारी कितनी मांगें रखीं। आपने बजट सत्र के 115 घंटे लडने-झगडने में क्यों बरबाद किए? आखिर भारत की भूखी-नंगी जनता ही तो उन्हें वेतन से लेकर तमाम सहूलियतें देती है, इसलिए मालिक को यह पूछने का हक है कि तुमने सही ढंग से काम क्यों नहीं किया? आज नहीं तो कल जनता इनका हिसाब लेगी और माननीय सांसदों को जवाब देना होगा।

सावधान, वहशी दरिंदे शहर में हैं

याद है आपको निठारी की खूनी हवेली डी-5 का सच। न जाने कई मासूमों की सिसकियां इन हवेलियों की चहारदीवारियों में कैद हैं। खून से सना ड्राइंगरूम चीख-चीखकर इन राक्षसों की हैवानियत को बयान करता है। इस हवेली के पास कोई भी बच्चा आया, तो जिंदा वापस नहीं जा सका। यहां दो जीवित प्रेतात्माओं का वास था, जो इन मासूमों को अपने हवस का शिकार बनाते थे और बेरहमी से कत्ल कर उनके अधपके गोश्त के साथ जश्न मनाते थे। लेकिन ये हैवान अभी भी जिंदा हैं, आपके घर के आसपास, शातिर नजरों से किसी मासूम को घूरते हुए। उन्हें इंतजार होता है किसी मासूम के अकेलेपन का। मौका मिलते ही ये वहशी दरिंदे अपने असली रूप में बाघ-नख की तरह शिकार की चीर-फाड क़रने बाहर निकल आते हैं। मासूम ये समझ भी नहीं पाता कि उसके साथ समाज कितना घिनौना खेल खेल रहा है। वह हर उस शख्स को अपने पिता के नायकत्व या फिर कहें आदर्श की नजर से देखता है। वह समझ नहीं पाता कि चॉकलेट के लोभ में उसे ऐसा जख्म दिया जाएगा, जो ताउम्र उसकी नजर में समाज को व्यभिचारी बना देगा। हर रिश्तों का मानी तार-तार हो जाएगा। उसकी ओर प्रेम से बढे हर हाथ को वो शंका की नजर से देखेगा। यह एक ऐसा मनोवैज्ञानिक रोग होगा, जो एक डरे हुए भयभीत समाज को जन्म देगा।
ब्लादिमीर नोबोकोव के विश्वविख्यात उपन्यास लौलिता की सराहना करते कई लोग मिल जाएंगे। लेकिन इस उपन्यास को लौलिता की नजर से देखने का साहस कितनों में है? एक मासूम बचपन को वासना के गंदे दलदल में धकेलने के जिम्मेदार शख्स को हम नायकत्व देने का साहस दिखाते हैं, तो कहीं न कहीं वो कुंठित विचार हमारे भीतर भी मौजूद हैं, यह इसी बात की गवाही है। हो सकता है कि लौलिता ने नायक (?) की एंट्री से पहले ही सहपाठियों में यौन-अभिरुचि दिखाई हो। लेकिन हमारे वहशी नायक ने उसे दलदल से बाहर निकालने की बजाय उसे और गहरे धकेलने का ही तो काम किया। अभी हमारे यहां सेना का एक लेफ्टिनेेंट कर्नल मासूम बच्चों के पोर्नोग्राफी इंटरनेट पर डालने के आरोप में पकडा गया है। कहते हैं इसपर देश-विदेश के खुफिया एजेंसियों की नजरें पहले से थीं। हालांकि सेना में सहकर्मियों के साथ यौन-शोषण के आरोप पहले भी लगते रहे हैं। लेकिन यह एक ऐसा आरोप है जो मासूमों के प्रति समाज की घोर उपेक्षा को ही दर्शाता है। देश का भविष्य, कल के भारत की तस्वीर और न जाने क्या-क्या विशेषण हम इन मासूमों के लिए प्रयोग में लाते हैं। लेकिन सभ्य समाज के भले मानसों के दिमाग के किसी कोने में एक ऐसा कीडा कुलबुला रहा होता है, जो इन अबोधोेंं की मासूमियत छीनकर अपनी सभ्यता का भौंडा प्रदर्शन करता है। शायद इन मासूमों की चीख उनकी काम वासना को और तीव्र ही करती होगी।
ये इस बात का परिचय है कि हम 21वीं सदी से आगे का सफर तय करने जा रहे हैं। उत्तर आधुनिकता का जाप करने वाले कुछ लेखक पहले तो ये तय कर लें कि क्या यह समाज आधुनिक होने के स्तर पर भी खडा हो सका है? बाजार के मानकों ने हमारे समाज के आदर्शों को धाराशायी कर दिया है। यहां हर एक व्यक्ति समाज की नजर में एक नंबर है, ऐसा प्रावधान सरकार करने जा रही है कि आपकी पहचान अब एक विशेष नंबर से किया जा सके। जो सरकार आम आदमी को विशेष नंबर से पहचानेगी, उसकी संवेदना समाज के प्रति कितनी मरी हुई होगी, इसका अंदाजा हम-आप खुद लगा सकते हैं। पश्चिम सभ्यता ने हमारे दरवाजे पर दस्तक दी और हमने पूरा दरवाजा ही उनके लिए खोल दिया। फिर समाज के प्रति उन संवेदनाओं को आने से भी हम भला कैसे रोक सकते थे, जो अपने मासूमों को निर्मम बाजार की भेंट चढा चुका हो। उन वहशियाना भेडियों को भी आने से रोकने का कोई तरीका नहीं था हमारे पास जो मासूमों को आसान शिकार बनाते हैं। कल हमारे बच्चे समाज के प्रति विकृति का भाव लेकर बडे होंगे और स्कूल में सहपाठियों पर दनादन गोलियां चलाएंगे। उसके लिए जिम्मेदार हम ही होंगे, मासूम बच्चे नहीं।
ऐसे बच्चे जो इन दरिंदों का शिकार होते हैं, वे समाज से कटे-कटे रहते हैं, चुप रहना एवं एकांतवास उन्हें ज्यादा पसंद होता है। समाज ने इनके दिलो-दिमाग पर जो गहरा जख्म दिया है, उसे भरने में वक्त तो लगेगा ही। हो सकता है समाज के प्रति ये विरक्ति उन्हें गलत रास्तों पर धकेल दे। फिर आनेवाली पीढियों में कई ऐसे होंगे, जो बडे होकर समाज के उसूलों को चुनौती देंगे। और हम कहेंगे, देखिए आज-कल के बच्चों को, संस्कार तो इनमें रहा ही नहीं। जब अपने बच्चों पर हम सारी जिम्मेदारियां लाद देंगे, असमय ही उनका बचपना छीन लेंगे, पैदा होते ही अव्वल रहने के करतब सिखाने लगेंगे, बच्चों को समय नहीं देंगे, तो ये मासूम अव्वल तो होंगे, लेकिन कुंठित इच्छाओं के साथ । फिर हम उनसे यह उम्मीद तो कतई न करें कि वे अपने मां-बाप का वही सम्मान करेंगे, जो कभी आपके समय में होता था। अक्सर देखा गया है कि नजदीक के रिश्तेदार या पडाेसी ही इन मासूमों को अपने हवस का शिकार बनाते हैं। ये ऐसे लोग होते हैं, जिनका आपके घर बराबर आना-जाना होता है। वे किसी ऐसे ही मौके की तलाश में होते हैं, जब वे इन मासूमों को शिकार बना सकें। आपके परिवार में ऐसे शख्स का इतना दबदबा होता है कि बच्चा डर से मुंह भी नहीं खोल पाता। वह अंदर ही अंदर घुटता है और समाज के प्रति संशय, शंका के साथ उपेक्षा का भाव लेकर बडा होता है।
एक हकीकत पर गौर फरमाएं। बिगडैल बच्चों को सुधारने के लिए उन्हें अपराधियों से दूर सुधार गृह में रखा जाता है। यहां की हकीकत भी शर्मसार करने वाली है, जिन अधिकारियों पर इनके चरित्र-निर्माण की जिम्मेदारी होती है, वही इनका चरित्र-हरण करने में अव्वल होते हैं। अनाथालयों में भी ऐसे वहशी दरिंदे आपको मिल जाएंगे, जो अनाथ बच्चों के साथ भी दुराचार करने से परहेज नहीं करते। जब मां-बाप ने ही इनके साथ न्याय नहीं किया, तो फिर वे समाज में भला किससे उम्मीद करें? मंदिरों में भी पंडे-पुजारियों पर कई बार ऐसे आरोप लगते रहे हैं, जो बाल यौन-शोषण में शामिल रहे हैं। लेकिन जब देश की सीमा पर बलिदान होने वाला सिपाही भी चाइल्ड पोर्नोग्राफी बनाता फिरे, तो फिर बाल-सुधार की उम्मीद किनसे की जा सकती है? देश-विदेश की खुफिया एजेंसियों की रडार पर यह सैन्य अधिकारी पहले से ही था। उसकी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी। यह इस बात का गवाह है कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी में रुचि लेने वाले लोगों की संख्या भी इन दिनों बढी है। अब यह जांच का विषय हो सकता है कि इस सैन्य अधिकारी ने पैसा बनाने के लिए मासूमों को बाजार में उतारा या फिर हवस का शिकार बनाने के लिए।
इंटरनेट पर बाल अश्लीलता को परोसने का मतलब है दुनियाभर में सक्रिय ऐसे यौन अपराधियों की कुंठा को जगाना। भारत में ऐसे मामले कम ही लोगों के सामने आ पाते हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि यहां बच्चों की मासूमियत से खिलवाड नहीं किया जाता। एस्कॉन से लेकर साईंधाम के मंदिरों में बिछे कालीनों के नीचे झांक कर देखें, तो धूल का ढेर मिलेगा, जो पुजारियों के धवल वस्त्र को दागदार करते हैं। जो यह बताता है कि सब कुछ साफ-सुथरा नहीं है, जैसा कि ऊपर से दिख रहा है। शहर में कई ऐसे भेडिए हैं, जो दिन के उजाले में ही मासूमों को हवस का शिकार बनाने के लिए निकलते हैं। उनकी खूंखार नजरें ऐसे मासूमों पर होती है, जो घर में अकेले हों या फिर घर से दूर किसी पार्क में हों। निठारी के दहशत से उबरने में समय तो लगेगा, लेकिन यह सदमा हमें कई और दूसरे निठारी न होने देने के लिए आगाह तो कर ही गया। सुरेंद्र कोली और पंढेर के साथ इस देश का कानून जो भी फैसला दे, ये शातिर मानवता के लिए खतरा बनकर सामने आते रहेंगे। मासूमों का बचपन असमय ही न छीन जाए, इसके लिए हमें बच्चों को समझना होगा, समय देना होगा, भले-बुरे की पहचान बतानी होगी, ताकि निठारी के प्रेत को हमेशा के लिए दफन किया जा सके। ताकि सोए हुए देश को जगाने के लिए फिर किसी मासूम को मरने के बाद कोर्ट में जाकर हड्डियों को गवाह के रूप में पेश न होना पडे। अाखिर इन अबोध मासूमों की हडिडयों ने ही तो इन अधम, नरपिशाचों की गवाही दी थी।

बेलगाम होती खाप

इन गांवों में जोडियां ऊपर से बनकर नहीं आती, सब कुछ पंचायतों में तय होता है। यहां प्रेम पर इन तालिबानियों का कडा पहरा है। हुक्के की गुडग़ुडी पंचों के बीच सुलगती-बुझती रहती है और उसी के साथ गांववालों की सांसें भी चढती-उतरती हैं।
मनोज-बबली की मौत के बाद से तो ऐसा लगता है मानो हर घर के आंगन में खाप पंचायतें मौजूद हों। महेंद्र सिंह टिकैत, चौटाला एवं नवीन जिंदल भी इसके दरबार में हाजिरी लगाने आते हैं। फैसला सुनाते समय खाप पंचायतों के बूढे शेरों के हाथों की ऊंगलियां सिकुड ज़ाती हैं और खूनी पंजे बाहर निकल आते हैं। मुंह रक्त से सन जाता है और इन पंचायतों की रवायत को जिंदा रखने के लिए नरबलि की जरूरत महसूस होने लगती है। ऐसे में ही कोई मनोज-बबली इनके शिकार होते हैं, तो कोई और गरीब।
यह हिन्दुओं का कबिलाई तालिबान है। यहां सगोत्रिय शादियों को लेकर मौत के फतवे जारी किए जाते हैं और हरकारे हुक्म की तामिल के लिए दौड पडते हैं। ऐसा लगता है कि आप मध्य युग के किसी गांव में पहुंच गए हों। इन गांवाें पर लक्ष्मी की विशेष कृपा-दृष्टि रही है। लेकिन ऐसा लगता है शहराती बनने के क्रम में यह गांव कहीं ठहर सा गया हो। खाप पंचायतें अलगू चौधरी और जुम्मन शेख की पंचायतें नहीं होती, जहां पंच परमेश्वर माना जाता था। इन गांवों में जोडियां ऊपर से बनकर नहीं आती, सब कुछ पंचायतों में तय होता है। यहां प्रेम पर इन तालिबानियों का कडा पहरा है। हुक्के की गुडग़ुडी पंचों के बीच सुलगती-बुझती रहती है और उसी के साथ गांववालों की सांसें भी चढती-उतरती हैं।
मनोज-बबली की मौत के बाद से तो ऐसा लगता है मानो हर घर के आंगन में खाप पंचायतें मौजूद हों। महेंद्र सिंह टिकैत, चौटाला परिवार एवं नवीन जिंदल भी इसके दरबार में हाजिरी लगाने आते हैं। फैसला सुनाते समय खाप पंचायतों के बूढे शेरों के हाथों की ऊंगलियां सिकुड ज़ाती हैं और खूनी पंजे बाहर निकल आते हैं। मुंह रक्त से सन जाता है और इन पंचायतों की रवायत को जिंदा रखने के लिए नरबलि की जरूरत महसूस होने लगती है। ऐसे में ही कोई मनोज-बबली इनके शिकार होते हैं, तो कोई और गरीब।
खाप पंचायतें 5 से 20 गांवों तक की पंचायतें होती हैं। इसका आगाज लोगों को तब होता है जब गांव के चौपाल पर चारपाइयां बिछनी शुरु हो जाती है। हुक्के की चिलम तैयार किया जाने लगता है।
आस-पास के गांवों के लोग सुबह से जुटने लगते हैं, तब लोगों की समझ में आता है कि आज किसी गरीब के तकदीर का फैसला होना है। गांव में जमींदार किस्म के लोग जो दबंग जातियों से होते हैं एवं बडे-बूढे पंच की जगह आसीन होते हैं। तब शुरु होता है जनसुनवाई का दौर, जिसका आतंक तथाकथित अपराधी के लिए किसी मध्ययुगीन न्यायालय से कम नहीं होता। न्यायालय तो इक्का-दुक्का मामलों में ही फांसी की सजा सुनाती है, लेकिन यहां का हर फैसला नरबलि की मांग करता है। दोनों पक्षों को सजा सुनाई जाती है और उसकी तालिम के लिए गांव के लोग हाथ बांधे खडे होते हैं, कुछ मामलों में तो परिवार वाले भी। इन्हें गांव से जाति-बिरादरी से बाहर निकाले जाने का डर सताता रहता है, हुक्का-पानी बंद होने का मतलब होता है घर में लडक़ियों की शादी तक का न होना। तो ये है दबंग पुरुषों की पंचायत, जहां दलितों, महिलाओं एवं युवाओं के भाग्य का फैसला सुनाया जाता है।
इन खाप पंचायतों का सच तो तब सामने आता है, जब गांव की नामचीन शादियां चाहे सगोत्रीय हों या विधर्मी में ये उनकी शान में कसीदे पढते नजर आते हैं। जब राजेश पायलट के बेटे सचिन पायलट ने फारुक अब्दुल्ला की बेटी से शादी की, तो गुर्जरों की पंचायत का कौन ऐसा बडा चेहरा था, जो वहां नहीं गया। तब इन कठमुल्लाओं ने क्यों फरमान नहीं जारी किया? पति-पत्नी को भाई-बहन बनाना, हत्या एवं बर्बर सजाएं-क्या ये महज संयोग हैं कि इनका शिकार केवल वही लडक़े-लडक़ियां हुए जो छोटी हैसियत वाले थे। यह खाप का कौन सा चेहरा है? यह तो वही बात हुई कि समरथ को नहीं दोष गुसाईं। यानी जो ताकतवर लोग हैं, वही समाज के नियम, कायदे-कानून तय करें और गरीबों को बताएं कि तुम्हें इसी राह पर चलना होगा। मनोज-बबली हत्याकांड में शामिल गुनहगारों को जब न्यायपालिका ने मौत का फरमान जारी किया, तब एक बार फिर इनका विद्रूप चेहरा लोगों के सामने था। इन पंचायतों ने कोर्ट के फैसले का विरोध करते हुए गुनहगारों की मदद के लिए लोगों से आगे आने की अपील की। हिन्दू विवाह अधिनियम में बदलाव किए जाने के लिए ये राजनेताओं पर दवाब भी डाल रहे हैं ताकि संसद में इस मुद्दे पर बहस शुरु की जा सके। हरियाणा, पंजाब में खाप पंचायतों के वर्चस्व के कारण शायद ही कोई नेता हो, जो इनके विरोध करने का साहस जुटा पाता है। यही कारण है कि कभी नवीन जिंदल कांग्रेस नेतृत्व का विरोध करते हुए भी इन पंचायतों का समर्थन करते नजर आते हैं, तो कभी इनेलो और भाजपा। ये नेता भी उसी गांव से निकलकर आते हैं, परंपराओं के नाम पर वे भी मौन साध लेते हैं। बहुसंख्यक लोगों को नाराज कर चुनाव नहीं जीता जा सकता। लेकिन कुछ नेताओं को हाईकमान के आदेश का पालन करते हुए सुबह दिया गया समर्थन रात तक वापस लेने के लिए मजबूर होना पडता है।
वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि एक ही गोत्र में विवाह से होने वाले बच्चों को वंशानुगत रोगों का सामना करना पड सकता है। गोत्र का मतलब एक ही जाति के लोगों के बीच भाईचारे की भावना को बढाना रहा है। कॉमरेड नीलोत्पल बसु का मानना है -'हिन्दू मैरिज एक्ट में बदलाव की मांग का समाज-सुधार से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि यह सामाजिक दबदबा कायम रखने के लिए किया जा रहा है।' जातिगत श्रेष्ठता का दंभ ही ऐसे दकियानूसी विचारों को जन्म देता है। समाज बनने की प्रक्रिया में बहुत सी आधी-अधूरी परंपराएं समय के प्रवाह में पीछे छूट जाती हैं। सती-प्रथा, बाल-विवाह के विरोध के समय भी कुछ ऐसे दकियानूसी लोग सामने आए थे, लेकिन अंतत: इन बुराईयों को मानने से समाज ने इंकार कर दिया। हो सकता है कि इस तर्क के पीछे वैज्ञानिक आधार हो, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इन परंपराओं को जीवित रखने के लिए किसी जीवित इंसान की बलि दी जाए। समाज में वर्ग के आधार को झूठलाने वाला तबका अमीर राजनेताओं एवं दबंगों के विधर्मी या सगोत्रिय शादियों का खुलकर विरोध करने का साहस क्यों नहीं जुटा पाता? इन गावों में अक्सर ये बात कहते लोग मिल जाएंगे-भई क्या करें, छोरे तो हाथ से निकल गए, छोरियों को पकड कर रखो। यहां पकडने से उनका मतलब सामाजिक ताने-बाने, धार्मिक संस्कारों, रीति रिवाजों में बांध कर रखने से है। खाप पंचायतों में आज भी गांव के बडे-बुजुर्गों का दबदबा होता है। दलितों, महिलाओं एवं युवाओं को खाप पंचायतों में कोई जगह नहीं दी जाती। देखा गया है कि जिन इलाकों में खाप पंचायतों का दबदबा है, लडक़ियों एवं दलितों को दोयम दर्जे का ही माना जाता है। महिलाएं घरों एवं खेत-खलिहानों में मेहनत-मजदूरी करती हैं, पुरुष चौपाल में बैठकर हुक्के का आनंद लेते हैं। गाय खिलाने से लेकर उनके लिए चरी लाने तक का काम महिलाओं के जिम्मे है। कन्या-भ्रूण हत्या के मामले में भी ये राज्य दूसरों से कहीं आगे हैं। गांव में छोरों के सामने सबसे ज्यादा समस्या शादी के लिए लडक़ी खोजने की होती है। जैसे-जैसे गांव बसते गए, रवायतें भी बनती गईं। धीरे-धीरे अन्य गोत्र के लोग भी आकर गांव में बसने लगे। गांव के साथ आस-पास के गांवों में भाईचारा होने के कारण समान गोत्र में शादी का विरोध भी इसी रवायत का हिस्सा बनती गई।
अगर किसी न इसके खिलाफ शादी करने का दुस्साहस किया तो गांव से हुक्का-पानी बंद कर दिया जाता है और अल्टीमेटम देकर गांव छोड देने की धमकी दी जाती है। आज परंपराओं को जिंदा रखने के नाम पर हिन्दू तालिबानी एकजुट हो रहे हैं। इनके लिए देश का कानून, न्याय, संविधान कोई मायने नहीं रखता।
ये परंपराओं की गोद में जीने वाला समाज है, जो आधुनिकता को गले लगाते हुए भी कुछ पुरानी चीजों को छोडने का लोभ नहीं छोड पाता। लोकतंत्र में जब अलगाववादियों एवं आतंकवादियों को भी वार्ता के टेबल पर लाया जा सकता है , तो फिर यह समाज भी मिल-जुलकर मामलों को क्यों नहीं सुलझाता? लेकिन कोई भी तालिबानी फैसला जो गरीब लोगों की बलि लेता हो- को सभ्य समाज मान्यता नहीं दे सकता। लेकिन ये गरीबों के लिए तालिबान है, ताकि वे धर्म, जाति की जकडन में उलझे रहें और कोई मार्क्सवादी इन्हें धर्म को अफीम बतलाकर न बरगला सके।

मिर्चपुर का दर्द

दिल्ली से महज डेढ सौ किलोमीटर की दूरी पर बसा है हरियाणा का मिर्चपुर गांव। बहुसंख्यक आबादी दबंग जाति जाटों की है, करीब दौ सौ घर वाल्मिकी समाज के हैं, जो भारत के दूसरे गांवों की तरह ही गांव के बाहर बसे हैं। इस देश की सामासिक संस्कृति ने विदेशी हमलावरों को तो गले लगाया, लेकिन दलितों को अछूत ही मानता रहा। इस गांव में गरीबी अगर कहीं दिखती है, तो इन दलितों के झोपडियाें में ही। गांव की जोत बहुसंख्यक जाटों के पास है और दूसरे लोग इनकी खेतों में ही खेती-मजूरी कर जिंदगी गुजारते हैं। जाट समुदाय के बच्चे गांव के अंग्रेजीदां स्कूलों में पढते हैं, तो दलितों के बच्चे सरकारी स्कूलों में। गांव में करीब 400 सरकारी शिक्षक हैं, जिनमें 380 के करीब जाट शिक्षक ही हैं। पुलिस विभाग में भी यहां के जाट बिरादरी के लोग भरे-पडे हैं। गांव में सामाजिक विभाजन स्पष्ट रूप से दिखता हैएक तरफ जाट तो दूसरी तरफ दलित एवं पिछडी ज़ातियां। वाल्मिकी समाज के लोग बाबू जी के रहमो-करम पर गुजर-बसर करते हैं, पर गांव के आवारा कुत्ते इस सोशल इंजीनियरिंग से अनभिज्ञ किसी पर भी भौंकने का दुस्साहस करने से बाज नहीं आते। इनका अकारण भौंकना इतने बडे हादसे को जन्म देगा, इसका अंदाजा लोगों को न था।
हुआ यूं कि वाल्मिकी समाज की ओर से गुजर रहे जाट युवकों को देखकर ये भौंकने लगे। इन युवकों को असमय इन कुत्तों का भौंकना रास नहीं आया। आम दिनों की तरह ही मामला गाली-गलौज से होता हुआ मार-पीट तक जाकर रुका। कर्णपाल और वीरभान नामक दलित युवक इनके हमलों में बुरी तरह जख्मी हो गए। मामला यहीं तक होता, तो गनीमत थी। गांव में अशांति को देखते हुए पुलिस की एक टीम आ चुकी थी। लेकिन जाटों का गुस्सा इनकी मार-पिटाई के बाद भी शांत नहीं हुआ था। पुलिस की मौजूदगी में ही 400 के करीब जाट समुदाय के लोगों ने दलितों के घरों को चारों ओर से घेर लिया। दलित भी आत्मरक्षा के लिए घरों की छतों पर चले गए और हमलावर भीड पर ईंट-पत्थर बरसाने लगे। पुलिस ने, जिसमें अधिकांश गांव के जाट परिवार के लोग ही थे, दलितों को बहला-फुसलाकर पंचायत के लिए चौपाल ले आए। जाटों को मौका मिल चुका था और उन्होंने दलितों के घरों को चारों तरफ से घेरकर आग लगा दी। बच्चे एवं महिलाएं चीखने-चिल्लाने लगीं। तब चौपाल में इकट्ठे दलितों को यह समझ में आया कि उनके साथ क्या साजिश रची गई थी। जाट युवक नंग-धडंग़ उन महिलाओं के आगे नाच रहे थे, जो दलित महिलाओं एवं लडक़ियों को अपमानित करने का उनका नायाब नुस्खा था। दलितों के छोटे-छोटे बच्चे और असहाय महिलाएं जलते हुए घरों की चहारदीवारियों में कैद थीं। इन्हीं जलते घरों में एक सोलह साल की विकलांग बच्ची थी सुमन, जो बचकर निकल भागने में असमर्थ थी। जब उसके पिता ताराचंद विकलांग जलती हुई बच्ची को बचाने के लिए दौडे, तो उपद्रवी भीड में से कुछ लोगों ने उन दोनों पर पेट्रोल छिडक़ दिया। कुछ ही समय में तडपते बाप-बेटी ने लोगों के सामने दम तोड दिया। बीस से ऊपर घर धू-धू कर जल रहे थे और उन्हें बुझाने वाला कोई न था।
सत्तारूढ क़ांग्रेस पार्टी इस बात में उलझी रही कि कहीं यह मामला राजनीतिक रंग न ले ले। दलितों के हिमायती कांग्रेस महासचिव एक बार फिर लाव-लश्कर के साथ दलितों के बीच थे। कुछ दिनों पहले ही दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बिल गेटस के साथ चार्टर्ड प्लेन से अमेठी के गांवों के दौरे पर उनका जाना सुर्खियों में रहा था। उनका मकसद जो भी रहा हो, लेकिन मिर्चपुर की यात्रा के कई दिन बाद भी दलितों में आक्रोश है और प्रशासन इस मामले को रफा-दफा करने में लगा है। खाप पंचायतों ने अपने स्वभाव के अनुकूल आस-पास के गांवों में फरमान जारी कर दिया है कि कोई भी गांव इन्हें अपने यहां शरण नहीं देगा। दरअसल इस विवाद की जड में जाएं तो वहां भी इन पंचायतों का खौफ ही नजर आता है। अस्सी के दशक में खाप पंचायत ने एक जाट परिवार का हुक्का-पानी बंद करवा दिया था। इसकी अनदेखी करते हुए दलितों ने उस परिवार के फंक्शन में जाकर बैंड बजाने की हिमाकत की थी। यह एक तरह से सशक्त जाट समाज को चुनौती थी, जिसे वह आज तक नहीं भूल सका है। इसके पहले भी दबंग जाति के लोगों ने सांसियों एवं चमारों को मार-पीट कर इस गांव से भगा दिया था। सामंती व्यवस्था के टूटने से तिलमिलाया यह वर्ग अब गांव में दलितों-पिछडों की मौजूदगी को बर्दाश्त नहीं करना चाहता। दलित अब खेतों में काम नहीं करते, साफ-सफाई नहीं करते, मैला नहीं ढोते। अब युवा दलित दकियानूसी सामंती विचारों को ठुकराकर शहरों में मजदूरी करना ज्यादा पसंद करता है। बचे लोग नरेगा के तहत गांव में रोजगार कर रहे हैं, ऐसे में बाबू जी का यह आधार तो टूटना ही था। अब वे बराबरी की मांग करने लगे हैं। गुपचुप तरीके से अपने हक की बात करते हैं। खाप पंचायतों में जहां दबंग जातियों का दबदबा है, में शामिल किए जाने की मांग करने लगे हैं। खाप पंचायतें के बीस साल पहले के 'बंद' का भय भी अब इन्हें परेशान नहीं करता। ऐसे 'बंद' के दौरान भूपति श्रमिकों का बहिष्कार करते थे। अब दलित ही बहिष्कार करने की हिम्मत दिखा रहे हैं। ऐसे में एक सभ्य कहा जाने वाला समाज आखिर इन चीजों को कब तक बर्दाश्त करता?
मिर्चपुर का दलित समाज राजधानी के जंतर-मंतर पर इकट्ठा है ताकि सरकार को अपना दुख-दर्द सुना सके। इनके चौपाल में राजधानी के बुध्दिजीवियों की चहलकदमी भी देखी जा रही है। मिर्चपुर के बहाने दलित फिर अपने अधिकारों के लिए एकजुट होते दिख रहे हैं। वे इस बात को जानते हैं कि वह दिन दूर नहीं, जब गांव में उनके भगवान का मंदिर होगा, जो दबंगों के विरोध के कारण अभी बारिश के थपेडे झेलने को मजबूर हैं। गौरतलब है कि गांव के शिव मंदिर में दलितों का प्रवेश वर्जित है। डर है कि कहीं दलित समुदाय हिंदुओं के भगवान को ठुकरा अपने भगवान न गढ लें। ऐसा ही कुछ साल पहले साउथ अफ्रीका के कांगो में हुआ। अश्वेतों को बताया गया था कि भगवान श्वेत हैं और स्वर्ग में केवल श्वेत लोग ही जा सकते हैं। अश्वेतों ने अपना अलग चर्च बनाया, जिसमें अश्वेत भगवान की पूजा होने लगी और देखते-देखते इस चर्च के अनुयायियों की संख्या डेढ क़रोड पार कर चुकी है। दलितों पर आए दिन हो रहे अत्याचारों के खबरें भी राष्ट्रीय अखबारों में जगह बनाने में सफल रही हैं। कभी अंबाला में दलित दुल्हे को घोडे से उतार अपमानित किया जाता है, तो कभी तमिलनाडु में दलितों को अपमानित करने के लिए मुंह में विष्ठा भर दिया जाता है। कहीं दलित महिलाओं को नंगा कर गांव में घुमाया जाता है, तो कहीं खेत में काम करने गई दलित महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता है। ऐसी कई घटनाएं हैं, जो हमें अब चौंकाती नहीं, हमारे संवेदनाओं को नहीं झकझोरती। लेकिन एक समुदाय है जो इन खबरों पर पैनी नजर रखता है और हर ऐसी घटना के बाद जार-जार रोता है। कहीं न कहीं मानवता के प्रति उसका सदियों का भ्रम जो टुकडे-टुकडे होकर बिखरता है।
जिस देश के इतिहास पर हम फूले नहीं समाते, उसी ने इन दलितों के गले में नगाडा बांधा था, ताकि सडक़ों पर इस बात की डुगडुगी बजाते चलें कि वे अछूत हैं और हमारा भद्र समाज इनसे दूरी बना सके। अपने गौरव ग्रंथों में हम आर्य विजेताओं को आज भी सम्मान देते हैं, जिन्होंने अनार्य कहे जाने वाले दलितों, आदिवासियों को उनके जमीन से उजाडा। रक्त शुध्दता बरकरार रखने के लिए समाज में मनुवादी ढांचा खडा किया। दलित वर्ग की इस पीढी क़ो अपने समाज और संस्कृति का ज्ञान होने पर निराशा ही हाथ लगती है, वह अपने इतिहास पर बौखलाता है और गैर दलितों के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करता है। मायावती लाख कडक़डिया नोटों की माला पहने, वह उन्हें जातिगत स्वाभिमान से जोडक़र देखता है। दलितों में लोकतंत्र की बढती चेतना से राजनीतिक पार्टियां बौखला गई हैं। तभी तो कभी कलावती, कभी शशिकला, तो कभी किसी और दलित महिला के यहां भोज का आयोजन होता है, तो अगली रात पंचसितारा होटलों के स्वादिष्ट व्यंजनों का रसास्वादन करते बीतती हैं।
दलित वर्ग आक्रोशित है। राहत के नाम पर मिर्चपुर के दलितों को दो बोरी गेंहू दी गई है। पिछले दिनों खाप पंचायतें एकतरफा समझौते करते हुए दलितों के साथ भाईचारापूर्वक गांव में रहने को तैयार हुए हैं। लेकिन दलित समुदाय इस कांड के दोषियों के लिए सजा की मांग कर रहा है। दलितों ने इस कांड में जान गंवाने वाले बाप-बेटी के अंतिम संस्कार से भी इंकार कर दिया है। सरकार चुप्पी साधे है। एक जागृत समाज में ऐसी बर्बर कार्रवाई करने का हौसला लोगों को कहां से मिलता है। जातीय उन्माद की स्थिति में सरकार और तंत्र इतने पंगु, असहाय क्यों हो जाते हैं, सोचने वाली बात तो यही है।

जनादेश का चीरहरण

पार्टी छोड़ने और बदलने के सिलसिले को पहले 'आयाराम गयाराम' कहा जाता था। दल-बदलू एक तरह की गाली हुआ करती थी, आज नहीं है। चार धाम की यात्रा करने वाले तीर्थयात्रियों की तरह हमारे नेता भी यहां से वहां आते-जाते रहते हैं। उनका उद्देश्य येन-केन प्रकारेण सत्ता में आना और आ गए तो किसी भी तरह वहां बने रहने का प्रयास करना रह गया। नीतियां और कार्यक्रम केवल चुनावी घोषणापत्रों तक ही सीमित रहने लगे। सरकारें भी जनता से मिले जनादेश के आधार पर नहीं, बल्कि चुनावों के बाद दलों और सदस्यों के बीच होने वाली सांठ-गांठ, समझौते, सौदेबाजी, खरीद-फरोख्त, दल-बदल और पर्दे के पीछे सत्ता के लिए साझेदारी के आधार पर बनने-गिरने लगीं।
भारतीय राजनीति का एक काला चेहरा है दलबदल। अगर दूसरे शब्दों में कहें तो यह लोकतंत्र का माखौल उडाना ही है, जहां नेता एक दल से चुनकर आते हैं परंतु अपने फायदे के लिए दल बदल लेते हैं। जिस जनता ने उसे चुना है उसके भावनाओं का जरा भी ख्याल नहीं करते ये नेता। दलबदल का नंगा नाच अभी लोगों को झारखंड में देखने को मिला। जनता ने किसी दल विशेष के लिए चुना था, आखिर नेताओं को किसने ये अधिकार दिया की वे दलबदल कर इस जनमत का अपमान करें। आज दलबदल ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है। इसकी हकीकत सूटकेस कांड में दिख ही चुकी है। लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए यह जरूरी है कि इसे पूर्णत: प्रतिबंधित कर दिया जाए। अगर किसी को यह लगता है की उसे दुसरे दल में जाना चाहिए तो वह इस्तीफा देकर पुन: जनता के पास जाए और पुन: स्पष्ट जनमत ले। किसी दल विशेष का सांसद या विधायक बनने का अवसर उसे जनता ने दिया है। अत: यह जनता का निर्णय है अत: इसे बदलने का अधिकार भी जनता को ही होना चाहिए। भारतीय राजनीति में दलबदल करना एक कोढ क़ी तरह हो गया है। सत्ता सुख पाने के लिए आज नेता कुछ भी करने को तैयार हैं। लोकतंत्र को मजाक बना दिया गया है। दल बदल कर पैसा कमाना सबसे सरल हो गया है। इतिहास गवाह है कि जनता ने विगत पचास वर्षों में केंद्र व राय सरकारों में ये तमाशा कई बार देखा। दलबदल के सहारे अपने जनमत को बिकते हुए खुलेआम देखा। दलबदल कानून के चलते अब नेता लोग थोक में बिकने लगे हैं। आज जरुरत यह है कि दलबदल कानून को निरस्त कर दलबदल को पूर्णत: अवैधानिक घोषित किया जाए। दलबदल जनता के मतों का खुला अपमान है अत: इसे पूर्णत: प्रतिबंधित किया जाए। यह कदम भारतीय लोकतंत्र की शुचिता के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।
झारखंड में गुरूजी ने जनता के साथ विश्वासघात करते हुए कभी भाजपा के पाले में जाने की घोषणा की, तो कभी कांग्रेस को पटाने में मशगूल रहे। उनकी यह राजनीतिक नौटंकी जारी रहती, लेकिन बात न बनती देख भाजपा ने समर्थन वापस लेना ही उचित समझा। हालांकि इससे पहले भाजपा और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने भाजपा के अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में नई गठबंधन सरकार के गठन पर सहमति दिखाई थी। लेकिन मुख्यमंत्री शिबू सोरेन लगातार अपना बयान बदलते रहे और उनके इस बयान के बाद कि वे राय में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस के भी संपर्क में हैं।, भाजपा के सब्र का बांध टूट गया। राय में राजनीतिक संकट एकाएक उस समय उठ खड़ा हुआ जब केंद्रीय बजट पर कटौती प्रस्ताव के दौरान शिबू सोरेन कांग्रेस के पाले में जा खडे हुए। एक अंदेशा यह भी था कि हो सकता है विधानसभा का चुनाव वे न जीत पाएं और ऐसा कर केंद्र में मंत्रिपद पर काबिज हो जाएं और बेटे हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री बना दें। गुरूजी ने तरह-तरह की राजनीतिक कलाबाजियां दिखाईं। कभी राय विधानसभा के बचे हुए 56 माह के कार्यकाल के दौरान 28-28 माह के लिए दोनों पार्टियों में सरकार बनाने पर सहमति के लिए राजी दिखे, तो कभी आदिवासी मुख्यमंत्री के नाम पर अडे। मामला जो भी हो, चुनाव पूर्व का राजनीतिक गठबंधन ही लोकतांत्रिक कहा जा सकता है, जहां जनता को यह पता होता है कि कौन सी पार्टी किसके साथ है? चुनाव के बाद जब धुर विरोधी पार्टियां हाथ मिलाकर सत्ता का बंदर बांट करती दिखती हैं, तो लोकतंत्र के प्रति एक वितृष्णा ही जन्म लेती है। ये तो वही बात हुई कि एक दूसरे के खिलाफ आप लडक़र आए और बाद में सत्ता के लालच में पाले बदल लिए। अगर कोई नेता व्यक्तिगत रूप से दल बदल करता है तो उसे अयोग्य ठहराने के लिए कानून है, लेकिन जब दल ही पाले बदलने लगें तो भला कौन सा कानून भारतीय लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए है।
उन दलों की पाला बदली में अगर कोई ठगा जाता है, तो वह है जनता। ऐसे में भारत का मौजूदा संविधान और कानून जनता की इच्छा के हिफाजत का कोई रास्ता नहीं दिखाता क्योंकि तब जनता बाहर होती है और माननीय अंदर। क्या ऐसी कोई संवैधानिक या कानूनी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए कि एक-दूसरे के खिलाफ जनादेश लेकर आए दल सत्ता के लिए गठजोड क़र लोक-इच्छा का अपहरण न कर सकें। हां, यह ठीक है कि खंडित जनादेश की स्थिति में मामला पेचीदा हो जाता है, यह भी ठीक है कि बार-बार चुनाव का बोझ इस देश की गरीब जनता पर नहीं डाला जा सकता। लेकिन क्या यह दोनों कारण इतने बडे हैं कि इसके लिए जनादेश का बलात अपहरण होने दिया जाए।
1985 में सत्ता संभालने के साथ ही राजीव गांधी ने 52वें संविधान संशोधन के जरिए देश के संसदीय लोकतंत्र की एक बड़ी बुराई दल-बदल पर अंकुश लगाने की कोशिश की थी। इस तरह दसवीं अनुसूची, जिसे आमतौर पर दलबदल विरोधी कानून कहा जाता है, को संविधान में जोड़ा गया था। मगर इस कानून में कमियां बरकरार हैं। इन्हीं का फायदा उठाकर नरसिंह राव ने अपनी अल्पमत सरकार को बचा लिया था। उसके बाद एनडीए सरकार ने 2003 में 90वें संशोधन के जरिए इस कानून को सख्त करने की कोशिश की थी। ऐसा नहीं है कि दलबदल किसी स्वार्थ के लिए ही किया जाता है। राजनीतिक अपराधी भी दलबदल करते हैं। आज विभिन्न राजनैतिक दलों के टिकट पर अथवा अपने व्यक्तिगत बाहुबल पर चुनाव जीतकर यह लोग आज हमारे देश की लोकसभा व कई विधानसभाओं में मौजूद हैं। एक पेशेवर अपराधी के दल-बदल का मकसद सत्ता या सिध्दान्त अथवा टिकट आदि देने दिलाने जैसी बातें न होकर केवल एक ही होती है कि आखिर उसके जीवन की गारंटी किस राजनैतिक दल की छत्रछाया में सुनिश्चित है। अपने इसी लक्ष्य के तहत आमतौर पर अपराधी लोग एक राजनैतिक दल का दामन छोड़कर दूसरे राजनैतिक दल का दामन थामने में लगे रहते हैं।
दलबदल विरोधी कानून कहता है कि अगर कोई संसद सदस्य या विधायक खुद पार्टी से इस्तीफा देता है तो उसकी सदस्यता भी खत्म हो जाती है। लेकिन अगर पार्टी निकालती है तो असंबध्द सदस्य के तौर पर उसकी सदस्यता बनी रहती है। संविधान विशेषज्ञ और जम्मू-कश्मीर के कांग्रेसी विधायक रवींद्र शर्मा कहते हैं, यह कानून राजनीतिक भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए बनाया गया था। सदन में वोटिंग के वक्त विधायकों के बिक जाने के कारण सरकारें अस्थिर हो जाती थीं। लेकिन यह कानून पार्टी की तानाशाही को भी स्वीकार नहीं करता। यदि किसी सदस्य को पार्टी से निकाला जाता है तो यह पार्टी का अंदरूनी मामला है, उसकी वजह से चुने हुए प्रतिनिधि को काम करने से नहीं रोका जा सकता। क्योंकि जिन्होंने उसे चुना है, वे अपने प्रतिनिधि को वापस नहीं बुला सकते। ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं है। यही कारण है कि अपने नेताओं की जोरदार मांग और अमर सिंह के उकसाने के बावजूद मुलायम उन्हें पार्टी से नहीं निकाल रहे।
पार्टी छोड़ने और बदलने के सिलसिले को पहले आयाराम गयाराम कहा जाता था। दल बदलू एक तरह की गाली हुआ करता था। आज नहीं है। चार धाम की यात्रा करने वाले तीर्थयात्रियों की तरह हमारे नेता भी यहां से वहां आते-जाते रहते हैं। उनका उद्देश्य येन-केन प्रकारेण सत्ता में आना और आ गए तो किसी भी तरह वहां बने रहने का प्रयास करना रह गया। नीतियां और कार्यक्रम केवल चुनावी घोषणापत्रों तक ही सीमित रहने लगे। सरकारें भी जनता से मिले जनादेश के आधार पर नहीं, बल्कि चुनावों के बाद दलों और सदस्यों के बीच होने वाली सांठ-गांठ, समझौते, सौदेबाजी, खरीद-फरोख्त, दल-बदल और पर्दे के पीछे सत्ता के लिए साझेदारी के आधार पर बनने-गिरने लगीं।

Thursday, January 14, 2010

लात-मत मारो, रोजी-रोटी है

डीटीसी अपने पहले की तरह रफतार से चली जा रही थी। सबकुछ सामान्य ही था। पहले की तरह खचाखच लोगों से भरी भीड़, पैर टिकाने को भी जगह नहीं। तभी लगभग कान के पास आकर किसी ने चिल्लाया-लात-मत मारो, रोजी-रोटी है। यही दसेक साल का कोई लड़का रहा होगा। पैबंद लगी चिकट शर्ट पहने वह लड़का मेरी ओर ही घूर रहा था। उसे हमारे सभ्य दिल्ली के भाई लोग बिहारी नाम से ही संबोधित करेंगे। उनकी नजर में हर गरीब टाइप लोग तो बिहारी ही होता है न। मैं सकपका कर दूर हुआ, तो नजर पड़ी कि उसका बैग मेरे पैर के पास रखा था। क्षमा याचना करते हुए मैंने पैर तो हटा लिया, लेकिन फिर चोरी-छुपे बारीकी से उस लड़के पर नजर रखने लगा। दरअसल ब्लॉगर का कीड़ा जो भीतर कुलबुलाने लगा था। मेरे लिए वो हाड़-मांस का लड़का कहानी के प्लॉट में कब बदल गया, पता भी नहीं चला। इस बात के लिए मैं लोगों से माफी चाहता हूं। मेरी नजर में ये अक्षम्य अपराध है, यह जानने के बाद भी मैंने ऐसा किया। बनियों की नजर में हर व्यक्ति ग्राहक होता है, मैनेजर की नजर एक सेल्समैन की तलाश में होती है, तो इनसे हटकर मैं भी नहीं सोच रहा था। अंधे बाजार युग में हर आदमी एक प्रोडक्ट में बदल गया है। कुछ इसी से आदमी की उपयोगिता तय होती है। या यों कहें कि बाजार में उसकी काबिलियत के हिसाब से उसकी बोली लगाई जाती है। हालांकि इस मुददे पर जाना फिलहाल मेरा मकसद नहीं।
सोचने का जो अंतहीन सिलसिला शुरू हुआ, तो फिर दूर तक निकलता चला गया। क्या कॉमनवेल्थ की मार ये गरीब झेल पाएंगे। फ्रांस या शिकागो अगर राजधानी बनायी जाती है, तो भला इनका क्या होगा। इन सभ्य शहरों में रहने वाले लोग भी तो वैसे ही होंगे। मॉल कल्चर को बढ़ावा देकर छोटे दूकानदारों को राजधानी से भगाया गया। कुछ बचे भी रहे तो लालडोरा के भूत ने शहर छोड़कर भागने को मजबूर किया। कुछ साल बाद तो ये स्थिति होगी कि नमक से लेकर सूई तक लेने के लिए हमें मॉल के चक्कर लगाने होंगे। कॉलोनी के नुक्कड़ में एक चमचमाता हुआ मॉल हमारे पास हर वो सामान उपलब्ध कराएगा, जो पहले छोटे दुकानदार रखते थे। हमारी गली का बनिया या रामू हलवाई बीते जमाने की बात हो जाएगी। कुछ ऐसा ही कहर रिलांयस फ्रेश के रिटेल आउटलेट ने भी ढ़ाया। तमाम सब्जी बेचने वालों को देश के सबसे बड़े अरबपति की नजर लग गई़ । अरबपति बनिये को वहां भी मुनाफा जो नजर आने लगा था। अब गरीब- गुरबा विरोध करे भी तो कैसे। जब सरकार ही इन अरबपतियों से गलबहियां डाल ता-ता थैया करने में लगी हो, तो इन करूणेां की पुकार भला कौन सुने। इतना भी होता तो गनीमत थी। आम जनता के टैक्स के पैसों से ही तो राजधानी में चमचमाते सर्पिलाकार फलाईओवर बनाए गए हैं। लेकिन क्या इनका इस्तेमाल भी ये गरीब माणुस कर पाएंगे। या यहां भी लंबी तेज रफतार वाली विदेशी गाड़ियों का बेड़ा ही गुजरेगा। लेकिन इसकी कीमत भी कांग्रेस के आम आदमी को चुकानी होगी। कम रफतार वाली गाड़ियों को तो वहां चलने भी नहीं दिया जाएगा। रिक्शे वाले तो यों भी राजधानी की तंग सड़कों से भगाए जा रहे हैं। भिखारियों पर तो सरकार के लठैत पुलिसवालों की नजर पहले से ही तिरछी होती रही है। आखिर शीला दीक्षित सरकार को भी तो मुंह दिखाना है। गरीब-गुरबों को देखकर विदेशी नाक-भौं सिकोड़ेंगे,तो भला सरकार की क्या इज्जत रह जाएगी। तो बलिदान तो इन्हें होना ही है।
अगर सरकार का बस चले तो गेम के दौरान विदेशियों के गुजरने वाले सड़कों पर बसे गंदी बस्तियों को सरकार तिरपाल से ढंकवा दे। अब किसी गरीब के धंधे को अनजाने में पैर लग गया हो, तो विरोध नजर आता है। अब इस संगठित तं़त्र के खिलाफ कैसे आवाज उठाई जाए,यह बात उनकी समझ से परे है। राह दिखाने वाले कुछ समाज सेवियों की जमात भी केवल जंतर-मंतर तक विरोध करने तक ही सीमित होती है,जिसकी सरकार कोई सुध नहीं लेती। ऐसा होता तो लोग कई सालों से न्याय होने के इंतजार में वहां नहीं बैठे होते। जनता के धीरज की तो दाद देनी होगी, जो सब कुछ खो जाने या छीन लिए जाने के बाद भी सरकार से ये उम्मीद लगाकर बैठे हैं कि शायद अब न्याय हो।

Tuesday, January 12, 2010

धुंध में नया साल

बहुत देर से कम्प्यूटर के की-बोर्ड से उलझता रहा। कुछ ऐसा था जो गले में फंसा था, निकलना चाह रहा था लेकिन लंबे समय तक इसी उहापोह में उलझा रहा। इसी समय नया साल भी दरवाजे पर बार-बार दस्तक दे रहा था। कोई साल नया कैसे होता है,समझ नहीं पा रहा हूं। क्या कोई नया सूरज उगता है,आसमान नया होता है, प्राकृतिक छटाएं कुछ अलग रंग बिखेरती हैं। कुछ भी तो नया नहीें होता। बस एक सोच,एक विचार कि नया साल है और उसका स्वागत करना है। कभी-कभी तो इसका एहसास भी तब होता है जब यार-दोस्तों के हैपी न्यू ईयर मैसेज आने शुरू होते हैं। नई सोच,नई उमंगें होती तो इसे हरेक सुबह महसूस किया जाना चाहिए था। सिर्फ नए साल की पहली तारीख को ही क्यों। क्या गरीबों के आगे से थालियां नहीं छीनने का वादा ये समाज के ब्लडसकर जोंक करेंगे। क्या नए साल में फिर किसी की नौकरी तो नहीें छीनेगी,क्या इसकी कोई गारंटी है। क्या भूख के कारण मासूमों की बिखरी लटें फिर से संवारे जाने का वादा सरकार करेगी। क्या दलितोंं पर होने वाले अत्याचारों में कोई कमी होगी। क्या आदिवासियों को उनके जंगल,जमीन से विस्थापित नहीं करने का वादा सरकार के नुमांइदे करेंगे। क्या हमने अपनी आवश्यकताओं को सीमित करने का कोई प्रण लिया है। गरीबों के बीच काम करने वालों ने क्या उनकी तरह ही रहने-खाने का फैसला लिया है। या केवल मीडिया में चेहरा चमकाने एवं गरीब बच्चों के साथ फोटो खींचा लेने तक ही उनकी जिम्मेदारियां हैं। अगर नहीं ,तो ऐसा नया साल आपको ही मुबारक हो। मेरे राम तो अपनी झोपडी में ही मगन हैं।
एक बाद और बार-बार भीतर तक मन को कुरेदती है। अमेरिका को गाली देना लगभग हमारी आदत में ‘शुमार हो चुका है। लेकिन भारत के पूंजीपतियों का चाल-चरि तो उनसे भी गंदा होता है। इस मामले में तो हम समृद्धि के उच्च शिखर पर बैठे अमेरिका को भी पीछे छोड चुके हैं। वहां के रईसों को भी भारत के रईसों की लाइफस्टाइल को देखकर रश्क हो सकता है। जब पूरी दुनिया आर्थिक मंदी से कराह रही थी,तब भारत में एक वर्ग 200 करोड रूपए की याट से अपनी बीबी को लुभा रहा था। गुटखा किंग न जाने कितने करोड की विदेशी गाडी अपने रिश्तेदारों को बर्थडे प्रेजेन्ट करने में मशगुल थे। कम से कम इस मामले में हम अमेरिका के रईसों को आगे मानते हैं। वो दूसरों को लूटते तो हैं,लेकिन उस पैसे का समाज के आगे नंगा प्रदशZन नहीं करते। कुछ समाज सेवा के नाम पर फांउडेशन बनाकर ही लगा देते हैं,या गरीब देशों को मदद के नाम पर अपना हित साधते हैं। हालांकि इसके पीछे भी उनकी दूरगामी नीति काम कर रही होती है,लेकिन इसी बहाने चलो कुछ तो पाप धुला। भारत के मामले में लूटनीति मंथन करी का विचार ही फलता-फूलता है। फिर जब समाज का उपेक्षित वर्ग इन तमाशों से उबकर विरोध करता है, तो सरकार की नजर में नक्सली या कोई देशद्रोही नजर आता है। सरकार को उनकी भूख से कुलबुलाती आंतें नहीं दिखती,जहां अगर वो विरोध नहीं करता तो शायद परिवार में सामूहिक आत्महत्या के अलावा कोई चारा नहीं था।एक बात और सोचता हूं कि भारत की तस्वीर ही कुछ और होती अगर भारत का हरेक अमीर एक गांव गोद लेने का प्रण करता। अगर भारत का हरेक शिक्षित नागरिक एक को शिक्षित करने का प्रण लेता। अगर ऐसा संभव है,तभी नए साल की खुशियों में शरीक होने का हमें हक है।

ल्ूखा एनजीओ यानि लूटो-खाओ एनजीओ

तो सबकुछ पर्दे के पीछे चल रहा था। बॉस को भी इसकी भनक लग चुकी थी। एक दिन कुछ हुआ यूं कि बॉस के एक चहेते को आकाशवाणी हुई भई, अब तुम भी पैसे बढ़ाने की जुगत करो। खर्च तो इतने में चलने से रहा। हालांकि सैलेरी किसी संस्थान से ज्यादा ही पाते रहे। तो हुआ यूं कि अब वे अपनी सभी घरेलू समस्याओं का जिक्र अकेले में बॉस से करने से नहीं चूकते। मौका मिलते ही दिल का दर्द लेकर ब्ौठ जाते। बॉस को भी एहसास हो चला था कि अकेले लूटने-खाने में एक दो लोगों को शामिल करना अब जरूरी हो गया है। होता ये है कि कोई विदेशी फर्म जब किसी प्र्रोजेक्ट के लिए एनजीओ को रकम देती है तो सालाना उसका हिसाब भी देना होता है। तो जितनी मोटी रकम आप एकाउन्टेन्ट के साथ मिलकर उड़ा सकते हो उड़ा लो। बाकि की रकम वापस करनी होती है। इसी पैसे पर सबों की नजरें गड़ी थी जिसे लोग सैलरी के नाम पर लूटना चाह रहे थे। ते यही खुल्ला खेल फरूZखाबादी चल रहा होता है। बॉस को रकम तो अपने जेब से देनी थी नहीं। सो चमचों को खुश करने के लिए उसे यह मौका अच्छा लगां। आपातकाल मीटिंग बुलाई गई। कुछ विरोध करने वालों को इस मीटिंग से अजीब से तर्क देकर बाहर रखा गया। अब बात इसपर आकर रूकी कि किसकी कितनी सैलरी बढ़े । तो जिसको जितनी जरूरत हो उतनी मिले- पर आकर बात समाप्त हुई। बढ़िया साम्यवाद के नारे का इस्तेमाल था- बॉस को अपनी मनमर्जी करने देने के लिए। तो हुआ ये कि ऑफिसब्वाय को भी इस मीटिंग से बाहर ही रखा गया क्योंकि इसके आधार पर सबसे अधिक हकदार तो वही बनता था। जिसे सरकार की रोजगार गारंटी से भी कम पैसा दिया जा रहा था और काम के नाम पर हाड़-तोड़ मेहनत़। पिता की मौत के बाद परिवार की सारी जिम्मेदारियां भी अपने कमजोर कंधों पर ढ़ो रहा था। पर कहते हैं ना कि बॉस इज आलवेज राइट। तो सभी चमचे गर्दभ राग में बॉस के सुर में सुर मिलाकर ढेंचू-ढेंचू करने लगे। एक-आध विरोध के स्वर भी उठे, तो बेरहमी से दबा दिए गए। बॉस अपनी इस विजय पर लंबी सी मुस्कान बिखेरता मीटिंग से बाहर निकल गया। खैर, इसी पर एक कविता पेश करने की गुस्ताखी चाहता हूं-

कहते हैं बड़े-छोटे का भेद उचित नहीं
ठीक ही कहते होंगे
मेरी उनसे कोई शकायत नहीं
लेकिन मन उचाट हो जाता है
जब देखता हूं एक हाड-तोड़ मेहनत करते
युवा की कातर निगाहें
भारी पड़ता है किराया पूरे महीने की सैलरी पर
फिर एक भरा-पूरे परिवार की जिम्मेदारियां भी तो हैं
जो छोड़ गए हैं पिता उसकी विरासत में
लेकिन बॉस के आगे आते ही सिटटी-पिटटी गुम

आखिर क्या करे वह
न जाने कई हैं कतार में
कि कब वो धम्म से गिरे और दूसरे चढ़ बैठें
एकांत में सोचता है-
थ्कतने खुदगर्ज हैं लोग
ल्ेकिन देखता हूं ऑफिस के एक कोने में
च्ुपचाप बैठे उस लड़के को
आप पूछ सकते हैं उसके नाम के बारे में
भई नाम में क्या रखा है
यों भी नाम तो नसीब वालों के होते हैं
चाय की दूकान में काम करने वाले हों या फिर
जूते सीने वाले या झाडू पोंछा करने वाले
सबों का एक ही नाम होता है छोटू

कभी खुश होता तो मुझसे आकर कहता
भैया अब मैं पढ़े-लिखों वाला काम करूंगा
ऐसे क्षण में मैं उसे गौर से देखता
और अपनी बदहाली पर भी तरस खाता
सीढ़ियां फलांगते तालीम के शीशZ पर तो आ पहुंचा था
लेकिन सोचता था अब क्या
अब तो पीछे लौटना भी संभव नहीं

अभी कुछ दिनों पहले की ही तो बात है
गया था पिता की बरसी पर छुटटी लेकर
मां के आंसू ने रोक लिए थे दो-चार दिन
लौटते हुए डर से कंपकंपी छूट रही थी
बॉस के अदृश्य निकले हुए नाखूनों की धार
वह महसूस कर रहा था अपने गर्दन पर

और एक ऐसे ही जाड़े के ठिठुरते दिनों में
जब हाथ उठाकर बढ़ायी जा रही थी लोगों की सैलरी
दफतर के एक कोने में सिसक रहा था लिंगप्पा
आज जब हमारे बीच नहीं है वो
याद आती है उसका मासूम सवाल
भैया अब मैं पढ़े-लिखों वाला काम करूंगा।
अगले अंक में

Monday, January 11, 2010

लूखा एनजीओ यानी लूटो खाओ एनजीओ

बॉस ने पीछे की सीट पर बैठे अपने चेले की ओर इशारा किया( इशारा भी कुछ यूं था जैसे चुटकी से सुर्ती मली हो। अक्सर ऐसा लोग पैसे के बारे में पूछने के लिए करते हैं। चेला भी पक्का शागिर्द था। उसने सहमति में सिर को हल्का सा यूुुं झटका दिया, जैसे सब समझ गया हो। कहा-हांं जितना कहा था,मिल गया है। गाडी अपने रफतार में सड़क पर इठलाती चली जा रही थी। खिड़की से बाहर का मनोरम नजारा लुभा रहा था । इस बातचीत में हालांकि मैं कहीं शरीक न था, लेकिन ध्यान इस मौन बातचीत की तरफ चला ही गया। खैर बताता चलूं कि बॉस राजधानी में एक एनजीओ चला रहा था और लोगों के बीच उसने अपनी प्रतिभा का लोहा जरूर मनवा लिया था। ऐसा लग रहा था मानो डाइवर को इन बातों से कोई मतलब ही नहीं। लेकिन वो भी था पूरा घाघ। बेफिक्र की तरह दिखना तो उसका एक छदम आवरण भर था। अब बिना भूमिका के बात पर आना ही ज्यादा उचित होगा। तो इस एनजीओ के कर्ताधर्ता हैं हमारे आज के नायक, जो कभी मीडिया में नुमाया हुआ करते थे। किसी ने सलाह दी कि भई कब तक केवल टीवी में चेहरा ही दिखाते रहोगे, या फिर पैसे भी बनाओगे। बात इन महोदय को जंच गई। अगले ही दिन लोगों ने देखा कि उनकी उठ-बैठ एक पक्के समाजसेवक के घर होने लगी। फिर एक स्वामिभक्त लोगों की टीम भी तो खड़ी करनी थी,जिनमें मिशन का जज्बा कूट-कूट कर भरा हो। एनजीओ के लिए विदेशी रकम का इंतजाम भी हो गया था। यों भी दरो-दीवार तो लोगों ने खड़ी की है। पैसे का तो एक ही रंग होता है,अंतर होता है तो बस इतना कि कहीं गांधी की तस्वीर छपी होती है, तो कहीं चर्चिल की। खैर मुददे की बात की जाए,वरना भाई लोग कम्यूनिस्ट ठहरा कर भददी सी गाली निकाल सकते हैेंं। हुआ यूं कि एक दिन ऑफिस एकाउन्टेन्ट को किसी बात पर झगड़ते देखा। बहस का मुददा यूं था कि बॉस ने जो हजामत कराई है, उसका पैसा एकाउन्ट में भला क्यों न जोड़ा जाए। आखिर हजामत का मकसद कहीं गरीबों को उपर उठाना ही तो है। भई टेलीविजन पर उन दुखियारों की बात करनी है, तो कम से कम चेहरा तो गरीब टाइप का न दिखे ना। तो भला हजामत का पैसा भी तो एकाउन्ट में जुड़ना ही चाहिए। खैर एकाउन्टेन्ट की मजबूरी समझ से परे नहीं थी। एक तो मंदी का असर, दूजे गरीबी के कारण पढ़ाई भी बीच में छोड़ने के दुख से वोे लाचार था, ऐसे ही लोगों की तलाश तो बॉस को हमेशा होती है, जो उजबक की तरह बस समय-समय पर गरदन हिलाता रहे और शुतुरमुर्ग की तरह डांट खाने पर गर्दन फशZ में गड़ा ले। तो बॉस के अश्लील इशारे पर बात हो रही थी। गांव में आम सभा होनी थी। गांव के गरीब-गुरबे सुबह से ही इंतजार में थे। महोदय एक लंबी एसी गाड़ी से उतरे। लोगों पर यूं नजरें बिखेरी जैसे कोई एहसान किया हो। मंच पर स्वागत के लिए कुछ लोग दौड़ ही तो पड़े थे। एक लंबे रटे-रटाए भाशण के बाद, जो अक्सर वो सभाओं में दिया करते थे के बाद नारेबाजी शुरू हुई। आयोजक परेशान सा दौड़ा-दौड़ा मेरे पास आया। भई साहब, आप तो साथ में ही आए हो ना। बताओे, कितने पैसे देने हैं। मैं हक्का-बक्का सा उसके मुंह की ओर देखने लगा। भई,मुझे तो मालूम नहीं-बस इतना ही मुंह से निकला होगा। हालांकि इसके लिए मुझे हल्की सी झाड़ भी सुननी पड़ी। आता हुआ पैसा, जो दूर जा रहा था। अंत में बॉस ने अपने विश्वसनीय सिपाहसलार को आगे खड़ा किया, जिसने पूरे काईंयापन के साथ उन मासूमों से वसूली की । तो ये इशारा उस पैसे के बारे में ही किया गया था, जो ड्राइवर को देनी थी और जिसकी रकम एक बार बॉस एकाउन्ट में भी चढ़ा चुके थे। तो हुआ ना दोनों हाथ में लडडू। अपने बॉस तो ऐसे ही थे। लक्ष्मी की भी विशेश कृपा उनपर बनी रही। देखते- देखते राजधानी में दो फलैट के मालिक बन चुके थे। एक में खुद रहते थे और दूसरे को किराए पर उठा रखा था। किसी और को नहीं, अपने को ही। इसके बदले एक मोटी रकम एकाउन्ट में ट्रांसफर हो जाती थी। गोरा-चिटटा चेहरा, मॉडर्न लुक और आदशZवाद का मुलम्मा लगा हो, तो लड़कियां तो फिदा होंगी ही। सो आज कल उनका दिल भी किसी और पर आया था। गाहे-बगाहे वो अपने शौक का इजहार भर करते रहते थे। पर हाय री किस्मत, निगोड़े समाज सेवक का मुखौटा जो लगा चुके थे। खैर दबा-छुपा ये रोमांस ऑफिस की फिजाओं में भी दिखने लगा था। आज-कल वे किसी यंगकमर्स पर फिदा थे। लैपटाप के साथ ऑफिस के कोने-कतरे में नजर आने लगे थे। उनकी चौकस निगाहें हर वक्त उसी का पीछा करती। आजकल बॉस की इन हरकतों से चमचों में हड़कंप मची थी। बॉस की इन हरकतों से उनकी चमचागिरी पर संदेह का साया जो लहराने लगा था। अब हनुमान की तरह दिल चीरकर अपनी भक्ति तो दिखाने से रहे। खैर, कुछ ना कुछ तो करना ही था( सो यहां चमचागिरी का स्तर और तेज हो गया था। अब होड़ किसी लड़के से हो तो,बात समझ में आती है। मामला किसी विपरीतलिंगी का हो,तो भला किया क्या जाए। आपातकाल मीटिंग होने लगी। लोगों में राय-विमशZ कर मामले को अनििश्चतकाल के लिए टालना ही उचित समझा। उड़ते-उड़ते बात मेरे तक पहुंची। एक अपना दुखड़ा यों बयान कर रहा था-क्या करें यार,आज-कल बॉस मुझसे खफा-खफा से रहते हैं। ढ़ंग से बात भी नहीं करते। कुछ ऐसी ही चर्चाएं यहां की फिजाओं में तारी रहती थी। अगले अंक में जारी…ण्