अस्पतालों को महंगी दवाओं के खरीदने पर मिलता है मोटा कमीशन। अस्पताल ही क्यों, डॉक्टरों को भी महंगी दवाएं ही सुहाती हैं, क्योंकि उन्हीं से उनके घर-परिवार की आर्थिक सेहत सुधरती है। सरकार का फरमान जारी करना एक अलग बात है, लेकिन यह देखना होगा कि कितने डॉक्टर अपने कमीशन की कीमत पर गरीब ननकू के लिए सस्ती दवा लिखने को तैयार होंगे?
भारतीय दवा कंपनियां मजबूती से उदारीकरण की आंधी में पैर जमा सकें, इसके लिए जरूरी है कि सरकारी अस्पतालों में जेनेरिक दवाओं की खरीद को शह दी जाए। भारतीय कंपनियां किफायती कीमतों पर दवाएं बेचती हैं जो काफी सक्षम और सुरक्षित मानी जाती हैं
पि छले दिनों चंडीगढ़ में आयरन की गोलियां खाकर बीमार हुए बच्चों ने सरकार की नींद उड़ा दी। इन बच्चों को जो दवाएं दी गई थीं, वे एक्सपायरी डेट की थी। रायपुर की दवा फैक्ट्रियों में धांधली की जांच के दौरान अजीबोगरीब गोलमाल उजागर हुआ। इन फैक्ट्रियों में एक्सपायरी डेट दवाओं की तारीख पेन से बढ़ाकर बाजार में बेचने की तैयारी थी। ऐसा लगता है कि भारतीय बाजार में एक्सपायरी और नकली दवाओं के कारोबार ने जड बना लिया है। इस घटना से सरकारी अस्पतालों की दवा खरीद नीति फिर से विवादों में आ गई है। करोड़ों रुपए की हर साल खरीदी जाने वाली दवाएं जो सरकारी अस्पतालों के जरिए निशुल्क दी जाती हैं , को लेकर हमारे देश में कोई एक नीति नहीं है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलामनबी आजाद ने देर से ही सही लेकिन सरकारी अस्पतालों और केंद्रीय स्वास्थ्य योजनाओं में ऐसी दवाओं को खरीदने पर जोर दिया है, जो पेटेंट मुक्त हों। यह गरीब भारत के स्वास्थ्य बाजार के लिए एक सही कदम होगा। भारत जैसे विकासशील देश में जहां दवा की कीमत बेहद मायने रखती है वहां इसको लेकर चिंता उठना जायज है। एनएसओ के सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में इलाज के कुल खर्च में 79 फीसदी लागत दवाओं की होती है। ऐसे में अगर दवाओं की वैकल्पिक आपूर्ति बंद हो जाती है तो कम इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतें भी आसमान छूने लगेंगी।
अगर पंजाब की ही बात करें तो यहां बड़े स्तर पर दवाओं की खरीद पंजाब हेल्थ सिस्टम कार्पोरेशन करता है वहीं सीएमओ भी लोकल कंपनियों से दवा खरीदते हैं।
मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल चाहते हैं कि दवा केवल स्टैंडर्ड कंपनियों की खरीदी जाएं । लेकिन ये लोकल कंपनियों की अपेक्षा महंगी हैं इसलिए महंगी दवा खरीदने के लिए सरकार के पास बजट की कमी है। विभाग ने स्टेंडर्ड ऊंचा करने के लिए केवल उसी कंपनी से दवा खरीदने की नई शर्त लगा दी है जिसकी टर्न ओवर 15 करोड़ है। हरियाणा ने यही शर्त 35 करोड़ की रख दी है। अभी तक पांच करोड़ रुपए की टर्नओवर वाली कंपनियां ही दवा सप्लाई कर सकती थीं। इस शर्त के चलते अधिकांश छोटी कंपनियां सरकारी अस्पतालों को दवा बेचने की दौड़ से बाहर हो गई हैं। अब एक और दवा से जुडी ख़बर पर नजर डाल लेते हैं। अमेरिकी फार्मा कंपनी एबॉट ने भारत की पिरामल हेल्थकेयर के दवा कारोबार को 3.72 अरब डॉलर यानी करीब साढ़े सत्रह हजार करोड़ रुपए में खरीदा है। अधिग्रहण से जहां विदेशी कंपनियों को विकसित देशों के महज 2-3 फीसदी सालाना बढ़त वाले फार्मा सेक्टर के मुकाबले 14-20 फीसदी बढ़ोतरी की संभावना वाला विशाल भारतीय बाजार मिलता है, वहीं देसी कंपनियां इसके बदले भारी-भरकम पूंजी हासिल करती हैं।
कहीं न कहीं सरकार की नीतियों से यह लग रहा था कि राज्य सरकार बडे दवा कंपनियों की दवाओं को ही गुणवत्तापूर्ण मान रही है। इसलिए छोटे एवं मंझोले स्तर के दवा कंपनियों पर दबाव था कि वे अपनी क्वालिटी को सुधारें। जेनरिक दवाओं के मामले में भारतीय दवा कंपनियों को आर-एंड-डी पर भारी निवेश करने की जरूरत है और उनके बेहतर नतीजों के लिए 10 से 15 साल तक इंतजार करना होगा। इससे उनके प्रतिस्पर्धा में बुरी तरह पिछड़ने का खतरा है, बल्कि उनके पास इसके लिए पूंजी भी नहीं है। दूसरे, उन्हें उन पेटेंट कानूनों और क्वॉलिटी कंट्रोल की उन कड़ी शर्तों का पालन करने के लिए तैयार होना होगा जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियां उन्हें कड़ी टक्कर दे सकती हैं। इस सौदे के साथ 55 हजार करोड़ रुपए के भारतीय दवा बाजार में एबॉट की हिस्सेदारी सात फीसदी हो गई है। इससे उसे भारत की सबसे बड़ी दवा कंपनी बनने का अवसर मिल गया है। दो वर्षों में किसी भारतीय दवा कंपनी के कारोबार का बहुराष्ट्रीय कंपनी के हाथों बिकने का यह दूसरा मामला है। 2008 में जापानी कंपनी दायची ने भारतीय कंपनी रेनबैक्सी का अधिग्रहण किया था। दवाओं के सरकारी खरीद की बात करें तो यह कहा जा सकता है कि महंगे इलाज के दंश से इस गरीब मुल्क को निजात दिलाने के लिए इस पहल को स्वागतयोग्य कहा जा सकता है। बाजार में विदेशी दवा कंपनियों की दवाएं जहां पांच सौ रुपए में मिलती है, वहीं जेनेरिक दवाओं पर खर्चा सौ रुपए के आस-पास ही होता है। अगर सरकारी अस्पतालों में ऐसी दवाओं के खरीद पर जोर दिया जाता है, तो इससे भारतीय दवा कंपनियों को भी एक सहारा मिलेगा ताकि वे विदेशी कंपनियों के एकाधिकार की चुनौती को समय रहते स्वीकार कर सकें। यहां विदेशी कंपनियों द्वारा देशी दवा कंपनियों के अधिग्रहण का कारण भी सरकार की नीतियों को ही जाता है, जो कहीं न कहीं महंगी दवाओं को ही गुणवत्तापूर्ण मानकर सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध करा रही थी। डॉक्टर भी दवा कंपनियों से मिल रही सुविधाओं का उपभोग करते हुए गरीब लोगों की पर्चियों पर महंगी दवाएं ही लिख रहे थे। आखिर दवा कंपनियों को प्रतिस्पध्र्दा में बने रहने के लिए दवा के मार्केटिंग की भी जरूरत थी, ताकि जेनेरिक दवाओं को मात दिया जा सके। लेकिन दवा खरीद का जो भारत में सुस्थापित नेक्सस है, वो सरकार की इस नीति को पलीता लगा सकता है। क्योंकि अस्पतालों को महंगी दवाओं के खरीदने पर मिलता है मोटा कमीशन। अस्पताल ही क्यों, डॉक्टरों को भी महंगी दवाएं ही सुहाती हैं, क्योंकि उन्हीं से उनके घर-परिवार की आर्थिक सेहत सुधरती है। सरकार का फरमान जारी करना एक अलग बात है, लेकिन यह देखना होगा कि कितने डॉक्टर अपने कमीशन की कीमत पर गरीब ननकू के लिए सस्ती दवा लिखने को तैयार होंगे?
भारतीय दवा कंपनियां मजबूती से उदारीकरण की आंधी में पैर जमा सकें, इसके लिए जरूरी है कि सरकारी अस्पतालों में जेनेरिक दवाओं की खरीद को शह दिया जाए। भारतीय कंपनियां किफायती कीमतों पर दवाएं बेचती हैं जो काफी सक्षम और सुरक्षित मानी जाती हैं जबकि वैश्विक दवा कंपनियां 'नई' के नाम पर महंगी दवाएं बेचने के लिए जानी जाती हैं। एक छोटा सा उदाहरण ही पूरी विदेशी दवा कंपनियों की हकीकत को बयान करता है। ऑट्रिविन नाम की नाक में डालने वाली दवाई एक वक्त 5 रुपए में मिलती थी और अब वैश्विक दिग्गज उसके ही स्प्रे को 45 रुपए में बेच रही हैं। ऐसे में किफायत को लेकर लोगों की चिंताएं समझी जा सकती हैं। भारतीय जेनेरिक उद्योग के अस्तित्व का सवाल बहुत बड़ा है। इस तरह की अफवाहें भी तैर रही हैं कि अब बिकने की किसकी बारी है। वैश्विक दवा कंपनियां की परंपरागत बाजार में संभावनाएं सीमित हैं और उन पर कीमतें घटाने के दबाव के साथ-साथ नियामक की सख्ती भी झेलनी पड़ रही है। ये मजबूरियां वैश्विक दवा दिग्गजों को अपनी सीमाओं से बाहर दूसरे बाजारों में विस्तार करने को विवश कर रही हैं। भारत किसी भी लिहाज से बेहद आकर्षक बाजार है। इसका ही नतीजा है कि भीमकाय विदेशी दवा कंपनियां भारत में दवा कंपनियों को खरीदने के लिए उम्मीद से भी यादा कीमत चुकाने को तैयार हैं।
विदेशों में दवा कंपनियों का मानना है कि वे नई दवाओं की खोज के लिए पर्याप्त राशि खर्च करती हैं और भारतीय कंपनियां इनकी मेहनत को चुराकर सस्ते में बाजार में दवाएं उतार देती हैं। इसके कारण दवा तो सस्ती मिलती है, लेकिन इसका खामियाजा विदेशी दवा कंपनियों को भुगतना पडता है। भारत सरकार को भी इस बात का ध्यान रखना होगा कि सस्ती दवाओं के चक्कर में कहीं नकली और एक्सपाइरी दवाएं ही सरकारी अस्पतालों में न मिलने लगें, जैसा कि हरियाणा और छत्तीसगढ में देखने को मिला। भारत में नकली दवाओं का बडा बाजार है और अगर इनकी घुसपैठ इन सरकारी अस्पतालों तक हुई, तो यह भारत की गरीब जनता के साथ खिलवाड होगा। ये अपनी दवाएं चलाने के लिए दवा खरीदी में दलाली के लिए एक बडी रकम भी देने को तैयार होंगी। भारत में कुछ दिनों पहले पोलियो ड्रॉप पीने से भी कुछ बच्चों के बीमार पडने की खबर काफी चर्चा में रही थी। सरकार अगर गरीब जनता का ख्याल करते हुए सस्ती दवाएं सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध कराना चाहती है, एक अच्छी पहल तो है, लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि दवाएं लोगों को मिले भी। डॉक्टरों और दवा कंपनियों के सांठ-गांठ को कमजोर करने के लिए भी सरकार को कदम उठाना चाहिए ताकि गरीबों को इलाज के लिए महंगी दवाओं का डोज न लेना पडे।
Wednesday, June 2, 2010
सरकारी बाबू समझो इशारे...
चन्दन राय
सरकारी बाबुओं और नेताओं में एक बात पर स्पष्ट मतैक्य है॥ आजादी के बाद वाले दौर से ही दोनों में इस बात की होड लगी है कि कौन भ्रष्टाचार में एक-दूसरे को पछाडता है। सरकारी बाबुओं को इस बात का अफसोस है कि आमतौर पर नेता उनसे बाजी मार ले जाते हैं। जैसे नेताओं में कई वर्ग होते हैं-छुटभैये नेता, प्रदेश और जिला स्तर के नेता या राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नेता, उसी तरह सरकारी बाबुओ में भी चपरासी से लेकर आईएएस लॉबी तक के कई लोग होते हैं। लोगों के हैसियत के हिसाब से रेट तय होता है। आम लोग भी इस बात को समझते हैं कि चपरासी है तो कुछेक हजार में काम निकल सकता है, ऊपर का अधिकारी हो तो फिर बात लाखों, करोडों तक भी जा सकती है। शायद ही कोई ऐसा हो, जिनका साबका सरकारी बाबुओं की इस बिरादरी से न पडा हो। एक बार जो इनके चंगुल में फंसा, जिंदगी भर के लिए इनसे तौबा कर लेता है। इनकी फितरत ही कुछ ऐसी होती है। चाहे राशन कार्ड बनवाना हो, ड्राइविंग लाइसेंस का रिन्यूवल करवाना हो, पासपोर्ट बनवाना हो या फिर कुछ और लालफीताशाही के फीतों में उलझकर बडों-बडों की सांसें दम तोड देती हैं। कहते हैं ऊपर से लेकर नीचे तक के बाबुओं का रेट बंधा होता है। बडा बाबू तक जाने के लिए छोटे बाबू को चढावा दिया जाता है। हालांकि सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार से देश के नेता तो नहीं उकताए, लेकिन न्यायपालिका जरूर सख्त हो गई। अभी मुंबई हाईकोर्ट ने सरकारी बाबुओं को भ्रष्टाचार के आरोप में पकडे ज़ाने पर आजीवन कारावास की सजा तजवीज की है। अपना घर साफ करते-करते न्यायपालिका को ऐसा लगा कि आस-पास के कूडों की भी सफाई होनी लाजिमी है। नहीं तो यह संक्रामक रोग फिर न्याय के मंदिर को भीतर से खोखला कर देगा। खैर यहां की व्यवस्था से हमारे मुख्य न्यायाधीश निपटें, हमारी चिंता तो लोकतंत्र के रहनुमाओं के स्थायी अधिकारियों से है। अभी मध्यप्रदेश के आईएएस लॉबी के यहां छापे के दौरान सीबीआई इस गुत्थी को सुलझाने में लगी रही कि यह पैसा तिरूपति के मंदिरों के चढावे से कितना गुना ज्यादा है। केतन देसाई के घर सीबीआई छापे के दौरान तो ऐसा लगता था मानो इनकी दिलचस्पी डॉक्टरी से ज्यादा सोना जमा करने में रही हो। एक बात तो तय है कि अगर यह सोना चंद्रशेखर सरकार के समय में होता, तो हमें अपने देश की इज्जत विदेशी बैंकों में गिरवी नहीं रखनी होती। ऐसे अफसरों के यहां कुछेक करोड पाया जाना तो आम बात है। फिर चल-अचल संपत्ति, बैंक लॉकर में जमा की गई रकम, मॉरिशस के रास्ते देश में भेजा गया टैक्स रहित पैसा, विदेशों में आलीशान कोठियां, अनगिनत हवाई यात्राएं, रिश्तेदारों के नाम संपत्ति, स्विस बैंक में काला धन और न जाने क्या-क्या? फिर ये वर्ग आम जनता को कैटल क्लास समझता भी है तो इसपर सदन में इतना हल्ला-हंगामा क्यों? सचमुच वे कीडों की तरह ही तो जी रहे हैं, विश्वास न हो तो धूल खा रही अर्जुन सेनगुप्ता की रिपोर्ट पर ही नजर दौडा लें। जब तक जीने लायक रहे जीया, नहीं तो मरने के लिए किसानों के पास कीटनाशक तो होता ही है।
मुंबई हाईकोर्ट के सब्र का बांध तभी टूटा, जब आत्महत्या करने के कगार पर खडे क़िसानों की जमाराशि को भी ये सरकारी बाबू ले उडे। ऌन प्रदेशों में तो ऐसा लग रहा है मानो आत्महत्या करने के लिए देश भर के गरीब किसान आंध्रप्रदेश, विदर्भ, बुंदेलखंड में इकट्ठे हो रहे हों। हो सकता है सरकार को इसमें विपक्षी साजिश की भी बू आती हो। हुआ यूं कि विदर्भ के गरीब किसानों का 1.30 करोड क़ा फंड एक को-ऑपरेटिव बैंक में कमिश्नर ने यह जानते हुए जमा करवाया कि एक महीने के बाद यह बैंक बंद हो जाएगा। सरकारी अफसरों की सांठ-गांठ से इन गरीबों के पैसे का हेर-फेर किया गया। इसी मामले में संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने सरकारी बाबुओं को भ्रष्टाचार के मामले में उम्रकैद दिए जाने की सलाह दी। वर्तमान नियम के तहत सिर्फ सात साल की सजा का प्रावधान है, जो कि इसे रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। उम्मीद है कि उम्रकैद का डर सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार को कुछ हद तक नियंत्रित करेगा। हालांकि कानून बनने से पहले ही सरकारी बाबू उसकी काट निकाल लेने में माहिर होते हैं। आजादी के बाद सूचना का अधिकार पहला ऐसा कानून था, जिसने इन बाबुओं की नींद हराम कर दी थी। सरकारी बाबुओं को यह बात हजम नहीं हुई कि जो तबका काम करवाने के लिए उनके आगे हाथ-पैर जोडक़र खडा रहता था, एकाएक साधिकार, गर्दन ऊंची करके उनसे बात कर रहा है। अभी भी आम आदमी के इस अधिकार पर बाबुओं की टेढी नजर है कि कैसे इस कानून को पटखनी दी जाए? अब तो सरकारी बाबुओं का मामला भी हाईटेक हो गया है। वो जमाना कल की बात हो चुकी जब सारा लेन-देन टेबल के नीचे होता था। मीडिया के स्टिंग ने सरकारी बाबुओं को काफी दंश दिया है।
अब राशन, पासपोर्ट दफ्तरों के बाहर ही सरकारी बाबुओं ने दलालों का जाल फैला रखा है। जो मोटी रकम लेने के बाद आपके काम हो जाने की गारंटी देता है, उसका एक अंश ऊपर से नीचे तक के बाबुओं में बंटता है। यही कारण है कि कमाऊ थानों के लिए थानेदार एक मोटी रकम चुकाते हैं, जिससे भ्रष्टाचार रूपी गंगा सतत प्रवाहित होती रहे। सरकार जब अपने मातहतों के बारे में यह जानने की जहमत नहीं उठाती कि मामूली तनख्वाह की बदौलत कैसे कोई नेता कुछ दिनों में ही करोडपति, अरबपति और न जाने कितने पति बन जाते हैं, तो भला सरकारी बाबुओं की लगाम कौन थामे? लूट के मामले में लोकतंत्र के हर कोने में मौन सहमति है। लूट नीति मंथन करी-लोकतंत्र में इस मंत्र का पाठ करके ही आप इस व्यवस्था का हिस्सा बन सकते हैं। बिहार में बाढ आने पर गंदे पानी में पलनेवाले जाेंक भी हर साल आ जाते हैं। बाढ में अपना घर-बार गंवा चुके लोगों को इस जोंक की भी ज्यादा चिंता नहीं होती। ये तो उस सरकारी जोंक से परेशान होते हैं, जिनके लिए बाढ, सुखाड या महामारी इनके खून चूसने का बेहतर मौसम होता है।
भारत में कई ऐसे देश हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था ही भारत जैसे भ्रष्ट देशों से आए काले पैसों पर चलती है। स्विटजरलैंड हो या मॉरीशस-ये देश अपने यहां के बैंकों में काले या सफेद पैसों को नहीं देखते। इन पैसों पर ही तो इनकी अर्थव्यवस्था का मजबूत ढांचा खडा होता है। मॉरीशस जैसे देशों में कंपनियां रजिस्टर्ड करवाने के बाद भारत में निवेश किया जाता है ताकि टैक्स से राहत मिल सके। क्या सरकार को इस बात की जानकारी नहीं-सोचना हमारी नादानी होगी। फिर सरकार के हाथ किन लोगों ने कार्रवाई करने से रोक रखे हैं-यह जानना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। यहीं से लोकतंत्र के ढोंग का पोल खुलेगा, जब अफसरशाह और राजनेता सभी इस खेल में नंगे, बेपर्दा होकर आम जनता के सामने लाए जाएंगे। आज भारत की तस्वीर ही दूसरी होती, यदि आजादी के बाद नेहरू ने आम जनता से किया अपना वादा निभाया होता। भ्रष्टाचारी बाबुओं और नेताओं को नजदीक के बिजली के पोल पर लटकाने की नेहरू की धमकी जीप घोटाले में फंसे अपने साथियों को देखकर मौन रह गई। यह देश के साथ पहला ऐसा धोखा था, जिसने भ्रष्टाचार के राक्षस को आज तक खाद-पानी देकर जीवित रखा है। आम लोगों में यह जुमला काफी प्रचलित है कि ऊंट किस करवट बैठेगा, जानना उतना ही मुश्किल है, जितना यह जानना कि सरकारी बाबू चढावे की रकम कितनी बोलेगा? हालांकि ऊंटों का नेचर काफी हद तक उन अफसरों से मिलता है जो सरकारी निर्णयों की फाइल किसी भी करवट दबाकर लेट जाते हैं और हुकूमत इस खुशफहमी में होती है कि उन योजनाओं का लाभ नीचे के लोगों तक पहुंच रहा होगा। कितने भी रोजगार गारंटी लागू कर लो, बिना व्यवस्था के बदले गरीबों के घर में मानसून नहीं आने वाला। तभी तो एक बार भटकता हुआ भ्रष्टाचार का राक्षस व्यंग्यकार शैल चतुर्वेदी के घर आकर अपना परिचय देता है- ''मैं आज का वक्त हूं, कलयुग की धमनियों में बहता हुआ रक्त हूं, मेरे ही इशारे पर रात में हुस्न नाचता है और दिन में पंडित रामायण बांचता है। '' इन हालातों में सरकारी बाबूओं की क्या बिसात जो उम्रकैद के डर से भ्रष्टाचार से तौबा कर लें?
सरकारी बाबुओं और नेताओं में एक बात पर स्पष्ट मतैक्य है॥ आजादी के बाद वाले दौर से ही दोनों में इस बात की होड लगी है कि कौन भ्रष्टाचार में एक-दूसरे को पछाडता है। सरकारी बाबुओं को इस बात का अफसोस है कि आमतौर पर नेता उनसे बाजी मार ले जाते हैं। जैसे नेताओं में कई वर्ग होते हैं-छुटभैये नेता, प्रदेश और जिला स्तर के नेता या राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नेता, उसी तरह सरकारी बाबुओ में भी चपरासी से लेकर आईएएस लॉबी तक के कई लोग होते हैं। लोगों के हैसियत के हिसाब से रेट तय होता है। आम लोग भी इस बात को समझते हैं कि चपरासी है तो कुछेक हजार में काम निकल सकता है, ऊपर का अधिकारी हो तो फिर बात लाखों, करोडों तक भी जा सकती है। शायद ही कोई ऐसा हो, जिनका साबका सरकारी बाबुओं की इस बिरादरी से न पडा हो। एक बार जो इनके चंगुल में फंसा, जिंदगी भर के लिए इनसे तौबा कर लेता है। इनकी फितरत ही कुछ ऐसी होती है। चाहे राशन कार्ड बनवाना हो, ड्राइविंग लाइसेंस का रिन्यूवल करवाना हो, पासपोर्ट बनवाना हो या फिर कुछ और लालफीताशाही के फीतों में उलझकर बडों-बडों की सांसें दम तोड देती हैं। कहते हैं ऊपर से लेकर नीचे तक के बाबुओं का रेट बंधा होता है। बडा बाबू तक जाने के लिए छोटे बाबू को चढावा दिया जाता है। हालांकि सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार से देश के नेता तो नहीं उकताए, लेकिन न्यायपालिका जरूर सख्त हो गई। अभी मुंबई हाईकोर्ट ने सरकारी बाबुओं को भ्रष्टाचार के आरोप में पकडे ज़ाने पर आजीवन कारावास की सजा तजवीज की है। अपना घर साफ करते-करते न्यायपालिका को ऐसा लगा कि आस-पास के कूडों की भी सफाई होनी लाजिमी है। नहीं तो यह संक्रामक रोग फिर न्याय के मंदिर को भीतर से खोखला कर देगा। खैर यहां की व्यवस्था से हमारे मुख्य न्यायाधीश निपटें, हमारी चिंता तो लोकतंत्र के रहनुमाओं के स्थायी अधिकारियों से है। अभी मध्यप्रदेश के आईएएस लॉबी के यहां छापे के दौरान सीबीआई इस गुत्थी को सुलझाने में लगी रही कि यह पैसा तिरूपति के मंदिरों के चढावे से कितना गुना ज्यादा है। केतन देसाई के घर सीबीआई छापे के दौरान तो ऐसा लगता था मानो इनकी दिलचस्पी डॉक्टरी से ज्यादा सोना जमा करने में रही हो। एक बात तो तय है कि अगर यह सोना चंद्रशेखर सरकार के समय में होता, तो हमें अपने देश की इज्जत विदेशी बैंकों में गिरवी नहीं रखनी होती। ऐसे अफसरों के यहां कुछेक करोड पाया जाना तो आम बात है। फिर चल-अचल संपत्ति, बैंक लॉकर में जमा की गई रकम, मॉरिशस के रास्ते देश में भेजा गया टैक्स रहित पैसा, विदेशों में आलीशान कोठियां, अनगिनत हवाई यात्राएं, रिश्तेदारों के नाम संपत्ति, स्विस बैंक में काला धन और न जाने क्या-क्या? फिर ये वर्ग आम जनता को कैटल क्लास समझता भी है तो इसपर सदन में इतना हल्ला-हंगामा क्यों? सचमुच वे कीडों की तरह ही तो जी रहे हैं, विश्वास न हो तो धूल खा रही अर्जुन सेनगुप्ता की रिपोर्ट पर ही नजर दौडा लें। जब तक जीने लायक रहे जीया, नहीं तो मरने के लिए किसानों के पास कीटनाशक तो होता ही है।
मुंबई हाईकोर्ट के सब्र का बांध तभी टूटा, जब आत्महत्या करने के कगार पर खडे क़िसानों की जमाराशि को भी ये सरकारी बाबू ले उडे। ऌन प्रदेशों में तो ऐसा लग रहा है मानो आत्महत्या करने के लिए देश भर के गरीब किसान आंध्रप्रदेश, विदर्भ, बुंदेलखंड में इकट्ठे हो रहे हों। हो सकता है सरकार को इसमें विपक्षी साजिश की भी बू आती हो। हुआ यूं कि विदर्भ के गरीब किसानों का 1.30 करोड क़ा फंड एक को-ऑपरेटिव बैंक में कमिश्नर ने यह जानते हुए जमा करवाया कि एक महीने के बाद यह बैंक बंद हो जाएगा। सरकारी अफसरों की सांठ-गांठ से इन गरीबों के पैसे का हेर-फेर किया गया। इसी मामले में संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने सरकारी बाबुओं को भ्रष्टाचार के मामले में उम्रकैद दिए जाने की सलाह दी। वर्तमान नियम के तहत सिर्फ सात साल की सजा का प्रावधान है, जो कि इसे रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। उम्मीद है कि उम्रकैद का डर सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार को कुछ हद तक नियंत्रित करेगा। हालांकि कानून बनने से पहले ही सरकारी बाबू उसकी काट निकाल लेने में माहिर होते हैं। आजादी के बाद सूचना का अधिकार पहला ऐसा कानून था, जिसने इन बाबुओं की नींद हराम कर दी थी। सरकारी बाबुओं को यह बात हजम नहीं हुई कि जो तबका काम करवाने के लिए उनके आगे हाथ-पैर जोडक़र खडा रहता था, एकाएक साधिकार, गर्दन ऊंची करके उनसे बात कर रहा है। अभी भी आम आदमी के इस अधिकार पर बाबुओं की टेढी नजर है कि कैसे इस कानून को पटखनी दी जाए? अब तो सरकारी बाबुओं का मामला भी हाईटेक हो गया है। वो जमाना कल की बात हो चुकी जब सारा लेन-देन टेबल के नीचे होता था। मीडिया के स्टिंग ने सरकारी बाबुओं को काफी दंश दिया है।
अब राशन, पासपोर्ट दफ्तरों के बाहर ही सरकारी बाबुओं ने दलालों का जाल फैला रखा है। जो मोटी रकम लेने के बाद आपके काम हो जाने की गारंटी देता है, उसका एक अंश ऊपर से नीचे तक के बाबुओं में बंटता है। यही कारण है कि कमाऊ थानों के लिए थानेदार एक मोटी रकम चुकाते हैं, जिससे भ्रष्टाचार रूपी गंगा सतत प्रवाहित होती रहे। सरकार जब अपने मातहतों के बारे में यह जानने की जहमत नहीं उठाती कि मामूली तनख्वाह की बदौलत कैसे कोई नेता कुछ दिनों में ही करोडपति, अरबपति और न जाने कितने पति बन जाते हैं, तो भला सरकारी बाबुओं की लगाम कौन थामे? लूट के मामले में लोकतंत्र के हर कोने में मौन सहमति है। लूट नीति मंथन करी-लोकतंत्र में इस मंत्र का पाठ करके ही आप इस व्यवस्था का हिस्सा बन सकते हैं। बिहार में बाढ आने पर गंदे पानी में पलनेवाले जाेंक भी हर साल आ जाते हैं। बाढ में अपना घर-बार गंवा चुके लोगों को इस जोंक की भी ज्यादा चिंता नहीं होती। ये तो उस सरकारी जोंक से परेशान होते हैं, जिनके लिए बाढ, सुखाड या महामारी इनके खून चूसने का बेहतर मौसम होता है।
भारत में कई ऐसे देश हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था ही भारत जैसे भ्रष्ट देशों से आए काले पैसों पर चलती है। स्विटजरलैंड हो या मॉरीशस-ये देश अपने यहां के बैंकों में काले या सफेद पैसों को नहीं देखते। इन पैसों पर ही तो इनकी अर्थव्यवस्था का मजबूत ढांचा खडा होता है। मॉरीशस जैसे देशों में कंपनियां रजिस्टर्ड करवाने के बाद भारत में निवेश किया जाता है ताकि टैक्स से राहत मिल सके। क्या सरकार को इस बात की जानकारी नहीं-सोचना हमारी नादानी होगी। फिर सरकार के हाथ किन लोगों ने कार्रवाई करने से रोक रखे हैं-यह जानना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। यहीं से लोकतंत्र के ढोंग का पोल खुलेगा, जब अफसरशाह और राजनेता सभी इस खेल में नंगे, बेपर्दा होकर आम जनता के सामने लाए जाएंगे। आज भारत की तस्वीर ही दूसरी होती, यदि आजादी के बाद नेहरू ने आम जनता से किया अपना वादा निभाया होता। भ्रष्टाचारी बाबुओं और नेताओं को नजदीक के बिजली के पोल पर लटकाने की नेहरू की धमकी जीप घोटाले में फंसे अपने साथियों को देखकर मौन रह गई। यह देश के साथ पहला ऐसा धोखा था, जिसने भ्रष्टाचार के राक्षस को आज तक खाद-पानी देकर जीवित रखा है। आम लोगों में यह जुमला काफी प्रचलित है कि ऊंट किस करवट बैठेगा, जानना उतना ही मुश्किल है, जितना यह जानना कि सरकारी बाबू चढावे की रकम कितनी बोलेगा? हालांकि ऊंटों का नेचर काफी हद तक उन अफसरों से मिलता है जो सरकारी निर्णयों की फाइल किसी भी करवट दबाकर लेट जाते हैं और हुकूमत इस खुशफहमी में होती है कि उन योजनाओं का लाभ नीचे के लोगों तक पहुंच रहा होगा। कितने भी रोजगार गारंटी लागू कर लो, बिना व्यवस्था के बदले गरीबों के घर में मानसून नहीं आने वाला। तभी तो एक बार भटकता हुआ भ्रष्टाचार का राक्षस व्यंग्यकार शैल चतुर्वेदी के घर आकर अपना परिचय देता है- ''मैं आज का वक्त हूं, कलयुग की धमनियों में बहता हुआ रक्त हूं, मेरे ही इशारे पर रात में हुस्न नाचता है और दिन में पंडित रामायण बांचता है। '' इन हालातों में सरकारी बाबूओं की क्या बिसात जो उम्रकैद के डर से भ्रष्टाचार से तौबा कर लें?
मुझे चुप रहने दो
चन्दन राय
अक्सर होता यही है कि बडे अपराधों में क्रिमिनल कोई सुराग नहीं छोडते। ऐसे में अपराधियों की तफ्तीश करना भूसे के ढेर में से सूई खोजने सरीखा होता है। जांच एजेंसियों को उम्मीद होती है कि चलो कुछ लोगों का नार्को या ब्रेन मैपिंग करवा लिया जाए, ताकि कुछ तो सूत्र हाथ आएंगे, जिसके आधार पर जांच आगे बढाई जा सकती है। हालांकि यह सब इतना आसान होता तो सीबीआई कब की अपराधियों को जेल की सलाखों में कैद कर चुकी होती। स्टांप घोटाले के आरोपी तेलगी के नार्को टेस्ट में कई राजनेताओं के नाम सामने आए, लेकिन सीबीआई हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। कोर्ट भी मात्र उतने ही अंश को स्वीकार करती है, जितना कि नार्को टेस्ट के आधार पर पुख्ता सबूत जुटा लिए जाएं
तु म आरुषि को कब से जानते हो? तुमने उसका मर्डर क्यों किया, जवाब दो? तुमने उसको क्यों मारा? लगातार प्रश्नों की बौछार से उकताया युवक स्ट्रेचर पर लेटा है और लगभग अर्ध्दबेहोशी की स्थिति में कुछ का कुछ बुदबुदा रहा है? उसे पता नहीं कि वह क्या कह रहा है? वह तो बस इतना चाहता है कि जल्द से जल्द वह इनके चंगुल से बाहर निकल जाए। ये फुटेज तो आपको याद होगा, जो बार-बार टेलीविजन पर चलाया गया था। मीडिया की भाषा में कहें तो यह देश की सबसे बडी मर्डर मिस्ट्री थी, जिसमें न जाने कइयों को कई बार इस तरह के प्रश्नों से दो-चार होना पडा। बंगलुरु का मशहूर फारेंसिक साइंसेज विभाग जहां जाने के नाम से ही कई शातिर, सफेदपोश अपराधियों को भी नानी याद आने लगती है। लेकिन होता यही है कि डेढ-दो घंटे की असह्य यातना के बाद भी मामला शिफर का शिफर। आरुषि के मामले में सीबीआई से लेकर देश की आला जांच एजेंसियां अंधेरे में तीर चलाती रही, पर हत्यारे की बात तो जानें दें, धारदार हथियार भी आज तक नहीं मिल सके जिनसे कत्ल किया गया था। यहीं से नार्को टेस्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठने शुरू हो गए थे। नशे की हालत में झूमते हुए राजकपूर का यादगार अभिनय बरबस लोगों के जेहन में कौंध जाता है-''मुझको यारों माफ करना, मैं नशे में हूं। अब तो मुमकिन है बहकना, मैं नशे में हूं। तुम बस इतना याद रखना, मैं नशे में हूं।'' यह गाना आम आदमी को तो याद रहा लेकिन सीबीआई इसी अर्धसत्य के आधार पर गुहनहगारों की तलाश में लगी रही। लगभग नशे में बेसुध आदमी के बयानों पर ही सच की तलाश में हाथ-पैर मारती रही। लोग कहते भी हैं भला शराबी का क्या भरोसा? कब क्या बक जाए? लेकिन देश की बडी-बडी ज़ांच एजेंसियां इसी को साक्ष्य के तौर पर मानती-जांचती रहीं। तो ये है नार्को टेस्ट का सच जो इस तर्क में विश्वास करता है कि 'सोडियम पेंटाथाल' नामक रसायन के नशे में बेसुध आदमी झूठ नहीं बोल सकता। अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 20 (3) स्वदोषारोपण से छूट के मौलिक अधिकार का हवाला देते हुए नार्को, पोलिग्राफिक और ब्रेन मैपिंग को असंवैधानिक करार दिया है।
हालांकि इसमें कई पेंच हैं, जो इसकी वैधानिकता को लेकर पहले भी उठते रहे हैं। नार्को और ब्रेन मैपिंग टेस्ट में साधारण अपराधी तो फंस जाता है, लेकिन कोई चालाक, शातिर अपराधी जो इस टेस्ट की खूबियों, खामियों से परिचित है, बचकर निकल जाता है। अगर कोई नशे में जाने के पहले यह ठान ले कि उसे कुछ नहीं कहना, तो लाख प्रयत्न करने के बाद भी कुछ उगलवा लेना मुश्किल है। यही कारण है कि डॉ. राजेश तलवार जैसे लोगों को कई बार इस टेस्ट से गुजरना पडा। इसके बावजूद सीबीआई हाथ मलती रही और कोई भी सबूत नहीं इकट्ठा कर सकी, जिससे इस दोहरे हत्याकांड की गुत्थी सुलझ सके। अगर वैधता के सवाल को भी छोड दें तो मनोवैज्ञानिक दवाब में किसी से जुर्म कबूल करवाना संवैधानिक अपराध है, कोर्ट ने इसी पक्ष को पकडा है। भारतीय कानून में धारा 164 के अनुसार बिना किसी दवाब के न्यायाधीश के सामने दिए गए बयान ही न्यायालयों को मान्य हैं। इसी को आधार बनाते हुए कोर्ट ने कहा है कि जांच एजेंसियों को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि जबरन किसी को यह कहने के लिए बाध्य करें कि तुमने ये हत्या की है या गुनाह किया है? सवाल तो आम आदमी के मौलिक अधिकारों को लेकर है, जिसमें देश के शातिर अपराधियों से लेकर संतों तक को भी एक ही श्रेणी में रखा गया है।
अगर देश में आतंकवादियों के लिए टाडा जैसे कानून की जरूरत सरकार बताती रही है, तो अजमल आमिर कसाब, अब्दुल करीम तेलगी, संतोखबेन जडेजा, देवेंद्र यादव जैसे लोगों को छूट क्यों? क्या देश के गद्दारों, आतंकवादियों एवं देशद्रोहियों के लिए इन मामलों में कुछ विशेष उपबंध नहीं किए जा सकते, जिससे कानून की मर्यादा भी रह जाए और ऐसे अपराधियों में भय का माहौल भी पैदा हो। ये ऐसे लोग हैं, जिन्होंने देश की अस्मिता को किसी न किसी रूप में चुनौती दी है। लेकिन सवाल तो ये है कि फिर तय कौन करे कि कौन देश के दुश्मन हैं और कौन सरकार की नीतियों का विरोध करने के कारण तथाकथित दुश्मन। सरकार सीबीआई की बदौलत इस हथियार का इस्तेमाल राजनैतिक विरोधियों को दबाने के लिए भी कर सकती है। इन दिनों ऐसे आरोप सडक़ से लेकर सदन तक सरकार पर लगते भी रहे हैं। हालांकि जांच के विषय में सीबीआई के आला अधिकारियों का मानना है कि अब कई राज इन अपराधियों के जहन में ही दफन हो जाएंगे। अक्सर होता यही है कि बडे अपराधों में क्रिमिनल कोई सुराग नहीं छोडते। ऐसे में अपराधियों की तफ्तीश करना भूसे के ढेर में से सूई खोजने सरीखा होता है। जांच एजेंसियों को उम्मीद होती है कि चलो कुछ लोगों का नार्को या ब्रेन मैपिंग करवा लिया जाए, ताकि कुछ तो सूत्र हाथ आएंगे, जिसके आधार पर जांच आगे बढाई जा सकती है। या अपराधियों के मोडस ओपरेंडी की या फिर उनके गैंग के बारे में जानकारी जुटाई जा सकती है। हालांकि यह सब इतना आसान होता तो सीबीआई कब की अपराधियों को जेल की सलाखों में कैद कर चुकी होती। स्टांप घोटाले के आरोपी तेलगी के नार्को टेस्ट में कई राजनेताओं के नाम सामने आए, लेकिन सीबीआई हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। सिर्फ अपराधी का कहना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि इनके कहे के आधार पर साक्ष्य भी जुटाने होते हैं। कोर्ट भी मात्र उतने ही अंश को स्वीकार करती है, जितना कि नार्को टेस्ट के आधार पर पुख्ता सबूत जुटा लिए जाएं। जैसे अपराधी ने नार्को टेस्ट के दौरान कबूला हो कि आरुषि की हत्या में धारदार हथियार को नाले में बहा दिया गया और सीबीआई उस हथियार को खोज निकाले। यहां हथियार दिखाना तो कोर्ट में साक्ष्य के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकता है, लेकिन सिर्फ उस व्यक्ति ने नार्को टेस्ट के दौरान ऐसा कहा को साक्ष्य नहीं माना जा सकता।
न्यायालय का इस मामले में स्पष्ट मानना है कि अगर सहमति या स्वेच्छा से इस तरह के टेस्ट किए जाते हैं और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देशों का पालन किया जाता है, तभी इस तरह के टेस्ट की इजाजत दी जानी चाहिए। इस मामले में कोर्ट का ये भी कहना है कि जनहित की दुहाई देने के बाद भी इन मामलों में छूट नहीं दी जा सकती। मानव अधिकारों के सजग प्रहरी होने के नाते सुप्रीम कोर्ट की चिंता वाजिबहै।
देश के वरिष्ठ न्यायविदों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। लेकिन क्या कोई अपराधी ऐसे टेस्ट के लिए तैयार होगा, जिसमें उसके फंसने की संभावना हो? हाल में आंध्रप्रदेश के पूर्व राज्यपाल एनडी तिवारी ने अवैध संतान के आरोप के मामले में डीएनए टेस्ट कराए जाने से इंकार किया है। यहां भी हवाला यही दिया जा रहा है कि मुझे जबरन मेरे ही खिलाफ गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। हालांकि इसकी वैधानिकता नार्को एवं लाइ डिटेक्टर से ज्यादा वैज्ञानिक धरातल पर आधारित है। लेकिन तर्क तो वही हैं। गुजरात की गॉडमदर संतोखबेन के नाम से आप परिचित होंगे ही। न जाने कई अपराध एवं हत्या के मामलों में आरोपी संतोखबेन ने नार्को टेस्ट कराए जाने की याचिका को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। ये जीत उन अपराधियों की है, जो मानवाधिकारों की आड में अपने क्रूर चेहरों पर नकाब डाल सकेंगे। हालांकि टेस्ट के नतीजों के बाद भी इनकी सेहत पर कोई असर नहीं होना था। अगर विश्वास न हो तो आज तक के नार्को टेस्ट के आंकडाें पर गौर फरमाएं, जिनमें पांच प्रतिशत सुराग भी जांच एजेंसियों को नहीं मिला है।
सुप्रीम कोर्ट ने कई गंभीर मामलों में नार्को टेस्ट के फुटेज मीडिया को जारी किए जाने पर भी आपत्ति जाहिर की थी। इन मामलों में जांच एजेंसियों को कोई सुराग मिले या नहीं, लेकिन ट्रायल कोर्ट बेशक प्रभावित होता है। हालांकि न्यायाधीश इस बात को जानते हैं कि ये पुख्ता सबूत नहीं, लेकिन बोलती तस्वीरों के असर से बाहर निकलने में समय तो लगता ही है। ऐसा हो सकता है कि फैसले को कुछ हद तक ये प्रभावित भी करें, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। नार्को टेस्ट में परिणाम प्रश्न पूछने के तरीकों पर ही निर्भर करता है। जांच के दौरान ऐसा देखा गया है कि व्यक्ति ज्यादातर पेश किए गए सुझावों पर हामी ही भरता है। नशे में तो आदमी घर का पता तक भूल जाता है, फिर ऐसे में नकारने का दुस्साहस उसमें नहीं होता। क्योंकि उसे पता है कि उसका एक 'न' कहना कई और अटपटे सवालों को खडा करेगा और उसे यह दुस्सह्य वेदना देर तक झेलनी होगी। अगर ब्रेन मैपिंग की ही बात करें तो हडबडाहट में वह कुछ का कुछ जवाब दे सकता है। आदमी को पता होता है कि उसका ब्रेन मैपिंग किया जा रहा है, तो फिर सहज होने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जब आदमी को कुछ चित्र या आवाज सुनाई जाती है, तो हो सकता है मिलते-जुलते दृश्यों के कारण या हडबडी में मस्तिष्क तीव्र गति से प्रतिक्रिया दिखाए। कुछ लोग यों भी दिल के कमजोर होते हैं, जो मस्तिष्क से निकली तरंगों के आधार पर अपराधी सिध्द किए जा सकते हैं। कुछ ऐसा ही होता है पॉलीग्राफ टेस्ट के दौरान भी। इसमें आदमी के ब्लड प्रेशर, हार्टबीट, श्वसन और मांसपेशियों की गति का सवाल पूछने के दौरान अध्ययन किया जाता है। वैज्ञानिक परीक्षण होने के बाद भी इसके निष्कर्षों को वैज्ञानिक कसौटी पर नहीं सही माना जाता। यह 1+1=2 की तरह का वैज्ञानिक सच नहीं है। देश के भले नागरिकों को नेक सलाह है कि अगली बार किसी 'सच का सामना' में जाएं तो जरा संभलकर, क्योंकि हो सकता है कि आपका सच मशीन के लिए झूठा हो। आप खामखां बदनाम भी हों और करोडों की माया भी हाथ न आए। संविधान ने स्वदोषारोपण के सवाल पर बोलने या चुप रहने में से एक विकल्प चुनने का अधिकार नागरिकों को दिया है। न्यायालय ने इस अधिकार की रक्षा के लिए फैसला तो दिया है, लेकिन देखना होगा कि कहीं अपराधी तबका इसकी आड में देश की कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती न साबित हों।
अक्सर होता यही है कि बडे अपराधों में क्रिमिनल कोई सुराग नहीं छोडते। ऐसे में अपराधियों की तफ्तीश करना भूसे के ढेर में से सूई खोजने सरीखा होता है। जांच एजेंसियों को उम्मीद होती है कि चलो कुछ लोगों का नार्को या ब्रेन मैपिंग करवा लिया जाए, ताकि कुछ तो सूत्र हाथ आएंगे, जिसके आधार पर जांच आगे बढाई जा सकती है। हालांकि यह सब इतना आसान होता तो सीबीआई कब की अपराधियों को जेल की सलाखों में कैद कर चुकी होती। स्टांप घोटाले के आरोपी तेलगी के नार्को टेस्ट में कई राजनेताओं के नाम सामने आए, लेकिन सीबीआई हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। कोर्ट भी मात्र उतने ही अंश को स्वीकार करती है, जितना कि नार्को टेस्ट के आधार पर पुख्ता सबूत जुटा लिए जाएं
तु म आरुषि को कब से जानते हो? तुमने उसका मर्डर क्यों किया, जवाब दो? तुमने उसको क्यों मारा? लगातार प्रश्नों की बौछार से उकताया युवक स्ट्रेचर पर लेटा है और लगभग अर्ध्दबेहोशी की स्थिति में कुछ का कुछ बुदबुदा रहा है? उसे पता नहीं कि वह क्या कह रहा है? वह तो बस इतना चाहता है कि जल्द से जल्द वह इनके चंगुल से बाहर निकल जाए। ये फुटेज तो आपको याद होगा, जो बार-बार टेलीविजन पर चलाया गया था। मीडिया की भाषा में कहें तो यह देश की सबसे बडी मर्डर मिस्ट्री थी, जिसमें न जाने कइयों को कई बार इस तरह के प्रश्नों से दो-चार होना पडा। बंगलुरु का मशहूर फारेंसिक साइंसेज विभाग जहां जाने के नाम से ही कई शातिर, सफेदपोश अपराधियों को भी नानी याद आने लगती है। लेकिन होता यही है कि डेढ-दो घंटे की असह्य यातना के बाद भी मामला शिफर का शिफर। आरुषि के मामले में सीबीआई से लेकर देश की आला जांच एजेंसियां अंधेरे में तीर चलाती रही, पर हत्यारे की बात तो जानें दें, धारदार हथियार भी आज तक नहीं मिल सके जिनसे कत्ल किया गया था। यहीं से नार्को टेस्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठने शुरू हो गए थे। नशे की हालत में झूमते हुए राजकपूर का यादगार अभिनय बरबस लोगों के जेहन में कौंध जाता है-''मुझको यारों माफ करना, मैं नशे में हूं। अब तो मुमकिन है बहकना, मैं नशे में हूं। तुम बस इतना याद रखना, मैं नशे में हूं।'' यह गाना आम आदमी को तो याद रहा लेकिन सीबीआई इसी अर्धसत्य के आधार पर गुहनहगारों की तलाश में लगी रही। लगभग नशे में बेसुध आदमी के बयानों पर ही सच की तलाश में हाथ-पैर मारती रही। लोग कहते भी हैं भला शराबी का क्या भरोसा? कब क्या बक जाए? लेकिन देश की बडी-बडी ज़ांच एजेंसियां इसी को साक्ष्य के तौर पर मानती-जांचती रहीं। तो ये है नार्को टेस्ट का सच जो इस तर्क में विश्वास करता है कि 'सोडियम पेंटाथाल' नामक रसायन के नशे में बेसुध आदमी झूठ नहीं बोल सकता। अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 20 (3) स्वदोषारोपण से छूट के मौलिक अधिकार का हवाला देते हुए नार्को, पोलिग्राफिक और ब्रेन मैपिंग को असंवैधानिक करार दिया है।
हालांकि इसमें कई पेंच हैं, जो इसकी वैधानिकता को लेकर पहले भी उठते रहे हैं। नार्को और ब्रेन मैपिंग टेस्ट में साधारण अपराधी तो फंस जाता है, लेकिन कोई चालाक, शातिर अपराधी जो इस टेस्ट की खूबियों, खामियों से परिचित है, बचकर निकल जाता है। अगर कोई नशे में जाने के पहले यह ठान ले कि उसे कुछ नहीं कहना, तो लाख प्रयत्न करने के बाद भी कुछ उगलवा लेना मुश्किल है। यही कारण है कि डॉ. राजेश तलवार जैसे लोगों को कई बार इस टेस्ट से गुजरना पडा। इसके बावजूद सीबीआई हाथ मलती रही और कोई भी सबूत नहीं इकट्ठा कर सकी, जिससे इस दोहरे हत्याकांड की गुत्थी सुलझ सके। अगर वैधता के सवाल को भी छोड दें तो मनोवैज्ञानिक दवाब में किसी से जुर्म कबूल करवाना संवैधानिक अपराध है, कोर्ट ने इसी पक्ष को पकडा है। भारतीय कानून में धारा 164 के अनुसार बिना किसी दवाब के न्यायाधीश के सामने दिए गए बयान ही न्यायालयों को मान्य हैं। इसी को आधार बनाते हुए कोर्ट ने कहा है कि जांच एजेंसियों को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि जबरन किसी को यह कहने के लिए बाध्य करें कि तुमने ये हत्या की है या गुनाह किया है? सवाल तो आम आदमी के मौलिक अधिकारों को लेकर है, जिसमें देश के शातिर अपराधियों से लेकर संतों तक को भी एक ही श्रेणी में रखा गया है।
अगर देश में आतंकवादियों के लिए टाडा जैसे कानून की जरूरत सरकार बताती रही है, तो अजमल आमिर कसाब, अब्दुल करीम तेलगी, संतोखबेन जडेजा, देवेंद्र यादव जैसे लोगों को छूट क्यों? क्या देश के गद्दारों, आतंकवादियों एवं देशद्रोहियों के लिए इन मामलों में कुछ विशेष उपबंध नहीं किए जा सकते, जिससे कानून की मर्यादा भी रह जाए और ऐसे अपराधियों में भय का माहौल भी पैदा हो। ये ऐसे लोग हैं, जिन्होंने देश की अस्मिता को किसी न किसी रूप में चुनौती दी है। लेकिन सवाल तो ये है कि फिर तय कौन करे कि कौन देश के दुश्मन हैं और कौन सरकार की नीतियों का विरोध करने के कारण तथाकथित दुश्मन। सरकार सीबीआई की बदौलत इस हथियार का इस्तेमाल राजनैतिक विरोधियों को दबाने के लिए भी कर सकती है। इन दिनों ऐसे आरोप सडक़ से लेकर सदन तक सरकार पर लगते भी रहे हैं। हालांकि जांच के विषय में सीबीआई के आला अधिकारियों का मानना है कि अब कई राज इन अपराधियों के जहन में ही दफन हो जाएंगे। अक्सर होता यही है कि बडे अपराधों में क्रिमिनल कोई सुराग नहीं छोडते। ऐसे में अपराधियों की तफ्तीश करना भूसे के ढेर में से सूई खोजने सरीखा होता है। जांच एजेंसियों को उम्मीद होती है कि चलो कुछ लोगों का नार्को या ब्रेन मैपिंग करवा लिया जाए, ताकि कुछ तो सूत्र हाथ आएंगे, जिसके आधार पर जांच आगे बढाई जा सकती है। या अपराधियों के मोडस ओपरेंडी की या फिर उनके गैंग के बारे में जानकारी जुटाई जा सकती है। हालांकि यह सब इतना आसान होता तो सीबीआई कब की अपराधियों को जेल की सलाखों में कैद कर चुकी होती। स्टांप घोटाले के आरोपी तेलगी के नार्को टेस्ट में कई राजनेताओं के नाम सामने आए, लेकिन सीबीआई हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। सिर्फ अपराधी का कहना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि इनके कहे के आधार पर साक्ष्य भी जुटाने होते हैं। कोर्ट भी मात्र उतने ही अंश को स्वीकार करती है, जितना कि नार्को टेस्ट के आधार पर पुख्ता सबूत जुटा लिए जाएं। जैसे अपराधी ने नार्को टेस्ट के दौरान कबूला हो कि आरुषि की हत्या में धारदार हथियार को नाले में बहा दिया गया और सीबीआई उस हथियार को खोज निकाले। यहां हथियार दिखाना तो कोर्ट में साक्ष्य के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकता है, लेकिन सिर्फ उस व्यक्ति ने नार्को टेस्ट के दौरान ऐसा कहा को साक्ष्य नहीं माना जा सकता।
न्यायालय का इस मामले में स्पष्ट मानना है कि अगर सहमति या स्वेच्छा से इस तरह के टेस्ट किए जाते हैं और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देशों का पालन किया जाता है, तभी इस तरह के टेस्ट की इजाजत दी जानी चाहिए। इस मामले में कोर्ट का ये भी कहना है कि जनहित की दुहाई देने के बाद भी इन मामलों में छूट नहीं दी जा सकती। मानव अधिकारों के सजग प्रहरी होने के नाते सुप्रीम कोर्ट की चिंता वाजिबहै।
देश के वरिष्ठ न्यायविदों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। लेकिन क्या कोई अपराधी ऐसे टेस्ट के लिए तैयार होगा, जिसमें उसके फंसने की संभावना हो? हाल में आंध्रप्रदेश के पूर्व राज्यपाल एनडी तिवारी ने अवैध संतान के आरोप के मामले में डीएनए टेस्ट कराए जाने से इंकार किया है। यहां भी हवाला यही दिया जा रहा है कि मुझे जबरन मेरे ही खिलाफ गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। हालांकि इसकी वैधानिकता नार्को एवं लाइ डिटेक्टर से ज्यादा वैज्ञानिक धरातल पर आधारित है। लेकिन तर्क तो वही हैं। गुजरात की गॉडमदर संतोखबेन के नाम से आप परिचित होंगे ही। न जाने कई अपराध एवं हत्या के मामलों में आरोपी संतोखबेन ने नार्को टेस्ट कराए जाने की याचिका को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। ये जीत उन अपराधियों की है, जो मानवाधिकारों की आड में अपने क्रूर चेहरों पर नकाब डाल सकेंगे। हालांकि टेस्ट के नतीजों के बाद भी इनकी सेहत पर कोई असर नहीं होना था। अगर विश्वास न हो तो आज तक के नार्को टेस्ट के आंकडाें पर गौर फरमाएं, जिनमें पांच प्रतिशत सुराग भी जांच एजेंसियों को नहीं मिला है।
सुप्रीम कोर्ट ने कई गंभीर मामलों में नार्को टेस्ट के फुटेज मीडिया को जारी किए जाने पर भी आपत्ति जाहिर की थी। इन मामलों में जांच एजेंसियों को कोई सुराग मिले या नहीं, लेकिन ट्रायल कोर्ट बेशक प्रभावित होता है। हालांकि न्यायाधीश इस बात को जानते हैं कि ये पुख्ता सबूत नहीं, लेकिन बोलती तस्वीरों के असर से बाहर निकलने में समय तो लगता ही है। ऐसा हो सकता है कि फैसले को कुछ हद तक ये प्रभावित भी करें, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। नार्को टेस्ट में परिणाम प्रश्न पूछने के तरीकों पर ही निर्भर करता है। जांच के दौरान ऐसा देखा गया है कि व्यक्ति ज्यादातर पेश किए गए सुझावों पर हामी ही भरता है। नशे में तो आदमी घर का पता तक भूल जाता है, फिर ऐसे में नकारने का दुस्साहस उसमें नहीं होता। क्योंकि उसे पता है कि उसका एक 'न' कहना कई और अटपटे सवालों को खडा करेगा और उसे यह दुस्सह्य वेदना देर तक झेलनी होगी। अगर ब्रेन मैपिंग की ही बात करें तो हडबडाहट में वह कुछ का कुछ जवाब दे सकता है। आदमी को पता होता है कि उसका ब्रेन मैपिंग किया जा रहा है, तो फिर सहज होने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जब आदमी को कुछ चित्र या आवाज सुनाई जाती है, तो हो सकता है मिलते-जुलते दृश्यों के कारण या हडबडी में मस्तिष्क तीव्र गति से प्रतिक्रिया दिखाए। कुछ लोग यों भी दिल के कमजोर होते हैं, जो मस्तिष्क से निकली तरंगों के आधार पर अपराधी सिध्द किए जा सकते हैं। कुछ ऐसा ही होता है पॉलीग्राफ टेस्ट के दौरान भी। इसमें आदमी के ब्लड प्रेशर, हार्टबीट, श्वसन और मांसपेशियों की गति का सवाल पूछने के दौरान अध्ययन किया जाता है। वैज्ञानिक परीक्षण होने के बाद भी इसके निष्कर्षों को वैज्ञानिक कसौटी पर नहीं सही माना जाता। यह 1+1=2 की तरह का वैज्ञानिक सच नहीं है। देश के भले नागरिकों को नेक सलाह है कि अगली बार किसी 'सच का सामना' में जाएं तो जरा संभलकर, क्योंकि हो सकता है कि आपका सच मशीन के लिए झूठा हो। आप खामखां बदनाम भी हों और करोडों की माया भी हाथ न आए। संविधान ने स्वदोषारोपण के सवाल पर बोलने या चुप रहने में से एक विकल्प चुनने का अधिकार नागरिकों को दिया है। न्यायालय ने इस अधिकार की रक्षा के लिए फैसला तो दिया है, लेकिन देखना होगा कि कहीं अपराधी तबका इसकी आड में देश की कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती न साबित हों।
Tuesday, June 1, 2010
समय से फैसला हो तो बचे 'मान'और धन
चन्दन राय
दरियागंज के एक स्कूल टीचर उमा खुराना का केस आपको याद होगा। एक निजी चैनल के फर्जी स्टिंग में उनपर स्कूल-छात्राओं को देह व्यापार में धकेलने का आरोप लगाया गया था। इस आरोप के बाद उग्र भीड ने उमा खुराना को जमकर पीटा और उनके कपडे तक फाड ड़ाले थे। जांच में यह मामला झूठा साबित हुआ। लेकिन अब तक जो होना था, वो हो चुका। उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया और समाज ने एक ऐसा गहरा घाव दिया, जिसे वह लोगों से छिपाती घूम रही थी। मीडिया ने उनके भीड द्वारा पीटे जाने एवं कपडे फ़ाडने के विजुअल को बार-बार दिखाया। इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने उमा खुराना को अपनी खोई छवि की भरपाई के लिए मानहानि और हर्जाने का मुकदमा दायर करने को कहा। अब एक दूसरे मामले पर नजर डालते हैं। अरबों रुपयों के घोटाले के आरोपी झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा ने कोर्ट में यह कहते हुए मानहानि का मुकदमा दायर किया कि उन्हें राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया जा रहा है। दोनों मामलों में मानहानि का मुकदमा दायर किया गया। हमारा मकसद यहां उचित या अनुचित मुकदमों के मामले में फैसला देने का नहीं, बल्कि इस बात की ओर इशारा करना है कि बढते मानहानि के मुकदमों के कारण न्यायपालिका के क्रिया-कलापों पर कितना असर पडा है? कई ऐसे मानहानि के मुकदमों के कारण देश की न्यायिक व्यवस्था चरमराती नजर आ रही है। देश में आए दिन इस तरह के मुकदमे देश के विभिन्न अदालतों में दायर किए जाते हैं, जिसमें व्यक्ति यह आरोप लगाता है कि उसकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचा है। पहले ही मुकदमों के बोझ से दबे न्यायालय के लिए यह एक दोहरी मार है।
अमिताभ बच्चन ने इस बात का जिक्र अपने ब्लॉग पर करते हुए कहा है कि मानहानि या माफी मंगवाने के लिए अदालत का रुख करना एक थका देने वाली प्रक्रिया है। ऐसे किसी मामले में अदालत का निर्णय आने में कई साल लग जाते हैं। किसी-किसी मामले में तो फैसला आने में 15-20 साल तक लग जाते हैं या मामले में शामिल लोगों का निधन तक हो जाता है। जब फैसला आता भी है तो या तो बहुत देर हो चुकी होती है या उस फैसले का कोई महत्व नहीं रह जाता। इस मामले में सदी के महानायक की चिंता जायज ही है। अगर ऐसे मामलों में वे कोर्ट जाने लगे, तो बाकि की जिंदगी उन्हें कोर्ट के चक्कर काटने में ही गुजारनी पडे। मीडिया सेलिब्रिटियों की लाइफ-स्टाइल पर पैनी नजर रखती है। उनसे जुडी हर छोटी-बडी घटनाएं मीडिया में सुर्खियां बनती हैं। उनके बीमार होने की खबर मिलते ही देश में उनके स्वास्थ्य को लेकर पूजा-पाठ का दौर शुरू हो जाता है। ऐसे में किसानी को अपना पेशा बताना कभी सुर्खियों में बनता है तो कभी विदेशी महंगी गाडी ज़न्मदिन के मौके पर अपने बेटे को देने के लिए कर बचाने की सरकार से अपील भी। इस तरह के मामलों का चर्चा में आना परेशान तो करता ही है। लेकिन उन्हें दुख तब होता है जब परिवार की बहू ऐश्वर्या राय को लेकर मीडिया में चर्चाएं होती हैं। उनका इशारा ऐसे ही मामलों में मानहानि को लेकर था, जब मीडिया की बेडरुम में अनर्गल तांक-झांक से सेलिब्रेटियों की निजी जिंदगी प्रभावित होती है। ऐसे में वे मानहानि के दावे के बारे में सोचने लगें, तो उन्हें स्थायी रुप से एक वकील की सेवा लेनी होगी।
उनकी चिंता का दायरा सिर्फ यहीं तक नहीं, बल्कि न्याय मिलने में देरी को लेकर भी है। ऐसे मामलों में अगर सुनवाई होती भी है, तो उनका फिल्मी कॅरियर बुरी तरीके से प्रभावित होगा। उम्र के आखिरी पडाव पर भी वे फिल्मी कॅरियर की तीसरी पारी खेलने मैदान में जमे हैं। बुध्दु बक्से पर भी अपनी धाक जमाने वाले अभिनेता ये कभी नहीं चाहेंगे कि वे अदालतों के चक्कर में उलझें। यही कारण है कि ब्लॉग पर वे मात्र अपनी हताशा जाहिर करते हैं।
अब मानहानि के मुकदमों की हकीकत भी समझ लें। कोच्चि आईपीएल फ्रेंचाइजी की मिल्कियत पर उठे विवादों को लेकर चर्चा में आई सुनंदा पुष्कर भी मानहानि का मुकदमा दायर करने के लिए अदालत का रुख करनेवाली हैं। उनका आरोप है कि मीडिया ने उन्हें एक ब्यूटीशियन, स्पा की मालकिन और सोशलाइट कहा है। जबकि वे कभी स्पा व्यवसाय में शामिल नहीं रहीं। मीडिया में गलत छवि पेश करने के मामले में वे क्षतिपूर्ति का दावा करने पर भी विचार कर रही हैं। सानिया-शोएब निकाह मामले में पाकिस्तान से उनके जीजा इमरान मलिक दिल्ली आए ताकि शोएब मलिक की पत्नी होने का दावा करने वाली आयशा सिद्दीकी पर मानहानि का मुकदमा चलाया जा सके। हालांकि इस मामले में शोएब मलिक की काफी किरकिरी हुई जब लोगों के सामने उन्हें स्वीकार करना पडा कि आयशा उनकी पत्नी रह चुकी हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण अडवानी को भी तीन सांसदों सहित मानहानि का मुकदमा झेलना पडा, जब सपा के एक नेता ने संसद में नोट लहराने के मामले को लेकर कहा कि इससे समाजवादी पार्टी की साख पर असर पडा है और ऐसा जानबूझकर पार्टी के खिलाफ माहौल बनाने की बदनीयती से किया गया है। अगर ऐसे मुकदमों में अदालतों का वक्त जाया हो, तो स्वाभाविक है कि मुकदमों की सुनवाई के लिए हमें लंबा इंतजार करना होगा। यों ही न्यायाधीशों की कमी का रोना रोती अदालतें सायंकालीन अदालत लगाने पर भी विचार कर रही हैं। पर आलम यह है कि जितने मामलों में सुनवाई होती है, उससे कई गुना ज्यादा मामले अदालतों की चौखट पर होते हैं।
लेकिन कोई व्यक्ति ये महसूस करे कि किसी व्यक्ति ने उसकी सार्वजनिक छवि को ठेस पहुंचाई है, तो अदालत में जाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं। अभी पटना के कंकडबाग इलाके में करोडाें की जमीन हडपने के कारण चर्चा में आए आसाराम बापू को भी मानहानि के मुकदमे का सामना करना पड रहा है। अदालत का उनके विरुध्द फैसला आने के बाद उनके शिष्यों द्वारा जमीन मालिक के खिलाफ जुलूस निकालकर आपत्तिजनक नारे लगाने का मामला सामने आया था। एक सार्वजनिक सभा में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जदयू पार्टी के पूर्व अध्यक्ष ललन सिंह पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के कारण पूर्व मुख्यमंत्री राबडी देवी को भी मानहानि के चक्कर में अदालत के चक्कर लगाने पडे। अगर राजनेता अपनी वाणी पर संयम रखें तो कई ऐसे मामलों से बचा जा सकता है, जिससे अदालत के समय की भी बचत होगी।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माने-जाने वाले मीडिया को सबसे ज्यादा मानहानि के मुकदमों का डर सताता है। लोकतंत्र में एक सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाने के कारण कभी-कभी वह राजनीतिज्ञों एवं सेलिब्रिटियों पर भी छींटाकशी करता रहता है। अगर इन लेखों से किसी की सार्वजनिक छवि पर असर पडता हो, तो मीडिया को भी बिना सच्चाई की तह में गए ऐसी खबरों से बचना चाहिए। फिल्मी गॉशिप के बहाने सेलिब्रिटिज की निजी जिंदगी की बखिया उधेडने को भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि कई मामलों में बेवजह ही उसे अदालत में घसीटा जाता है। हाल में एक अंग्रेजी अखबार को 'प्रताडित करना' शब्द-प्रयोग के कारण मानहानि का सामना करना पडा। संपत्ति विवाद को लेकर यह मामला न्यायालय में लंबित था। हालांकि अखबार के वकील का कहना था कि उक्त व्यक्ति ने कुछ मौकों पर दूसरे पक्ष को धमकाया था, इसलिए इस शब्द का प्रयोग अपमानजनक नहीं। इस मामले में बांबे हाईकोर्ट ने अखबार का पक्ष रखते हुए कहा कि जरूरी नहीं कि अदालत की कार्यवाही की मानहानि करने वाली खबर वाकई अदालत की आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आती हो।
मानहानि किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि अदालतों की भी होती है। कानून की भाषा में इसे कोर्ट की अवमानना या कंटेम्ट ऑफ कोर्ट कहते हैं। अगर अदालत को ऐसा लगे कि किसी व्यक्ति के आचरण से न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुंचा हो तो संबंधित व्यक्ति को कंटेम्ट ऑफ कोर्ट का सामना करना पडता है। देखा गया है कि अदालत अपने गरिमा को लेकर कुछ ज्यादा ही सचेत रहती है। अभी एक ऐसा ही मामला काफी चर्चा में रहा, जब न्यायालय में
एक लडक़ी ने जस्टिस पसायत को मि. पसायत कहते हुए संबोधित किया। कोर्ट की मर्यादा का ध्यान दिलाए जाने पर उसने कहा कि कानून के सामने सभी समान हैं और आप लोग भी मेरी तरह आम आदमी हैं। कोर्ट ने इस बात पर ऐतराज जताते हुए कहा कि उसे संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादाओं का ख्याल रखना चाहिए। लडक़ी का जवाब भी बेहद शालीन था कि वह सिर्फ देश के संविधान का सम्मान करती है। जस्टिस पसायत पर सुनवाई के दौरान जूता फेंकने के मामले में वह पहले ही कोर्ट की अवमानना का सामना कर रही थी, उसपर कई नए अवमानना के मुकदमे और जड दिए गए। अभी ऑस्ट्रेलिया के हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि इंटरनेट वेबसाइट पर छपे लेख के लिए दूसरे देशों की अदालतों में जाकर भी मानहानि का मुकदमा दायर किया जा सकता है। वादी ने यह दलील दी कि उसे जानने वाले मेलबोर्न में भी रहते हैं, जबकि यह लेख अमरीका स्थित वेबसाइट में छपा था। संभवत: यह पहला ऐसा मामला है जिसमें किसी भी देश के न्यायालय ने इंटरनेट और कानून की सीमा पर विचार किया है। इंटरनेट साइट पर छपे लेखों के कारण अब दुनिया भर में मुकदमों की झडी लग सकती है। ऐसे में सदी के महानायक की मानहानि के मुकदमों को लेकर चिंता जायज है।
दरियागंज के एक स्कूल टीचर उमा खुराना का केस आपको याद होगा। एक निजी चैनल के फर्जी स्टिंग में उनपर स्कूल-छात्राओं को देह व्यापार में धकेलने का आरोप लगाया गया था। इस आरोप के बाद उग्र भीड ने उमा खुराना को जमकर पीटा और उनके कपडे तक फाड ड़ाले थे। जांच में यह मामला झूठा साबित हुआ। लेकिन अब तक जो होना था, वो हो चुका। उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया और समाज ने एक ऐसा गहरा घाव दिया, जिसे वह लोगों से छिपाती घूम रही थी। मीडिया ने उनके भीड द्वारा पीटे जाने एवं कपडे फ़ाडने के विजुअल को बार-बार दिखाया। इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने उमा खुराना को अपनी खोई छवि की भरपाई के लिए मानहानि और हर्जाने का मुकदमा दायर करने को कहा। अब एक दूसरे मामले पर नजर डालते हैं। अरबों रुपयों के घोटाले के आरोपी झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा ने कोर्ट में यह कहते हुए मानहानि का मुकदमा दायर किया कि उन्हें राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया जा रहा है। दोनों मामलों में मानहानि का मुकदमा दायर किया गया। हमारा मकसद यहां उचित या अनुचित मुकदमों के मामले में फैसला देने का नहीं, बल्कि इस बात की ओर इशारा करना है कि बढते मानहानि के मुकदमों के कारण न्यायपालिका के क्रिया-कलापों पर कितना असर पडा है? कई ऐसे मानहानि के मुकदमों के कारण देश की न्यायिक व्यवस्था चरमराती नजर आ रही है। देश में आए दिन इस तरह के मुकदमे देश के विभिन्न अदालतों में दायर किए जाते हैं, जिसमें व्यक्ति यह आरोप लगाता है कि उसकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचा है। पहले ही मुकदमों के बोझ से दबे न्यायालय के लिए यह एक दोहरी मार है।
अमिताभ बच्चन ने इस बात का जिक्र अपने ब्लॉग पर करते हुए कहा है कि मानहानि या माफी मंगवाने के लिए अदालत का रुख करना एक थका देने वाली प्रक्रिया है। ऐसे किसी मामले में अदालत का निर्णय आने में कई साल लग जाते हैं। किसी-किसी मामले में तो फैसला आने में 15-20 साल तक लग जाते हैं या मामले में शामिल लोगों का निधन तक हो जाता है। जब फैसला आता भी है तो या तो बहुत देर हो चुकी होती है या उस फैसले का कोई महत्व नहीं रह जाता। इस मामले में सदी के महानायक की चिंता जायज ही है। अगर ऐसे मामलों में वे कोर्ट जाने लगे, तो बाकि की जिंदगी उन्हें कोर्ट के चक्कर काटने में ही गुजारनी पडे। मीडिया सेलिब्रिटियों की लाइफ-स्टाइल पर पैनी नजर रखती है। उनसे जुडी हर छोटी-बडी घटनाएं मीडिया में सुर्खियां बनती हैं। उनके बीमार होने की खबर मिलते ही देश में उनके स्वास्थ्य को लेकर पूजा-पाठ का दौर शुरू हो जाता है। ऐसे में किसानी को अपना पेशा बताना कभी सुर्खियों में बनता है तो कभी विदेशी महंगी गाडी ज़न्मदिन के मौके पर अपने बेटे को देने के लिए कर बचाने की सरकार से अपील भी। इस तरह के मामलों का चर्चा में आना परेशान तो करता ही है। लेकिन उन्हें दुख तब होता है जब परिवार की बहू ऐश्वर्या राय को लेकर मीडिया में चर्चाएं होती हैं। उनका इशारा ऐसे ही मामलों में मानहानि को लेकर था, जब मीडिया की बेडरुम में अनर्गल तांक-झांक से सेलिब्रेटियों की निजी जिंदगी प्रभावित होती है। ऐसे में वे मानहानि के दावे के बारे में सोचने लगें, तो उन्हें स्थायी रुप से एक वकील की सेवा लेनी होगी।
उनकी चिंता का दायरा सिर्फ यहीं तक नहीं, बल्कि न्याय मिलने में देरी को लेकर भी है। ऐसे मामलों में अगर सुनवाई होती भी है, तो उनका फिल्मी कॅरियर बुरी तरीके से प्रभावित होगा। उम्र के आखिरी पडाव पर भी वे फिल्मी कॅरियर की तीसरी पारी खेलने मैदान में जमे हैं। बुध्दु बक्से पर भी अपनी धाक जमाने वाले अभिनेता ये कभी नहीं चाहेंगे कि वे अदालतों के चक्कर में उलझें। यही कारण है कि ब्लॉग पर वे मात्र अपनी हताशा जाहिर करते हैं।
अब मानहानि के मुकदमों की हकीकत भी समझ लें। कोच्चि आईपीएल फ्रेंचाइजी की मिल्कियत पर उठे विवादों को लेकर चर्चा में आई सुनंदा पुष्कर भी मानहानि का मुकदमा दायर करने के लिए अदालत का रुख करनेवाली हैं। उनका आरोप है कि मीडिया ने उन्हें एक ब्यूटीशियन, स्पा की मालकिन और सोशलाइट कहा है। जबकि वे कभी स्पा व्यवसाय में शामिल नहीं रहीं। मीडिया में गलत छवि पेश करने के मामले में वे क्षतिपूर्ति का दावा करने पर भी विचार कर रही हैं। सानिया-शोएब निकाह मामले में पाकिस्तान से उनके जीजा इमरान मलिक दिल्ली आए ताकि शोएब मलिक की पत्नी होने का दावा करने वाली आयशा सिद्दीकी पर मानहानि का मुकदमा चलाया जा सके। हालांकि इस मामले में शोएब मलिक की काफी किरकिरी हुई जब लोगों के सामने उन्हें स्वीकार करना पडा कि आयशा उनकी पत्नी रह चुकी हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण अडवानी को भी तीन सांसदों सहित मानहानि का मुकदमा झेलना पडा, जब सपा के एक नेता ने संसद में नोट लहराने के मामले को लेकर कहा कि इससे समाजवादी पार्टी की साख पर असर पडा है और ऐसा जानबूझकर पार्टी के खिलाफ माहौल बनाने की बदनीयती से किया गया है। अगर ऐसे मुकदमों में अदालतों का वक्त जाया हो, तो स्वाभाविक है कि मुकदमों की सुनवाई के लिए हमें लंबा इंतजार करना होगा। यों ही न्यायाधीशों की कमी का रोना रोती अदालतें सायंकालीन अदालत लगाने पर भी विचार कर रही हैं। पर आलम यह है कि जितने मामलों में सुनवाई होती है, उससे कई गुना ज्यादा मामले अदालतों की चौखट पर होते हैं।
लेकिन कोई व्यक्ति ये महसूस करे कि किसी व्यक्ति ने उसकी सार्वजनिक छवि को ठेस पहुंचाई है, तो अदालत में जाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं। अभी पटना के कंकडबाग इलाके में करोडाें की जमीन हडपने के कारण चर्चा में आए आसाराम बापू को भी मानहानि के मुकदमे का सामना करना पड रहा है। अदालत का उनके विरुध्द फैसला आने के बाद उनके शिष्यों द्वारा जमीन मालिक के खिलाफ जुलूस निकालकर आपत्तिजनक नारे लगाने का मामला सामने आया था। एक सार्वजनिक सभा में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जदयू पार्टी के पूर्व अध्यक्ष ललन सिंह पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के कारण पूर्व मुख्यमंत्री राबडी देवी को भी मानहानि के चक्कर में अदालत के चक्कर लगाने पडे। अगर राजनेता अपनी वाणी पर संयम रखें तो कई ऐसे मामलों से बचा जा सकता है, जिससे अदालत के समय की भी बचत होगी।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माने-जाने वाले मीडिया को सबसे ज्यादा मानहानि के मुकदमों का डर सताता है। लोकतंत्र में एक सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाने के कारण कभी-कभी वह राजनीतिज्ञों एवं सेलिब्रिटियों पर भी छींटाकशी करता रहता है। अगर इन लेखों से किसी की सार्वजनिक छवि पर असर पडता हो, तो मीडिया को भी बिना सच्चाई की तह में गए ऐसी खबरों से बचना चाहिए। फिल्मी गॉशिप के बहाने सेलिब्रिटिज की निजी जिंदगी की बखिया उधेडने को भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि कई मामलों में बेवजह ही उसे अदालत में घसीटा जाता है। हाल में एक अंग्रेजी अखबार को 'प्रताडित करना' शब्द-प्रयोग के कारण मानहानि का सामना करना पडा। संपत्ति विवाद को लेकर यह मामला न्यायालय में लंबित था। हालांकि अखबार के वकील का कहना था कि उक्त व्यक्ति ने कुछ मौकों पर दूसरे पक्ष को धमकाया था, इसलिए इस शब्द का प्रयोग अपमानजनक नहीं। इस मामले में बांबे हाईकोर्ट ने अखबार का पक्ष रखते हुए कहा कि जरूरी नहीं कि अदालत की कार्यवाही की मानहानि करने वाली खबर वाकई अदालत की आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आती हो।
मानहानि किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि अदालतों की भी होती है। कानून की भाषा में इसे कोर्ट की अवमानना या कंटेम्ट ऑफ कोर्ट कहते हैं। अगर अदालत को ऐसा लगे कि किसी व्यक्ति के आचरण से न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुंचा हो तो संबंधित व्यक्ति को कंटेम्ट ऑफ कोर्ट का सामना करना पडता है। देखा गया है कि अदालत अपने गरिमा को लेकर कुछ ज्यादा ही सचेत रहती है। अभी एक ऐसा ही मामला काफी चर्चा में रहा, जब न्यायालय में
एक लडक़ी ने जस्टिस पसायत को मि. पसायत कहते हुए संबोधित किया। कोर्ट की मर्यादा का ध्यान दिलाए जाने पर उसने कहा कि कानून के सामने सभी समान हैं और आप लोग भी मेरी तरह आम आदमी हैं। कोर्ट ने इस बात पर ऐतराज जताते हुए कहा कि उसे संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादाओं का ख्याल रखना चाहिए। लडक़ी का जवाब भी बेहद शालीन था कि वह सिर्फ देश के संविधान का सम्मान करती है। जस्टिस पसायत पर सुनवाई के दौरान जूता फेंकने के मामले में वह पहले ही कोर्ट की अवमानना का सामना कर रही थी, उसपर कई नए अवमानना के मुकदमे और जड दिए गए। अभी ऑस्ट्रेलिया के हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि इंटरनेट वेबसाइट पर छपे लेख के लिए दूसरे देशों की अदालतों में जाकर भी मानहानि का मुकदमा दायर किया जा सकता है। वादी ने यह दलील दी कि उसे जानने वाले मेलबोर्न में भी रहते हैं, जबकि यह लेख अमरीका स्थित वेबसाइट में छपा था। संभवत: यह पहला ऐसा मामला है जिसमें किसी भी देश के न्यायालय ने इंटरनेट और कानून की सीमा पर विचार किया है। इंटरनेट साइट पर छपे लेखों के कारण अब दुनिया भर में मुकदमों की झडी लग सकती है। ऐसे में सदी के महानायक की मानहानि के मुकदमों को लेकर चिंता जायज है।
सावधान, कोई सुन रहा है?
आपात काल के दिनों में भी नेता संभलकर फोन पर बात-चीत करते थे। उन्हें पता था कि कांग्रेस हाईकमान के निर्देश पर सभी विरोधी नेताओं की टोली पर सरकार की नजर है। फोन टैप करना ही नहीं, बल्कि उसी के आधार पर विरोधियों पर कार्रवाई भी की जाती थी। क्या हम अभी तक आपातकाल के सदमे से उबरने में सफल हो सके हैं? नेहरू लोकतंत्र में अपने राजनैतिक विरोधियों को भी जगह देते थे। इतना ही नहीं, वे राजनीति में ऐसे लोगों का सम्मान भी करते थे। लोहिया चाहे सदन में नेहरु को कितनी भी खरी-खरी सुना दें, बाहर आते ही हंस कर गले मिलते थे। सारे गिले-शिकवे दूर करने का नेहरु का ये अपना तरीका था, जिसका राजनैतिक विरोधी भी सम्मान करते थे। क्या कांग्रेस अपनी राजनीतिक विरासत भूलती जा रही है?
चंदन राय
भा रत में राजा-महाराजाओं के अपने खुफिया तंत्र होते थे। उनका काम जनता के बीच जाकर गुप्त तरीके से यह पता लगाना होता था कि राजा के खिलाफ लोग षडयंत्र तो नहीें कर रहे। धीरे-धीरे समय बदला और देश में लोकतंत्र की बयार आई। रातों-रात राजा-महाराजा चोगा बदल लोकतंत्र के रहनुमा बन गए। लेकिन एक परिवर्तन आ चुका था, अब जनता के मौलिक अधिकार के साथ कर्तव्य भी निर्धारित कर दिए गए थे। सत्ता का चाल-चरित्र बदला, लेकिन सिंहासन के पुराने कायदे-कानून वही रहे। वंशानुगत अधिकारों को अब लोकतांत्रिक रूप दे दिया गया, लेकिन राजनैतिक विरोधियों के लिए खुफिया विभाग जस-का-तस बना रहा। आईबी और रॉ के होने का मकसद तो कुछ और बताया जाता रहा, लेकिन वे राजनैतिक विरोधियों के शह-मात के खेल में ही लगे रहे। आपातकाल के दिनों में खुलकर, तो बाकि दिनों में दबे-छुपे तरीके से। यही कारण है कि नेताओं के फोन टैप किए जाने के मामले पर जनता के बीच कोई तीखी प्रतिक्रिया
नहीं हुई।
राजतंत्र से लोकतंत्र तक की यात्रा में एक परिवर्तन आ चुका था। अब संख्याबल ही सत्ता का मिजाज तय करता था। सरकार को अपने विरोधियों से भी ज्यादा खतरा अपने पार्टी के विभीषणों से था। न जाने कब पाला बदल, गच्चा दे जाएं। इसलिए जरुरी था कि इनकी लगाम को मजबूती से थामकर रखा जाए। आईपीएल प्रकरण में तो वह अपने विश्वस्त सिपाहसलार शशि थरूर को दांव पर लगा ही चुकी थी। अब इस मामले में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ था नहीं। यही कारण है कि वह आईपीएल की साफ-सफाई में खासा रुचि ले रही थी। मराठा छत्रप को अंकुश में रखने के लिए प्रफुल्ल पटेल पर दांव खेला गया। राजनीति के बिसात पर अपना मोहरा पिटता देख कांग्रेस ने अंतिम हथियार के रूप में आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी पर शिकंजा कसा। सरकार को पता था कि मुसीबत में वे अपने राजनैतिक आकाओं को फोन जरूर करेंगे और इसी दांव पर कुछ केंद्रीय मंत्रियों के नाम भी सामने आने लगे जो आईपीएल की आड में काला धन सफेद करने में लगे थे।
अगस्त 2007 में बिहार के मुख्यमंत्री दिल्ली यात्रा पर थे। देश के बीमारु प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने वाले नीतीश केंद्र सरकार से विशेष फंड की फिराक में थे। वे अपने मित्रों से सहायता राशि के बारे में फोन पर बात-चीत कर रहे थे। लेकिन उन्हें क्या पता था कि वे सरकार की नजर में देश के लिए बडे ख़तरों में से एक हैं और उनका फोन टैप किया जा रहा है? बिहार में राजनैतिक धरातल की तलाश में जुटी केंद्र सरकार के लिए यह जरूरी था कि सूबे के मुख्यमंत्री के मंसूबों को जांचा-परखा जाए। कुछ ऐसी ही गलती माकपा के महासचिव प्रकाश करात ने भी कर दी थी। वे विपक्ष को एकजुट कर सदन में यूपीए सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी में थे।
उन दिनों यूपीए सरकार के एकसूत्रीय एजेंडे में शामिल था भारत-अमरीकी असैन्य परमाणु करार और वे उसके खिलाफ राजनैतिक माहौल बना रहे थे। सरकार को गिराने का दांव खेलने के कारण वे सरकार की नजर में राष्ट्रद्रोही माने जा रहे थे। इसलिए वे भी केंद्र सरकार के खुफिया एजेंसियों के दायरे में थे। कांग्रेस के महासचिव दिग्गी राजा की समझ में नहीं आ रहा था कि उनसे कौन सी खता हो गई कि सरकार ने उनकी भी जासूसी शुरु कर दी। लेकिन उनकी यही गलती थी कि वे पार्टी लाईन से कभी-कभी अलग कदम उठा लेते थे। कांग्रेस कार्यकारिणी का चुनाव होने वाला था और वे कौन सा तुरूप का पत्ता चलेंगे इसलिए उनका फोन भी खुफिया एजेंसियों के दायरे में था। आपात काल के दिनों में भी नेता संभलकर फोन पर बात-चीत करते थे। उन्हें पता था कि कांग्रेस हाईकमान के निर्देश पर सभी विरोधी नेताओं की टोली पर सरकार की नजर है। फोन टैप करना ही नहीं, बल्कि उसी के आधार पर विरोधियों पर कार्रवाई भी की जाती थी। क्या हम अभी तक आपातकाल के सदमे से उबरने में सफल हो सके हैं? क्या इन घटनाओं ने एक बार फिर लोगों को 1975 के काले दिनों की याद नहीं दिला दी? जब लोगों के राजनैतिक एवं मौलिक अधिकार छीने जा रहे थे और हर जगह खामोशी छाई थी।
नेहरू लोकतंत्र में अपने राजनैतिक विरोधियों को भी जगह देते थे। इतना ही नहीं, वे राजनीति मेें ऐसे लोगों का सम्मान भी करते थे। लोहिया चाहे सदन में नेहरु को कितनी भी खरी-खरी सुना दें, बाहर आते ही हंस कर गले मिलते थे। सारे गिले-शिकवे दूर करने का नेहरु का ये अपना तरीका था, जिसका राजनैतिक विरोधी भी सम्मान करते थे। क्या कांग्रेस अपनी राजनीतिक विरासत भूलती जा रही है? क्या लोकतंत्र में बिना सशक्त विपक्ष के उचित नीति-निर्धारण संभव है? कहीं न कहीं तो हमें राजनैतिक विरोधियों को स्पेस देना ही होगा, उनके विचारों का सम्मान करना होगा, उनकी आलोचनाओं की कसौटी पर सरकार की नीतियों को कसा जाना होगा, यही एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।
जानकारी मिली है कि सरकार के पास करीब 90 ऐसे उपकरण हैं, जिनका इस्तेमाल दंगों, राष्ट्रीय आपदाओं एवं आतंकवाद से लडने के लिए किया जाना है। लेकिन इस बात की कल्पना कर ही मन कांप उठता है कि अगर ये उपकरण आतंकवादियों के हाथ लग गए, तो सरकार की उनपर निगरानी की सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाएंगी। और वे जब चाहे, जहां चाहे, कुछ भी करने को स्वतंत्र होंगे। सत्ता की नजदीकी का फायदा उठाकर उद्योगपति अपने विरोधी कंपनियों को मात देने के लिए या उनकी योजनाओं पर नजर रखने के लिए भी इस उपकरण का इस्तेमाल कर सकते हैं।
कानूनी दृष्टि से बात करें तो ये संविधान के अनुच्छेद 21 का सरासर उल्लंघन है। लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। प्रत्येक व्यक्ति का अपना दायरा होता है, जहां उसे उम्मीद होती है कि उसकी निजता सुरक्षित है। अगर इसपर हमला हुआ, तो लोकतंत्र भी खतरे में पड ज़ाएगा। फोन टैपिंग की आड में 2 किलोमीटर तक के दायरे में आने वाले किसी भी व्यक्ति के फोन को सुना जा सकता है। क्या यह अधिकार हम सरकार को देंगे कि वह हमारी निजी बात-चीत पर भी नजर रखे? ऐसे हालात में सभी पार्टियों से यह उम्मीद करना कि वे सरकार के सुर में सुर मिलाएं-कहां तक उचित है? राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने भी एक बार राजीव गांधी सरकार पर यह आरोप लगाया था कि राष्ट्रपति भवन में उनका फोन टैप किया जा रहा है। इसी प्रकार के आरोप कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े पर भी लगे थे, जिसके कारण बाद में उन्हें अपने पद से भी इस्तीफा देना पड़ा था। अमर सिंह ने भी अपना फोन टैप किए जाने का आरोप लगाया था। चंद्रशेखर सरकार से कांग्रेस की समर्थन वापसी की अहम वजह भी फोन टैपिंग ही थी। ऐसे में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार फोन टैपिंग को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहरा सकती। पहले थाने के प्रभारी को भी यह अधिकार था कि वह टेलीफोन कंपनी से कहकर किसी का फोन टैप करा लेता था। लेकिन अब आईजी स्तर के अधिकारी की सहमति से ही किसी का फोन टैप किया जा सकता है। हालांकि राज्य स्तर पर गृहसचिव की स्वीकृति को भी जरुरी माना गया है। लेकिन अब ऐसे डिवाइस आ गए हैं, जिसमें मंजूरी की कोई जरूरत ही नहीं। एक चलती कार में यह डिवाइस लगा होता है, जो 2 किलोमीटर तक के दायरे में आने वाले किसी भी व्यक्ति का फोन टैप कर सकता है।
उम्मीद की जा रही है कि इस मामले को लेकर संसद का आगामी सत्र काफी हंगामेदार होगा। विपक्ष केंद्र सरकार को पूरी तरह से घेरने की तैयारी में है। महंगाई, महिला आरक्षण, आईपीएल ने पहले ही सरकार की नाक में दम कर रखा है। ऐसे में फोन टैपिंग प्रकरण की आंच प्रधानमंत्री को थिम्फू के वातानुकूलित कक्ष में भी महसूस होगी।
चंदन राय
भा रत में राजा-महाराजाओं के अपने खुफिया तंत्र होते थे। उनका काम जनता के बीच जाकर गुप्त तरीके से यह पता लगाना होता था कि राजा के खिलाफ लोग षडयंत्र तो नहीें कर रहे। धीरे-धीरे समय बदला और देश में लोकतंत्र की बयार आई। रातों-रात राजा-महाराजा चोगा बदल लोकतंत्र के रहनुमा बन गए। लेकिन एक परिवर्तन आ चुका था, अब जनता के मौलिक अधिकार के साथ कर्तव्य भी निर्धारित कर दिए गए थे। सत्ता का चाल-चरित्र बदला, लेकिन सिंहासन के पुराने कायदे-कानून वही रहे। वंशानुगत अधिकारों को अब लोकतांत्रिक रूप दे दिया गया, लेकिन राजनैतिक विरोधियों के लिए खुफिया विभाग जस-का-तस बना रहा। आईबी और रॉ के होने का मकसद तो कुछ और बताया जाता रहा, लेकिन वे राजनैतिक विरोधियों के शह-मात के खेल में ही लगे रहे। आपातकाल के दिनों में खुलकर, तो बाकि दिनों में दबे-छुपे तरीके से। यही कारण है कि नेताओं के फोन टैप किए जाने के मामले पर जनता के बीच कोई तीखी प्रतिक्रिया
नहीं हुई।
राजतंत्र से लोकतंत्र तक की यात्रा में एक परिवर्तन आ चुका था। अब संख्याबल ही सत्ता का मिजाज तय करता था। सरकार को अपने विरोधियों से भी ज्यादा खतरा अपने पार्टी के विभीषणों से था। न जाने कब पाला बदल, गच्चा दे जाएं। इसलिए जरुरी था कि इनकी लगाम को मजबूती से थामकर रखा जाए। आईपीएल प्रकरण में तो वह अपने विश्वस्त सिपाहसलार शशि थरूर को दांव पर लगा ही चुकी थी। अब इस मामले में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ था नहीं। यही कारण है कि वह आईपीएल की साफ-सफाई में खासा रुचि ले रही थी। मराठा छत्रप को अंकुश में रखने के लिए प्रफुल्ल पटेल पर दांव खेला गया। राजनीति के बिसात पर अपना मोहरा पिटता देख कांग्रेस ने अंतिम हथियार के रूप में आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी पर शिकंजा कसा। सरकार को पता था कि मुसीबत में वे अपने राजनैतिक आकाओं को फोन जरूर करेंगे और इसी दांव पर कुछ केंद्रीय मंत्रियों के नाम भी सामने आने लगे जो आईपीएल की आड में काला धन सफेद करने में लगे थे।
अगस्त 2007 में बिहार के मुख्यमंत्री दिल्ली यात्रा पर थे। देश के बीमारु प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने वाले नीतीश केंद्र सरकार से विशेष फंड की फिराक में थे। वे अपने मित्रों से सहायता राशि के बारे में फोन पर बात-चीत कर रहे थे। लेकिन उन्हें क्या पता था कि वे सरकार की नजर में देश के लिए बडे ख़तरों में से एक हैं और उनका फोन टैप किया जा रहा है? बिहार में राजनैतिक धरातल की तलाश में जुटी केंद्र सरकार के लिए यह जरूरी था कि सूबे के मुख्यमंत्री के मंसूबों को जांचा-परखा जाए। कुछ ऐसी ही गलती माकपा के महासचिव प्रकाश करात ने भी कर दी थी। वे विपक्ष को एकजुट कर सदन में यूपीए सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी में थे।
उन दिनों यूपीए सरकार के एकसूत्रीय एजेंडे में शामिल था भारत-अमरीकी असैन्य परमाणु करार और वे उसके खिलाफ राजनैतिक माहौल बना रहे थे। सरकार को गिराने का दांव खेलने के कारण वे सरकार की नजर में राष्ट्रद्रोही माने जा रहे थे। इसलिए वे भी केंद्र सरकार के खुफिया एजेंसियों के दायरे में थे। कांग्रेस के महासचिव दिग्गी राजा की समझ में नहीं आ रहा था कि उनसे कौन सी खता हो गई कि सरकार ने उनकी भी जासूसी शुरु कर दी। लेकिन उनकी यही गलती थी कि वे पार्टी लाईन से कभी-कभी अलग कदम उठा लेते थे। कांग्रेस कार्यकारिणी का चुनाव होने वाला था और वे कौन सा तुरूप का पत्ता चलेंगे इसलिए उनका फोन भी खुफिया एजेंसियों के दायरे में था। आपात काल के दिनों में भी नेता संभलकर फोन पर बात-चीत करते थे। उन्हें पता था कि कांग्रेस हाईकमान के निर्देश पर सभी विरोधी नेताओं की टोली पर सरकार की नजर है। फोन टैप करना ही नहीं, बल्कि उसी के आधार पर विरोधियों पर कार्रवाई भी की जाती थी। क्या हम अभी तक आपातकाल के सदमे से उबरने में सफल हो सके हैं? क्या इन घटनाओं ने एक बार फिर लोगों को 1975 के काले दिनों की याद नहीं दिला दी? जब लोगों के राजनैतिक एवं मौलिक अधिकार छीने जा रहे थे और हर जगह खामोशी छाई थी।
नेहरू लोकतंत्र में अपने राजनैतिक विरोधियों को भी जगह देते थे। इतना ही नहीं, वे राजनीति मेें ऐसे लोगों का सम्मान भी करते थे। लोहिया चाहे सदन में नेहरु को कितनी भी खरी-खरी सुना दें, बाहर आते ही हंस कर गले मिलते थे। सारे गिले-शिकवे दूर करने का नेहरु का ये अपना तरीका था, जिसका राजनैतिक विरोधी भी सम्मान करते थे। क्या कांग्रेस अपनी राजनीतिक विरासत भूलती जा रही है? क्या लोकतंत्र में बिना सशक्त विपक्ष के उचित नीति-निर्धारण संभव है? कहीं न कहीं तो हमें राजनैतिक विरोधियों को स्पेस देना ही होगा, उनके विचारों का सम्मान करना होगा, उनकी आलोचनाओं की कसौटी पर सरकार की नीतियों को कसा जाना होगा, यही एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।
जानकारी मिली है कि सरकार के पास करीब 90 ऐसे उपकरण हैं, जिनका इस्तेमाल दंगों, राष्ट्रीय आपदाओं एवं आतंकवाद से लडने के लिए किया जाना है। लेकिन इस बात की कल्पना कर ही मन कांप उठता है कि अगर ये उपकरण आतंकवादियों के हाथ लग गए, तो सरकार की उनपर निगरानी की सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाएंगी। और वे जब चाहे, जहां चाहे, कुछ भी करने को स्वतंत्र होंगे। सत्ता की नजदीकी का फायदा उठाकर उद्योगपति अपने विरोधी कंपनियों को मात देने के लिए या उनकी योजनाओं पर नजर रखने के लिए भी इस उपकरण का इस्तेमाल कर सकते हैं।
कानूनी दृष्टि से बात करें तो ये संविधान के अनुच्छेद 21 का सरासर उल्लंघन है। लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। प्रत्येक व्यक्ति का अपना दायरा होता है, जहां उसे उम्मीद होती है कि उसकी निजता सुरक्षित है। अगर इसपर हमला हुआ, तो लोकतंत्र भी खतरे में पड ज़ाएगा। फोन टैपिंग की आड में 2 किलोमीटर तक के दायरे में आने वाले किसी भी व्यक्ति के फोन को सुना जा सकता है। क्या यह अधिकार हम सरकार को देंगे कि वह हमारी निजी बात-चीत पर भी नजर रखे? ऐसे हालात में सभी पार्टियों से यह उम्मीद करना कि वे सरकार के सुर में सुर मिलाएं-कहां तक उचित है? राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने भी एक बार राजीव गांधी सरकार पर यह आरोप लगाया था कि राष्ट्रपति भवन में उनका फोन टैप किया जा रहा है। इसी प्रकार के आरोप कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े पर भी लगे थे, जिसके कारण बाद में उन्हें अपने पद से भी इस्तीफा देना पड़ा था। अमर सिंह ने भी अपना फोन टैप किए जाने का आरोप लगाया था। चंद्रशेखर सरकार से कांग्रेस की समर्थन वापसी की अहम वजह भी फोन टैपिंग ही थी। ऐसे में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार फोन टैपिंग को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहरा सकती। पहले थाने के प्रभारी को भी यह अधिकार था कि वह टेलीफोन कंपनी से कहकर किसी का फोन टैप करा लेता था। लेकिन अब आईजी स्तर के अधिकारी की सहमति से ही किसी का फोन टैप किया जा सकता है। हालांकि राज्य स्तर पर गृहसचिव की स्वीकृति को भी जरुरी माना गया है। लेकिन अब ऐसे डिवाइस आ गए हैं, जिसमें मंजूरी की कोई जरूरत ही नहीं। एक चलती कार में यह डिवाइस लगा होता है, जो 2 किलोमीटर तक के दायरे में आने वाले किसी भी व्यक्ति का फोन टैप कर सकता है।
उम्मीद की जा रही है कि इस मामले को लेकर संसद का आगामी सत्र काफी हंगामेदार होगा। विपक्ष केंद्र सरकार को पूरी तरह से घेरने की तैयारी में है। महंगाई, महिला आरक्षण, आईपीएल ने पहले ही सरकार की नाक में दम कर रखा है। ऐसे में फोन टैपिंग प्रकरण की आंच प्रधानमंत्री को थिम्फू के वातानुकूलित कक्ष में भी महसूस होगी।
जब नियामक ही लडें तो...
इन विवादों के लिए जिम्मेदार वित्त मंत्रालय कठघरे में है। आम निवेशक जानना चाहता है कि क्या वित्त मंत्रालय को विवाद की स्थिति में दोनों नियामक संस्थाओं के अधिकार-क्षेत्र के निर्धारण के लिए आगे नहीं आना चाहिए था। विवाद की शुरुआत सेबी, जो कि शेयर बाजार की नियामक संस्था है, ने चौदह निजी बीमा कंपनियों को यूलिप जारी करने पर रोक लगाने से की।
चन्दन राय
सेबी और इरडा के विवाद का असर शेयर बाजार पर पडना ही था। शेयर बाजार की चाल सुस्त होती देख सरकार हरकत में आई। वित्त मंत्रालय जो इन विवादों को अपने स्तर पर सुलझा सकती थी, ने दोनों नियामक संस्थाओं को अदालत में जाने की सलाह दी। ऐसे में ग्राहकों का करीब डेढ लाख करोड रुपए दांव पर लगे हैं, और दोनों नियामक संस्थाएं अधिकार-क्षेत्र के विवाद में उलझी हैं। वित्तीय स्थिरता की गारंटी को बहाल रखने के लिए जरुरी था कि सरकार निवेशकों को भरोसे में ले। कुछ ही घंटों बाद बीमा कंपनियों की नियामक संस्था इरडा के अधिकारियों का बयान जारी होता है कि इन कानूनी पेचिदगियों का असर ग्राहकों पर नहीं पडेग़ा, ये दोनों संस्थाओं के बीच का मामला है, जिसे जल्द ही सुलझा लिया जाएगा। इन विवादों के लिए जिम्मेदार वित्त मंत्रालय कठघरे में है। आम निवेशक जानना चाहता है कि क्या वित्त मंत्रालय को विवाद की स्थिति में दोनों नियामक संस्थाओं के अधिकार-क्षेत्र के निर्धारण के लिए आगे नहीं आना चाहिए था। विवाद की शुरुआत सेबी, जो कि शेयर बाजार की नियामक संस्था है, ने चौदह निजी बीमा कंपनियों को यूलिप जारी करने पर रोक लगाने से की। इसके तहत पुरानी यूलिप की बिक्री पर इस आदेश का कोई असर नहीं होना था। यूलिप यानी यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान बीमा कंपनियों की एक ऐसी स्कीम है, जिसमें ग्राहकों को रिस्क कवर करने के साथ ही बाजार में निवेश का मौका भी मिलता है। ऐसे में स्वाभाविक है कि शेयर बाजार के उतार-चढाव का असर यूलिप स्कीम पर पडे। ऌस तरह की पॉलिसी में निवेश का खतरा निवेशक को ही झेलना पडता है। कह सकते हैं कि ये मामला सीधे शेयर बाजार से जुडा है। भारत में आयकर की धारा 8 सी के तहत यूलिप पर निवेश की छूट है। मामला यहीं से शुरु होता है। सेबी का मानना है कि शेयर बाजार में पैसा लगाए जाने के कारण इसे म्यूच्युअल फंड की तरह ही माना जाए। बीमा कंपनियों को बिना सेबी में रजिस्ट्रेशन कराए यूलिप की बिक्री करने का अधिकार नहीं है। ऐसा करने से पहले उन्हें रजिस्ट्रेशन कराना होगा, ताकि समय आने पर उन बीमा कंपनियों की निगरानी की जा सके, जो शेयर बाजार में पैसा लगा रही हैं।
इरडा ने भी इस मामले को लेकर कानूनी चुनौती देने का मन बना लिया। इसके पहले उसने बीमा कंपनियों को आदेश जारी कर यूलिप पर सेबी के किसी तरह के प्रतिबंध को मानने से इंकार कर दिया था। इस मामले पर सेबी के सदस्य प्रशांत सरन का कहना है कि कंपनियों ने इस बात को स्वीकार किया है कि यूलिप के दो घटक हैं। पहला है इनश्योरेंस घटक, जहां जीवन बीमा का हिस्सा बीमा कंपनी के पास होता है और दूसरा निवेश घटक, जहां जोखिम निवेशक के साथ होता है। यानी यूलिप एक मिश्रित उत्पाद हैं और निवेश घटक के पंजीकरण और सेबी द्वारा नियंत्रित होने की आवश्यकता है। हालांकि यूलिप की बिक्री विदेशों में भी बीमा कंपनियों के अधीन हैं। ग्राहक ऐसी स्थिति को देखकर अपना पैसा लगाने से हिचकिचा सकते थे, जिसका असर शेयर बाजार के साथ बीमा कंपनियों पर भी पडना था। इसलिए आनन-फानन मेेंं इरडा ने एक बयान जारी कर यूलिप के पॉलिसीधारकों को विश्वास दिलाने की कोशिश की कि ये पॉलिसियां सुरक्षित हैं और इस मामले का निबटारा जल्द ही कानून के दायरे में किसी उचित फोरम में कर लिया जाएगा। ग्राहक इस पूरे प्रकरण से हतोत्साहित न हों, उनका पैसा सुरक्षित है। लेकिन खतरे के समय ही ऐसे सरकारी बयानों की बाढ अा जाती है, ये आम निवेशक भी समझता है। बीमा कंपनियां जिनको यूलिप की बिक्री रोकने का आदेश सेबी ने दिया है में एगॉन रेलिगेयर, अविवा, बजाज अलियांज, भारती एएक्सए, बिरला सन, एचडीएफसी स्टैंडर्ड, आईसीआईसीआई प्रूडेंसियल, आईएनजी वैश्य, कोटक महिंद्रा , मैक्स न्यूयार्क, मेटलाइफ इंडिया, रिलायंस लाइफ इनश्योरेंस, एसबीआई लाइफ इनश्योरेंस और टाटा एआईजी शामिल हैं। वित्त मंत्रालय ने यथास्थिति बहाल रखने का दावा कर विवाद को और बढाने का ही काम किया। दोनों नियामक संस्थाएं अपने-अपने हित में इसका अर्थ निकालने में उलझी हैं। बीमा कंपनियों का कहना है कि सरकार के इस फैसले का अर्थ यह है कि बीमा कंपनियां नई यूलिप पॉलिसियां लांच कर सकती हैं। जबकि सेबी के अधिकारियों का कहना है कि वित्त मंत्रालय ने ऐसा कहकर 14 बीमा कंपनियों पर उनके लगाए प्रतिबंध को उचित ठहराया है। मामला अधिकार-क्षेत्र को लेकर है और सरकार, जो इसके लिए जिम्मेदार थी, दूर खडी होकर तमाशा देख रही है। इरडा के सदस्य आर कन्नन का कहना है कि हम आगे भी नए बीमा उत्पाद जारी करते रहेंगे क्योंकि यह बीमा नियमों के दायरे में आता है। यूलिप के मामले में किसके पास फैसला करने का ज्यादा अधिकार है, इसका निर्णय कोर्ट करेगा। लेकिन जब तक इरडा कोर्ट में जाने का मन बना रही थी, सेबी उसके इरादे को भांपते हुए पहले ही कोर्ट की शरण में चली गई।
भारत में बीमा कंपनियों में प्रतियोगिता निजी कंपनियों के आने से शुरु हुई थी। निजी कंपनियां चाहे बीमा-क्षेत्र में काम करें या उत्पादन के क्षेत्र में-मुनाफा ही उनका बिजनेस मंत्र होता है। जहां भी इन्हें मुनाफे की संभावना दिखती है, पैसे लगाने को दौड पडते हैं। इस क्षेत्र में विदेशी निवेश को भी 26 प्रतिशत तक बढा दिया गया। प्रतिद्वंद्विता तेज होनी ही थी। बीमा कंपनियों में निवेश करने वाला वर्ग अपनी कमाई का एक छोटा हिस्सा बीमा कंपनियों में लगाता है, ताकि आडे समय में उसका भविष्य सुरक्षित हो। बीमा कंपनियां ग्राहकों को लुभाने के लिए तरह-तरह की स्कीम लेकर आती हैं। इसी के तहत मामला आता है-यूलिप का। ग्राहकों को लुभाया जाता है कि जल्द ही उनका पैसा दुगुना हो जाएगा। लंबे समय के निवेश में आयकर में छूट भी मिलती है। आज सभी बीमा कंपनियां यूलिप प्लान बेचने के कारोबार में एक दूसरे से होड ले रही हैं। इसमें निवेशक की पूंजी का एक हिस्सा शेयर बाजार में और दूसरा हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों में लगाया जाता है। इसके अंतर्गत अधिक जोखिम से लेकर कम जोखिम लेने वाले निवेशकों के लिए अलग-अलग स्कीमें हैं। जैसे-जैसे हम कम जोखिम की ओर जाते हैं, हमारा रिस्क तो कम होता है साथ ही मुनाफे भी कम होता जाता है, क्योंकि इनका 20-50 प्रतिशत रकम ही शेयर बाजार में लगा होता है। आम निवेशक जो जल्द ही अपनी रकम दुगुनी करना चाहते हैं, हाई रिस्क लेते हुए मोटा मुनाफा कमाते हैं। इस समय सभी बीमा कंपनियों का 70 फीसदी राजस्व यूलिप से ही आ रहा है। इस मुनाफे को देखते हुए ही जनवरी में सेबी ने इन कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा कि वे बिना सेबी की इजाजत के यूलिप पॉलिसी कैसे बेच रहे हैं? शेयर बाजार पर नजर रखने वाली संस्था सेबी ने पहली बार इस तरह का कदम उठाया है।
मामला दो नियामक संस्थाओं के बीच उलझकर रह गया है। निजी कंपनियां अपने हितों को लेकर ग्राहकों को ठेंगा दिखाती रही हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि मोटे मुनाफे के चक्कर में यदि बीमा कंपनियां ग्राहकों को बिना बताए अधिक पैसा शेयर बाजार में निवेश करें, तो ग्राहकों के सामने क्या रास्ता बचता है? वह इसकी शिकायत इरडा में करे या सेबी के पास जाए। इस लडाई से आम आदमी को कोई मतलब नहीं, बशर्ते कि उसका पैसा सुरक्षित होने की गारंटी उसे हो। वित्त मंत्रालय को सुपर नियामक संस्था बनाने की पहल करनी चाहिए ताकि इन नियामक संस्थाओं के अधिकार-क्षेत्र के निर्धारण के साथ ही विवादों का निबटारा भी किया जा सके।
चन्दन राय
सेबी और इरडा के विवाद का असर शेयर बाजार पर पडना ही था। शेयर बाजार की चाल सुस्त होती देख सरकार हरकत में आई। वित्त मंत्रालय जो इन विवादों को अपने स्तर पर सुलझा सकती थी, ने दोनों नियामक संस्थाओं को अदालत में जाने की सलाह दी। ऐसे में ग्राहकों का करीब डेढ लाख करोड रुपए दांव पर लगे हैं, और दोनों नियामक संस्थाएं अधिकार-क्षेत्र के विवाद में उलझी हैं। वित्तीय स्थिरता की गारंटी को बहाल रखने के लिए जरुरी था कि सरकार निवेशकों को भरोसे में ले। कुछ ही घंटों बाद बीमा कंपनियों की नियामक संस्था इरडा के अधिकारियों का बयान जारी होता है कि इन कानूनी पेचिदगियों का असर ग्राहकों पर नहीं पडेग़ा, ये दोनों संस्थाओं के बीच का मामला है, जिसे जल्द ही सुलझा लिया जाएगा। इन विवादों के लिए जिम्मेदार वित्त मंत्रालय कठघरे में है। आम निवेशक जानना चाहता है कि क्या वित्त मंत्रालय को विवाद की स्थिति में दोनों नियामक संस्थाओं के अधिकार-क्षेत्र के निर्धारण के लिए आगे नहीं आना चाहिए था। विवाद की शुरुआत सेबी, जो कि शेयर बाजार की नियामक संस्था है, ने चौदह निजी बीमा कंपनियों को यूलिप जारी करने पर रोक लगाने से की। इसके तहत पुरानी यूलिप की बिक्री पर इस आदेश का कोई असर नहीं होना था। यूलिप यानी यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान बीमा कंपनियों की एक ऐसी स्कीम है, जिसमें ग्राहकों को रिस्क कवर करने के साथ ही बाजार में निवेश का मौका भी मिलता है। ऐसे में स्वाभाविक है कि शेयर बाजार के उतार-चढाव का असर यूलिप स्कीम पर पडे। ऌस तरह की पॉलिसी में निवेश का खतरा निवेशक को ही झेलना पडता है। कह सकते हैं कि ये मामला सीधे शेयर बाजार से जुडा है। भारत में आयकर की धारा 8 सी के तहत यूलिप पर निवेश की छूट है। मामला यहीं से शुरु होता है। सेबी का मानना है कि शेयर बाजार में पैसा लगाए जाने के कारण इसे म्यूच्युअल फंड की तरह ही माना जाए। बीमा कंपनियों को बिना सेबी में रजिस्ट्रेशन कराए यूलिप की बिक्री करने का अधिकार नहीं है। ऐसा करने से पहले उन्हें रजिस्ट्रेशन कराना होगा, ताकि समय आने पर उन बीमा कंपनियों की निगरानी की जा सके, जो शेयर बाजार में पैसा लगा रही हैं।
इरडा ने भी इस मामले को लेकर कानूनी चुनौती देने का मन बना लिया। इसके पहले उसने बीमा कंपनियों को आदेश जारी कर यूलिप पर सेबी के किसी तरह के प्रतिबंध को मानने से इंकार कर दिया था। इस मामले पर सेबी के सदस्य प्रशांत सरन का कहना है कि कंपनियों ने इस बात को स्वीकार किया है कि यूलिप के दो घटक हैं। पहला है इनश्योरेंस घटक, जहां जीवन बीमा का हिस्सा बीमा कंपनी के पास होता है और दूसरा निवेश घटक, जहां जोखिम निवेशक के साथ होता है। यानी यूलिप एक मिश्रित उत्पाद हैं और निवेश घटक के पंजीकरण और सेबी द्वारा नियंत्रित होने की आवश्यकता है। हालांकि यूलिप की बिक्री विदेशों में भी बीमा कंपनियों के अधीन हैं। ग्राहक ऐसी स्थिति को देखकर अपना पैसा लगाने से हिचकिचा सकते थे, जिसका असर शेयर बाजार के साथ बीमा कंपनियों पर भी पडना था। इसलिए आनन-फानन मेेंं इरडा ने एक बयान जारी कर यूलिप के पॉलिसीधारकों को विश्वास दिलाने की कोशिश की कि ये पॉलिसियां सुरक्षित हैं और इस मामले का निबटारा जल्द ही कानून के दायरे में किसी उचित फोरम में कर लिया जाएगा। ग्राहक इस पूरे प्रकरण से हतोत्साहित न हों, उनका पैसा सुरक्षित है। लेकिन खतरे के समय ही ऐसे सरकारी बयानों की बाढ अा जाती है, ये आम निवेशक भी समझता है। बीमा कंपनियां जिनको यूलिप की बिक्री रोकने का आदेश सेबी ने दिया है में एगॉन रेलिगेयर, अविवा, बजाज अलियांज, भारती एएक्सए, बिरला सन, एचडीएफसी स्टैंडर्ड, आईसीआईसीआई प्रूडेंसियल, आईएनजी वैश्य, कोटक महिंद्रा , मैक्स न्यूयार्क, मेटलाइफ इंडिया, रिलायंस लाइफ इनश्योरेंस, एसबीआई लाइफ इनश्योरेंस और टाटा एआईजी शामिल हैं। वित्त मंत्रालय ने यथास्थिति बहाल रखने का दावा कर विवाद को और बढाने का ही काम किया। दोनों नियामक संस्थाएं अपने-अपने हित में इसका अर्थ निकालने में उलझी हैं। बीमा कंपनियों का कहना है कि सरकार के इस फैसले का अर्थ यह है कि बीमा कंपनियां नई यूलिप पॉलिसियां लांच कर सकती हैं। जबकि सेबी के अधिकारियों का कहना है कि वित्त मंत्रालय ने ऐसा कहकर 14 बीमा कंपनियों पर उनके लगाए प्रतिबंध को उचित ठहराया है। मामला अधिकार-क्षेत्र को लेकर है और सरकार, जो इसके लिए जिम्मेदार थी, दूर खडी होकर तमाशा देख रही है। इरडा के सदस्य आर कन्नन का कहना है कि हम आगे भी नए बीमा उत्पाद जारी करते रहेंगे क्योंकि यह बीमा नियमों के दायरे में आता है। यूलिप के मामले में किसके पास फैसला करने का ज्यादा अधिकार है, इसका निर्णय कोर्ट करेगा। लेकिन जब तक इरडा कोर्ट में जाने का मन बना रही थी, सेबी उसके इरादे को भांपते हुए पहले ही कोर्ट की शरण में चली गई।
भारत में बीमा कंपनियों में प्रतियोगिता निजी कंपनियों के आने से शुरु हुई थी। निजी कंपनियां चाहे बीमा-क्षेत्र में काम करें या उत्पादन के क्षेत्र में-मुनाफा ही उनका बिजनेस मंत्र होता है। जहां भी इन्हें मुनाफे की संभावना दिखती है, पैसे लगाने को दौड पडते हैं। इस क्षेत्र में विदेशी निवेश को भी 26 प्रतिशत तक बढा दिया गया। प्रतिद्वंद्विता तेज होनी ही थी। बीमा कंपनियों में निवेश करने वाला वर्ग अपनी कमाई का एक छोटा हिस्सा बीमा कंपनियों में लगाता है, ताकि आडे समय में उसका भविष्य सुरक्षित हो। बीमा कंपनियां ग्राहकों को लुभाने के लिए तरह-तरह की स्कीम लेकर आती हैं। इसी के तहत मामला आता है-यूलिप का। ग्राहकों को लुभाया जाता है कि जल्द ही उनका पैसा दुगुना हो जाएगा। लंबे समय के निवेश में आयकर में छूट भी मिलती है। आज सभी बीमा कंपनियां यूलिप प्लान बेचने के कारोबार में एक दूसरे से होड ले रही हैं। इसमें निवेशक की पूंजी का एक हिस्सा शेयर बाजार में और दूसरा हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों में लगाया जाता है। इसके अंतर्गत अधिक जोखिम से लेकर कम जोखिम लेने वाले निवेशकों के लिए अलग-अलग स्कीमें हैं। जैसे-जैसे हम कम जोखिम की ओर जाते हैं, हमारा रिस्क तो कम होता है साथ ही मुनाफे भी कम होता जाता है, क्योंकि इनका 20-50 प्रतिशत रकम ही शेयर बाजार में लगा होता है। आम निवेशक जो जल्द ही अपनी रकम दुगुनी करना चाहते हैं, हाई रिस्क लेते हुए मोटा मुनाफा कमाते हैं। इस समय सभी बीमा कंपनियों का 70 फीसदी राजस्व यूलिप से ही आ रहा है। इस मुनाफे को देखते हुए ही जनवरी में सेबी ने इन कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा कि वे बिना सेबी की इजाजत के यूलिप पॉलिसी कैसे बेच रहे हैं? शेयर बाजार पर नजर रखने वाली संस्था सेबी ने पहली बार इस तरह का कदम उठाया है।
मामला दो नियामक संस्थाओं के बीच उलझकर रह गया है। निजी कंपनियां अपने हितों को लेकर ग्राहकों को ठेंगा दिखाती रही हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि मोटे मुनाफे के चक्कर में यदि बीमा कंपनियां ग्राहकों को बिना बताए अधिक पैसा शेयर बाजार में निवेश करें, तो ग्राहकों के सामने क्या रास्ता बचता है? वह इसकी शिकायत इरडा में करे या सेबी के पास जाए। इस लडाई से आम आदमी को कोई मतलब नहीं, बशर्ते कि उसका पैसा सुरक्षित होने की गारंटी उसे हो। वित्त मंत्रालय को सुपर नियामक संस्था बनाने की पहल करनी चाहिए ताकि इन नियामक संस्थाओं के अधिकार-क्षेत्र के निर्धारण के साथ ही विवादों का निबटारा भी किया जा सके।
फैसले से बंधे सूबों के हाथ
चन्दन राय
सीबीआई जांच में कोई अभियुक्त अगर निचली अदालत से ही बरी हो जाता है और सीबीआई उच्च न्यायालय में अपील नहीं करती, तो राज्य सरकार अपराधी को सजा दिलाने के लिए कुछ भी नहीं कर सकती। यह केंद्र पर निर्भर करता है कि वह इस मामले में अपील दायर करेगी या नहीं। या हो सकता है इसका इस्तेमाल राजनैतिक विरोधियों को अपने पाले में रखने के लिए करे। सत्ता में कोई किसी का सगा नहीं होता और हमेशा के लिए कोई दुश्मन नहीं होता-ये मुहावरा आज सत्ता के चाल-चरित्र का बखूबी वर्णन करते हैं। ऐसे में जैसे ही कोई राजनैतिक अभियुक्त केंद्र से दूरी बनाने का प्रयास करता है, उसके पुराने मामलों को लेकर सीबीआई न्यायालय पहुंच जाती है। यही एकमात्र डर विरोधी दल के नेताओं को सांसत में रखने के लिए काफी है।
हालांकि इससे पहले पटना हाईकोर्ट ने लालू दंपत्ति को बरी करने के फैसले के खिलाफ दाखिल राज्य सरकार की याचिका को स्वीकार कर लिया था। इसके बाद लालू ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अब भाजपा इस मामले को लेकर प्रधानमंत्री पर दवाब डालने का प्रयास कर रही है कि वह सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने का निर्देश दें। एक बात तो तय है कि इस फैसले के बाद अब सीबीआई से संबंधित मामले केंद्र सरकार के इशारों पर ही चलेंगे, जबकि राज्यों के अधिकार सीमित हो जाएंगे। सीबीआई का मामला केंद्र बनाम राज्य के बीच उलझकर रह गया है। राजनीतिक जानकार इस फैसले को राज्याें की शक्ति को कमजोर करने वाला बता रहे हैं। हालांकि राज्य सरकारें मामला आपराधिक हो या भ्रष्टाचार का, अब सीबीआई जांच की मांग उठाने से पहले सौ बार सोचेंगे।
इन दिनों देश की राजनीति कहां से तय होती है? अगर आप व्यवस्था से अनभिज्ञ हैं, तो आपका जवाब होगा, यह भी कोई पूछने की बात है, अधिकांश फैसले तो सेवन रेसकोर्स से ही लिए जाते हैं। अगर आप राजनीति के चतुर पंडित हुए तो आपका इशारा दस जनपथ की तरफ होगा। लेकिन आप सोच भी नहीं सकते कि दिल्ली के संभ्रांत इलाके लोधी रोड में भी एक ऐसा आवास है, जहां से सत्ता की धुरी को नियंत्रित किया जाता है, खासकर राजनैतिक विरोधियों को मजा चखाने के लिए। तो हम आपको बताते चलें- ये है देश की सबसे प्रतिष्ठित जांच एजेंसी सीबीआई का मुख्यालय यानी सीजीओ कॉम्पलैक्स। ये हम नहीं कह रहे, बल्कि तमाम राजनैतिक पार्टियां सीबीआई की वैधानिकता पर सवाल खडे क़रते रही हैं। आज राजनीति के गलियारों में वैधानिकता के साथ-साथ इसकी विश्वसनीयता पर भी ऊंगलियां उठने लगी हैं। यूपीए सरकार के मंत्रियों ने भी पिछले साल सदन में प्रश्न काल के दौरान इस तरह के सवाल खडे क़िए थे। ऐसा नहीं होता, तो क्या कारण है कि लालू जब केंद्र के साथ होते हैं, सीबीआई की जांच-प्रक्रिया धीमी हो जाती है। और उनके केंद्र-विरोधी तेवर अख्तियार करते ही उनके खिलाफ मामलों में तेजी आ जाती है। जहां आम जनता इस बात पर जोर दे रही थी कि सीबीआई पर केंद्र सरकार के नियंत्रण को कमजोर किया जाए, वहीं सुप्रीम कोर्ट के एक ताजा फैसले ने इसे और मजबूत ही किया है। आय से अधिक संपत्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लालू दंपत्ति को राहत देते हुए कहा कि सीबीआई जांच से बरी किए जाने पर या तो केंद्र सरकार अपील कर सकती है या खुद सीबीआई, राज्य सरकार को ऐसे मामलों में अपील दायर करने का अधिकार नहीं। एक बार फिर राज्यों के अधिकार छीनकर सीबीआई पर केंद्र की जकडन को मजबूत किया गया है।
अपने इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को पटना हाईकोर्ट में अपील दायर करने के अधिकार को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट का कहना है कि लालू दंपत्ति के खिलाफ सीबीआई ने ही अभियोग चलाया था। हालांकि इससे पहले पटना हाईकोर्ट ने लालू दंपत्ति को बरी करने के फैसले के खिलाफ दाखिल राज्य सरकार की याचिका को स्वीकार कर लिया था। इसके बाद लालू ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अब भाजपा इस मामले को लेकर प्रधानमंत्री पर दवाब डालने का प्रयास कर रही है कि वह सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने का निर्देश दें। एक बात तो तय है कि इस फैसले के बाद अब सीबीआई से संबंधित मामले केंद्र सरकार के इशारों पर ही चलेंगे, जबकि राज्यों के अधिकार सीमित हो जाएंगे।
सीबीआई का मामला केंद्र बनाम राज्य के बीच उलझकर रह गया है। राजनीतिक जानकार इस फैसले को राज्याें की शक्ति को कमजोर करने वाला बता रहे हैं। हालांकि राज्य सरकारें मामला आपराधिक हो या भ्रष्टाचार का, अब सीबीआई जांच की मांग उठाने से पहले सौ बार सोचेंगे। उसकी वजह यह है कि सीबीआई जांच में कोई अभियुक्त अगर निचली अदालत से ही बरी हो जाता है और सीबीआई उच्च न्यायालय में अपील नहीं करती, तो राज्य सरकार अपराधी को सजा दिलाने के लिए कुछ भी नहीं कर सकती। यह केंद्र पर निर्भर करता है कि वह इस मामले में अपील दायर करेगी या नहीं। या हो सकता है इसका इस्तेमाल राजनैतिक विरोधियों को अपने पाले में रखने के लिए करे। सत्ता में कोई किसी का सगा नहीं होता और हमेशा के लिए कोई दुश्मन नहीं होता-ये मुहावरा आज सत्ता के चाल-चरित्र का बखूबी वर्णन करते हैं। ऐसे में जैसे ही कोई राजनैतिक अभियुक्त केंद्र से दूरी बनाने का प्रयास करता है, उसके पुराने मामलों को लेकर सीबीआई न्यायालय पहुंच जाती है। यही एकमात्र डर विरोधी दल के नेताओं को सांसत में रखने के लिए काफी है। लोकतंत्र में संख्या-बल मायने रखता है ऐसे में एक भी सांसद के इधर-उधर होने से केंद्र की सत्ता डगमगाने लगती है। पहले तो कांग्रेस सरकार में शामिल करने के लिए मायावती पर डोरे डालने में लगी रही, मामला नहीं बनता देखकर केंद्र ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना ही जरुरी समझा। राजनैतिक विश्लेषकों की मानें तो कांग्रेस यूपी में अपना जनाधार बढाने के लिए दलित कार्ड खेलने की तैयारी में है, जिसके मार्ग में मायावती एकमात्र बाधा हैं। यही कारण है कि आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआई यूपी की मुख्यमंत्री मायावती पर नकेल कसने की कोशिश करती रही है। केंद्र के निर्देश पर ही मायावती के मामले में सीबीआई कभी नरमी, तो कभी गरमी का रूख अख्तियार करती रही है।
अभी तक अपराध की सीबीआई जांच की सिफारिश करने की मांग राज्य सरकारें ही करती रही हैं। लेकिन अब अपील करने का अधिकार केंद्र के पाले में होगा, ऐसे में राज्य सरकारें अपने हाथ बांधना नहीं चाहेंगी। अब राज्य सरकार को अगर लगता है कि किसी व्यक्ति ने राज्य की संपत्ति की हानि पहुंचाई है, तब भी चुप रहने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं। उसे पता है आखिर में मामला सीबीआई के पाले में ही जाना है। हालांकि इसके पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के मामले को लेकर राज्य के अधिकारों पर चोट की है। अगर किसी मामले की सीबीआई जांच कराने का फैसला उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट करती है, तो ऐसे में संबंधित राज्यों से सहमति लेने की जरुरत नहीं।
फिर बात करते हैं लालू यादव की राजनीति पर। दरअसल लालू बिहार में सुशासन का नारा देने वाले नीतीश कुमार के खिलाफ प्रदेश में कांग्रेस का साथ चाह रहे थे। पिछले चुनाव में टिकटों के बंटवारे में कांग्रेस को दरकिनार किए जाने के कारण कांग्रेस प्रमुख नाराज चल रही थीं। यूपीए सरकार से संबंध सुधारने के संकेत लालू लंबे समय से दे रहे थे। हालांकि महिला आरक्षण विधेयक को लेकर संसद में उनके तेवर गरम दिखे। केंद्र को भी इस विधेयक को पारित कराने के लिए लालू के समर्थन की जरुरत थी। इसके साथ ही अभी बिहार में राज्य सभा का चुनाव भी होना है। रामविलास पासवान को राज्य सभा में भेजने के लिए लालू कांग्रेस की मदद करने का संकेत दे चुके थे। यही कारण है कि राजनैतिक जोड-तोड क़ा फायदा लालू को सीबीआई मामलों में बरी कर दिया गया, राजनैतिक विश्लेषकों का ऐसा मानना है। हालांकि चारा घोटाले में भ्रष्टाचार के कई मामले अभी भी लालू यादव का सुख-चैन छीन सकते हैं। लेकिन कांग्रेस के सहारे ही वे उम्मीद लगाए हैं कि उनकी डगमग नैया इस बाधा को पार कर लेगी।
अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष बूटा सिंह भी इससे पूर्व सीबीआई पर राजनैतिक षडयंत्र का आरोप लगाते हुए यह कहते रहे हैं कि सीबीआई जांच एजेंसी की भूमिका का निर्वाह सही तरीके से नहीं कर रही। यह आरोप उन्होंने बेटे स्वीटी सिंह पर एक करोड रुपए घूस लेने के आरोप में चल रहे सीबीआई जांच को लेकर लगाए थे। राजनैतिक संरक्षण में भ्रष्टाचार के पनपने के पीछे यह भी एक कारण रहा है। जहां सत्ताधारी दल के नेताओं को सीबीआई जांच के मामलों में एक तरह से अघोषित छूट का होना शामिल है। हालांकि कई ऐसे मामले हैं, जिनमें सीबीआई को ढीला-ढाला रवैया अपनाने के कारण सुप्रीम कोर्ट की फटकार भी सुननी पडी है।
कुछ ऐसे राजनैतिक मामले जिनमें सीबीआई की भूमिका संदिग्ध रही है उनमें हैं-झारखंड के मुख्यमंत्री शिबु सोरेन को उच्च न्यायालय द्वारा बरी किए जाने के मामले में सीबीआई का अपील दायर नहीं करना। दूसरा मामला कांग्रेस सरकार के ही अजित जोगी के बेटे अमित जोगी का है जिसमें रामअवतार जग्ग्गी हत्या मामले में कोर्ट द्वारा बरी किए जाने के मामले में भी सीबीआई मौन रही। तो देश के बहुचर्चित मामले बोफोर्स में भी हिंदूजा बंधुओं को हाईकोर्ट द्वारा आरोपमुक्त किए जाने पर सीबीआई ने आरोप पत्र दाखिल करना जरुरी नहीं समझा।
भारत एक संघीय प्रदेश है। आज विकेंद्रीकरण का युग है जिसमें सत्ता का बंटवारा केंद्र से पंचायतों की ओर होना है। ऐसे में राज्यों के अधिकारों में कमी किए जाने को लोकतंत्रवादी संदेह की नजरों से देख रहे हैं। सीबीआई की स्थापना विशेष पुलिस स्थापना अध्यादेश के जरिए की गई है, जो ब्रिटिश शासन में जारी किया गया था। अगर सीबीआई को अपनी साख बचानी है, तो उसे क्षुद्र राजनीति से दूर ही रखना होगा। इसके लिए जरुरी है इस जांच एजेंसी को गृह मंत्रालय के चंगुल से मुक्त कर एक स्वतंत्र इकाई के रूप में स्थापित किया जाए। हालांकि इस मामले में केंद्र सरकार से यह उम्मीद करना नाकाफी होगा कि वह इस मामले में पहल कर अपने पर कतरने को तैयार होगी।
अन्य मामले जिसमें नहीं हुई अपील
बोफोर्स मामला- इसमें उच्च न्यायालय का हिंदूजा बंधुओं को आरोप मुक्त करने का फैसला जिसका पूरे देश में कडा विरोध हुआ।
शशिनाथ झा हत्याकांड- इसमें उच्च न्यायालय द्वारा झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को बरी किए जाने के बाद सीबीआई के कार्यप्रणाली पर तीखी बहस।
रामअवतार जग्गी हत्याकांड- इस हत्याकांड में कांग्रेस नेता अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को बरी करने का निर्णय लिया गया था।
सीबीआई जांच में कोई अभियुक्त अगर निचली अदालत से ही बरी हो जाता है और सीबीआई उच्च न्यायालय में अपील नहीं करती, तो राज्य सरकार अपराधी को सजा दिलाने के लिए कुछ भी नहीं कर सकती। यह केंद्र पर निर्भर करता है कि वह इस मामले में अपील दायर करेगी या नहीं। या हो सकता है इसका इस्तेमाल राजनैतिक विरोधियों को अपने पाले में रखने के लिए करे। सत्ता में कोई किसी का सगा नहीं होता और हमेशा के लिए कोई दुश्मन नहीं होता-ये मुहावरा आज सत्ता के चाल-चरित्र का बखूबी वर्णन करते हैं। ऐसे में जैसे ही कोई राजनैतिक अभियुक्त केंद्र से दूरी बनाने का प्रयास करता है, उसके पुराने मामलों को लेकर सीबीआई न्यायालय पहुंच जाती है। यही एकमात्र डर विरोधी दल के नेताओं को सांसत में रखने के लिए काफी है।
हालांकि इससे पहले पटना हाईकोर्ट ने लालू दंपत्ति को बरी करने के फैसले के खिलाफ दाखिल राज्य सरकार की याचिका को स्वीकार कर लिया था। इसके बाद लालू ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अब भाजपा इस मामले को लेकर प्रधानमंत्री पर दवाब डालने का प्रयास कर रही है कि वह सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने का निर्देश दें। एक बात तो तय है कि इस फैसले के बाद अब सीबीआई से संबंधित मामले केंद्र सरकार के इशारों पर ही चलेंगे, जबकि राज्यों के अधिकार सीमित हो जाएंगे। सीबीआई का मामला केंद्र बनाम राज्य के बीच उलझकर रह गया है। राजनीतिक जानकार इस फैसले को राज्याें की शक्ति को कमजोर करने वाला बता रहे हैं। हालांकि राज्य सरकारें मामला आपराधिक हो या भ्रष्टाचार का, अब सीबीआई जांच की मांग उठाने से पहले सौ बार सोचेंगे।
इन दिनों देश की राजनीति कहां से तय होती है? अगर आप व्यवस्था से अनभिज्ञ हैं, तो आपका जवाब होगा, यह भी कोई पूछने की बात है, अधिकांश फैसले तो सेवन रेसकोर्स से ही लिए जाते हैं। अगर आप राजनीति के चतुर पंडित हुए तो आपका इशारा दस जनपथ की तरफ होगा। लेकिन आप सोच भी नहीं सकते कि दिल्ली के संभ्रांत इलाके लोधी रोड में भी एक ऐसा आवास है, जहां से सत्ता की धुरी को नियंत्रित किया जाता है, खासकर राजनैतिक विरोधियों को मजा चखाने के लिए। तो हम आपको बताते चलें- ये है देश की सबसे प्रतिष्ठित जांच एजेंसी सीबीआई का मुख्यालय यानी सीजीओ कॉम्पलैक्स। ये हम नहीं कह रहे, बल्कि तमाम राजनैतिक पार्टियां सीबीआई की वैधानिकता पर सवाल खडे क़रते रही हैं। आज राजनीति के गलियारों में वैधानिकता के साथ-साथ इसकी विश्वसनीयता पर भी ऊंगलियां उठने लगी हैं। यूपीए सरकार के मंत्रियों ने भी पिछले साल सदन में प्रश्न काल के दौरान इस तरह के सवाल खडे क़िए थे। ऐसा नहीं होता, तो क्या कारण है कि लालू जब केंद्र के साथ होते हैं, सीबीआई की जांच-प्रक्रिया धीमी हो जाती है। और उनके केंद्र-विरोधी तेवर अख्तियार करते ही उनके खिलाफ मामलों में तेजी आ जाती है। जहां आम जनता इस बात पर जोर दे रही थी कि सीबीआई पर केंद्र सरकार के नियंत्रण को कमजोर किया जाए, वहीं सुप्रीम कोर्ट के एक ताजा फैसले ने इसे और मजबूत ही किया है। आय से अधिक संपत्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लालू दंपत्ति को राहत देते हुए कहा कि सीबीआई जांच से बरी किए जाने पर या तो केंद्र सरकार अपील कर सकती है या खुद सीबीआई, राज्य सरकार को ऐसे मामलों में अपील दायर करने का अधिकार नहीं। एक बार फिर राज्यों के अधिकार छीनकर सीबीआई पर केंद्र की जकडन को मजबूत किया गया है।
अपने इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को पटना हाईकोर्ट में अपील दायर करने के अधिकार को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट का कहना है कि लालू दंपत्ति के खिलाफ सीबीआई ने ही अभियोग चलाया था। हालांकि इससे पहले पटना हाईकोर्ट ने लालू दंपत्ति को बरी करने के फैसले के खिलाफ दाखिल राज्य सरकार की याचिका को स्वीकार कर लिया था। इसके बाद लालू ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अब भाजपा इस मामले को लेकर प्रधानमंत्री पर दवाब डालने का प्रयास कर रही है कि वह सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने का निर्देश दें। एक बात तो तय है कि इस फैसले के बाद अब सीबीआई से संबंधित मामले केंद्र सरकार के इशारों पर ही चलेंगे, जबकि राज्यों के अधिकार सीमित हो जाएंगे।
सीबीआई का मामला केंद्र बनाम राज्य के बीच उलझकर रह गया है। राजनीतिक जानकार इस फैसले को राज्याें की शक्ति को कमजोर करने वाला बता रहे हैं। हालांकि राज्य सरकारें मामला आपराधिक हो या भ्रष्टाचार का, अब सीबीआई जांच की मांग उठाने से पहले सौ बार सोचेंगे। उसकी वजह यह है कि सीबीआई जांच में कोई अभियुक्त अगर निचली अदालत से ही बरी हो जाता है और सीबीआई उच्च न्यायालय में अपील नहीं करती, तो राज्य सरकार अपराधी को सजा दिलाने के लिए कुछ भी नहीं कर सकती। यह केंद्र पर निर्भर करता है कि वह इस मामले में अपील दायर करेगी या नहीं। या हो सकता है इसका इस्तेमाल राजनैतिक विरोधियों को अपने पाले में रखने के लिए करे। सत्ता में कोई किसी का सगा नहीं होता और हमेशा के लिए कोई दुश्मन नहीं होता-ये मुहावरा आज सत्ता के चाल-चरित्र का बखूबी वर्णन करते हैं। ऐसे में जैसे ही कोई राजनैतिक अभियुक्त केंद्र से दूरी बनाने का प्रयास करता है, उसके पुराने मामलों को लेकर सीबीआई न्यायालय पहुंच जाती है। यही एकमात्र डर विरोधी दल के नेताओं को सांसत में रखने के लिए काफी है। लोकतंत्र में संख्या-बल मायने रखता है ऐसे में एक भी सांसद के इधर-उधर होने से केंद्र की सत्ता डगमगाने लगती है। पहले तो कांग्रेस सरकार में शामिल करने के लिए मायावती पर डोरे डालने में लगी रही, मामला नहीं बनता देखकर केंद्र ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना ही जरुरी समझा। राजनैतिक विश्लेषकों की मानें तो कांग्रेस यूपी में अपना जनाधार बढाने के लिए दलित कार्ड खेलने की तैयारी में है, जिसके मार्ग में मायावती एकमात्र बाधा हैं। यही कारण है कि आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआई यूपी की मुख्यमंत्री मायावती पर नकेल कसने की कोशिश करती रही है। केंद्र के निर्देश पर ही मायावती के मामले में सीबीआई कभी नरमी, तो कभी गरमी का रूख अख्तियार करती रही है।
अभी तक अपराध की सीबीआई जांच की सिफारिश करने की मांग राज्य सरकारें ही करती रही हैं। लेकिन अब अपील करने का अधिकार केंद्र के पाले में होगा, ऐसे में राज्य सरकारें अपने हाथ बांधना नहीं चाहेंगी। अब राज्य सरकार को अगर लगता है कि किसी व्यक्ति ने राज्य की संपत्ति की हानि पहुंचाई है, तब भी चुप रहने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं। उसे पता है आखिर में मामला सीबीआई के पाले में ही जाना है। हालांकि इसके पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के मामले को लेकर राज्य के अधिकारों पर चोट की है। अगर किसी मामले की सीबीआई जांच कराने का फैसला उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट करती है, तो ऐसे में संबंधित राज्यों से सहमति लेने की जरुरत नहीं।
फिर बात करते हैं लालू यादव की राजनीति पर। दरअसल लालू बिहार में सुशासन का नारा देने वाले नीतीश कुमार के खिलाफ प्रदेश में कांग्रेस का साथ चाह रहे थे। पिछले चुनाव में टिकटों के बंटवारे में कांग्रेस को दरकिनार किए जाने के कारण कांग्रेस प्रमुख नाराज चल रही थीं। यूपीए सरकार से संबंध सुधारने के संकेत लालू लंबे समय से दे रहे थे। हालांकि महिला आरक्षण विधेयक को लेकर संसद में उनके तेवर गरम दिखे। केंद्र को भी इस विधेयक को पारित कराने के लिए लालू के समर्थन की जरुरत थी। इसके साथ ही अभी बिहार में राज्य सभा का चुनाव भी होना है। रामविलास पासवान को राज्य सभा में भेजने के लिए लालू कांग्रेस की मदद करने का संकेत दे चुके थे। यही कारण है कि राजनैतिक जोड-तोड क़ा फायदा लालू को सीबीआई मामलों में बरी कर दिया गया, राजनैतिक विश्लेषकों का ऐसा मानना है। हालांकि चारा घोटाले में भ्रष्टाचार के कई मामले अभी भी लालू यादव का सुख-चैन छीन सकते हैं। लेकिन कांग्रेस के सहारे ही वे उम्मीद लगाए हैं कि उनकी डगमग नैया इस बाधा को पार कर लेगी।
अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष बूटा सिंह भी इससे पूर्व सीबीआई पर राजनैतिक षडयंत्र का आरोप लगाते हुए यह कहते रहे हैं कि सीबीआई जांच एजेंसी की भूमिका का निर्वाह सही तरीके से नहीं कर रही। यह आरोप उन्होंने बेटे स्वीटी सिंह पर एक करोड रुपए घूस लेने के आरोप में चल रहे सीबीआई जांच को लेकर लगाए थे। राजनैतिक संरक्षण में भ्रष्टाचार के पनपने के पीछे यह भी एक कारण रहा है। जहां सत्ताधारी दल के नेताओं को सीबीआई जांच के मामलों में एक तरह से अघोषित छूट का होना शामिल है। हालांकि कई ऐसे मामले हैं, जिनमें सीबीआई को ढीला-ढाला रवैया अपनाने के कारण सुप्रीम कोर्ट की फटकार भी सुननी पडी है।
कुछ ऐसे राजनैतिक मामले जिनमें सीबीआई की भूमिका संदिग्ध रही है उनमें हैं-झारखंड के मुख्यमंत्री शिबु सोरेन को उच्च न्यायालय द्वारा बरी किए जाने के मामले में सीबीआई का अपील दायर नहीं करना। दूसरा मामला कांग्रेस सरकार के ही अजित जोगी के बेटे अमित जोगी का है जिसमें रामअवतार जग्ग्गी हत्या मामले में कोर्ट द्वारा बरी किए जाने के मामले में भी सीबीआई मौन रही। तो देश के बहुचर्चित मामले बोफोर्स में भी हिंदूजा बंधुओं को हाईकोर्ट द्वारा आरोपमुक्त किए जाने पर सीबीआई ने आरोप पत्र दाखिल करना जरुरी नहीं समझा।
भारत एक संघीय प्रदेश है। आज विकेंद्रीकरण का युग है जिसमें सत्ता का बंटवारा केंद्र से पंचायतों की ओर होना है। ऐसे में राज्यों के अधिकारों में कमी किए जाने को लोकतंत्रवादी संदेह की नजरों से देख रहे हैं। सीबीआई की स्थापना विशेष पुलिस स्थापना अध्यादेश के जरिए की गई है, जो ब्रिटिश शासन में जारी किया गया था। अगर सीबीआई को अपनी साख बचानी है, तो उसे क्षुद्र राजनीति से दूर ही रखना होगा। इसके लिए जरुरी है इस जांच एजेंसी को गृह मंत्रालय के चंगुल से मुक्त कर एक स्वतंत्र इकाई के रूप में स्थापित किया जाए। हालांकि इस मामले में केंद्र सरकार से यह उम्मीद करना नाकाफी होगा कि वह इस मामले में पहल कर अपने पर कतरने को तैयार होगी।
अन्य मामले जिसमें नहीं हुई अपील
बोफोर्स मामला- इसमें उच्च न्यायालय का हिंदूजा बंधुओं को आरोप मुक्त करने का फैसला जिसका पूरे देश में कडा विरोध हुआ।
शशिनाथ झा हत्याकांड- इसमें उच्च न्यायालय द्वारा झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को बरी किए जाने के बाद सीबीआई के कार्यप्रणाली पर तीखी बहस।
रामअवतार जग्गी हत्याकांड- इस हत्याकांड में कांग्रेस नेता अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को बरी करने का निर्णय लिया गया था।
अब गांव-गांव पहुंचेगी अदालत
चंदन राय
इससे गांव के किसानों को जिला पंचायतों के चक्कर लगाने से छूटकारा तो मिलेगा ही, साथ ही अब खेती-किसानी की ओर वे अधिक समय दे पाएंगे। लेकिन क्या ये कानून न्याय की गुणवत्ता को भी बहाल रख पाएगा या जातिवाद, भ्रष्टाचार के दलदल में दम तोड देगा-इस पर न्यायविदों में मतभेद है। यह कानून अगर सही तरीके से लागू किया जाए तो लोकतंत्र के विकेद्रीकरण से एक कदम आगे न्याय के विकेंद्रीकरण की ओर बढा जा सकता है
जज साहब लोगों को शांत कराने के लिए हथौडे क़ी चोट टेबुल पर दे मारते हैं। न्याय की देवी थोडी सहम सी जाती हैं। आज अदालत एक ऐसे मामले में फैसला सुनाने वाला है, जो लगभग पचास सालों से कोर्ट में चलता आ रहा है। वादी एवं प्रतिवादी दोनों ने न्याय की आस में लगभग इतने ही वर्ष कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाते गंवा दिए हैं। यह एक प्लाईवुड कंपनी का विज्ञापन है जो भारत में न्याय की सही तस्वीर पेश करता है। भारतीय न्यायालय न्याय होने से ज्यादा न्याय होते दिखने में विश्वास करती है। ऐसे मामलों में अक्सर न्यायालय से पहले यमराज अपना फैसला सुना देते हैं और न्यायालय में एक और मुकदमे से निजात मिल जाती है। यह भयावह तस्वीर कल्पना मात्र नहीं, बल्कि एक हकीकत बन चुकी है। अगर विश्वास न हो तो गांव के किसी अलगू चौधरी से पूछ लें। जस्टिस डिले इज जस्टिस डिनाइड का मंत्र न्यायालय परिसर में गीता के पवित्र श्लोक की तरह लोग जानते-मानते हैं, लेकिन होता वही है- तारीख पर तारीख देकर लोगों को कोर्ट-कचहरी में उलझाकर रखा जाता है। एक व्यक्ति के कई महत्वपूर्ण मानव दिवस कोर्ट की बलि चढ ज़ाते हैं। हालांकि एक लंबी नींद के बाद भारत सरकार की तंद्रा टूटी और उसने आनन-फानन में ग्राम न्यायालय की स्थापना करने का फैसला लागू करने जा रही है। इससे गांव के किसानों को जिला पंचायतों के चक्कर लगाने से छूटकारा तो मिलेगा ही, साथ ही अब खेती-किसानी की ओर वे अधिक समय दे पाएंगे। लेकिन क्या ये कानून न्याय की गुणवत्ता को भी बहाल रख पाएगा या जातिवाद, भ्रष्टाचार के दलदल में दम तोड देगा-इस पर न्यायविदों में मतभेद है। यह कानून अगर सही तरीके से लागू किया जाए तो लोकतंत्र के विकेद्रीकरण से एक कदम आगे न्याय के विकेंद्रीकरण की ओर बढा जा सकता है।
केंद्र सरकार ने ग्राम न्यायालय कानून पारित कर दिया है। सरकार इस कानून के जरिए पांच हजार ग्राम अदालतों का गठन करने जा रही है। इसके पीछे सरकार की सोच है कि आम आदमी को त्वरित न्याय उपलब्ध कराया जा सके। अभी 2.5 करोड से भी अधिक मामले विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। ग्राम न्यायालयों के गठन से मामलों के तेजी से निबटारे में मदद मिलेगी। सरकार की मंशा आम आदमी के कानूनी सशक्तीकरण पर जोर देना है। यदि उन्हें न्याय नहीं मिलता है तो इससे लोकतंत्र के अर्थ कमजोर होंगे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने न्याय व्यवस्था में सुधार और मजबूती को आगे भी जारी रखने का आश्वासन दिया है। सरकार ग्राम न्यायालयों के गठन पर करीब 1400 करोड रुपए खर्च करने जा रही है। अब ग्राम न्यायालय ऐसे गांववाले, जिनकी पहुंच न्यायालयों तक नहीं हो पाती, के दरवाजे पर ही न्याय दिलवाना सुनिश्चित करेगी। हालांकि इस कानून का क्रियान्वयन कुछ हद तक राज्य सरकार की मंशा पर निर्भर करता है ।
गांव के भोले-भाले लोगाें मे कानून का इतना खौफ है कि आज भी वे फौजदारी या मुकदमे के नाम से ही कांप जाते हैं। आज भी वहां न्याय के नाम पर प्राइवेट अदालतों का बोलबाला है- जो या तो माओवादियों की अदालत हो सकती है, या फिर पप्पू यादव जैसे बाहुबलियों की या फिर जातिगत खाप पंचायतें। इन पंचायतों में त्वरित न्याय होता है और उनके फैसलों को मनवाने के लिए निजी सेना या फिर समाज की नैतिक ताकत खडी होती है। बिहार के संदर्भ में न्यायालय के निचले स्तर पर समानान्तर बाहुबलियों की ग्राम-पंचायत लगती थी, जिनके फैसलों को चुनौती देने का साहस बिरले आदमी में ही होता था। नक्सली भी अपनी पंचायतों में नाक-कान काटने तक का फरमान जारी करते रहे हैं। हरियाणा के गांवों में खाप पंचायतों का आतंक तो आज भी सभ्य समाज को आतंकित करता है। इन सामुदायिक पंचायतों में सगोत्रीय एवं अंतर्जातीय विवाहों को लेकर आज भी मध्ययुगीन बर्र्बरता कायम है। इनके फैसलों ने कई जिंदगियों को बर्बाद किया है। आज भी गांवों के स्तर पर जो पंचायतें सक्रिय हैं, उनमें जाति-धर्म को लेकर संकीर्ण विचार बदस्तूर कायम हैं।
हालांकि इस कानून के अंतर्गत पांच हजार न्यायिक अधिकारियों की बहाली करना सरकार के लिए टेढ़ी खीर होगी। केवल यूपी की ही बात करें तो यहां 50 प्रतिशत से अधिक न्यायिक पद खाली हैं। और अगर संख्या की भी बात छोड दें, तो न्याय की गुणवत्ता को निचले स्तर पर बहाल रख पाना क्या संभव हो सकेगा? जब जस्टिस दिनकरन और सौमित्र सेन जैसे कई जज भ्रष्टाचार के मामले में महाभियोग का सामना कर रहे हों, तो निचले स्तर पर यह अपेक्षा रखना तो अनुचित ही होगा कि वे भ्रष्टाचार से बिना प्रभावित हुए ही काम करेंगे। ग्राम न्यायालयों में भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के लिए क्या कोई निगरानी विभाग होगा, जो इनके भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रख सके । भारत के मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन लगातार न्यायपालिका में शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार की बात करते रहे हैं।
ग्रामीण स्तर के पंचायतों में फैसले धर्म एवं जाति जैसे मामलों से संचालित होते रहे हैं। खाप पंचायतों में दलितों एवं महिलाओं को पंचायतों से दूर ही रखा जाता है। इन सभी कमजोरियाें से क्या ग्राम न्यायालय अछूते रह पाएंगे? अगर सामुदायिक पंचायतों और ग्राम न्यायालयों के फैसलों में मतभेद की स्थिति होगी, तो क्या अपने फैसलों को मनवाने के लिए उनके पास कोई तंत्र होगा? न्याय होना तो जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है सही और उचित न्याय होना। आज भी राजनेताओं एवं समाज के पैसे वाले तबकों के लिए न्यायालय से सजा हो पाने की संख्या ऊंगलियों पर गिनी जा सकती है।
हालांकि हम दावा करते रहे हैं न्याय के समानता की। कानून की नजर में सभी समान हैं तो फिर हाईप्रोफाइल मामलों में ऐसा क्यों ? कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने कांग्रेस से संबंधित वकीलों का राष्ट्रीय डाटाबैंक बनाने की वकालत की और उनके विशेष प्रशिक्षण पर जोर दिया। इसके साथ ही उन्हें न्यायपालिका की मुख्यधारा से जोडने का आश्वासन भी दिया। कांग्रेस से जुडे वकीलों से यह भी आग्रह किया गया कि वे आम आदमी के न्यायिक सशक्तीकरण एवं कानूनी शिक्षा के लिए काम करें। लेकिन एक गंभीर सवाल न्याय की गुणवत्ता को लेकर है। क्या इतने सारे न्यायिक प्रशिक्षित लोगों की बहाली संभव है? अगर ऐसा है, तो अभी तक केंद्र से लेकर राज्यों के स्तर पर इतने सारे जजों के पद क्यों खाली रखे गए? अगर न्याय की गुणवत्ता से समझौता किया गया तो लोगों को न्याय उपलब्ध करवाने की सोच पर ही सवाल उठ खडे होंगे। या कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारी ही इन न्यायिक पदों को सुशोभित करेंगे, जैसी मंशा कानून मंत्री जाहिर कर चुके हैं। मनमोहन सिंह ने कहा कि उनकी सरकार अलग-अलग राज्यों में केंद्रीय जांच ब्यूरो की 71 अतिरिक्त अदालतें गठित करने जा रही है। हाल ही में विधि आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की सुनवाई के लिए दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और मुंबई में सुप्रीम कोर्ट में क्षेत्रीय शाखाएं खोलने की बात की थी। इसके पीछे मकसद था कि पीडितों को इंसाफ के लिए सालों तक इंतजार न करना पडे। ऌस मामले में मुख्य न्यायाधीश बालाकृष्णन का कहना था कि यह अंतिम अदालत है और हमें इसकी अखंडता को बनाए रखना चाहिए। देश में सुप्रीम कोर्ट की गुणवत्ता को बरकरार रखने के लिए अगर यह जरूरी था, तो फिर ग्राम न्यायालयों में न्याय का क्या स्तर होगा? क्या गांवों में समृद्ध वर्ग फिर न्याय के लिए जिला न्यायालय और हाईकोर्ट का रूख नहीं करेंगे। क्या न्याय की गंगा जो ऊपर से नीचे गांवों तक जानी चाहिए, सतत एक समान प्रवाहित हो पाएगी?
ग्राम पंचायतों की तरह ही इस कानून का अधिकांश भार राज्यों पर डाल दिया गया है। अभी उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती शिक्षा का अधिकार कानून को लागू करने के लिए पैसे की कमी का रोना रो रही हैं। क्या राज्यों में दूसरे दलों से ये अपेक्षा की जा सकती है कि वे ग्राम न्यायालय के क्रियान्वयन के लिए उचित कार्रवाई करेंगे। भारत की 70 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है। गांधी के सपनों का भारत आज भी गांवों में ही बसता है और इस साल हम उनकी पुस्तक हिंद स्वराज का शताब्दी वर्ष भी मना रहे हैं। राजधानी में बैठे नेताओं ने गांव की नेतृत्व क्षमता पर विश्वास कम, कुठाराघात ज्यादा किया है। स्वतंत्रता के ठीक पश्चात श्री काकासाहब गाडगिल ने ग्राम स्वराय के विषय में कहा था 'स्वराय का अर्थ ही गलती करने की संधि और उस गलती से सीखने की संधि होती है।' अगर यह कानून सही तरीके से लागू होती है तो एक बार फिर हम आम आदमी का न्याय में विश्वास बहाल कर पाने में सफल होंगे।
क्या हैं ग्राम न्यायालय के प्रावधान
सरकार ने नचियप्पन समिति द्वारा 23 वर्ष पूर्व की गई सिफारिशों को अमल में लाते हुए सचल ग्राम न्यायालयों की स्थापना का फैसला लिया है। ग्रामीणों को मीलों दूर जिला और तहसील मुख्यालय पर स्थित स्थानीय न्यायालय के चक्कर लगाने में होने वाली परेशानियों से बचाने के लिए सरकार ने पांच हजार से अधिक सचल न्यायालयों की स्थापना का निर्णय लिया है, लेकिन ये अदालतें किस रूप में काम करेंगी इसकी जिम्मेदारी संबंधित राय सरकार पर छोडी ग़ई है। ज्ञातव्य है कि निचले स्तर पर नागरिकों को न्याय दिलाने के लिए ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 लागू किया गया है। न्यायालयों में लंबित मामलों का भार कम करने के लिए पांच हजार से यादा सचल अदालतों की स्थापना पर विचार किया जा रहा है। वर्तमान में नियमित न्यायालयों पर 30 लाख से भी अधिक लंबित मामलों का बोझ है। शीघ्र ही सौ से दो सौ अदालतें काम करना शुरू कर देंगी। इस काम में केंद्र सरकार भी राय सरकारों को सहायता देने के लिए तैयार है। अदालतों की स्थापना, वाहनों तथा उपकरण खरीदने के लिए केंद्र एक हजार चार सौ करोड़ की धनराशि उपलब्ध कराएगी, जिसमें से एक अदालत के लिए अधिकतम 18 लाख रुपए दिए जाएंगे। सचल न्यायालयों में किसी भी मुकदमे का निपटारा छह माह के अंदर किया जाएगा। इन अदालतों में राय सरकार द्वारा एक न्यायाधिकारी की नियुक्ति की जाएगी जिसके पास उच्च न्यायालय के प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के अधिकार होंगे। ग्राम न्यायालयों के कार्यक्षेत्र के बारे में बताते हुए अधिकारियों ने कहा कि न्यायालयों के पास दीवानी और फौजदारी दोनों मामलों की सुनवाई करने का अधिकार होगा।
इससे गांव के किसानों को जिला पंचायतों के चक्कर लगाने से छूटकारा तो मिलेगा ही, साथ ही अब खेती-किसानी की ओर वे अधिक समय दे पाएंगे। लेकिन क्या ये कानून न्याय की गुणवत्ता को भी बहाल रख पाएगा या जातिवाद, भ्रष्टाचार के दलदल में दम तोड देगा-इस पर न्यायविदों में मतभेद है। यह कानून अगर सही तरीके से लागू किया जाए तो लोकतंत्र के विकेद्रीकरण से एक कदम आगे न्याय के विकेंद्रीकरण की ओर बढा जा सकता है
जज साहब लोगों को शांत कराने के लिए हथौडे क़ी चोट टेबुल पर दे मारते हैं। न्याय की देवी थोडी सहम सी जाती हैं। आज अदालत एक ऐसे मामले में फैसला सुनाने वाला है, जो लगभग पचास सालों से कोर्ट में चलता आ रहा है। वादी एवं प्रतिवादी दोनों ने न्याय की आस में लगभग इतने ही वर्ष कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाते गंवा दिए हैं। यह एक प्लाईवुड कंपनी का विज्ञापन है जो भारत में न्याय की सही तस्वीर पेश करता है। भारतीय न्यायालय न्याय होने से ज्यादा न्याय होते दिखने में विश्वास करती है। ऐसे मामलों में अक्सर न्यायालय से पहले यमराज अपना फैसला सुना देते हैं और न्यायालय में एक और मुकदमे से निजात मिल जाती है। यह भयावह तस्वीर कल्पना मात्र नहीं, बल्कि एक हकीकत बन चुकी है। अगर विश्वास न हो तो गांव के किसी अलगू चौधरी से पूछ लें। जस्टिस डिले इज जस्टिस डिनाइड का मंत्र न्यायालय परिसर में गीता के पवित्र श्लोक की तरह लोग जानते-मानते हैं, लेकिन होता वही है- तारीख पर तारीख देकर लोगों को कोर्ट-कचहरी में उलझाकर रखा जाता है। एक व्यक्ति के कई महत्वपूर्ण मानव दिवस कोर्ट की बलि चढ ज़ाते हैं। हालांकि एक लंबी नींद के बाद भारत सरकार की तंद्रा टूटी और उसने आनन-फानन में ग्राम न्यायालय की स्थापना करने का फैसला लागू करने जा रही है। इससे गांव के किसानों को जिला पंचायतों के चक्कर लगाने से छूटकारा तो मिलेगा ही, साथ ही अब खेती-किसानी की ओर वे अधिक समय दे पाएंगे। लेकिन क्या ये कानून न्याय की गुणवत्ता को भी बहाल रख पाएगा या जातिवाद, भ्रष्टाचार के दलदल में दम तोड देगा-इस पर न्यायविदों में मतभेद है। यह कानून अगर सही तरीके से लागू किया जाए तो लोकतंत्र के विकेद्रीकरण से एक कदम आगे न्याय के विकेंद्रीकरण की ओर बढा जा सकता है।
केंद्र सरकार ने ग्राम न्यायालय कानून पारित कर दिया है। सरकार इस कानून के जरिए पांच हजार ग्राम अदालतों का गठन करने जा रही है। इसके पीछे सरकार की सोच है कि आम आदमी को त्वरित न्याय उपलब्ध कराया जा सके। अभी 2.5 करोड से भी अधिक मामले विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। ग्राम न्यायालयों के गठन से मामलों के तेजी से निबटारे में मदद मिलेगी। सरकार की मंशा आम आदमी के कानूनी सशक्तीकरण पर जोर देना है। यदि उन्हें न्याय नहीं मिलता है तो इससे लोकतंत्र के अर्थ कमजोर होंगे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने न्याय व्यवस्था में सुधार और मजबूती को आगे भी जारी रखने का आश्वासन दिया है। सरकार ग्राम न्यायालयों के गठन पर करीब 1400 करोड रुपए खर्च करने जा रही है। अब ग्राम न्यायालय ऐसे गांववाले, जिनकी पहुंच न्यायालयों तक नहीं हो पाती, के दरवाजे पर ही न्याय दिलवाना सुनिश्चित करेगी। हालांकि इस कानून का क्रियान्वयन कुछ हद तक राज्य सरकार की मंशा पर निर्भर करता है ।
गांव के भोले-भाले लोगाें मे कानून का इतना खौफ है कि आज भी वे फौजदारी या मुकदमे के नाम से ही कांप जाते हैं। आज भी वहां न्याय के नाम पर प्राइवेट अदालतों का बोलबाला है- जो या तो माओवादियों की अदालत हो सकती है, या फिर पप्पू यादव जैसे बाहुबलियों की या फिर जातिगत खाप पंचायतें। इन पंचायतों में त्वरित न्याय होता है और उनके फैसलों को मनवाने के लिए निजी सेना या फिर समाज की नैतिक ताकत खडी होती है। बिहार के संदर्भ में न्यायालय के निचले स्तर पर समानान्तर बाहुबलियों की ग्राम-पंचायत लगती थी, जिनके फैसलों को चुनौती देने का साहस बिरले आदमी में ही होता था। नक्सली भी अपनी पंचायतों में नाक-कान काटने तक का फरमान जारी करते रहे हैं। हरियाणा के गांवों में खाप पंचायतों का आतंक तो आज भी सभ्य समाज को आतंकित करता है। इन सामुदायिक पंचायतों में सगोत्रीय एवं अंतर्जातीय विवाहों को लेकर आज भी मध्ययुगीन बर्र्बरता कायम है। इनके फैसलों ने कई जिंदगियों को बर्बाद किया है। आज भी गांवों के स्तर पर जो पंचायतें सक्रिय हैं, उनमें जाति-धर्म को लेकर संकीर्ण विचार बदस्तूर कायम हैं।
हालांकि इस कानून के अंतर्गत पांच हजार न्यायिक अधिकारियों की बहाली करना सरकार के लिए टेढ़ी खीर होगी। केवल यूपी की ही बात करें तो यहां 50 प्रतिशत से अधिक न्यायिक पद खाली हैं। और अगर संख्या की भी बात छोड दें, तो न्याय की गुणवत्ता को निचले स्तर पर बहाल रख पाना क्या संभव हो सकेगा? जब जस्टिस दिनकरन और सौमित्र सेन जैसे कई जज भ्रष्टाचार के मामले में महाभियोग का सामना कर रहे हों, तो निचले स्तर पर यह अपेक्षा रखना तो अनुचित ही होगा कि वे भ्रष्टाचार से बिना प्रभावित हुए ही काम करेंगे। ग्राम न्यायालयों में भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के लिए क्या कोई निगरानी विभाग होगा, जो इनके भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रख सके । भारत के मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन लगातार न्यायपालिका में शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार की बात करते रहे हैं।
ग्रामीण स्तर के पंचायतों में फैसले धर्म एवं जाति जैसे मामलों से संचालित होते रहे हैं। खाप पंचायतों में दलितों एवं महिलाओं को पंचायतों से दूर ही रखा जाता है। इन सभी कमजोरियाें से क्या ग्राम न्यायालय अछूते रह पाएंगे? अगर सामुदायिक पंचायतों और ग्राम न्यायालयों के फैसलों में मतभेद की स्थिति होगी, तो क्या अपने फैसलों को मनवाने के लिए उनके पास कोई तंत्र होगा? न्याय होना तो जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है सही और उचित न्याय होना। आज भी राजनेताओं एवं समाज के पैसे वाले तबकों के लिए न्यायालय से सजा हो पाने की संख्या ऊंगलियों पर गिनी जा सकती है।
हालांकि हम दावा करते रहे हैं न्याय के समानता की। कानून की नजर में सभी समान हैं तो फिर हाईप्रोफाइल मामलों में ऐसा क्यों ? कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने कांग्रेस से संबंधित वकीलों का राष्ट्रीय डाटाबैंक बनाने की वकालत की और उनके विशेष प्रशिक्षण पर जोर दिया। इसके साथ ही उन्हें न्यायपालिका की मुख्यधारा से जोडने का आश्वासन भी दिया। कांग्रेस से जुडे वकीलों से यह भी आग्रह किया गया कि वे आम आदमी के न्यायिक सशक्तीकरण एवं कानूनी शिक्षा के लिए काम करें। लेकिन एक गंभीर सवाल न्याय की गुणवत्ता को लेकर है। क्या इतने सारे न्यायिक प्रशिक्षित लोगों की बहाली संभव है? अगर ऐसा है, तो अभी तक केंद्र से लेकर राज्यों के स्तर पर इतने सारे जजों के पद क्यों खाली रखे गए? अगर न्याय की गुणवत्ता से समझौता किया गया तो लोगों को न्याय उपलब्ध करवाने की सोच पर ही सवाल उठ खडे होंगे। या कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारी ही इन न्यायिक पदों को सुशोभित करेंगे, जैसी मंशा कानून मंत्री जाहिर कर चुके हैं। मनमोहन सिंह ने कहा कि उनकी सरकार अलग-अलग राज्यों में केंद्रीय जांच ब्यूरो की 71 अतिरिक्त अदालतें गठित करने जा रही है। हाल ही में विधि आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की सुनवाई के लिए दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और मुंबई में सुप्रीम कोर्ट में क्षेत्रीय शाखाएं खोलने की बात की थी। इसके पीछे मकसद था कि पीडितों को इंसाफ के लिए सालों तक इंतजार न करना पडे। ऌस मामले में मुख्य न्यायाधीश बालाकृष्णन का कहना था कि यह अंतिम अदालत है और हमें इसकी अखंडता को बनाए रखना चाहिए। देश में सुप्रीम कोर्ट की गुणवत्ता को बरकरार रखने के लिए अगर यह जरूरी था, तो फिर ग्राम न्यायालयों में न्याय का क्या स्तर होगा? क्या गांवों में समृद्ध वर्ग फिर न्याय के लिए जिला न्यायालय और हाईकोर्ट का रूख नहीं करेंगे। क्या न्याय की गंगा जो ऊपर से नीचे गांवों तक जानी चाहिए, सतत एक समान प्रवाहित हो पाएगी?
ग्राम पंचायतों की तरह ही इस कानून का अधिकांश भार राज्यों पर डाल दिया गया है। अभी उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती शिक्षा का अधिकार कानून को लागू करने के लिए पैसे की कमी का रोना रो रही हैं। क्या राज्यों में दूसरे दलों से ये अपेक्षा की जा सकती है कि वे ग्राम न्यायालय के क्रियान्वयन के लिए उचित कार्रवाई करेंगे। भारत की 70 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है। गांधी के सपनों का भारत आज भी गांवों में ही बसता है और इस साल हम उनकी पुस्तक हिंद स्वराज का शताब्दी वर्ष भी मना रहे हैं। राजधानी में बैठे नेताओं ने गांव की नेतृत्व क्षमता पर विश्वास कम, कुठाराघात ज्यादा किया है। स्वतंत्रता के ठीक पश्चात श्री काकासाहब गाडगिल ने ग्राम स्वराय के विषय में कहा था 'स्वराय का अर्थ ही गलती करने की संधि और उस गलती से सीखने की संधि होती है।' अगर यह कानून सही तरीके से लागू होती है तो एक बार फिर हम आम आदमी का न्याय में विश्वास बहाल कर पाने में सफल होंगे।
क्या हैं ग्राम न्यायालय के प्रावधान
सरकार ने नचियप्पन समिति द्वारा 23 वर्ष पूर्व की गई सिफारिशों को अमल में लाते हुए सचल ग्राम न्यायालयों की स्थापना का फैसला लिया है। ग्रामीणों को मीलों दूर जिला और तहसील मुख्यालय पर स्थित स्थानीय न्यायालय के चक्कर लगाने में होने वाली परेशानियों से बचाने के लिए सरकार ने पांच हजार से अधिक सचल न्यायालयों की स्थापना का निर्णय लिया है, लेकिन ये अदालतें किस रूप में काम करेंगी इसकी जिम्मेदारी संबंधित राय सरकार पर छोडी ग़ई है। ज्ञातव्य है कि निचले स्तर पर नागरिकों को न्याय दिलाने के लिए ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 लागू किया गया है। न्यायालयों में लंबित मामलों का भार कम करने के लिए पांच हजार से यादा सचल अदालतों की स्थापना पर विचार किया जा रहा है। वर्तमान में नियमित न्यायालयों पर 30 लाख से भी अधिक लंबित मामलों का बोझ है। शीघ्र ही सौ से दो सौ अदालतें काम करना शुरू कर देंगी। इस काम में केंद्र सरकार भी राय सरकारों को सहायता देने के लिए तैयार है। अदालतों की स्थापना, वाहनों तथा उपकरण खरीदने के लिए केंद्र एक हजार चार सौ करोड़ की धनराशि उपलब्ध कराएगी, जिसमें से एक अदालत के लिए अधिकतम 18 लाख रुपए दिए जाएंगे। सचल न्यायालयों में किसी भी मुकदमे का निपटारा छह माह के अंदर किया जाएगा। इन अदालतों में राय सरकार द्वारा एक न्यायाधिकारी की नियुक्ति की जाएगी जिसके पास उच्च न्यायालय के प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के अधिकार होंगे। ग्राम न्यायालयों के कार्यक्षेत्र के बारे में बताते हुए अधिकारियों ने कहा कि न्यायालयों के पास दीवानी और फौजदारी दोनों मामलों की सुनवाई करने का अधिकार होगा।
राहत बिना कैसा बीमा?
बीमा कंपनियों का अनुमान है कि सरकार की सामाजिक योजनाओं के चलते ग्रामीण आबादी का रुझान बीमा की तरफ बढ़ा है। बीमा प्रीमियम राशि के 2015 तक एक लाख करोड़ रुपए छू लेने का अनुमान है। ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा अभी भी बीमा कवर के बाहर है। इन कंपनियों का अगला निशाना गांव के भोले-भाले किसान हैं, जिन्हें तमाम तरह के आश्वासन देकर इस कारोबार को आगे बढाया जा सकता है। लेकिन बीमा कंपनियों के मुनाफे के इस बाजार में आम आदमी अभी भी ठगा सा महसूस करता है
दि ल का दौरा पडने पर सर्जरी लगभग दो से ढाई लाख रुपए, वाहन दुर्घटनाग्रस्त होने पर चार से आठ लाख का नुकसान, ऐसे में एक आम आदमी बीमा की शरण में जाकर ही इन झंझटों से मुक्ति पाना चाहता है। तेज भाग-दौड भरी जिंदगी में स्वास्थ्य का क्या भरोसा, कब दगा दे जाए और आपको चार से पांच दिनों के लिए अस्पताल में भर्ती होना पडे, एेसे में इलाज पर आए बिल को देखकर ही आदमी फिर से बीमार हो जाता है। सडक़ पर गाडियों में मचे रेलम-पेल के बीच कब आपकी गाडी क़ो पीछे से कोई टक्कर मार दे और लाखों की चपत लगा जाए, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। वाकई स्वास्थ्य सेवाओं एवं वाहन-दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या के कारण बीमा कराना आज की जरूरत बन चुका है। लेकिन मात्र बीमा करा लेने भर से ही आपकी दुश्वारियों का अंत नहीं हो जाता, ये शुरुआत है आपके परेशानी भरी जिंदगी की।
दरअसल बीमा कंपनियों द्वारा सरकार को आर्थिक विकास की गति बनाए रखने के लिए लांग टर्म फंड सृजित करने में मदद मिलती है। सरकार इन पैसों का उपयोग इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर उद्योगों को तमाम सुविधाएं देने पर खर्च करती है। सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में गिरावट के कारण आम आदमी निजी अस्पतालों में जाने के लिए मजबूर हुआ है। इलाज लगातार खर्चीला होता जा रहा है। सरकार पंचसितारा अस्पतालों को आगे लाने के लिए तमाम सुविधाएं तो देती नजर आती है, वहीं सरकारी अस्पतालों की सुविधाएं बढाने पर कोई ध्यान नहीं देती। यही कारण है कि भारत में हेल्थ इंश्योरेंस का बाजार फलता-फूलता जा रहा है। आम आदमी का स्वास्थ्य बीमा कंपनियों के भरोसे है। भारत में चिकित्सा सुविधा के नाम पर लूटने वाली व्यवस्था काम कर रही है। ऐसे में मध्यवर्ग हेल्थ बीमा कराने के लिए मजबूर होता है, ताकि संकट के समय में इलाज के लिए पैसे की समस्या न रहे। मेहनत की कमाई से कुछ पैसे प्रीमियम के रूप में जमाकर वह बीमा कराता है, ताकि आडे समय में आई विपदा से छुटकारा पा सके। होता ये है कि क्लेम करने के कई महीनों बाद ही उसे बीमा का पैसा मिल पाता है, तब तक या तो बीमार आदमी की मौत हो चुकी होती है या फिर वो खुद परेशान होकर उस पैसे से तौबा कर लेता है। बीमा कंपनियां ऐसे-ऐसे कानूनी दाव-पेंच निकालती है, जिसमें आम आदमी उलझकर रह जाता है। ऐसे मामलों में आम आदमी को उपभोक्ता अदालत से लेकर कोर्ट तक के चक्कर लगाने पड ज़ाते हैं। बहुतेरे मामलों में एक लंबा समय बीत जाने के बाद ही न्याय हो पाता है? क्या आपमें बीमारी या दुर्घटना के बाद भी इतनी दौड-भाग करने की कूव्वत है, अगर है तभी आप बीमा कराने के बारे में सोचें।
आइए जानें स्वास्थ्य बीमा है क्या और इसके दायरे में आम आदमी कैसे क्लेम कर सकता है? जहां जीवन बीमा आय के विकल्प की अवधारणा पर आधारित है, वहीं स्वास्थ्य बीमा सबके लिए एक समान जरूरत के मुद्दे पर आधारित होता है। स्वास्थ्य बीमा स्त्री, पुरूष, बच्चों तथा सभी नौकरी करने वालों के लिए एक समान है। स्वास्थ्य बीमा में यादातर कंपनियां थ्री डी प्रोटेक्शन प्रदान करती हैं यानी डिजीज, डेथ और डिसएबिलिटी। इन तीनों स्थितियों में हेल्थ बीमा काम आता है और कंपनी पॉलिसी होल्डर को जोखिम के अनुरूप क्लेम देती है। खासकर स्वास्थ्य बीमा किसी बीमारी, दुर्घटना या हादसे में लगने वाली चोट के लिए सुरक्षा कवच के रूप में करवाया जाता है। हेल्थ इंश्योरेंस में दवाइयों, खून और ऑक्सीजन का खर्चा, जांच, डॉक्टर और अस्पताल में भर्ती होने का खर्चा, अस्पताल की अन्य सेवाएं जैसे ऑपरेशन कक्ष, एक्स रे, लैब जांच, परीक्षण और मेडिकल एप्लायंस जैसे पेसमेकर, कृत्रिम अंग और यंत्रों आदि के खर्च के साथ-साथ कई बार आपातकालीन स्थितियों में ट्रांसपोटर्ेशन सुविधाएं भी उपलब्ध करवाई जाती हैं। बीमा कंपनियों की ओर से बडे-बडे दावे किए जाते हैं। अकस्मात दुर्घटना या बीमारी की स्थिति में अगर आपने स्वास्थ्य बीमा का कवच धारण किया हो तो ऐसा कहा जाता है कि आप निश्चित रूप से इस मुश्किल से उबर सकते हैं।
जमीनी धरातल पर हालात कुछ और ही नजर आते हैं। अभी हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया। खाड़ी देश में काम कर रहे आमोद की दुर्घटना में मौत होने पर उसकी पत्नी आरती देवी ने बीमा के लिए क्लेम किया। बीमा कंपनी द्वारा भुगतान नहीं देने पर जिला उपभोक्ता फोरम में उसने शिकायत दर्ज कराई। फोरम ने बीमा कंपनी के विरुद्ध आदेश देते हुए पंद्रह हजार रुपए का जुर्माना लगाया और पूरी बीमा राशि के भुगतान के लिए कहा। ऐसे कई मामले होते हैं, जिनमें बीमा कंपनियां बेवजह लोगों को परेशान करती हैं।
आजकल बीमा कंपनियों की एक पॉलिसी कैशलेस हास्पीटलाइजेशन सामने आई है। इस प्लान में बीमित व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती होने पर अस्पताल के बिलों का भुगतान नहीं करना होता; बीमा कंपनी सीधे बिलों का निपटान कर देती है। लेकिन होता ये है कि कंपनियां बीमा लेते समय कुछ शर्तों को छिपा लेती हैं। इसके अंतर्गत घायल व्यक्ति जहां इलाज करा रहा हो, उस अस्पताल का बीमा कंपनी से टाइ-अप होना जरूरी होता है और क्लेम के लिए दस्तावेज भी सही क्रम में होने चाहिए। उपभोक्ताओं को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि बीमा कंपनियां दस्तावेजों के सही नहीं होने को लेकर किसी भी स्तर पर आना-कानी कर सकती हैं।
बीमा कंपनियां केवल हेल्थ बीमा के क्षेत्र में ही क्लेम राशि देने के लिए ऐसा नहीं करती। वाहन बीमा के मामले में भी इनका रवैया कुछ ऐसा ही रहा है। सरकार ने नए वाहन खरीदते समय ही वाहन इंश्योरेंस लेना अनिवार्य कर दिया है। बीमा कंपनियों को इसके कारण काफी मुनाफा हुआ। लेकिन अभी भी कोर्ट के तमाम फैसले और बीमा नियामक प्राधिकरण के दिशा-निर्देश के बावजूद जब बात मुआवजे की आती है, तो उपभोक्ताओं को काफी पेचिदगियों से गुजरना पडता है। ऐसे ही एक मामले में अभी बीमा कंपनियों को सुप्रीम कोर्ट की फटकार भी सुननी पडी। अपने एक फैसले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन होने पर भी बीमा कंपनियां सडक़ दुर्घटना में क्षतिग्रस्त वाहनों का मुआवजा देने से बच नहीं सकती। एक प्रतिष्ठित बीमा कंपनी ने पश्चिम बंगाल के अभलेन्दु साहू को यह कहकर मुआवजा देने से इंकार कर दिया था कि उन्होंने अपनी निजी कार बैंक को किराए पर दिया था। बैेंक कर्मचारी कार में जा रहे थे कि गाडी दुर्घटनाग्रस्त हो गई। पॉलिसी की शर्तों के अनुसार साहू की कार निजी इस्तेमाल के लिए थी। कार का व्यावसायिक इस्तेमाल करके साहू ने पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन किया था, लिहाजा उन्हें मुआवजा नहीं दिया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मालवाहक गाडियों का उदाहरण देते हुए कहा कि ये गाडियां ओवरलोड होने पर दुर्घटनाग्रस्त हो जाती हैं, तो उस दशा में बीमा कंपनियां 75 प्रतिशत मुआवजे राशि का भुगतान करती हैं। इसी प्रकार अगर साहू ने अपनी निजी कार किराए पर देकर शर्तों को तोडा है, तो उसे 50 प्रतिशत मुआवजा दिया जा सकता है। लेकिन कुछ ऐसे भी मामले सामने आए जिसमें इंश्योरेंस कंपनी ने दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जिस समय दुर्घटना हुई उस समय ड्राइवर के पास वैध लाइसेंस नहीं था। इसलिए कंपनी क्षतिपूर्ति देने के लिए बाध्य नहीं है।
मामले बहुतेरे हैं, एक और उदाहरण पर नजर डालते चलें। मध्यप्रदेश के एक करोड़ छात्रों को बीमा कवर देने वाली योजना अदालती विवादों में उलझ कर रह गई। योजना के अनुसार प्रति छात्र एक रुपए प्रीमियम के रूप में लिया जाता था। दुर्घटना में मौत होने पर छात्र के परिजनों को 50 हजार रुपए सहायता के रूप में दिया जाना था। साइकिल क्षतिग्रस्त होने व किताबें खोने पर भी राशि का प्रावधान था। वर्ष 2007-09 के दौरान 55 क्लेम प्रकरण निरस्त करने वाली बीमा कंपनी के खिलाफ शिक्षा विभाग ने अदालत की शरण ली। कंपनी ने कई वजह गिनाते हुए इन दावों को खारिज कर दिया था। वहीं शिक्षा विभाग का कहना था कि अनुबंध की शर्तों के मुताबिक कंपनी को सभी दस्तावेज मुहैया करा दिए गए थे। मामला उपभोक्ता फोरम में पहुंचने पर ही दंड राशि के साथ क्लेम राशि का भुगतान किया गया। बीमा कंपनियों का अनुमान है कि सरकार की सामाजिक योजनाओं के चलते ग्रामीण आबादी का रूझान बीमा की तरफ बढ़ा है। बीमा प्रीमियम राशि के 2015 तक एक लाख करोड़ रुपए छू लेने का अनुमान है। ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा अभी भी बीमा कवर के बाहर है। इन कंपनियों का अगला निशाना गांव के भोले-भाले किसान हैं, जिन्हें तमाम तरह के आश्वासन देकर इस कारोबार को आगे बढाया जा सकता है। लेकिन बीमा कंपनियों के मुनाफे के इस बाजार में आम आदमी अभी भी ठगा सा महसूस करता है। कंपनियां लोगों को बीमा कराने के लिए तरह-तरह से लुभाती हैं, एक ऐसी तस्वीर निर्मित की जाती है मानो क्लेम लेना बहुत सरल और आसान हो-लेकिन जब आदमी फंसता है तो एक तो बीमारी से और दूसरा कंपनी से क्लेम लेने के लिए लडता है। यह उसके लिए दोहरा संकट होता है, जब मुश्किल भरे हालात में वह अकेले जूझ रहा होता है।
दि ल का दौरा पडने पर सर्जरी लगभग दो से ढाई लाख रुपए, वाहन दुर्घटनाग्रस्त होने पर चार से आठ लाख का नुकसान, ऐसे में एक आम आदमी बीमा की शरण में जाकर ही इन झंझटों से मुक्ति पाना चाहता है। तेज भाग-दौड भरी जिंदगी में स्वास्थ्य का क्या भरोसा, कब दगा दे जाए और आपको चार से पांच दिनों के लिए अस्पताल में भर्ती होना पडे, एेसे में इलाज पर आए बिल को देखकर ही आदमी फिर से बीमार हो जाता है। सडक़ पर गाडियों में मचे रेलम-पेल के बीच कब आपकी गाडी क़ो पीछे से कोई टक्कर मार दे और लाखों की चपत लगा जाए, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। वाकई स्वास्थ्य सेवाओं एवं वाहन-दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या के कारण बीमा कराना आज की जरूरत बन चुका है। लेकिन मात्र बीमा करा लेने भर से ही आपकी दुश्वारियों का अंत नहीं हो जाता, ये शुरुआत है आपके परेशानी भरी जिंदगी की।
दरअसल बीमा कंपनियों द्वारा सरकार को आर्थिक विकास की गति बनाए रखने के लिए लांग टर्म फंड सृजित करने में मदद मिलती है। सरकार इन पैसों का उपयोग इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर उद्योगों को तमाम सुविधाएं देने पर खर्च करती है। सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में गिरावट के कारण आम आदमी निजी अस्पतालों में जाने के लिए मजबूर हुआ है। इलाज लगातार खर्चीला होता जा रहा है। सरकार पंचसितारा अस्पतालों को आगे लाने के लिए तमाम सुविधाएं तो देती नजर आती है, वहीं सरकारी अस्पतालों की सुविधाएं बढाने पर कोई ध्यान नहीं देती। यही कारण है कि भारत में हेल्थ इंश्योरेंस का बाजार फलता-फूलता जा रहा है। आम आदमी का स्वास्थ्य बीमा कंपनियों के भरोसे है। भारत में चिकित्सा सुविधा के नाम पर लूटने वाली व्यवस्था काम कर रही है। ऐसे में मध्यवर्ग हेल्थ बीमा कराने के लिए मजबूर होता है, ताकि संकट के समय में इलाज के लिए पैसे की समस्या न रहे। मेहनत की कमाई से कुछ पैसे प्रीमियम के रूप में जमाकर वह बीमा कराता है, ताकि आडे समय में आई विपदा से छुटकारा पा सके। होता ये है कि क्लेम करने के कई महीनों बाद ही उसे बीमा का पैसा मिल पाता है, तब तक या तो बीमार आदमी की मौत हो चुकी होती है या फिर वो खुद परेशान होकर उस पैसे से तौबा कर लेता है। बीमा कंपनियां ऐसे-ऐसे कानूनी दाव-पेंच निकालती है, जिसमें आम आदमी उलझकर रह जाता है। ऐसे मामलों में आम आदमी को उपभोक्ता अदालत से लेकर कोर्ट तक के चक्कर लगाने पड ज़ाते हैं। बहुतेरे मामलों में एक लंबा समय बीत जाने के बाद ही न्याय हो पाता है? क्या आपमें बीमारी या दुर्घटना के बाद भी इतनी दौड-भाग करने की कूव्वत है, अगर है तभी आप बीमा कराने के बारे में सोचें।
आइए जानें स्वास्थ्य बीमा है क्या और इसके दायरे में आम आदमी कैसे क्लेम कर सकता है? जहां जीवन बीमा आय के विकल्प की अवधारणा पर आधारित है, वहीं स्वास्थ्य बीमा सबके लिए एक समान जरूरत के मुद्दे पर आधारित होता है। स्वास्थ्य बीमा स्त्री, पुरूष, बच्चों तथा सभी नौकरी करने वालों के लिए एक समान है। स्वास्थ्य बीमा में यादातर कंपनियां थ्री डी प्रोटेक्शन प्रदान करती हैं यानी डिजीज, डेथ और डिसएबिलिटी। इन तीनों स्थितियों में हेल्थ बीमा काम आता है और कंपनी पॉलिसी होल्डर को जोखिम के अनुरूप क्लेम देती है। खासकर स्वास्थ्य बीमा किसी बीमारी, दुर्घटना या हादसे में लगने वाली चोट के लिए सुरक्षा कवच के रूप में करवाया जाता है। हेल्थ इंश्योरेंस में दवाइयों, खून और ऑक्सीजन का खर्चा, जांच, डॉक्टर और अस्पताल में भर्ती होने का खर्चा, अस्पताल की अन्य सेवाएं जैसे ऑपरेशन कक्ष, एक्स रे, लैब जांच, परीक्षण और मेडिकल एप्लायंस जैसे पेसमेकर, कृत्रिम अंग और यंत्रों आदि के खर्च के साथ-साथ कई बार आपातकालीन स्थितियों में ट्रांसपोटर्ेशन सुविधाएं भी उपलब्ध करवाई जाती हैं। बीमा कंपनियों की ओर से बडे-बडे दावे किए जाते हैं। अकस्मात दुर्घटना या बीमारी की स्थिति में अगर आपने स्वास्थ्य बीमा का कवच धारण किया हो तो ऐसा कहा जाता है कि आप निश्चित रूप से इस मुश्किल से उबर सकते हैं।
जमीनी धरातल पर हालात कुछ और ही नजर आते हैं। अभी हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया। खाड़ी देश में काम कर रहे आमोद की दुर्घटना में मौत होने पर उसकी पत्नी आरती देवी ने बीमा के लिए क्लेम किया। बीमा कंपनी द्वारा भुगतान नहीं देने पर जिला उपभोक्ता फोरम में उसने शिकायत दर्ज कराई। फोरम ने बीमा कंपनी के विरुद्ध आदेश देते हुए पंद्रह हजार रुपए का जुर्माना लगाया और पूरी बीमा राशि के भुगतान के लिए कहा। ऐसे कई मामले होते हैं, जिनमें बीमा कंपनियां बेवजह लोगों को परेशान करती हैं।
आजकल बीमा कंपनियों की एक पॉलिसी कैशलेस हास्पीटलाइजेशन सामने आई है। इस प्लान में बीमित व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती होने पर अस्पताल के बिलों का भुगतान नहीं करना होता; बीमा कंपनी सीधे बिलों का निपटान कर देती है। लेकिन होता ये है कि कंपनियां बीमा लेते समय कुछ शर्तों को छिपा लेती हैं। इसके अंतर्गत घायल व्यक्ति जहां इलाज करा रहा हो, उस अस्पताल का बीमा कंपनी से टाइ-अप होना जरूरी होता है और क्लेम के लिए दस्तावेज भी सही क्रम में होने चाहिए। उपभोक्ताओं को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि बीमा कंपनियां दस्तावेजों के सही नहीं होने को लेकर किसी भी स्तर पर आना-कानी कर सकती हैं।
बीमा कंपनियां केवल हेल्थ बीमा के क्षेत्र में ही क्लेम राशि देने के लिए ऐसा नहीं करती। वाहन बीमा के मामले में भी इनका रवैया कुछ ऐसा ही रहा है। सरकार ने नए वाहन खरीदते समय ही वाहन इंश्योरेंस लेना अनिवार्य कर दिया है। बीमा कंपनियों को इसके कारण काफी मुनाफा हुआ। लेकिन अभी भी कोर्ट के तमाम फैसले और बीमा नियामक प्राधिकरण के दिशा-निर्देश के बावजूद जब बात मुआवजे की आती है, तो उपभोक्ताओं को काफी पेचिदगियों से गुजरना पडता है। ऐसे ही एक मामले में अभी बीमा कंपनियों को सुप्रीम कोर्ट की फटकार भी सुननी पडी। अपने एक फैसले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन होने पर भी बीमा कंपनियां सडक़ दुर्घटना में क्षतिग्रस्त वाहनों का मुआवजा देने से बच नहीं सकती। एक प्रतिष्ठित बीमा कंपनी ने पश्चिम बंगाल के अभलेन्दु साहू को यह कहकर मुआवजा देने से इंकार कर दिया था कि उन्होंने अपनी निजी कार बैंक को किराए पर दिया था। बैेंक कर्मचारी कार में जा रहे थे कि गाडी दुर्घटनाग्रस्त हो गई। पॉलिसी की शर्तों के अनुसार साहू की कार निजी इस्तेमाल के लिए थी। कार का व्यावसायिक इस्तेमाल करके साहू ने पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन किया था, लिहाजा उन्हें मुआवजा नहीं दिया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मालवाहक गाडियों का उदाहरण देते हुए कहा कि ये गाडियां ओवरलोड होने पर दुर्घटनाग्रस्त हो जाती हैं, तो उस दशा में बीमा कंपनियां 75 प्रतिशत मुआवजे राशि का भुगतान करती हैं। इसी प्रकार अगर साहू ने अपनी निजी कार किराए पर देकर शर्तों को तोडा है, तो उसे 50 प्रतिशत मुआवजा दिया जा सकता है। लेकिन कुछ ऐसे भी मामले सामने आए जिसमें इंश्योरेंस कंपनी ने दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जिस समय दुर्घटना हुई उस समय ड्राइवर के पास वैध लाइसेंस नहीं था। इसलिए कंपनी क्षतिपूर्ति देने के लिए बाध्य नहीं है।
मामले बहुतेरे हैं, एक और उदाहरण पर नजर डालते चलें। मध्यप्रदेश के एक करोड़ छात्रों को बीमा कवर देने वाली योजना अदालती विवादों में उलझ कर रह गई। योजना के अनुसार प्रति छात्र एक रुपए प्रीमियम के रूप में लिया जाता था। दुर्घटना में मौत होने पर छात्र के परिजनों को 50 हजार रुपए सहायता के रूप में दिया जाना था। साइकिल क्षतिग्रस्त होने व किताबें खोने पर भी राशि का प्रावधान था। वर्ष 2007-09 के दौरान 55 क्लेम प्रकरण निरस्त करने वाली बीमा कंपनी के खिलाफ शिक्षा विभाग ने अदालत की शरण ली। कंपनी ने कई वजह गिनाते हुए इन दावों को खारिज कर दिया था। वहीं शिक्षा विभाग का कहना था कि अनुबंध की शर्तों के मुताबिक कंपनी को सभी दस्तावेज मुहैया करा दिए गए थे। मामला उपभोक्ता फोरम में पहुंचने पर ही दंड राशि के साथ क्लेम राशि का भुगतान किया गया। बीमा कंपनियों का अनुमान है कि सरकार की सामाजिक योजनाओं के चलते ग्रामीण आबादी का रूझान बीमा की तरफ बढ़ा है। बीमा प्रीमियम राशि के 2015 तक एक लाख करोड़ रुपए छू लेने का अनुमान है। ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा अभी भी बीमा कवर के बाहर है। इन कंपनियों का अगला निशाना गांव के भोले-भाले किसान हैं, जिन्हें तमाम तरह के आश्वासन देकर इस कारोबार को आगे बढाया जा सकता है। लेकिन बीमा कंपनियों के मुनाफे के इस बाजार में आम आदमी अभी भी ठगा सा महसूस करता है। कंपनियां लोगों को बीमा कराने के लिए तरह-तरह से लुभाती हैं, एक ऐसी तस्वीर निर्मित की जाती है मानो क्लेम लेना बहुत सरल और आसान हो-लेकिन जब आदमी फंसता है तो एक तो बीमारी से और दूसरा कंपनी से क्लेम लेने के लिए लडता है। यह उसके लिए दोहरा संकट होता है, जब मुश्किल भरे हालात में वह अकेले जूझ रहा होता है।
आखिर मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त क्यों
ननकू के खेत का झगडा अगर पटवारी और तहसीलदार संभाल लें, तो ननकू अदालत क्यों जाए? ननकू के इस सवाल में ही पूरे प्रश्न का हल छिपा है। अगर विधायिका कानून बनाते समय गांधी के अंतिम आदमी के मंत्र को ध्यान में रखे और कार्यपालिका उन नीतियों को ढंग से लागू करे, तो भला न्यायपालिका को अनावश्यक हस्तक्षेप की जरुरत क्यों पडे?
आ ज न्यायिक सक्रियता का दौर है। जैसे-जैसे भारतीय संविधान परिपक्व होता गया, कार्यपालिका और विधायिका लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा से पीछे हटती गई। फिर भारत की आम जनता ने कमान अपने हाथों में संभाल लिया। जनहित याचिकाओं का दौर शुरु हुआ, जिसके कारण न्यायपालिकाओं को सक्रिय होना पडा। यही कारण है कि आज न्यायपालिका को सीवर ढका होने से लेकर महिलाओं को सेना में स्थायी कमीशन देने के मामले तक में फैसला देना पड रहा है। सडक़ के बीचों-बीच धार्मिक स्थल न बनें से लेकर आवारा पशुओं को सडक़ से हटाने तक न्यायपालिका को सक्रिय होना पडा है। लेकिन एक सवाल जो अहम है, वो ये कि आखिर क्यों न्यायपालिका को कार्यपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप करना पड रहा है? अगर सीवर के ठक्कन लगाने से लेकर लैंगिक असमानता तक सभी फैसले न्यायपालिका को ही करने हैं, तो फिर ये लोकतंत्र के दो स्तंभ क्या करेंगे? यह जरूरत क्यों आन पडी क़ि कार्यपालिका और विधायिका को अक्सर न्यायपालिका की फटकार सुननी पडती है? लोकतंत्र में आम जनता ने संप्रभुता विधायिका के हाथों में सौंपी थी कि वह उनके हित में काम करेगी। कुछ ऐसी नीतियां बनाएगी, जिससे आम लोगों का भला हो सके। अंतत: 5 साल तक संसद में चुनकर भेजने का मतलब यही था कि वह भारत की जनता के प्रति जवाबदेह होगी। लेकिन विधायिका की निष्क्रियता से परेशान होकर लोगों को न्यायपालिका की शरण लेनी पड रही है।
अगर जनहित याचिका की बात करें तो सबसे पहले यह 1979 में बिहार के विचाराधीन कैदियों की अमानवीय स्थिति को लेकर डाली गई थी। त्वरित न्याय को इन कैदियों के लिए जरुरी माना गया, मुकदमे के नतीजतन 40,000 से भी अधिक कैदियों को रिहा किया गया था। इस सिद्धांत को बाद के निर्णयों में भी लागू रखा गया। दिल्ली में बढते प्रदूषण को कंट्रोल करने के लिए न्यायालय ने करीब एक लाख औद्योगिक ईकाइयों को शहर से बाहर करने का निर्णय दिया। इस मामले में मजदूर संगठनों ने यह आरोप लगाया कि इसमें पर्यावरण के नाम पर मजदूर हितों की अनदेखी की गई। न्यायालय के इस फैसले के कारण करीब 40 लाख मजदूर प्रभावित हुए थे। तो वहीं दिल्ली को प्रदूषणमुक्त रखने के लिए सीएनजी गाडियों की जरुरतों पर जोर दिया गया। न्यायपालिका लगातार ऐसे लोककल्याणकारी फैसले लेने के लिए विवश है। अब आइए इसके कारणों की जांच-पडताल करते हैं।
कार्यपालिका के अंदर भ्रष्टाचार इस कदर जड ज़मा चुकी है कि हरेक सरकारी नीतियों की विफलता के पीछे अधिकारियों की अक्षमता ही नजर आती है। विधायिका कल्याणकारी राज्य के लिए संवेदनशील नहीं रही। समावेशी विकास की जगह कुछ लोगों के विकास की बात होने लगी। कुछ समृद्धि के द्वीप खडे क़िए गए, तो इसकी कीमत कुछ क्षेत्रों को चुकानी पडी। भारत के समृद्ध राज्यों ने अपने-अपने स्थानीय उपनिवेश बना लिए। यही कारण है कि तेलंगाना, बुंदेलखंड, पूर्वांचल की मांगें इन दिनों जोर पकडती जा रही हैं। ट्रिकल डाउन थ्योरी ने भारतीय लोकतंत्र में एक नई भिखारियों की जमात को जन्म दिया है, जिसके प्रति सरकार हमदर्द नहीं। यही कारण है कि हाल में दिल्ली सरकार को दूसरे राज्यों के भिखारियों के पुनर्वास के लिए संबंधित राज्यों से संपर्क करना पडा। यानी जो नागरिक इस राज्य की अर्थव्यवस्था में योगदान नहीं देगा, उसे राज्य सरकार जबरन उठाकर राज्य की सीमा से बाहर फेंक देगी। कल को यही तर्क इस राज्य के बेरोजगारों के लिए भी गढे ज़ाएंगे। तो विधायिका के इन तर्कों को न्यायपालिका ने सिरे से खारिज करते हुए इस तरह के कृत्य को असंवैधानिक करार दिया।
विधायिका के दोहरे मापदंड के कारण ही रिक्शे चालकों को आजतक लाइसेंस राज में जीना पड रहा है। जबकि उद्योगपति लाइसेंस राज की त्रासदी से कब के उबर चुके हैं। आखिर क्यों सरकार दिल्ली में ट्रैफिक जाम के लिए जिम्मेदार वाहन कंपनियों को सीमित संख्या में लखटकिया कार बनाने के लिए मजबूर नहीं करती? देश के अरबों रुपए स्वास्थ्य क्षेत्र में फूंके जाने के लिए जिम्मेदार तंबाकू व्यवसायियों पर रोक लगाने की बात क्यों सरकार नहीं करती? फिर इन्हीं तर्कों पर हम कैसे ट्रैफिक की बदहाली के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए गरीब रिक्शा चालकों को शहर से बाहर कर सकते हैं? यहां भी न्यायपालिका ने गरीब रिक्शा चालकों के हित में फैसला दिया और लाइसेंस राज से मुक्ति के लिए सरकार को कदम उठाने के लिए कहा। विधायिका के ऐसे फैसलों के कारण ही जनता की नजर में उसकी विश्वसनीयता घटी है। आम जनता भी उसके दमनकारी कानूनों के विरोध में न्यायपालिका रूपी ब्रहमास्त्र का प्रयोग करने से नहीं चूकती।
भारत में समय के अनुसार सामाजिक सरोकार नारों में तब्दील होते चले गए। फिर इसका जिम्मा विदेशी पूंजी से चलने वाले एनजीओ ने उठा लिया। जो विदेशी कंपनियों के दलाल बनकर भारत में कुछ- कुछ सुधारवादी काम करने का दिखावा करते रहे और ऐसी कंपनियों के हितों के लिए छुपे रूप से काम करते रहे। यही कारण है कि व्यवस्था की जकडन को ढीली करने के लिए विदेशी कंपनियां सूचना का अधिकार पर काम करने के लिए तो एनजीओ को पैसा देती है, लेकिन स्वराज जैसे काम के लिए फंड की कमी का रोना रोती है। भारत की आम जनता ने एनजीओ के इस गोरखधंधे को समझा और धीरे-धीरे इनके चंगुल से बाहर निकलने के लिए कमान खुद अपने हाथों में ले ली। दुर्भाग्य है कि तमाम सरकारी और गैर सरकारी संगठन सिर्फ सत्ता-सुख का भोग करने में लिप्त हैं और न्यायपालिका को चौबीसों घंटे सजग रहना पड रहा है। सेना में महिलाओं के स्थायी कमीशन की बात करें तो यह वर्षों से मंत्रालय दर मंत्रालय धक्के खाती रही। तमाम मंत्री आए और चले गए, तमाम सेनाध्यक्ष आए और कार्यकाल पूरा होने पर चले गए लेकिन इस लैंगिक असमानता को दूर करने की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। अंत में यह फैसला भी न्यायालय को ही करना पडा।
न्यायपालिका पर ज्यूडिसियल एक्टीविजम का आरोप लगा रहे लोगों को यह देखना चाहिए कि आखिर क्यों लोग अदालत की ओर भाग रहे हैं? आज यहां जनहित याचिकाओं की बाढ क्यों उमड पडी है? ननकू के खेत का झगडा अगर पटवारी और तहसीलदार संभाल लें, तो ननकू अदालत क्यों जाए? ननकू के इस सवाल में ही पूरे प्रश्न का हल छिपा है। अगर विधायिका कानून बनाते समय गांधी के अंतिम आदमी के मंत्र को ध्यान में रखे और कार्यपालिका उन नीतियों को ढंग से लागू करे, तो भला न्यायपालिका को अनावश्यक हस्तक्षेप की जरुरत क्यों पडेग़ी? दुनिया के लगभग हर मुल्क में युद्ध में शहीद हुए जवानों की याद में भव्य स्मारक बनाए गए हैं। भारत में सेना यह मांग लंबे समय से करती रही है, लेकिन किसी भी सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगा। जबकि नेहरु परिवार की मूर्तियां हर चौराहे, सडक़ों की शोभा बढाती दिख जाएगी। कोई सरकारी योजना की शुरुआत भी इन्हीं के नाम पर की जाती है। सरकार अगर आम जनता की उपेक्षा कर हाथी की मूर्तियां बनाने एवं पार्क पर करोडाें रुपए खर्च करने में लगी होगी और अदालत की फटकार के बाद भी मानने को राजी नहीं होगी, तो हार कर न्यायपालिका को जनहित में फैसला देने को मजबूर होना ही होगा। हालांकि न्यायपालिका की अपनी भी सीमाएं हैं। जजों की संख्या बढाकर, या कुछ कंप्यूटर लगाकर या अदालतों का डिजीटलीकरण कर मूल समस्या को एड्रेस नहीं किया जा सकता। संसद, विधानसभाओं में भी न्यायालयों की अति सक्रियता पर लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैें। यह कहा जा रहा है कि न्यायालय अपनी सीमा का अतिक्रमण कर हमारे मामलों में दखल दे रही है। लेकिन क्या ये सवाल अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए उठाया गया नहीं दिखता। हम सुस्त हैं और इस बात पर हंगामा कर रहे हैं कि दूसरा सक्रिय क्यों है?
आ ज न्यायिक सक्रियता का दौर है। जैसे-जैसे भारतीय संविधान परिपक्व होता गया, कार्यपालिका और विधायिका लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा से पीछे हटती गई। फिर भारत की आम जनता ने कमान अपने हाथों में संभाल लिया। जनहित याचिकाओं का दौर शुरु हुआ, जिसके कारण न्यायपालिकाओं को सक्रिय होना पडा। यही कारण है कि आज न्यायपालिका को सीवर ढका होने से लेकर महिलाओं को सेना में स्थायी कमीशन देने के मामले तक में फैसला देना पड रहा है। सडक़ के बीचों-बीच धार्मिक स्थल न बनें से लेकर आवारा पशुओं को सडक़ से हटाने तक न्यायपालिका को सक्रिय होना पडा है। लेकिन एक सवाल जो अहम है, वो ये कि आखिर क्यों न्यायपालिका को कार्यपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप करना पड रहा है? अगर सीवर के ठक्कन लगाने से लेकर लैंगिक असमानता तक सभी फैसले न्यायपालिका को ही करने हैं, तो फिर ये लोकतंत्र के दो स्तंभ क्या करेंगे? यह जरूरत क्यों आन पडी क़ि कार्यपालिका और विधायिका को अक्सर न्यायपालिका की फटकार सुननी पडती है? लोकतंत्र में आम जनता ने संप्रभुता विधायिका के हाथों में सौंपी थी कि वह उनके हित में काम करेगी। कुछ ऐसी नीतियां बनाएगी, जिससे आम लोगों का भला हो सके। अंतत: 5 साल तक संसद में चुनकर भेजने का मतलब यही था कि वह भारत की जनता के प्रति जवाबदेह होगी। लेकिन विधायिका की निष्क्रियता से परेशान होकर लोगों को न्यायपालिका की शरण लेनी पड रही है।
अगर जनहित याचिका की बात करें तो सबसे पहले यह 1979 में बिहार के विचाराधीन कैदियों की अमानवीय स्थिति को लेकर डाली गई थी। त्वरित न्याय को इन कैदियों के लिए जरुरी माना गया, मुकदमे के नतीजतन 40,000 से भी अधिक कैदियों को रिहा किया गया था। इस सिद्धांत को बाद के निर्णयों में भी लागू रखा गया। दिल्ली में बढते प्रदूषण को कंट्रोल करने के लिए न्यायालय ने करीब एक लाख औद्योगिक ईकाइयों को शहर से बाहर करने का निर्णय दिया। इस मामले में मजदूर संगठनों ने यह आरोप लगाया कि इसमें पर्यावरण के नाम पर मजदूर हितों की अनदेखी की गई। न्यायालय के इस फैसले के कारण करीब 40 लाख मजदूर प्रभावित हुए थे। तो वहीं दिल्ली को प्रदूषणमुक्त रखने के लिए सीएनजी गाडियों की जरुरतों पर जोर दिया गया। न्यायपालिका लगातार ऐसे लोककल्याणकारी फैसले लेने के लिए विवश है। अब आइए इसके कारणों की जांच-पडताल करते हैं।
कार्यपालिका के अंदर भ्रष्टाचार इस कदर जड ज़मा चुकी है कि हरेक सरकारी नीतियों की विफलता के पीछे अधिकारियों की अक्षमता ही नजर आती है। विधायिका कल्याणकारी राज्य के लिए संवेदनशील नहीं रही। समावेशी विकास की जगह कुछ लोगों के विकास की बात होने लगी। कुछ समृद्धि के द्वीप खडे क़िए गए, तो इसकी कीमत कुछ क्षेत्रों को चुकानी पडी। भारत के समृद्ध राज्यों ने अपने-अपने स्थानीय उपनिवेश बना लिए। यही कारण है कि तेलंगाना, बुंदेलखंड, पूर्वांचल की मांगें इन दिनों जोर पकडती जा रही हैं। ट्रिकल डाउन थ्योरी ने भारतीय लोकतंत्र में एक नई भिखारियों की जमात को जन्म दिया है, जिसके प्रति सरकार हमदर्द नहीं। यही कारण है कि हाल में दिल्ली सरकार को दूसरे राज्यों के भिखारियों के पुनर्वास के लिए संबंधित राज्यों से संपर्क करना पडा। यानी जो नागरिक इस राज्य की अर्थव्यवस्था में योगदान नहीं देगा, उसे राज्य सरकार जबरन उठाकर राज्य की सीमा से बाहर फेंक देगी। कल को यही तर्क इस राज्य के बेरोजगारों के लिए भी गढे ज़ाएंगे। तो विधायिका के इन तर्कों को न्यायपालिका ने सिरे से खारिज करते हुए इस तरह के कृत्य को असंवैधानिक करार दिया।
विधायिका के दोहरे मापदंड के कारण ही रिक्शे चालकों को आजतक लाइसेंस राज में जीना पड रहा है। जबकि उद्योगपति लाइसेंस राज की त्रासदी से कब के उबर चुके हैं। आखिर क्यों सरकार दिल्ली में ट्रैफिक जाम के लिए जिम्मेदार वाहन कंपनियों को सीमित संख्या में लखटकिया कार बनाने के लिए मजबूर नहीं करती? देश के अरबों रुपए स्वास्थ्य क्षेत्र में फूंके जाने के लिए जिम्मेदार तंबाकू व्यवसायियों पर रोक लगाने की बात क्यों सरकार नहीं करती? फिर इन्हीं तर्कों पर हम कैसे ट्रैफिक की बदहाली के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए गरीब रिक्शा चालकों को शहर से बाहर कर सकते हैं? यहां भी न्यायपालिका ने गरीब रिक्शा चालकों के हित में फैसला दिया और लाइसेंस राज से मुक्ति के लिए सरकार को कदम उठाने के लिए कहा। विधायिका के ऐसे फैसलों के कारण ही जनता की नजर में उसकी विश्वसनीयता घटी है। आम जनता भी उसके दमनकारी कानूनों के विरोध में न्यायपालिका रूपी ब्रहमास्त्र का प्रयोग करने से नहीं चूकती।
भारत में समय के अनुसार सामाजिक सरोकार नारों में तब्दील होते चले गए। फिर इसका जिम्मा विदेशी पूंजी से चलने वाले एनजीओ ने उठा लिया। जो विदेशी कंपनियों के दलाल बनकर भारत में कुछ- कुछ सुधारवादी काम करने का दिखावा करते रहे और ऐसी कंपनियों के हितों के लिए छुपे रूप से काम करते रहे। यही कारण है कि व्यवस्था की जकडन को ढीली करने के लिए विदेशी कंपनियां सूचना का अधिकार पर काम करने के लिए तो एनजीओ को पैसा देती है, लेकिन स्वराज जैसे काम के लिए फंड की कमी का रोना रोती है। भारत की आम जनता ने एनजीओ के इस गोरखधंधे को समझा और धीरे-धीरे इनके चंगुल से बाहर निकलने के लिए कमान खुद अपने हाथों में ले ली। दुर्भाग्य है कि तमाम सरकारी और गैर सरकारी संगठन सिर्फ सत्ता-सुख का भोग करने में लिप्त हैं और न्यायपालिका को चौबीसों घंटे सजग रहना पड रहा है। सेना में महिलाओं के स्थायी कमीशन की बात करें तो यह वर्षों से मंत्रालय दर मंत्रालय धक्के खाती रही। तमाम मंत्री आए और चले गए, तमाम सेनाध्यक्ष आए और कार्यकाल पूरा होने पर चले गए लेकिन इस लैंगिक असमानता को दूर करने की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। अंत में यह फैसला भी न्यायालय को ही करना पडा।
न्यायपालिका पर ज्यूडिसियल एक्टीविजम का आरोप लगा रहे लोगों को यह देखना चाहिए कि आखिर क्यों लोग अदालत की ओर भाग रहे हैं? आज यहां जनहित याचिकाओं की बाढ क्यों उमड पडी है? ननकू के खेत का झगडा अगर पटवारी और तहसीलदार संभाल लें, तो ननकू अदालत क्यों जाए? ननकू के इस सवाल में ही पूरे प्रश्न का हल छिपा है। अगर विधायिका कानून बनाते समय गांधी के अंतिम आदमी के मंत्र को ध्यान में रखे और कार्यपालिका उन नीतियों को ढंग से लागू करे, तो भला न्यायपालिका को अनावश्यक हस्तक्षेप की जरुरत क्यों पडेग़ी? दुनिया के लगभग हर मुल्क में युद्ध में शहीद हुए जवानों की याद में भव्य स्मारक बनाए गए हैं। भारत में सेना यह मांग लंबे समय से करती रही है, लेकिन किसी भी सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगा। जबकि नेहरु परिवार की मूर्तियां हर चौराहे, सडक़ों की शोभा बढाती दिख जाएगी। कोई सरकारी योजना की शुरुआत भी इन्हीं के नाम पर की जाती है। सरकार अगर आम जनता की उपेक्षा कर हाथी की मूर्तियां बनाने एवं पार्क पर करोडाें रुपए खर्च करने में लगी होगी और अदालत की फटकार के बाद भी मानने को राजी नहीं होगी, तो हार कर न्यायपालिका को जनहित में फैसला देने को मजबूर होना ही होगा। हालांकि न्यायपालिका की अपनी भी सीमाएं हैं। जजों की संख्या बढाकर, या कुछ कंप्यूटर लगाकर या अदालतों का डिजीटलीकरण कर मूल समस्या को एड्रेस नहीं किया जा सकता। संसद, विधानसभाओं में भी न्यायालयों की अति सक्रियता पर लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैें। यह कहा जा रहा है कि न्यायालय अपनी सीमा का अतिक्रमण कर हमारे मामलों में दखल दे रही है। लेकिन क्या ये सवाल अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए उठाया गया नहीं दिखता। हम सुस्त हैं और इस बात पर हंगामा कर रहे हैं कि दूसरा सक्रिय क्यों है?
Subscribe to:
Posts (Atom)